Skip to main content

Full text of "Bhallata Shatak With Maheshwari Sanskrit Tika Ved Kumari Ghai"

See other formats




| “ < =® ह £. ५- क्क गष ह ++ ~ "4 -- ग ~ न 4 च~ च 
भक , 1 ह = 
१. " च 

1 ॐ द ः ज 

क 4 

। 

 । । 

द्य ^ 


 माहेर्वरी संस्कृत टीका, हिन्दी एवं अंजी । 
प्रचुवाद सहित अ्रालोचनात्मक संस्कररण | | 
। 


डां वेदकुमारी घ | 
डां० रासभ्रलाप , न 
१ 
| 
1 
: 
( 


मेहर चन्द लदम्नदास पल्त्निकेडान्स ११ 
नड दिल्लौ-२ ` ‡ 


| ((-0 9118511। 5116118 1 05114811 01661100. 01411260 0 6081001 





४ 4 {| ४५. १३ = - १५ ५, 
1 ॥ > कि, ~ # न ~= = + , भर व 4, ° "न 

र १ „ "4 १ ` ¡नैन । + न ^ ॥ #* ॐ, + तकत, । 

५*.४। ५६. ४ ४५ “> „ 9 त क) 9 0 क म, 7 7. ~ 7 + 





४ ४ 
॥ कै 
#। 
| 1 
कीर 
"०: 





((-0 9118511। 51164118 1 05114181 01661100. 01411260 0 60810011 





@.6 -0 511851। 51161618 70811९18} ©0॥€५01. [21111260 0 6800011 


|; । श 






मद्टशरतक 
| 1 प्रह एप ^... ^6471^.1< 4. 


((-0 91188511। 5116118 1 0511/.181। 01661100. 01411260 0 66810011 





च = 


जा 


((-0 9118511 51164118 1 0511.1811। 01661100. 01411260 0 6810011 





काङहमीरकक वि मल्लटकृतं 
अभल्लवट्गतक 


[ माहेडव री संस्कृत टीका, हिन्दी एवं भ्रंग्रेजी श्रनुवाद सहित 
ग्रालोचनात्मक संस्करण | 


डा० वेदकुमारी घई 
डा० रामप्रताप 
सस्छृत विभाग, जम्मू विङव विद्यालय 


सवे विक्रयाधिकारी 





मेहर चन्द लह्मनदास 
नई दिल्ली-११० ००२ 


((-0 9118511। 5116118 1 0511/.181। 01661100. 01011260 0 66810011 





प्रकारक : 
मेहरचन्ट लछमनदास पट्लिकेशन्स 
1, दरियागंज, नई दिल्ली-110 002 


यहे पृस्तक जम्मू विश्वविधालय की ग्राथिक सहायता 
से प्रकाशित की गई है। | 


रथम संस्करण 
1985 





| | दा । श्य । रि दल्लं गी १ 


(-0 91185111 91618 105111<181। (0661101). ¢ 1. ©68110011 





५ भ 





1 "^> 4 
| ` = ` च 2 १ | 9 1] # ॥ ~ 
[० | "र ह 3 4 गे (0 4 + । 1 9 ~ + न [कि ग यि ते 


1८45101२ 70६7 80 ^11.^^..3 
ए^1.1.^1^9^.1^.1 ^ 


[^ 6111681 €411101 71} &8715111{ 60716018 2 118165४878, 
170} 379 1811511 {780513110185| 


07. श्वात्र्यं 791 
07. दशा079180 
06071601 9 88056711, वद्ापिप 1\/67511५ 


५५ 


5012 0151176011101.5 





^ 0५7) 1.4 (प्रप 11^ ^ 5 
` पष्ट षा. प्रा-110 002 


((-0 9118511। 9116418 1 05111811 0661100. 14111260 0 6810011 








5 101150६वं 6} 
॥ | ततता) 1.46 तप्त 045 एएए.1८^+ 71105 
1, 40591 ९२०३, 0 वा +3881}, पप» 70401110 002 


[70 † 
००६ 125 66] एण015060 ए) {116 0081618] 25513181}. 
0) 1377] पाण्ट. | | 





| 151 6011; 


1985 


९5. 50/- 


अं ए 1/९ 4) 


| 9 ए ; 1; 
0७ ६०६ 1 ए१ा१४॥९ ॥ 
र 38९27}, पष 4 
©©-0 91185॥। 561<118/ 70511/411811 06101. 09 ग 0800011 


1 4 














 81\12}, (9११ 


1{2831171177 185 एला 3 © 016 9 {70180 (पाणा € अत्‌ लाणा1281107 
51166 भला४ €वा]४ (1168. (1115 एल्वपाणि। गल 13 6९ लत 101 
011 07 18 181] 06815 प 2180 07 115 007४, 0110507४ 
210 01116 171{लाटलप81 8 ला1€भ्लाला5. 


¶ [75 0०1८ €0118प्ा7 20001 100 *लाऽ€§ ° 116 1९85771 0६ 
31211318 1195 एल) ल1616911$ €011€0 गात 1741518160 1 प्र1101 817 
ए18118]1 ८४ 07. ४९ [पारा 181 वात 0. हता) 21818) ५) 
ता [7श्लाऽ)1४. 106 ४बाप€ 9 11015 ल्वा 15 ला1712400660 षणा 
1116 {लण्डनमा ° 91 ०1त ऽछा] ल्गाापाला दा 1071 {116 एला गय 
50111 1701871 शा{ल, 1/18165४278., एू1116 1188 एषद्ला एपए1516त {ज 
116 0751 11716. [{ 1ऽ 8 लालणं7 ट्क्णा€ ग ऽद्षाऽनाा {00165 111 
11656 2€{ €021 76800756 {7071 8॥| 8115 0 [71418 211 876 105 व) 
11117001181{ 960 07 74110718] 11{€2741101. 

16 *लाऽ८७ 0 1118 &82181:8 216 [1 जा 5817176 31 50६8650 
2110 &1४€ 2. वृ€्शाः [लणा€ ०1 1681 118. {113 19{€ 2 [0€7# 1185 115 
1611181 ४816 210 15 161९५211 €शला 10५2४. (ऽ 11715 1169४ 
९0771700511011 1§ 8 ९८01116 ६५61107 10 {16 9818धा1{ 1169६. 
1076 176 ऽलागक§ अत 5[प्रतला1§ ° 38115161 12120826 {| 7716 
{16 ०001८ 17{€165117£ 810 परि). 


ञाण 18५५1 11, २. एर 
पपि0४ल110€' 14, 1५84 


((-0 9118511। 5116118 1 05111811 01661100. 01411260 0 66810011 


((-0 9118511। 51164118 1 0511९811 01661100. 01411260 0 66810011 








कतज्ञतः ज्ञापन 


जम्मू विडवविद्यालय कै कुलपति प्रो मनसाराम पुरीकेप्रति हम हादिक 
ग्राभार प्रकट करते हँ जिन्ोने इस पुस्तक का प्राक्कथन लिखकर हमे 
उत्साहित किया है । 

श्री एस० भास्करन्‌ नायर, डाइरेक्टर, विश्वेश्व रानन्द विरववन्धु वेदिक 
रोध संस्थान, होशियारपुर ने भल्लटश्तकं के मलयालम लिपि मे लिखे 
हस्तलेख को उपलब्ध करा कर तथा पठ कर हमारी सहायता की है, एतदथं 
हम उनका हृदय से धन्यवाद करते हं। जम्मु विश्वविद्यालय के केन्द्रीय 
पुस्तकालय, मद्रास की गवरनमेन्ट ग्रोरियण्टल मेन्युस्क्िष्ट्ूस लादव्रेरी तथा 
प्रडियार्‌ की श्रडियार लाइत्ररी कै श्रधिकारियों को हस्तलेख प्रदान करने के 
लिए धन्यवाद देते हैँ । इस पुस्तक की प्रेस कापी तेयार करने में हमारे शिष्य 
डा० केदारनाथ, डा० भारतभूषर तथा श्री प्रशान्तकुमार आ्राचायं का 
सराहनीय योगदान रहा है । वे हमारे भ्राश्ीर्वाद के पात्र हैं| 

इस ग्रन्थ कै प्रकाशन के लिए ्रधिक सहायता प्रदान कराने तथा श्रन्य 
प्रकार का सहयोग देने के लिए जम्म विइवविद्यालय के कुलसचिव, 
श्री केवलकृष्ण गुप्ता तथा सहायक कुलसचिव, श्री वाचस्पति शर्मा के प्रति भी 
हम म्रपना भ्राभार प्रकट करते हैँ । इसको छपाई तथा साजसज्जा में मससं 
मेह॒रचन्द लछमनदास पचव्लिकेशन्स के प्रधिपति श्री सुदशनकुमार ने विशेष 
परिश्रम किया है । इसके लिए हम उनके कृतज्ञ द । 


जम्मू तवी वेदकुमारी घरई 
१६ नवम्बर, १६८४ रामपरताप 


((-0 9118511। 51164118 1 0511/.1811। 01661100. 01011260 0 66810011 








(१०५५४९५0 € 615 


€ पल्ल) 1 8 &7681 एशष्छ€ 10 €>ए7655 0पा 91766ा€ 72117906 
{० 2088507 74. ए. एणाः), 166. ग्ण्व्लाल, शाप ताार्लाऽार, 
0 708 106 ए०गलकणत. 


५/६ 316 ह62॥1$ ००1९6 ० 9011 28125 विड, 0160, 
४. ४. २. 1., ठभ 0 0021108 २४६180८६ {० ए5 1४5 विण. 3506 
ण 1.31 (क्षत (नाल्नीगण आत णिः पलवल शात2ा ल 11 15 
71690108. {716 1612 ग {€ [01205 ° 00श्दा7ा€०४ [एड ४, 
10785, 46987 [0 श४, 409४87 210 176 (काग [णिषा$ ण 
वथ्फणप णर्लऽ$ 15 2180 86100 01€0ह६्वं 9 10४1078 ४5 116 
6000165 9 १6 0शप्ऽल 15. 


007 {121८3 876 ००८ {0 17६ ााश€ा511$ 2 1770४ 07 59061107. 
8 8 ऽप्05य$ 20 ६० ऽं &, ६, उ ण9, रदं 3ा 27 3071 ४.२. 
9108018, &5515180{ ९888 (0०120005) 07 भत 1ण1ला€5॥ वा 
18 एण्णील्शगा. प्© ६४८ [ल्डऽप्राल 10 दपण लऽऽ7ह छपा 20661100216 
61085 10 छपा ऽ1006015, 707. ८6087 }42{1, ऽ 20821 8705141 
20 $ ?. , 40021798, 170 [४४6 [एत ०5 19 17€ एलु 221107 
ण ए7685-6070‰. छण, फट अ€ हाशारणि ॥ अपा उप्तम ञक्षा ज 
11688678. 14690870 1.260187625 एपएा16&६008, प्म 7206111 
0 १गुत्०६ 2178 16 ए7108 छण {013 छठा 10 {16 [८ऽ€्ौ 0. 


वका 0 | $ध्वाधणाणक्षा) जठ 
प्विठश्लाषएल 16, 1984 |: 11111111 


((-0 9118511। 51164118 1 05111.1811। 01661100. 01411260 0 66810011 





विषय सूचौ 
सम्पादकोय 


१. संस्कृत कविता को कश्मीर का योगदान 
२. मुक्तक का लक्षण 

३. मूक्तक का स्वरूप एवं भेद 

४. भल्लट का जीवन तथा समय 

५. भल्लटशतक की व्यङ्ग्योक्तियां 

६. कडमीरी मुक्तकों की परम्परा 

७. मल्लटरतक के प्रस्तुत संस्करण में प्रयुक्त 


टस्तलिखित प्रियां 


्ग्रेजो भूमिका 


९/४ 


१९१ 


१२९ 


| 
न्ट 


मूलपाठ, सस्कृत व्याख्या, हिन्दी तथा श्रग्रेजो ञ्ननुवाद १- १२५ 


परिश्षिष्ट 


इलोकानुक्रमरिका 


((-0 91188511। 51164118 1 0511/.1811। 01661100. 01411260 0 6810011 


१२७ 


१२३३ 


((-0 9118511। 51164118 1 05114811 01661100. 01411260 0 66810011 


(0 $ 
।॥ > 1१:96 6/ 94 ।९।,। 


18 (०0० म हीणा 10 52309त1( 
ए०्धार 2०6 २0668 


2, @€्णाला9] 0क्षहतान ग पातश 
3 एनान 80 1065 ० किण ०॥८३ 
4 02४6 ° 2191188 

ॐ. 59175 1० {€ ण्न ण 2121818 
6* ¶6प्णढ ला(लइण 7 3091198 

7. निश्णप्ऽ०1018 म 80912198 {82 


8. 190४5611 ८५९० 10 {€ एए 9 {06€ 
िहठऽलाप त्ताप्रणा ज एाशाभर्ऽवध्वा(४ 


हा ऽपि साा (ठाना ९९ ^ पपा १.२१, (19.819) | 
वि पाप्िणि प्रणि उलप 


जि 0 *८९ 525 


((-0 9118511। 51164118 1 05111.181। 01661100. 01411260 0 66810011 


25.38 


26 
28 
28 
33 


35 


36 


1 ~ 125 


133 





| = 3118511| 5116118 1 0511/.181। 01661100. 01011260 0 6810011 


सम्पादकोय 


१. संस्कृत कविता को कदमीर का योगदान 


संस्कृत कविता तथा काव्यशास्त्र की विभिन्न विघा्रों के प्रणयन मे 
कश्मीर के कवियों तथा काव्यशास्त्रियों का महान्‌ योगदान रहा है । सहज 
प्रतिभा के घनी इन महाकवियो ने मुक्तककाव्य, महाकान्यः खण्डकान्य, 
गीतिकाव्य, एेतिहासिक काव्य, धामिक कान्य तथा तीतिकान्यादि सभी 
प्रकार के काव्यो की रचना की है । यदि भल्लट, कल्टण, विल्टण, रम्भ, 
जोनराज तथा श्रीवर श्रादि कदमीरी कवियों कौ रचनाभ्रों को संस्छृत साहित्य 
मे से निकाल दिया जाये तो गुण ग्रौर परिमाण में बहुत थोड़ा साहित्य सस्कृत 
भाषा के पास रह जायेगा । साहित्यशास्त्र के रस, प्रलङ्कार, रीति, वक्रोक्ति, 
घ्वनि एवं श्रौचित्य जंसे विभिन्न सम्प्रदाय कर्मीर की घाटी मे उपने भ्रौर 
पनपे हँ । यह्‌ बात दूसरीदहै कि भरत, दण्डी, विश्वनाथ, विश्चवनाथदेव एवं 
पण्डितराज जगन्नाथ श्रादि श्राचार्यं कदमीरेतर हैँ । परन्तु इन प्राच्यो को 
संख्या श्रल्प ही है । वस्तुतः मामह्‌, वामन, उद्‌भट, रुद्रट, श्रानन्दवधन, 
महिमभदु, श्रमिनवगप्त, मम्मट श्रौर क्षेमेन्द्र श्रादि कष्मीरी श्राचार्यो कौ कृतियों 
के विना प्राचीन भारतीय काव्यशास्तर भ्रस्तित्वहीन सा हो जायेगा । वितस्ता 
नदी तथा उल भील के इस हरे भरे प्रदेशमे पुरातन कालसेही दशंन, 
कान्य तथा समालोचना सम्बन्धी महतत्वपूणं ग्रन्थ लिखे जाते रहे हं जिनसे 
कषमीर की गरिमा भारत की सीमाग्रों को भी लाघकर दूरदूर तक जा पहुंची 
है । यह शास्त्रीय ज्ञान तथा म्रन्यरचना की परम्परा श्राज भी विद्यमान दहे । 
परन्तु इस दिशा में उल्लेखनीय परिणाम प्राप्त करने के लिए विशेष योजना, 
कंडी तपस्या श्रौर घोर साधना कौ भ्रावश्यकता है । हस्तलिखित ग्रन्थों के 
प्रकाशन, ग्रकाडित ग्रन्थों के अ्रनुवाद तथा समालोचना एवं नद मौलिक 
कृतियो से यह्‌ उज्ज्वल परम्परा जीवित रह्‌ सकेगी । प्रस्तुत संस्करण इस 


दिशा मे एक विनघ्न प्रयास है। 


२. मूक्तक का लक्षण 
शल्दक्तल्यद्रम मे मुक्तक की व्युत्पत्ति इस प्रकार दिखलाई गईं हं - 
मुक्तकं क्ली ° ( मुच्यते स्मेति । मुच्‌ +क्त संज्ञायां कन्‌) काव्यविङेषः।" इस व्युत्पत्ति 
0 


]. राजा राधाकान्तदेवविरचित शुब्दकल्पहं नः तृतीय काण्ड, सं० ७२६ (दिल्ली, १६६१ 


((-0 9118511। 9116418 1 05111<181। 0661100. 01011260 0 6810011 


। + ~ 9 च ४ 





ने था यह कान्य. 
क अनुसार मुक्तक शब्द ॐ प्रयोग नपसक लिङ्ध मे होता है 0 ते 
विशेष का वाचकं हे । यह स्वयं पक्त होता है भ्र्थात्‌ एकं मुक्तक र 
पम्बन्य नहीं होता है । अग्निुराय मे इस ुक्तके का प्रमुख ४ 
चमत्कार को उत्पन्न करना वताया है 
मुक्तके इलोकं एवेकश्चमत्कारक्षमः सताम्‌ ।1 र 
पहंदयों के लिए मत्कार उत्पन्न करने मे समर्थं एक ही ॥ श 
रोता है । किन्तु द नमक्कृति किन किन बातो पर निर्भर रहती अ 
नचा पुराणकार ने नहीं की लोक एवैक" कहकर मुक्तक को न 
क्षी स्वीकार किया गया हे। इर कथावस्तु, रस, गुण, चमत्कार १ ९ 
(10 ता होना पड़ता है । काठ्याद्छमे दण्डी ने न (4 
िपादन करते €ए वताया है कि कतक महाकाव्य के भ्रन्तग॑त 
गाता है- 
पृक्तके कुलकं कोषः सङ्घात इति ताहशः । 
सगेबन्य ्गूपत्वा नुक्त; पद्यविस्तरः ।।2 
मुक्तक, ॐलक, कोष श्रौ 


र्सङ्कात भेद सगेवन्य ( महाकाव्य) के क 
। इन पद्यरूपो विस्तार नहीं किया गय हं । “मुक्तकं क ्‌ 
ट सपक्षम्‌ एकमेव चम्‌ प्रथ्‌ दत्तक श्रन्य पद्यसे भ 
(नरप त होता है । एक ही पद्य जव क्य श्रौ वरण्यं वस्तु कं 
ष्टि से पूणं हो प्र त्‌ वाक्यान्वृय र विषय की पणता की दृष्टि से श्रन्य = 
की प्रपेक्षा १ र 61 £ केहुलाता है | अमरुशतक ्रार 
॥ तके के उदाहरण हैँ । १ 
के च ९ १ परस्परसम्बये श्लोकसमूह्‌ का 7ाम हं । सामान्यतः 
सो के को कतम 1 कै निषयानुसार संग्रह 
ति को चत आ वखप्त्तत) र चुभ्य्ितग्वली रादि । 
परिमित कथावस्तर यक्त एवं एकं ही छन्दमें ग्रथित मेषद्रेत प्रादि प्रबन्धात्मक 
सवनये सङ्घात नाती है | 


कं भनुसार 
कन्दोवद्धपं 


भौ मुक्तकं उन्दोवद्ध स्वतन्त्र पद होता €~ 
र पदं तेन मुक्तेन भुक्तकम्‌ |4 
॥ 








छन्द से निबद्ध एकाकी श्रौर दूसरे लोक की श्रपेक्षा न रखने वाले पच 
को मुक्तक कहते हैँ । मुक्तक के लिए छन्दोवद्ध या इंत्तगन्धि होना अ्रनिवाय 
घमं है ।1 

अआ्यङिटतथती मौर ग़थाख्टतथती कौ भ्राययिं ओर गाथाय 
भी मुक्तकों का एक रूप टँ । इनको जव श्रव्रस्तुतत्र यता ग्रलङ्कार के माध्यम 
से प्रस्तुत किया जाताहैतोयेः गरन्यापदेश मुक्तक कहलाते है । अपस्तुतप्रशसा 
वह भ्र्थाल्कार है जहाँ किसी अप्रस्तुत वाच्य के कथन से प्रस्तुत व्यङ्ग्य का 
बोध कराया जाता है। इसके पाँच भेद है 


१. श्रप्रस्तुत वाच्य कारण से प्रस्तुत व्यङ्ग्य कायं का उपस्थापन । 


शरपरस्तुत वाच्य कायं से प्रस्तुत व्यङ्ग्य कारेण का उपस्थापन । 


+ 


३. श्रप्रस्तुत वाच्य सामान्य से प्रस्तुत व्यङ्ग्य विशेष का उपस्थापन । 


. श्रप्रस्तुत वाच्य विशेष से प्रस्तुत व्यङ्ग्य सामान्य का उपस्थापन । 


०< 


५. साह्य के श्राधार पर श्रप्रस्तुत वाच्य से प्रस्तुत ्यङ्ग्य का 
उपस्थापन । 


यह्‌ ग्रन्तिम समात्समा भ्र्थात्‌ समान गुण से समान गणं का बोध कराने 
वाली श्रप्रस्तुतप्रशंसा कभी इलेष से होती है तो कभी विना इलेष के ॑ 
चमत्कारपूणं श्रन्यापदेश मुक्तकं का यही प्रस्तुतप्रशंसा मूल भ्राघार हे । 
समय वीतने पर श्रागे जाकर हिन्दी साहित्य में प्रचलित न्योनित , सतसई, 
दोहा आर सोरठा इसी मुक्तक कौ परम्परा भे ग्रति हैँ । उदू केशेरश्रौर 
फारसी की रुबाई भी मुक्तक की हौली कही जा सकती है । हिन्दीमें किहग्य- 
खतसखई, गरुञ्जन भ्रौर कीर्परवः इसी जेली पर लिखे काव्य हं 
व्िहगखयीसतसख्ड करी प्रक्षसा में यह उक्ति प्रचलित दै 
ततसैया के दोहरा ज्यों नावक के तीर । 
देखत मेँ छोटे लगे घाव करे गम्भीर ॥ 


नावक के तीर से अभिप्राय है वहं दधोरी नली में रखे हृए पाच दस बाण 
जो इकटठे लक्ष्य पर चलाये जाते है । 


॥, 8 








९१ र्न ष 
1, वुत्तगन्धोज्कितं गद मुक्तक वृत्तगन्धि च । -साहित्यदपंण, ९१२९५ 


((-0 9118511। 5116118 1 0511/.181। 01661100. 01411260 0 66810011 





९ सुक्तककाव्य मेः स्वरूपभेद है। 
वस्तु की गति तथा पात्रों के चरित्र का 


सहायक होता 
1 है। 
पान कै विषय भ बने तन्ततसंसकार उन पात्र 


5) उनो को ठ 
देते ह ना 

करती लक तुकौकौ तकपणं र ए स्सानुभूति के सम्पादन में सहायता 
है ग्रौर्‌ णीयता भी पाठक ऊँ हदय को श्राकषित 
। ह कौ उत्सुकता उसे शौघ्रातिशीध्र 
ष्या को श्रोर रत्युकेता के कारण प्रवन्धकाव्य के 
येक प रसद ¢ ° होती है। दस्र वीसं सरस पो क 
< रत्तु मुक्तककराव्य मेँ पाठक को 
बहा नतो ६ सका ह्‌ केवल ४ ट क्याकि भ्रान दानुभरति के लिए 
= . के विपये प पचतिशेष 'पर ही रिका रहता दै । 
इए सस्कार ज्यादा काम करते 
समय सुभ" ए मुकतककाव्य का को भावी घटनाश्रों की श्नोर उन्मु- 
बाहे बदलती ररी \ क इस चग मत्कारक्षम होना श्रावदयक माना 
ह सभी उपक १ 14 मूग ति तथा रमणीयता की परिभाषा 
कोई मुक्तक ब्रहम र्णोकी उपस्थिति पततत्समय नुसार उस रमणीयता के 
य विषयो मि ९९ " घ्रषित समी जाती रही है । जन 
। आनन्द विरत्‌ कुर ण पाठक के दय के 

घ देता है तभी हदय को श्रानन्दमग्न कर 
न 11 मुक्तक पय ९ सफल मुक्तक कटा जा सकता 
कसम ^ १। प्रशंसा करते हुए एक एक 


तकेषु ट १ खदा ह 


ठ प्रवरं 
ह्यमरुकस्य नष्विव 

क रस॒ न्धाभिनि 

¶ये २ ह समान मवं १ पवन्वायमानाः प्रसिद्धाः एव 
गे तकं 

रव्य भमरुके भे भी 

केषियों दारा (ध नादिते ; शङ्कार (9 1 रखने वाले कवि 
) र्ण) काहिति करने वाले प्रबन्ध 


ही प्ते षटना त 
सत्ता ट केम समत्य 
हेती ह | इसीलिए ने ७९ दित उस 
कु 


घर व्‌ क ॥ व्य 8 


वन्या भकेभ्रन २ ही है । कमीरी महा- 
सोके, ७ दृ्तिभाग ˆ ट । इनमे श्रन्यापदेश्न या 


((-0 91185111 91168 1 05111811 0661100. 14111260 0 €0810011 











सम्पादकोय ५ 


अ्न्योवित प्रधान मुक्तकों का प्रमुख स्थान है । इनके भ्रतिरिक्त श्य ङ्गार, नीति, 

भवित, वैराग्य, उपदेश श्रादि विषयभेद से मुक्तकभेद देखे जाते हँ । कविता 
यदि जीवन की श्रालोचना है तो श्नन्यापदेश मुक्तक अ्रवशय इस कसौटी पर खरे 

उतरते हैँ क्योक्रि इनमे कविहदय की वे गहरी अ्रनुभूतियां प्रकट होती है जिन्हे 

वहु अभिधा से नहीं कट्‌ पाता हे) ग्यङ्ग्योक्तियों का सहारा लेकर कवि लता, 

पुष्प श्रादि के माध्यम से मानव जीवन के मामिक सत्यो का प्रकाशन हृदय प्रौर 
मस्तिष्क दोनों पर गहरी चोट करता है । इस शली पर सवेप्रथम लिखा गया 

शतक कदमीर के कवि भल्लट का श्रल्लट्थ्तक्त है। इसके कुछ ही प्य 
अ्रन्योकति शैली से बाहर दै । शम्भु की अनर्योक्तद्ुच्छल तः मी इसी श्रेणी 
मे रती है । श्रानन्दवर्धन का दौकीथतक्ठ, भ्रवतार का ईश्वरश्तकः, 

लोष्ठ्क का दीनणएक्रन्दनस्तोत्र रौर कल्हण का अर्धनारैशवर 
भक्तिपरक्‌ मुक्तक काव्य हैँ । क्षेमे के वतुर्वर्गखल्््रह प्रर चार्चर्या 
उपदेशात्मक दै । शिल्हण का शररकितश तकत वैराग्यपरक है । मुक्तककोष- 
रन्थों स करमीर के जल्हण की सूच्छिघुच्छक ली, वल्लभदेव कौ सुभरढतः- 
दल तथा श्रीवर की चुश्द्धितग्ठल्क़ी प्रसिद्ध ह । इन सङ्ग्रहो मे बहुत से 

संस्कृत कवि कश्मीर के हैँ परन्तु दौर्भाग्यं से उनकी समूची रचनायें उपलब्ध 

नहीं होतीं । सुभाषित सङ्ग्रहो भे विखरे पदयो से ही उनके विषय भें अनुमान 

लगाया जा सकता है । 


४. भरल्लट का जीवन तथा समय 

्रानन्दवर्धन (सन्‌ ८५०-६०० ई०) ने श्रपने ग्रन्थ €वन्याल"क मे विना 
नाम दिये श्रल्लटथतक् के "पराथ यः पीडामनुभवति भङ्गेऽपि मधुरः" इस 
मुक्तक को लिया है । इससे प्रतीत होता है कि भल्लट श्रानन्दवधन के समकालीन 
युवा कवि ये जिनकी रचनाभ्रों से जनता को परिचित जानकर प्रानन्दवधेन ने 
नाम देने की श्रावद्यकता नहीं समभी । कल्हण ने खाल तरङ्ग में कश्मीर 
के राजा शङ्कुरवर्मा के समय का वर्णेन करते हुए भल्लट का उल्लेख करिया है । 
गुणियों के सङ्ग से विमुख रहन वाले उस राजा के राज्य में भल्लट जसे 
कवियों को बडा कष्टमय जीवन विताना पड़ रहा था । एक ग्रोर बड़ बङ्‌ कवि 
वेतन रहित रहकर जीवन का भार ढो रदे थे, दूसरी प्रोर बोभा उठने वाला 
जडबुद्धि लवट दो हजार दीनार वेतन केरूपमेपारहाथा। उसने म्रपनेको 
नीच कुल मे उत्पन्न होने वाला प्रमाणित कर दिया था । उसने सस्त भाषा 





1. भत्लटशतक, ५३; ध्वन्यालोक! ३०४१ वृत्तिभाग 


((-0 9118511। 5116118 1 0511९811 01661100. 01411260 0 6810011 


8 








६ | 
6 भल्लटशतकम्‌ 

7 गाली देना 
से ९०२ ई७ तक था यकाल ८८३ ई 
तथा दसवी वताम ८ ग्रतः भर्लट का समय ह्वीं दताब्दी का उत्तर 
शङ्करवर्मा के पिता परवन्तिवर्मा पवां माना जा सकता है । सम्भवतः मल्ल ते 
कण, शिवस्वामी, नन्दयन छा वह्‌ राज्यकाल मी देखा था जिसमें मुक्ता- 
प्त हुश्रा था | रलाकर तथा रत्नाकर जैसे म हाकवियों को सम्मा 


किणौ तना | 
गो केका चिवस्वामौ तथा श्रानन्दवर्धन जैसे शौढ़ महा 


भल्ल लगि 
तभी कह ते इन न १ तक शायद विदोष प्रसिद्धि नहीं पा सके होगे 
१ के साथ भेह्लट को 2 व र 


५, 
ग्ल्लटथतक कौ व्य ङग्योक्तियां 


र्ल्लृट (ि ध 

तत्का शतक ब्न्यापदे १ 

त्तासीन समाज के ५ र मे भत्यापदेश ग्रथवा ञ्नन्योवित का अ्राधार लक 

=  केथन का ष पापे व्यवितयों के ऊपर फन्तियां कसी ६। 

इनके वात डन दषो गडपदा्थं एवं पशु, पक्षी रादि प्राणी रह 

' भ्रतिरिक्त न्य्‌ २ तथा प्राणियों पर घट रहीहोती हं वही बात 

भ कविहद परभी होती ह _ की इत 

रतिक्रिया रविहृदय कौ मापिकं परिता्थं होती है । मल्लट कौ & 

£ ५ नःस्थित्ि दि पीडा तथा तत्कालीन समाज के भ्रति 4 
इजा 


= ¦ पडती ॐ मे > नरतितयां 
रही है। ती है । इन में से कतिपय व्यङ्गधोक्ि 


प्रारम्भ कर्‌ 
स्म कर दिया था ।२ शङ्कुरवर्भा का राज 


भान्वाता जरे 
परि #। उदारहृदय व नो त 
का श ४५ ने जवे १ वमा के राज्यकाल की सुखसूुविधा प 
मध्यमसे सातो उतका रि त रण्ये विदानो की उपेक्षा रौर जनता 

त च्ञ ८; देद्य सूयं ्रौर श्रन्वकार के प्रतीक ८ 

पतः पष्णो 
भवति महूत 
कालेनास्तं = नोपतापाय य 
य व्यथयति " वयरयान्ति यास्यन्ति चान्ये । 


परमेन भर्ति रादस्तमोभि- 
0, ८५) व्योमि न लन्धो ऽनकाशः ।। | 
नदपासतया तस्मिन | ` (मण्लर १ | 
र नास्सुकवयो अ पणिद्धपराडम 
कर भा राह्म ; 
थां रना विवस्वामौ क ५ श वापर द 4“ (9: 
करण्वाग बिरान 15 दवी वाग्‌ यर „ _#-६ 


षवे =, २० = 
त साभा्धधनः। - राजतरङ्किणी, ^ 


न्ति वर्मेण " || 


((-0 9118511। 5116118 1 05111811 (0661101. निति 


---- --- 





सम्पादकीय ७ 


सूयं का भ्रस्त हो जाना महान्‌ कष्ट कौ वात नहीं क्योकि काल मने पर 
कौन इस दुनियां से नहीं चल वसे ! द्सरे भी जारे दै ग्रौर जाते रहेंगे, पर 
सबसे अधिक दुःख तो इस वात काद कि सूयं के जाते ही इस लोक से बाहर 
के ्रन्धकारों ने विश्लाल नभ पर ग्रधिकार जमा लिथाहे। 
यह अन्योवित दो तरिम्ब उपस्थित करती दै 1 एक है सूये के प्रकाश से प्रदीप्त 
सुनहले दिवस का, जिसकी महत्ता प्रोर उपादेयता का श्रनुमान कश्मीर कौ बर्फाली 
घाटियों मे रहने वाले ही लगा सकते ह ग्रोर दूसरा है गहरी काली प्रमावस को 
रातका। कवि ने श्रमिधासे कुछ नहीं कहा पर प्रन्धकार का कालासाया हदय 
पर गहरी चोट करता हृश्ना कवि के हृदय कौ व्यथा का परिचयदेदेता ह ॥ 
श्रवन्तिवर्मा के निवन के वाद किसी सामान्य स्तर के चरपकाउदयभी लो 
की विरह व्यथाकोदूर नहींकर सक्ता धा, पर कवि को यह्‌ देखकर श्रौर 
भी दुःख होता कि भ्रव क्ुद्रहुदय व्यविति ही ्रन्धकार को नष्ट करने को 
तैयार दहो रहे है । कैसी विडम्बना है । 
गते तस्मिन्‌ मानौ त्रिभुवनसमून्मेषविरह- 
व्यथां चन्द्रो सँष्यत्यनुचितमतो नास्त्यसटशम्‌ । 
इदं चेतस्तापं जनयतितरामनत्र यदमी 
ग्रदीपाः संजातास्तिमिरहतिबद्धोद्ुररिखाः ॥ 
(भ°डा०, १३ 


पता नहीं किंस चाटुकार ने एक कीड़े को खद्योत नाम दे दिया दै जो 
नाम श्रथ मं सूयं को छोड़ कर चन्द्र तक को मी नहीं षरता- 
सूयदिन्यत्र यचन्दरेऽप्यथसिंस्पडि तत्छरृतम्‌ । 
खद्योत इति कीटस्य नाम तुष्टेन केनचित्‌ ॥ (भ°श०, १४) 
अल्लट देख रहा था कि अव लक्ष्मी दुष्टों के पास दही पहंचती है, 8 
के पास नहीं । यही नहीं विद्वानों की सदुवितियां भी उसे सहन नहीं होतीं । 
स्वच्छन्दचारिणी श्रभिसारिकाके माध्यम से कवि ने निजी ् कही है । 
स्वच्छन्दचारिणी दुष्ट अमि सारिका लक्ष्मी गहरे अन्धकार भरे रास्तास जाती 
हुई गुणी जन के भूषणो को श्रावाज को भी सहन नहीं कर पाती- 
श्रीविश्यद्भलखलाभिसारिका 
वत्मेमि धंनतमोमलीमसंः । 
दाब्दमात्रमपि सोद्रमक्षमा 
भूषणस्य गुणिनः समुत्थितम्‌ ॥। (म०्श०, ७) 


((-0 9118511। 51164118 1 05111811 01661100. 01411260 0 66810011 











भल्लटशतकम्‌ 


परिणामस्वरूप गुणयो ने श्रपने गुणों को छिपा लिया ५६ 8 
गासन के भ्रत्याचारों के विरुद्ध श्रावाज उठाने क बु र ५ ५ ¦ तो 
घनापह्रण को शंकासे चुप वटे कि यदि कही हमारे रन्त प स 1 
पता चल गया तो यह्‌ राजसी ठाठ क्षणा भर मे चनि जा्येगे। एे 


सुप्तात्मा को सम्बोधित करते हए कवि कमलके प्रतीक का प्रयोग करता है-- 


कि दीधदीरघेषु गुरोषु पद्य ष्ववच्छादनकारणं ते । 
अस्त्येव, तान्पहयति चेदनार्या तस्तेव लक्ष्मी न पदं विधत्ते ॥ 
( भथ रा० 0. ५) 


अरे कमल ! तुमने श्रपने श्वेत लम्बे लम्बे तन्तुग्रों को वों चपा रखा 
दे ? कोई कारण तो श्रवदय है । हां 


र, यदि दृष्टा लक्ष्मी इन्दं देख ले तो उर 

के मारे यहां कदम न रखे । 
मल्तट एस व्यन्तो को धिक्कारता ह जो निरन्तर निरादर सहते हए 

मी अ्रयोग्य स्वामी की सेवा 


क्यिजा रहै हँ । भ्रमर 
विशेषणो का प्रयोग करते 
रसनातिपर्ययविधिस्तत्क्णय 


, _ दृष्टिः सामदवि स्मृतस्वपरदिक्‌ छि भूयसोक्तेन वा । 
९व निर्चितवानसि भ्रमर हे यद्‌ वारणोऽाप्यसा- 


"न्त.शून्यकरो निषेव्यत 


माध्यमसे भ्रौर ष्लेषयुक्त हए यह्‌ कहता है- 
योडचापलं 


इति भ्रातः कं एष ग्रहः ॥ 


( भन्डा०; १६ ) 
भ्रत्याचारी शासक के गासन मे राष्की 
सिहर उठता हुश्रा कृवि 


भावौ दुगेति की कल्पना से 
रिकारी कै प्रतीक # माघ्यम से कहता हे-- 
ृत्यारास्यमिवाततं धनुरिदं चाशौविषामाः शराः 
शिक्षा सापि जितारजुनप्रभृति का सर्वाङ्ग 


लग्ना गत्तिः | 
शरस्य मधुरं हा हारि गेयं मृ 


पष्यति तथा मन्ये वतं निमृगम्‌ ॥ 


(भण्डश०, ६४। 
मोतके उल महसा पह्‌ इसका ध नुष, तेज शहूर सने ये इसके बार, 
व्रजल को मात करने वाला इसक्रा हनर, सारे श्र 
शरम श्रोरं प्रधरों पर मीरे 


गों की यह चुस्ती, दिल में 
मीठे गीत चस जंगल यु 


4 














= ् 








सम्पादकीय ६ 


दिल पर कसी करारी चोट करने वाला प्रयोग है? जंगल को किस्मत 
की बागडोर होल पर चाशनियों से भरे तरानि श्नौर दिल मेँ जुल्म कौ दुरियां 
लिये कारी के हाथमे जा पडी है ? चहकते पक्षियों उचछलते कूदते हरिणो 
तथा अ्नन्य पशुग्रों से मरा यह जंगल सुना हो जायेगा । 


गरन्याय की आंधी मै धूलि को ्रासमान पर चढता देख कवि प्रवन को 
उलाहनाः देते हृए कहता दै-पवन । यह तेरी कसी चाल हैःजो लोगो के पेरों 
से कुचले जाने योग्य धूलि कौ तेजस्वियो के उपभोगयो्य माकाश मे ले जा रहे 
टो ? इसे उठि हुए तुम लोगों कौ श्रा मेद्रून तो क ही रहै हो, 
उसकी परवाह न सही पर भ्रपनी देहं पर्‌ जो मेल लगा ली दहै उसे कंसे 
हटाञ्रोे 


कोऽयं ्रान्तिप्रकारस्तव पवन पदं लोकषादाहतानां 
| तेजस्विव्रातसेग्ये नभसि नयसि यत्पासुपूरं प्रतिष्ठाम्‌ । 
-श्रस्मिन्ुत्थाप्यमाने - जननयनपध्रोपद्रवस्तावदास्ताम्‌ 
केनोपायेन साध्यो वपुषि कलुषतादोष एष त्वयव ॥ 
(भर्श० ^ ६५) 


किसी परोपकारी एवं मनस्वी व्यवित के प्रति समाज के श्रन्याय का चित्रण 
पेड को कही इस अ्रन्योक्ति दारा कियादहै। श्रे भले इक्न तुम चौराहे पर 
वरयो जन्मे ? इतनी अधिक घनी छाया क्यो बनाई { १६. कयो लगाए † फल्‌- 
युक्त होने पर विनस्न क्यों हुए ? भरव ्रपने ८५ कर्मोका फल मोगा । 
लोगं तुम्हारी टहनियों को खी चे मरोड़ ग्रौर तोड़ --यह सब कष्ट सहते रहो । 


क्रि जातोऽसि चतुष्पथे घनतरच्छायोऽसि कि छायया 
युक्तदचेत्‌ फलितोऽसि कि फलभरंराद्योऽपि कि स्तः । 
हे सद्वृक्ष सहस्व सम्प्रति सवे शाखारिखाकषेण- 
क्षोभामोटनभजञ्जनानि जनतः स्वैरेव दुदचेष्टितेः ॥ 
(भ०्रा०, ३७ ) 


दत ग्रन्योकितियो मे मल्लट क) राजनीति सम्बन्धी टष्टिकोण स्पष्ट 
दिखाई देता ह । वह बासक जिसके श्रपने मंत्रिमण्डल मे भी फुट है श्रौर 
बाहरसे दातु का भ्रातकं बना रहता ट ठेसे लासक के गुण जल्दी ही नष्ट हो 
जाते ह । 


((-0 9118511। 9116418 1 05111<1811। 0661100. 01011260 0 6810011 








^ 


१० भल्तटशतकम्‌ 
अरन्तर्चि्राणि भूयांसि कण्टका बहवो वहिः । 
क्थ कमलनालस्य मा भूवन्‌ भङ्गुरा गुणाः ।। (भश्श०) २९ ४ ) 
| भोतर श्रनेक छिद्र ह श्रौर टि 
के गुण क्षणभङ्गुर कंसे न हो ष बहत ते काटि है, फिर भला कमलनाल | 
शासक को 
५.५ ५ ४ को कठिने कठिन परिस्थितियों म षड़करमी 
विषयक एक गरोव भे है_ {स प्डन्त का प्रतिपादन पुरुषोत्तम निष्यः = 
पस्त्वादपि प्रविचलेद्यदि यथघोऽपि 
यायाद्‌ यदि प्रणायने स्यात 
अ 0 न महानपि स्यात्‌ । 
केनापि दिक्‌ प्रकटिता पुरुषोत्तमेन ॥ 
(५ (भ ००, ७६) 


॥। 


र राष्ट राष्टरोद्धार र्‌ +| ल्ूगन । 
० राष्रकषाकेतिए वहे न शासक को यह्‌ उपदेश दिया गया ह कि | 


य, क से बृह ननन 
ए तयार रहना न भ्रपमान ्रौर निजी व्यवितत्व कै बलिदान 


त मे विष्णा के | | 
कए गये संकेत से मोहिनी प्वतार तथा वामनावतार की श्रोर | 


विप्रलम्भ शृङ्खार । 
ग से ष्ङ्गारमेंप मे 
ञ्ग से म्रभिव्यक्त हृभरा है । विरहिणी का उला टना बड़े मामिक 
वर्षाकाल ते उसके हृदय | शति भायु श्रौर गरजते मेषो के साथ श्राकर 
साथ श्र 


दिया ध पीड़ाजगा दी 
त र, विजली चम्‌ नगादीहै। मोरोने ता रर | 


यमे 


काको वां वमक कर उसका देल | 
हृदय ५ यु, मयूर ग्रौर र र 6. दहला रही है । वियो गिनी ॥ 
4 विचत्‌ से हैजो ४ को व्यथा नहीं रयत नहीं क्योकि वे सब कठोर 


द। उपेतो कोमल भाति नारी होती = हचानते । पर शिकायत तो इस 
दिखानी चां हि गलहृदया नारी ल ६ भी निर्दयताका व्यवहार कर रही 
"हए थी । कितना ता १) पतिवियुक्ता के प्रति सहानुभूति 
¡ वान्तु कदम्ब शु ˆ 1 अह्ना है 
( वहूल 


ध ` क्व्‌, च 
$ 


वात॒ 


त्साहा ¡ त्यन्त सपं 
मग्नां कान्तवियो ५ भवेतो पदानगुरवे क | 
न द्‌ सरत रय दीनान 1) 
| `+मप्यकरुणो । स्त्रीत्वे 
णे । स्त्रीत्वेऽपि तुल्ये सत्ति ॥ 


0 ५ 
॥ 1 ॥~ -0 3188111 96|<18/ 1 05116180 (01661101. 1011266 © 681 पि य° , ^ ) 


= 





~ = 





सम्पादकीय ११ 


६. कडमीरी मूक्तकों को परम्परा 


१. भल्लटश्तक : कदमीर के मुक्तकों मे प्रथम श्रौर प्रघान मुक्तक 
अल्लदथतक् दै । भल्लट ने अ्रपते मुक्तको मे विशेष रूप से ग्रप्रस्तुतघ्रशंसा 
को अ्रपनाया है किन्तु कीं कहीं उन्होने ज्गारः, मावध्वनि तथा विविष 
अ्रलङ्धारों से श्रपनी कविता को चमत्कारक्षम वनात है । उदीयमान सुय का 
वर्णन इस प्रकार किया जा रहा दं: 


युष्माकमम्बरमणेः प्रथमे मगूला- 
स्ते मद्धलं विदघतूदयरागमाजः । 
कृर्वन्ति ये दिवसजन्ममहोत्सवेषु 
1 सिन्द्‌रपाटलमुखीरिव दिक्पुरन्ध्रीः ॥ (भण्ड०, २ 


भल्लटथतक्त के शरन्यापदेश मुक्तकों के सम्बन्ध में उपर लिखा जा 
चुका ह । 


२. भ्रन्योक्तिगृक्तालता : यहं मुक्तक का महाकवि ध दम्भु की रचना है। 
ये कंष्मीर के प्रसिद्ध राजा हषेदेव के सभाकवि थे जिसका शासन काल 
१०८६ ई० से ११०१ इ० तक था। श्रीकण्ठ के यशस्वी रचयिता 9 
मह्ख ने राम्भु को महाकविके खूप मे तथा उसके पुत्र व का विविध 
का ज्ञाता माना शम्भु की श्रस्य रचनार नेन्द्र कण्दर है जो मुक्तक न 
होकर राजा हषे की प्रशसा भे लिखा स्तुतिकाव्य € | म 
की १०८ अरन्योवितियां विभिन्न क्षेत्रो सेली गर्हं भ्र कई मामिक व 
उदघाटन करती दै । महाकवि शम्भू के मन म जहां स्पते समय र्कं र ता 
के कटु आलोचकों के प्रति पराक्रोश ह वहां सत्कार्यो मे श्रपने धन कोन 
खच करने वाले वमवशाली व्यवितयों के लिए निरादर की भावनादह। 


किसी विद्व्समा में मूखं को सम्मानित होते देख कर कवि भाश्रयदाता 
को जतलाना चाहता है कि जिस समा भः नाना क शरीर + १ की 
सुगन्धि बिखेरने वाले पण्डित सोभा देते हं बह ति ४ 1 प्र ् 
पद देना समुचित नदी होता । किसीमीक्ेत्र भे चाहं वट्‌ ५५ र ध ॥ 
या प्रल्लासन का, धर्म कादहो या दिक्षा काः श्रनुपयुक्त व्यक्ति को दी ग 
७ ~ 


ग गग्रण्यं शरण्यं पद्धतैः । 
अरपेषभिष णरण्यं शास्त 
८ ववन्देऽथ तमानन्दं सुतं शम्भुमहाकवेः ॥ - श्रो कण्ठचरित, २५, ६७ 


(-0 9118511। 9116418 1 05111811 0661100. 10111260 0 68104011 











१२ 


भल्लट एतकम्‌ 
्रवानता सारी व्यवस्था का सौ 


न्दय विगाड़ देती है । हार गू्‌थने वाले माली के 
परति कही इस भ्रन्योक्ति मे यह 


री माव ध्वनित होता है-- 


उतछसलवक्लेलंवङ्गमुकुलै रेफालिकाकुड्मलै- 
नीलाम्मोजकुलंस्तथा विचकिलैः कान्तं च कान्तं च यत्‌ । 
तस्मिन्‌ सौरभधाम्नि दाम्नि किमिदं सगन्ध वन्ध्य मुधा 
मध्ये मुग्ध कषुम्ममुम्मसि भवेननैवैष युक्तः कमः ॥ 
( नर्० मरु०) 4 ) 
सौरभ काश्रागार जो 


(४ तर लले हृए मोलसिरी के फलों स लव्ध क 
+।लया से, शेफालिका के मुकुलो से नीलकमलों से ग्रौर विचकरिल फुल। स 
गूथा शोभा दे रहा है, 


उस के बीचों बीच, श्ररे भोले, यह्‌ निर्गेन् कुसुम्भ क्यो 
गूथ रहे हो ? यह तो टक रीत नहीं ! 


भरसहृदयों के बीच फंसे कविह 
की ्रन्योक्ति मं फट पड़ी है । 


ठ्दय को वेदना मोलसिरीकीद्धोटी सी बेल 
क श्रारोप करते हुए 


मोलसिरी पर प्रत्पवयस्का नायिका के व्यवहार 
कवि कहता = 


४. 


केनात्र शकरा रीरवनान्तराते 


.  भलाद्‌ वकरुलकन्दलि रोपितासि । 
न्यु मंधुलिहस्तव कोमलानि 


7 कुड्मलानि न रलानि न कन्दानि | 


(ग्र ०मूु०, ७) 
ल ५ भोली मोलसिरी कौ बेल । महं किसने जव्दस्ती इन व्‌ लोर कटी 
केर्‌[र्‌ पेडों के जगल वीच रि न | + 
पत्तो तथा प्रकुरों तक ओ नही पट्च वतै र त फम्हारी कोमल कलियं 
नन्हे नकषत्राकार फुलों 


१ । मौोलसिरी के सुकुमार नर 
हे, परन्तु पत्तों रहित का रक सुगम्धि भवरोको उव करदेन वाली होती 
व ५ पहचा (र कसेर क जंगलो मे खिलते दए उन फुलों का 
0 म पाता हे | बशसा श्रौर ग्रनुरागकी प्यास हदय मे लिए वै 
मे रा जाते । भ्रसहूदय प्रपरिचितों की भीड़ 
त कितने उग्र रूप म ५ उटन मोलसिरी व 


क वणेन कै माध्यम 


गिर क 


को को सनाते हृए कवि कीटक ग्रति 





व 
= या 
~ = ~ --- 


न 
~ = 





सम्पादकीय १३ 


उत्कण्ठाकुलमस्तु कण्टककुले सञ्जाय तां तेमनः 
सानन्दं पि चुमन्दकन्दलदलास्वादेषु कावा क्षतिः| 
एतत्‌ कि नु तव क्रमेलक कथङ्धारं सहे दुःसहं 
तस्मिन्‌ पुण्ड्ककन्दलीकिसलये येनासि निन्दापरः ॥ 
(र मऽ) १८ ) 
यदि तेरा मन काटो के समूह को पाने रौर नीम के पत्तों को खाने से 
ग्रानन्दिति होता है तो होता रहै, इसमें क्या हानि है? परन्तु हेञ्ट! मँ 
तेरी यह धृष्टता कंसे सहन कर लू जो तू मी गन्ने की पोरियों कौ निन्दा 
करनेमें लगादहेः 
अ्रालोचकों के रिकार किसी कवि के प्रति सान्त्वना भ रे शब्द पौडे 
(गन्ने) के माध्यम से के ह्‌ 
वत्ते कीरवघूरदच्छदसुधामाधुयंमृद्रां रसो 
येषां सा परिपाकसम्पदपि च क्षोद्रद्र वद्रोहिणी । 
तेषां षृण्ड़ककाण्ड पाण्डिमजुषां त्वः पवां चवेणां 
कि मुग्धाः करभा मुधैव विरसा विन्दन्ति निन्दन्ति च ॥। 
(णमु, ८) 
हे गन्नै ! तुम्हारी जिन पोरियो का रस कदमीर देश की सुन्दर रम्‌- 
णियोँ ङ्के ्रधरों की मधुर छाप लिये है ग्रौर जिसका पका भ्रा गुड रहत, को 
मी मात करता है, उन सफेद पोरियों के भ्रास्वाद कोये श्ररसिक ऊंट व्यथंही 
प्राप्त करते ह श्रौर व्यथे ही उनकी निन्दा करते है । 
वतमान की कटूता से सन्तस्त कवि सुन्दर प्रतीत की स्मृतियों को कूरेदता 
हशर भ्रमर को लक्ष्य करके क्ता है- 
ाच्यस्ते खदिरः करीरविटपः सेव्योऽपि कि कृमहे 
मार्गः सङ्खत एष ते खरतर्य॑द्धूरवो मारव. । 
¦ वीथिका 
तन्मल्लीमुकूलं तदूत्पलकुल स। यूथिकावं | 
१. च्धं तच्च लवज्गमङ्ग भवता हा भद्ध दूरं गतम्‌॥ 

( ग्रपम्‌०, ३३ ) 
दरं अवरे अत्‌ तुम्हं चरके पेडसेही याचना करनी द मरोर 
तीहि। हम क्या करे ? श्रव तुम्हारे लिए यह्‌ कटि- 
7 ही उपयुक्त है । वहं मल्लिका कौ कली, 


रे सुः 
करीर के पेड की सेवा कर 
दार ब्रक्षोसे भरा रेगिस्तानी रास्त 


((-0 9118511। 51164118 1 05114811 01661100. 01411260 0 66810011 























#॥11 
भल्लटशतकम्‌ 


नील कमलो का वह्‌ समूह्‌, जुही की 


ह वह्‌ क्यारी ग्रौरव ह्‌ सन्दर लवदङ्धल 
1 सुन्दर लवद्धलता सव 


ध 14 मरे विपरीत वातावरण म जीवन की 

लगन लगतं 

तथा (५ ध | च त नो शाते भरोरसे स्वार्थ, घृणा, उपेक्षा 
| 1 पाता है तो उसकी लेखनी सौन्दयं की मृष्टि नहीं कर 


पाती । उसकी श्रात्मा के 
(त्मा मृत्युके ्रालि ङ्न को चाट = 
श्रभिव्यक्ति लवङ्गं को कही गई इस ह ष ए ए समीय की 


तुलना मे मूत्युही श्रेयस्कर 


कुञ्जे कोरकितं करीरतरुभि ्रक्कामिरुत्पुद्रितं 
4६ यसमन््कुरितं करञ्जविटयपंरुन्मीलितं पीलुभिः । 
१ कि वहसि क्र कान्तामनोवागुरा 
भर खु टि क 
ग्गं लवङ्ग मङ्खमगमः क्रिना सि कोऽयं क्रमः। 


५५ (म्र°मु०, ४३) 
०.४1 1२. 
क ७ जिस कज्जमे करीर के पेड रे है, जहां द 

| 2 जहा ॥ डो ~ ९ + ॥ त्र प पद्ध 
रहे है, वहां 0 > चरक देहं गर पीत्‌ हः र 
वधन वाली श्रदाये दिख व रहेहो ! कों वयं ही रमणियो के मनो क 
रीतहै ? 7 रहे हो? पुम दटूटही क्यों नहीं गये ? यह कैसी 


पत्तप र्‌ 


परोपकारसे नितान्त 
नत विमुख प्र | 
हए कमि समुद्र के वहन (म ष चन सम्पन्न व्यक्ति को उलाह्ना देते 


नीरं नीरसम स्तु कौपमिति तत्पाथो 
कासाराम्बु 
पाने मज्जनकमेनर्मशि 


वर्‌ मारवं 
त । 

दस्तु पा परिमितं पद्वाऽस्तु वापीपयः । 
तथा वाह्यैरलं वारिधे ५५ 


कल्लो . 
--(लावलिहारिमि स्तव नमः सञ्च रिभि वरिभि 
>, ||| 
हे समुद्र! तुम्हारी श्राका (्र°मु०, ५७ ) 
= माकाश तकं उठने ङ 
पानीन पीने के काम भ्राताहै ग्रोर ष उठने वाली लहरों का कं 


पम्भु की कई श्रन्योक्तियां 
¦ ष्पा क्तय श्द्खार्‌ 
क्तियां शृङ्गार का ॐ लिए भ्रपनी प्रि 
यत्तमा की 


((-0 3118851 5116118 1 0511/.1811। 01661100. 01411260 0 66810011 





सम्पादकीय १५ 


स्थिति का म्रकन ्रमरान्योक्ति मे इस प्रकार 


स्मृति मे खोए एकं प्रेमी की 
हना दै 


नानन्दं मचकुन्दकूडमलकुले नो केतके कौतुक 4 
नोत्फुल्ले कुमुदे मदं न कुटजे कौदुमन्यमालम्बते । 
चोलीदन्तचतुष्किकाशुचिरुचिस्मेरा स्मरन्‌ सालती 
कि त्वास्ते तरुकोटिकोटसरकूटीबद्धास्पदः षट्पदः ॥ 
(भणमु०, ३०) 


संसार भर के फलों से विमुख हृभ्रा केवल मालती की मुसकान को याद 
करता हुश्रा दक्ष की कोटर कुटीर मे चुपचाप बैठा भ्रमर वियोगी सच्चे प्रेमी 
का मार्मिक प्रतीक है । 


३-४. चतुवं गसंग्रह एवं चारुचर्था ; ग्यारहवीं शती के उत्तराध मे हृए 
स्ेनेन्द्र के प्रकारित ग्रन्थों मे चतुर्व्गखव्रह तथा चारूवर्या नीतिपरक 
मक्तक कान्य ह । चतुर्वि यह के चार परिच्छेदो मे कमः चम, न्थ 
काम, मोक्ष विषयक पद्य ह । प्रथम परिच्छेद के २७ पद्या भे कृविने ५ के 
विभिन्न ्रंगो- सत्य; श्रहिसा, पवित्रता, दान, रान्ति, वैराग्य ्रादि पर 
प्रका डाला है । श्राउम्बरहीन जीवन विताने पर बल देते हए कहा है- 


तप्तंस्तीत्रव्रतैः कि विकसति करुणास्यन्दिनी यद्यहिसा 
कि दरैस्ती्थ॑सारेयंदिं शमविमलं मानस सत्यदूतच्‌ । 
यस्नादन्योपकारे प्रसरति यदि धीरदानपुण्यः किमन्यः छ, 
करि मोक्षोपाययोगे यंदि शुचिमनसामच्युत तरस्ति ॥ 
(चभ०्सण० + 4 ) ९७ ) 


मनुष्य मेँ यदि करुणा प्रवाहित करने वाली अ हिसा है तो उसे १ 
से क्या ? यदि शान्ति से निमंल हंभ्रा मन सत्यपूत है तो दूर इर के तीथ क 
क्या वास्ता ? यदि बुद्धि परोपकाररत हैतो दिल के च (4 सः 
यदि पवित्र मन वालों की ब्रच्युत (विष्णु) मे टद्‌ भक्ति दै 


उपायों से क्या 
पयो में घन के महत्व का प्रतिपादन तथा 


दवितीय परिच्छेद के २५ प्यं भे 4 ४ 


कितनी स्पष्टता से बताया दै 
((-0 9118511। 5116118 1 05114811 01661100. 01411260 0 6810011 





१६ भटलटणशतकम्‌ 


तावद्धमकथा मनोभवरुचिमक्षस्पृहा जायते 
यावत्तृप्तिसुखोदयेन न जनः श्षुतक्षामकुक्षिः क्षणम्‌ । 
प्राप्ते भोजनचिन्तनस्य समये वित्तं निमित्तं विना 
घमं कस्य धियः स्मरं स्मरति कः केनेक्ष्यते मोक्षभूः ॥ 
॑ ( चभ्सं०, २,२४ ) 


घमं कौ कथाए, काम मे सुचि श्रौर मुक्ति की चाह तभी होती ह जव 


मनुष्य का पेट भरा हो । गांठमे पेसान होने पर भोजन की चिन्ता लगी हो 
तो कुच ग्रौर नहीं सूता । 


तृतीय परिच्छेद मे कामप्रशंसा के प्रसंग में नारी.के सौन्द्यं का, प्रियजन 
के विरह कौ पीडाका तथा मिलन की घडियों के हर्षातिरेक का श्रंकनहै। जो 
नारी संयोगावस्था मे ्रानन्दसन्दोह्‌ है वही विरहावस्था मे दुःखजनिका हो 
जाती है- 
कुवलयमयी लोलापाङ्गखं तरङ्खमयी श्रूवोः 
शशिशतमयी वक्त्रे गात्रे मृणाललतामयी । 
मलयजमयी स्पशं तन्वी तुषारमयी स्मिते 
दिशति विषमं स्मृत्या तापं किमग्निमियीव सा ॥ 
(च० सण, २,७ ) 
यह्‌ क्या बात हं कि वही प्रिया जिसके चञ्चल नयन नीलकमल से है, 
भौं तरद्धोंसी, मृख सौ चन्द्रो क समान श्रौर गात्र मृणाललताकी तरह है ्रौर 
जिसका स्पशे चन्दन की तरह ग्रौर मुस्कान हिमकणों की तरह शीतल है वही 
्रिया विरह मे क्यों प्रग्निमयी सीहो जाती है श्रौर उसकी याद भी विषम ताप 
का उत्पन्न कृरने लगती दहै ? 


प्ियमिलन के श्रवसर पर ठर्पविभोर नायिका की चेष्टां देवते ही 
वनती हं : 


समायाते पत्यौ वहुतरदिनप्राप्यपदवीं 
,  समुल्लङ्ध्याविघ्नागमनचतुरं चारुनयना । 
स्वय टषद्वाप्पा हरति तुरगस्यादरवती 


रजः स्कन्वालीनं निजवसनकोणावहननैः ॥ 


(च°स०, ३,१८) 


((-0 9118511। 5116118 1 0511/.181। 01661100. 01411260 0 66810011 





` गगरे 
। ब ` 


सम्पादकोय १७ 


पति बहुत दिनों वाद घर लौटाहै। उसे देखते ही सुनयना गृहिणी की 
भ्राखो मे हषे के श्रासू भर राये हैँ । भावविभोर होकर वह्‌ श्रपने ्रंचल से 
उस घोड़े के गले कीधूल काडने लगती है जो उसके प्रिय को घरतकलेभश्राया 
है । प्रेमात्िरेक का कंसा स्वाभाविक अङ्कुन है । 


ग्रन्तिमि परिच्छेद में सांसारिक वस्तुग्नों कौ क्षणमभंगुरता भ्नौर वैराग्य की 
महत्ता का प्रतिपादन है । कवि कहता है-- 


न॒ कस्य कुवन्ति शमोपदेशं स्वप्नोपमानि प्रियसङ्गतानि । 
ज रानिपीतानि च यौवनानि कृतान्तदष्टानि च जीवितानि ॥ 
(चभ्स०, ४ ) 


ग्रनुष्टुप्‌ छन्द मे रचित चणरुदर्या के १०१ पदयो मे देनिक सद्न्यवहार 
को बातो कौ चर्चाहै। प्रत्येक पद्य की प्रथम पक्ति में उपदेशात्मक उक्ति रहै 
तथा दूसरी पक्ति उसी उक्ति के समथेन मे किसी प्रसिद्ध घटना की श्रोर संकेत 
करती है । निम्न इलोकों में भ्रष्वत्थामा, धृतरष्ट मौर जनमेजय कै नाम लिये 
गये चै-- 


कूर्याद्‌ वियो गदुःखेषु धेय मुत्सृज्य दीनताम्‌ । 
्रश्चत्थामवधं श्रुत्वा द्रोणो गतध्रतिहंतः ।। (चा०्च०, ४०) 
न॒ पत्रायत्तमेश्वर्य कायेमार्येः कदाचन । 
पुत्रापितगप्रभूत्वोऽभूद धृतराष्टस्तरृणोपमः । (चा०च०, ८०) 
ईर्ष्या कलटमूलं स्यात्‌ क्षमा मूलं हि सम्पदाम्‌ । 
ईष्यादोषाद्‌ विप्रक्ञापमवाप जनमेजयः ।॥। (चा०च०, १२) 


५. चौ रपञ्चाश्िका : दक्षिणा देश के चालुक्य वंश के म्न्तिमि शासक 
सोमेदवर चतुथं (११८२ ई०) के सभाकवि बिल्हण ने यौरपञ्चादिक्ा 
मुक्तक लिखा है । यह विशुद्ध रूपसे रङ्गारमुक्तक है रौर इसके सभी शोक 
'म्रद्यापि' पदसे प्रारम्भ होते हैँ। पदयो की सरलता, प्रवाह, सङ्धीत तथा 
एेन्द्रियकता प्रभावोत्पादक दैँ। विरह की सूचनामाच्र से विषण्ण होने वाली 
नायिका कै श्रवसाद का स्मरण नायक को रोकातुर कर रहा है-- 


ग्र्यापि तां गमनमित्युदितं मदीयं 
शुत्वेव भीरुहरिणीमिव चञ्चलाक्षीम्‌ । 
वाचा स्खलद्विगलदश्रुजलाकूलाक्षीं 
सञ्चिन्तयमि गुरुशौोकविनस्रवक्त्राम्‌।। (चौ ०प०, २८) 


((-0 9118511। 51164118 1 0511/.181। 01661100. 01411260 0 6681001} 





भल्तटणतकम 


भलि डरी हुई (9 षी श्रा पहंी ठे, यह सुनते ही प्रमिका की । 
रौर तभी उसने र हा उठीं, वाणी लडखडा उदी, रब 


न शोक से मख नीचा कर लिया । 
= ज 
(नवम्‌, यक्नादि कौ धी को श्रपत हदय मे स्थान दियाह उसे वहु स्वग 
"या समम लेता > 
1 धपतिरोखरराजयुतरं 
पयौवनमदालसपूणनेत्र | 
ग्ध्य म्‌ । 
किलनेरनागकन्यां 
गदो निपतितामिव चिन्तयामि ॥। 
ग (चौ °प० ५५) 
प्राप्त करने त "यक्त 


ह यास भ क मे उपलब्ध दस श्लोक भें परमिका की | 
! श्रपने प्राणो के चले जानै का भी मय 


भवत्कृते ख -गनमजञ्जुलाध्चि | 
आननेनापि दशान नानि र्यातु पातु । 
५, ५ नीतानि पाशे जनकात्मजाम्‌ # 
विल्डणदजप्प्वािकका ज (चौ०प०, परिशिष्ट ३/ 


को (४ ४ ताह पवुल्तर भरथवां रयञ्चग्द्धिक्ठा के उत्तर में लिखा 
विना: र्‌े केत वहां कव्वाली न्व्रतनय7ख्ञ्जलल्यित 

ताये मेम (याः उत्तर & 
४ को. ए सखी! ॐ ` रत्यत्तर की शली मेँ नायिका 


तम 

(१ क) अरसं स्मरामि | ) | 

शग से फे चौ०्प० परिदिष् ९ | 
तय भीरो ( 


के | 
पा क तम पदयो भे कवि प्रिया | 
भि गमेतो वहु एक दिखाई । 






' ध्‌ 11-5/161<118 1 0511/.181। (01661100. 01011260 0 66810011 








सम्पादकौय १६ 


देती है पर उसके विरह में सारा विव ही प्रियामय प्रतीत होता है। 
यह रागात्मकता की चरम सीमा है । 


प्रासादे सा पथि पथिचसा प्ृष्ठतःसा पुरः सा। 

पयैद्क सा दिशि दिशि च सा नास्ति तद्ियोगातुरस्य ।। 
देहान्तः सा बहिरपि चसा नास्ति ट्श्यं द्वितीय । 

सासा सा सा त्रिभुवनगता तन्मयं विश्वमेतत्‌ ॥ 
संगमविरहवितकं वरमिह विरहो न संगमस्तस्याः 

सङ्गे सैव तथैका त्रिभुवनमपि तन्मयं विरहे ॥' 


९. शान्तिशतक : नीति ग्रौर भवित के वीच चरुलता हृभ्रा एक अच्य 
मूक्तककाग्य कडमीरी कवि दिल्हण या सिल्हण (१३बीं शताब्दी) का अर्ल्त- 
अतक्ठ है। यह काव्य भतंहरि के केरान्यथ्तक्त के अनुकरण पर र्चा 
गया प्रतीत होता है । जीवानन्द विद्यासागर सम्पादित संस्करण मे १०११द् हैँ 
जिनमे से सात पद्य भतहरि के कैराग्यथ्तक्छ से लगभग श्रक्षरशः मिलते 
ह । कु अरन्य मे मावसाम्य है । १२०२ ईसवी मे श्रीघरदास द्वारा सम्पादित 
सदुक्तिकः फरमरुत में रिल्दण को करुमीरी कवि कहा गया है 
जगहितथतकः के प्च भी उद्धृत क्रि ५ है । स्पष्ठहैकि सिस्टर हरि 
करे वाद श्रौर श्रीधरदास से पूर्वं हृए हीगे । कल्टण की रालतर्रङ्ग्ण्ी 
मे शिल्टण का उल्लेख नहीं मिलता। हो सकता है शिल्टण कल्टण के बाद इए 
हों या फिर कवि के कष्मीर से बाहर चलं जाने से उस की चर्चा का प्रसंग 
त श्राया हो । इस रातकं के ्रधिकाडा हस्तलख गाल से भराप्त हृ है । एक 
हस्तलेख ही जम्मू के श्रीरणवीर संस्कृत प्रनुसंघान संस्थान में सुरक्षित हे । 

आल्तिथतक्ठ के पच परितापोपशम, विेकोदय, कन्तव्योपदेश तथा 
रह प्राप्तिनामक चार पर््छिदों भे विमाजित हैँ । शतक के प्रारम्भ मे कर्मों 
की महिमा बताई गई है-- 

नमस्यामो देवान्‌ ननु हतविधेस्तेऽपि वशगा 
विधिर्वन्यः सोऽपि प्रतिनियतक्मकफलदः । 
फलं कर्मायत्तं किममरगणेः किञ्च विधिना 
नमस्तत्‌ कमेम्यो विधिरपि न येभ्यः प्रभवति ॥ 
(गा ०शग०,१) 





1. चौ० प० कश्मीरी पाठ अन्तिम पद्य । 


((-0 9118511। 5116118 1 05114811 01661100. 01411260 0 66810011 


ग्ण 


0 


| | | 
। | 


| 
| | 
| 
6 
4 
| 


+~ = 


. 
[. 


॥--- 





9 


ए ~ ~ 





ह 


च 
ए. | 
| 





त्र 
भल्लटणतकम्‌ 





के 1: क व २! नमस्कार कर लेते किन्तु देवता लोग भी वि | 
५८4 ताभी हमारे कर्मोकादौ ८ न 

को ही नमस्कार है जिनपर विधा कर्मा काही फल दे सकता है ।ञ्रतः कमं 
गनपर्‌ विघाताका वडा नहीं चलता । 


कति इस वात पर दुःख प्र 


नहीं कट करताहैकिसंसारके लो 
माग नहीं अरपनाते जिसमे श्रानः के लोग प्रभुमक्तिका 


न्द ही श्रानन्द है- 
ताथे शरी परपोत्तम विजगतमेकाधिपे चेतसा 
॥ सन्ये स्वस्य पदस्य दातरि सुरे नारायसो 
॥ र्षाधमं कतिपयग्रामेशमल्प थेदं 
"ताय मृगयामहे नरमहो 


तिष्ठति । 


मूढा वराका वयम्‌ । 

^ (गा०्ग०, ११) 

क (रचय ह्‌, हम बेचारे भी कितने मूखं है 

र तानू विष्णु मानसिक सेवामात से ही ५ 

तयार रहते हँ । से प्र + 5 

सेवा के ~ र ् ए भी हम जिस किसी सामान्य जन की 
क | & ट जा हमें तनिक सा टुकड़ा भी डाल देता है । 

| तन्ते विचरते ह ए निरिचः 
कहता है ९ए (नदिचन्त मृग को सम्बोधित करते 


। तीनों लोकों के स्वामी 
क) भ्रपना परम पददेनैको 


हए कवि 


४.८. धहरीकषसे 7 धनिनां ब्रूषे न चारं मृषा 
< ५ शृणोषि न पुनः प्रत्याशया घावसि 
त (५ ५1 युखं निद्रासि निद्रागमे 
६ नै ` कुत्र भवता क्रि नाम तप्तं तपः ॥ 


व (शा०गा०,१४) 


मने कहां कौ 
नीद सोते तो एमन कहां कौन 


सा है जो 

रोर इहं बनि पपतपाहे जो तुम तृण खाकर सुख की 

व तय को खुशामद करने की नौबत नहीं श्राती । 

ति भी इस संसार का मोह न चोडने वाते = + 
ता है ठन छीडने वाले इद्ध के प्रति 

दमितः केनापि पृष्टे कृतः 


शिशुभ वयौवनजराभ 
बालस्तं अ 4; ३ वय।वनजराभावावतारादयम्‌ । 
7 बहु मन्य गचुलमं प्राप्तं युवा सेवतां | 


इृद्धस्त्वंवि 
पयाद्‌ वहिष्करत इव व्याहृत्य किं पयसि ॥। 
(शा०्शा० ) | | 


((-0 9118511। 51164118 1 0511९811 (01661100. 01011260 0 6810011 | 


+, ५ = च = | ल्द + ७११ = 8 | # ~ छ १४ 
‡ । अदि ' अ 4. 0.) 1 2 ध ------- 





सम्पादकोय 


यह संसार, बचपन, जवानी भ्रौर बुदापेके रूपमे किसीके प्रागे है, किसी 
के इद गिर्दं फलाहै श्रौर किसी के पीचेष्टुट गया दै। शिशु कें लिये सुलभ 
नहीं वह्‌ उसे श्रादर दे, युवक को मिलादहैतो उसे मोगे परह वृद्ध ! विषयों 
से बाहर घकेले जाकर भी तुम क्यों मुड़ मुड़ कर पी देख रहे हो ‹ 


मुक्तक काव्यो का एक अरन्य व स्तोत्रमुक्तक काव्यो का है जिनमें किसी 
न किसी इष्टदेव की स्तुति मिलती है ।1 श्रानन्दव्धन का दौकी.शतक, कल्टण 
का अर्ध्रएरी.श्वरस्तोत्र, सवैज्ञमित्र का खग्धरएरस्त)त्र, लोष्टक का 
 दैनाक्रल्दनस्तोतऋ, म्रवतार का ईश्वरश्तक इसी कोटिमें श्राते 
ह । देकीतक्छ सें चित्रवन्धों से अलंकृत शैली मे पावती कौ स्तुति कं प्च 
है । कल्हण के अधन्नि7री.शवर स्तोत्र मे शार्दूलविक्रीडित छन्द मे रचित 
18 पद्य हे । खन्धरास्तोत्र मे खग्धरा छन्द में रचित 31 पदयो में तारादेवी 
की स्तुति की गई है । अ्रवतार का ईश्वरथतक्छ प्रालद्खारिक दीली मे 
रचित शिवस्तुति के पद्यं का संग्रह है । प्रनेक प्रकार कं यमक, भ्रनुप्रास ग्रादि 
शब्दालङ्कार तथा श्ननेकविघ चिव्रबन्धों से ईश्वर.शत्‌कः ग्रोर द्वीश्तकः 
की रौली दृरूह हो गई है । यद दुरूहता एवं छृत्रिमता निम्न लिखित इ लोको मे 
देखी जा सकती है-- 


रक्नावतारं गम्भीरं भवमूग्रं हरेश्वर। 
नय नीतिगुणं तं तु ममताप्रियतामिमाम्‌ ।॥ (ई०श०, २ ) 


रसारसा सारसार सारसारसरसास्ता। 
रसां रसासारसारसारसाररसारसा ॥ (ई०श०, ७१) 


महदे सुरसं धम्मे तमवसमासङ्खमागमाह रणे । 

हरबहुसरणं तं चित्तमोहमवसरउ उमे सहसा ।। (ई०श०७६) 
(सस्कृतमहारष्टुभाषाइलेषः) 
इस श्रलङ्कृत दौली से भिन्न शलौ भें रचित एक स्तोत्र लोष्टक का 
दीनःक्रल्दनस्तोच्रहं। क व्यसौन्दयं की रष्टि से श्रधिक महतत पणं 
न होने पर मी इसमे भक्त को दीनता श्रौर व्याकुलता का सुन्दर वणन हे। 
54 पदयो के इस स्तोत्र मे कवि कही शिवं को उलाहना देतारै तो कहीं 

ग्रपनी दीनता की दुहाई देकर दुःखों ते वचाने की प्राथना करता ह-- 





1. इसौ शैली के स्तोत्रसमुचचय भाग 1; डयार पुस्तकालय तथा भनुसन्घान संस्थान, 


अडथार, मद्रास से 1969 ई° मे प्रकाशित हए हं । 
(-0 91185111 51164९81 1 05141811 (0610101. 01041260 0 66810011 





२२ भत्लटशतशम्‌ 


पूवं न चेद्‌ विरचिता तव देव सेवा 

तेनेव नैव दयसे श्रयतो ममात्तिम्‌ | 
कि प्रागसंस्तुत इति प्रतिपन्नमूल- 

च्छायं गतश्चमरजं न तरुः करोति । (दी °स्तो० ॥ ५) 


ठीक हे मेने पहले श्रापकी सेवा नहीं की । प्रमो, क्या इसी कारण मुभ 
दुःखी पर्‌ दया नहीं कर रहैटो 


हो ८ क्या दक्ष श्रपनी दाया तले श्राये जीव की 
कान इसलिए दुर नहीं करता कि उसने उस वृक्ष की पहले प्रदंसा नहीं की 
कवि श्रागे. चलकर श्रपनी कृपापात्रता जतलाते हुए कटता है कि मँ यदि 
पापौ हुं तो शकर श्राप 


पप नष्ट कृरमै मे नि पृण ह ग्रतः मुभ पर दया 
श्रव्यं करो- 


ग्रह॒ पापी 1पक्षपरानिपुणः शकर भवाः 

नहं भीतो भोताभयवितरणे ते 

प्रहु दीनो दीनोद्धरणावि धिसज्जस्त्वमि 

स जानेऽहं वक्तुं कुरु सकलशोच्ये 

म यदि पापी हंतोह 

पव हष्टियों से शोचनीय मे 


व्यसनिता | 
तर- 


ये मयि दयाम्‌॥ (दीऽस्तो०) 


गङ्कुर्‌, श्राप पराप नष्ट करने में निपुण हँ । श्राप 
९ ऊपर दया करें । 
स्थानाभाव के कार 


न ण 
विचार नहीं किया जास 


करमर के कतिपय श्मन्य मुक्तकों के सम्बन्ध में 
काटै। 

७. भल्लटशञत 
लोकों 'तथा महे 
म्पादन करने के 
किया गया है । 


क के भस्तुत संस्करण मे "युक्त हस्तलिखित प्रतियां- मूल- 
रकृत संस्कृत टीके। से सर्मा 


| पमान्नत भरल्लट्लतक्छ का 
लिए निम्नलिसति  हस्तलिसित प्रतिलिपियों का उपयोग 


( १ ) ह प्रतिलिपि £ रि 


प्रतिलिपि मूल लोक त प ल्लट्थतक्त कौ इस हस्तलिखित 
र भस्तुत संस्करण वै सम्पादनाथं = श्त स्प से विद्यमान है, इ 


0 धि इसी प्रतिलिपि कोरा 
४ < । यह प्रतिलिपि पजाब विरवविद्यालय 
स्थान तकालय, होशियारपुर केलालं 
इसको हस्तलिखि त पि क्रम ४. 


घारम्रन्थ कै रूप 
के विशवेश्वरानन्द 


प्रतिलिपि क्रम स कन्द संग्रह भें सुरक्षित है। 
दोनों है। चस्या {०० से १ पव्या ९६ तकं पद्य तथा टीका 


((-0 9118511। 5116118 1 0511९811 (01661100. 01411260 0 छ त 











न 


सम्पादकीय २३ 


दिया हृभ्राहै। ६६ से ८० पत्र किनारेसे बरुटित हं । पचर का भ्राकार 
2 म 13 ड 1 = | प्रत्येक प्रपर ४ पक्तियां तथा प्रत्येक पक्ति में २३६ अ्रक्षर 
है । इसकी साधारण श्रवस्या श्रच्छी नहीं है । पाठ शुद्ध तथा युवाच्य है । करई 
स्थानों मे चिद्र श्रौर रिक्त स्थान हं । यह लगभग ३०० वषे प्राचीन प्रतीत 
होती है। कहीं भी लिपिकर्ता का नाम तथा समय नहीं बताया गयादह) 
० वी० राघवन्‌ ने इस हस्तलिखित प्रति का कोई उपयोग नहीं किया ह 
इसका प्रारम्भ (कूटलूर मेलेटत्ते भत्लटडतकव्याख्यानम्‌' से होता है । इसका 
प्रथं है कि भल्लदथतक्छ की इस टीका को रखने का स्थान क्रूुटलूर मेलतम्‌ 
का घर ह । इसके तुरन्त वाद निम्नलिखित मंगल वचन ह-- 


हरिः श्री गणपतये नमः। श्री गुरुभ्यो नमः| 
मरविष्नमस्तु। श्रीसरस्वत्ये नमः । श्रीदुगयि नमः 


टीका के श्रन्त की पंक्ति इसप्रकार है-- 


ग्रगाधगत्तं निक्षिपति चेत्यर्थः । तत्र दुः। वस्तु व्यज्यते । इति 
श्रीमन्महेरवरेण । ल ~ णाराध्य । 


(२) म" प्रतिलिपि : यह जम्मू विइवविद्यालय के विइवविद्यालय 
पुस्तकालय के कश्मीर विभाग (प्रवे सं० १५६७१८, २१५३।बी०/७७) 
मे सुरक्षित है । इसमें पूरे ्राकार कं २० पृष्ठ है । मद्राससे लाई गर यह धरति 
मूलतः त्रिवेन््रम से उपलब्ध एक हस्तलिखित प्रति को प्रतिलिपि है । गवनंमेन्ट 
परोरियन्टल मैन्यूरिकरप्ट्स लाइ्रेरी, मद्रास मे यह प्रति ( कमसंख्या 
डी° १२१०६) विद्यमान है । इसमे कुल ११०९ एलोक तथा २० पृष्ठ ह| 
इसका प्रारम्भ ॥ श्रीः | मल्लटशतक ग्रौर तां भवानीं इस मगल्दलोक 
से होता है तथा इति “भल्लटशतकं समाप्तम्‌ ।' समाप्तञ्चेदम्‌ ।' इस रूप में 
पुष्पिका मिलती हे । 

आल्लदथतक्छ कौ भूजंपत्र की एक प्रौर प्रतिलिपि (डी° १२११०) 
ग्रन्थाकार रूप में उत्कीणं की गई है । यह गवनंमन्ट श्रोरिग्रन्टल मैन्युस्किष्ट्स 
लाइत्रेरी, मद्रास मेँ इसी प्रतिलिपि के साथ सुरक्षित हं । परन्तु वह उपलब्ध 
नहीं हो सकी ग्रौर इसी कारण इसका वतमान संस्करण में उपयोग नहीं हो 
सका । इसमे कुल इलोक संख्या १०५ हं । 


(३) मः प्र तिलिपि : जम्मू विश्वविद्यालय के विरदवविद्यालय पुस्तकालय 


((-0 9118511। 91168 1 05111811 0661100. 01411260 0 6810011 





२४ भल्लटशतकम्‌ 


म स्थित कश्मीरविभाग (प्रवेश सं° १५९७१६९, २१५३।बी०/७७) में 
यह प्रति सुरक्षित है । गवनंमैन्ट श्रोरियन्टल मैन्युस्क्रष्ट्स लाद्धरी, मद्रास में 
स्थित मूलतः मालाबार लिपि वाली हस्तलिखित प्रति सं० २९०७ से इस 
प्रतिलिपि को तंयार किया गयाहै। इस प्रति में केवल संस्कृत टीकाभागहीदहै 
जिसमें १०५ इलोकों की व्याख्या की गई है । पूरे प्राकार के सफेद पृष्ठों की 
संख्या ९४ है । प्रतोत होता है कि मालावार से उपलन्व संस्कृत टीका भाग 
वाली इस प्रति को होशियारपुर की हु प्रति के गद्य भागसे तैयार किया 
गया है क्योकि ६६ से ८० पत्रतक जो भागंहू प्रति कं किनारेसे त्रुटित है उस 
ग्रशकामःमे प्रभाव है तथा स्थान स्नाली छोड़ा गयादहै । शेष टीकाहुको 
तरह है । इसके ्रारम्म मे श्रीरस्तु । भल्लटरतकन्याख्या । हरिः । 
श्रीगणपतये नमः मंगलाचरण है तथा ्रन्त में ग्रगाघे गतं निक्षिपति चेत्य्थः। 
तत्र दु; । वस्तु व्यज्यते । इति श्रीमन्महेरवरेण । 

याहं पुस्तक दष्ट तादशं लिखितं मया । 

श्रबद्धं'वा सुब्रद्धंवा मम दोषो न विद्ते ॥ 

ग्रो तत्‌ सत्‌ । 

(४) श्र प्रतिलिपि : यह हस्तलिखित प्रति जम्मू विश्वविद्यालय के 
विश्वविद्यालयपुस्तकालय के कदमीरविभाग (प्रविश्ि सं° १५६९७२०, 
२१५३।बी ०/७७) मे विद्यमान है । इसमे बड़ प्राकार के २४पृष्ठर्ह। इसे 
भूर्जपत्र की प्रति से सफेद पृष्ठो पर लिखवाकर मंगाया गया है । भूर्जेपत्र पर 
मलयालम में लिली हुई यह हस्तलिखित प्रति श्रड्यार लाइ री, श्रड्यार (सं° 
४० सी°० 5 सूचीपतव्र 11 पृ ८ वी०) में सुरक्षित है। इसमे १०८ ग्लोक हैँ। 
इसका प्रारम्भ श्रीः । भत्लटशतकम्‌ । भल्लटः । तां मवानीं से होता रै 
म्रौर श्रन्त ओ इति भल्लटशतकम्‌ समाप्तम्‌ । लिखा है 1 

(ङ) क प्रतिलिपि : भल्लट्थतक्छ का यह संस्करण सन्‌ १८६९९ में 
निणयसागर प्रसत, वम्बर्ई मं (कान्यमाला श्यृङ्खला का चतुर्थं गुच्छक) छपा 
था। इसमें इस वात का कोई संकत नहीं है कि यह्‌ ग्रन्थ किस हस्तलिखित 
प्रति से तंयार किया गया है । प्रस्तुत भत्लटशतकीय संस्करण को तयार करने 
मे इस ग्रन्थ का उपयोग क प्रति के रूपमे क्रिया गया है। इसमें कूल १०८ 
इलोक हँ । इसके प्रारम्भ के शन्द इस प्रकार ह-- महाकविभल्लटकृतम्‌ 
मल्लटशतकम्‌ 1 युष्माकमम्बरमणेः प्रथमे मयूखाः । पुष्पिका इस तरह है- 
इति रत्नत्रये भत्लटश्चतकम्‌ समाप्तम्‌। 





((-0 9118511। 51164118 1 0511.1811। 01661100. 01411260 0 66810011 


तिः गक 9 












3 


५४३६ 


२२६६ 


2. "८2:22 

द ~ व. 
~ ् 

~ = 


0१, 88.4819191 94 8।9।१। 


१. (0प्रारयाएतााछप्रि 0 &^ऽप्ाधार 70 3475 रात ०081२ 4117) 

20119 

116 70ल[§ 80 प्ाहठातलंक्षा§ ० [वशा 18४९ 11206 8 &7681 
©01711710711011 17 {16 ¶ृतं ० 3818|ला1† ए0ला7$ 810 06९1165. 70060 
४1111 8 ए0ातलाणि। 6ा6व॥*८ 2011119, 1169 18१८ 66216 811 50115 ~ 
(८411745, 1.6. 7710/12व/1 वऽ, (८147174 ८211745, ११14६4८4} वड, ८7120 
51/८८) 45, 17/71/८145, 5८111/41145 616. 411 (16 17001811 5010015 
ण [ताश 0061165, 18106} ४ 7व5व, ५147८, 1711, 1व<70॥, 44/17 
214 (01८८1८10 {00८ 0171} 370 70पा1817160 111 [९ 25111111. 4817151८ 0067४ 
10568 716] 10 पप्शा1४ पापे वपा 1 णाता ग 81811318, 
{<81118108, 68711071, 81118118, 101187818 874 57४29 276 7€110 "€ 
शिता 11. आ] श, 1017 51201068 7181785 9 87८ 1701811 
0०61165 एणा¶0पण [6 कला§ 01 06[गाल315 [11९ एिका13 118, ७३71978, 
रणा, र प्वा 218, 18748 ५87011818, 4 01102४82 0{8, 118111718- 
0118118, 2187111818 2710 [< 5€ा161078. 


2. (६९4. (अ ^^(1६र्‌ 0 11741८4 


`"[17€ 16६्ब] गा [ल क्[प्ाल 85 लाला ग 112 15 76811260 10 176 
27681681 €{€ा1{ 111 {1€ 56181 681601४ 0? 9815111 111€721{17€ 81160 
116 व7110वव€ईव5०1द॥८व. {176 व11 644९446 4106८ ३35 8 {071 0 1116 
72116 18 8 ०६४९10एाला† पिठ) 1116 कव} कतव4९ 0 111 116 १द/६)/ध, 1181 13 
{16 4८१ ६का-व ०1 वा45(/1401454/715क 07 471110/८17. ५/९ 2716 701 81 776 
56111 8016 {0 7> {€ €व्]ादऽा लय 16 ल०गा1008६्त॑ बा वग] कवक, 
8४ 16 {1716 9 7३ ५३011818 (70तताल ग (€ पात्रा व्लापा) 
€017110 0851118 (1114004 4€54 {180 0८601€ {851110112016 31710 +€ 776 
&118108 1117561 4001118 ऽ०111€ 47114८4 4€505 ° 0111675 27 0116€ ए 
11115617 171 11185 22111471) 210८ध. एप {€ €81116851 (गुाध्ला०ा 2 आल॥ 
211, कवरवटईव ८ला8६5 \*11161 185 6016 10 ३ 15 116 &14/4 ठ 061 
87131188, 1८10 1 88 5/1411व व 5८14५. ^€ ए11811818, {6 ८711:त- 
44९4454८ 0668716 एला [0एपाक्ष 21 €श्ल्लए॥ 17 116 (३5८ 0 8 
शफ, {16 10061105 0668716 11661811681. 771 


1. 471 0/9 ९41९54४4 @7दावा (7151714८, (रा प०३॥, 0]. 1, 1940, 
एवा 1. ४, २202५३1, 7/९ &/411व(व .94/वदव, 1. 37 17160 270 एएणा§71€त 91 
[पा08181 [1070811 68511881 27655, 11801785. 


((-0 9118511। 51164118 1 05114811 01661100. 01411260 0 66810011 


26 भल्लटणतकम्‌ 


¶015 4710204९ <व 00४ 1८ भा४ पि015 196, 4 00४ ग व्ल) 

200 20180211 €(€16066 2 19८ 0९४, 1४ (6017165 0प्( + €ा1 {€ 00*§ 

7010 18 णि] ग गप्टा5 शी त 790 ०णह 00167156. (1 त08 

. 7द्८०पाऽ€ {0 ऽधए४8651101, {1८ 206 01168165 50106 1702265 {017} 
08{धा€ 07 06 30668 9 112 8409 5०९९6515 1070981 (€) 11016 

९6८४] 72६ छछणात ००01॥ 02४८ छलल @प८58€0 0710 णद्)) 51166 

5181161४ 9 89613. 24411 60८4८ 15 2171 €४०६01८८ 2 (015 9961. 


 & 763] कप्दिकद्य 71६68 116 76वव6& एपा1&6 17010 {16 ०८641 
1180681 0188 बल 36108 010 {66 (मुक्त) 7011 811 जला ०४5. 
५11€ 0815108 70४ वऽ 9 क्रा, 5727902 *27002112 125 
16887060 पल) णि] ग लीद) 270 ला{106॥. प्ल 3245 : 


मुक्तकेषु हि प्रबन्धेष्विव रसवन्वामिनिवेशिनः कवयो दृश्यन्ते यथा 
ह्यमरुकस्य कवे मृक्तकाः श्य ङ्गाररसस्यन्दिनः प्रवन्धायमानाः प्रसिद्धा एव 1 


९0615 @€ ऽध्ला {0 06 10६61 0 तला ण्लभा ण 5€01100€ा11† 10 ‰11८८८- 
{4८८5 25 10 01-0€086त [ला ४ **011:5. {10४5 10€ 211८८८45 
7027014 876 2110085 णिः धल 00050 17 {06 लातत 56111170 11॥ 
2४१ &7€ 7९066 &§ &००५ 25 {011-76वव्वं श्णाऽ 10 एगण जा 
60170. 4 ६ परणाप्ालालऽधा ४८565 687 06 6851४ (02160 171 8 
6740471404/ददा व (110४ 78110 ४06 0680४ 9 {76 016, ०6८०८5८ 
76806 '§ 0पा1091$ 10601 पि ध्रल 0८४6० ला( ग 106 5101 1700८65 
प्रा {0 १०५९ 85६ [काग 105६णाण्ल्डा। ४९7ऽ65ऽ 27 115 एतन 
३4०81014066 00 प€ लौदादललाऽ ग 06 फलाः वृप्ावलदणऽ 915 [पावा 
7121109 णि 2 वृद &7987 ० 176 56०5६. [0 3. 21४८ द्व, 0 {16 
०१0८ १8०0, € 8{{€ण०प 15 ८५8९५ ०0 2 51०0816 जला ऽ€ ५16 


31165 0 +110 311 1८§ फला17§ 200 ०६८5. 2८/44 50001 ` 


10*8180 ०6 08770108 200 01९019४ {त *6. 


3. एष्टयिद्नाा0ि शत्रः 7४९8७ 08 1442444 
4. 171 {८14 1185 060 04९0060 {पऽ 10 4&717४1*दद : 
मुक्तक श्लोक एवंकदचमत्कारक्षम : सताम्‌ । 
24५८14८ 1§ 81 100670600601 ४९756 +0160 15 ८३702०1६ जा 70006. 


108 711786010ए5 लर्ट्ल ०0 06 00016 11098. (¶171€ ठाण§ श्लोक एवैकः 
97658 ४00० 10€ 1०006 &12186{6८ ° 11/{4८८ 111८) ००९5 


1. छवम्याजोक, 3.7, 1८41 
2. अग्निपुराण, 337.36 


((-0 9118511। 51164118 1 05111.181। 01661100. 01411260 0 66810011 


द्‌ = 


=-= 


== 


:- ------ 





8 > 


पित0फएएलया 0 27 


10{ ०€{€10 011 0 *€ा56§ 07115 101, ऽलं 61८. 16211811 
11 1115 56/71एववव7 वव [61015 11115 56।[{-तकृलातला८€ ग आद्व्व्ठ एए 
58178 : + 


छन्दोवद्धपदं पदं तेन मुक्तेन मुक्तकम्‌ । 1 


¢^ 66010111 10 1713 वली711110), 8 106€ातला† 270 5171216 *€756 
13 68116 7770८14८. {1115 {$€ 2 #€ा7§€ 1145 8 €07016[€ 108 7 
1151. ^ 01118 *32प[)18 [६861115 116 तली ठा गा ऋ्व्व {76 : 


पूरवापिरनिरपेक्षेणापि हि येन रसचर्वंणं क्रियते तदेव मुक्तकम्‌ ।8 


प्रह 11 118 51{8{ला0ल€ा11 1€ 118६8 1{1€ ४070 रसचवंण [16] 7681715 
11181 11€ 1{351€ 2 +वऽव (ला{1716्‌1) 7110151 06 ए7€5€ा1† 11 8 11171/८{व/्ध. 
2.12((८(व॥व ५५015 8376 21 {१५० 1#706€8, ८050 810 5८7104८4. ^ ©011६6- 
1101) 2 *2710प्5 *€56§ © त10€ा€ा1६ 10910८5 15 68116 05८ 810 2 
60116110] 2 ४811005 ४€7§8€ऽ 011 0116 {0016 15 ६811660 547105८4. रि0ा] 
{1९ 0111 ° ४1€ ४ ग €०ा1{ला15, {116 1८८4८; (811 € 018८८ णाल 
४8110115 ©816801168 51011 5 4111 दाव -77114/८(व६व, 71711-111111८1446, 20/14/८117 - 
771111८14/८८ €{८. {< 25771117 185 10846 8 1018016 (071718० 10 {115 
01811611 ० §87181त1{ 0ला7#. 0९07 5८44८ 9 &7181089810118118, 75047 व 
9८1 0 ८५४३3, 07116/८/4714द77व 6 {011 01 1.051{4168, 41101 - 
7८2411८ 0 ९२8॥151८878 211 1२01714 9८(द्वद ° २२३1718168111118 ८०६ 
1706 0114८11 10111145 १०६ 7/0114{4 ,०५।५व 9 31211218, 47100 - 
{110211/117101द ० 68111010, 5व7117 50/0६ 0? 51111818, (2111116, 
(4117146 45404740 870 .24210वव214714 0 65616018 276 117/1- 
71111८45.  23111121185 (4147८047 241८2 6871 ०6 0681278160 25 
3 < 4८451014. 71071251 2211/1८14८व -6८05व5, 5 ४८177711/1कव07 2 
18111818, 5110/1457(61477 ० #211801806€४8 810 54015112, ठ 
81978 376 {871015. 07 11656 711/८141८व5, {11€ 71051 €६८।1४६८ 876 
00४0] 876 11105€ जए111€ा1 11 47114044 51#/16€ 810 1116 €8111651 
[ता0ण्णा व7110624€50450(वद््व ८०165 {01 8 [६8511 {06६ 81811818 
\/{10856€ +€786 185 0द€ा 4०९५ 111 6112104 98701131815 12/114711:41014.4 


1. साहित्यदर्पण, 6.314 
2. 1014.. 6 314: तेन मृक्तेन मुक्तकम्‌ । तेन पद्येन मृक्तेन पद्यान्तरनिरपेक्षेण एकेन । तेनैकेन 
च मुक्तकम्‌ इति क्वचित्‌ पाठः । (0107२017 07 साहित्यदर्पण ४५ दुर्गाप्रसाद द्विवेदी, 
निणेय सागर प्रेस, बम्बई, 1931). 
3. भरतनाट्यशास्त (श्रभिनवभारती) 
4, पराथे यः पीडामनुभवति भङ्गेऽपि मधुरः) (भल्लटशतकं 35; ध्वन्यालोक, 2.41 वृत्तिभाग) 


((-0 9118511। 51164118 1 05114811 01661100. 01411260 0 66810011 





28 


भत्लटशतकम्‌ 


4 ^.¶1 0 8प्^11.^^ 


१४९ [त0 तिता 12112185 7२ 


414147161/07 1118 ए ॥ 
४३5 8 एलान 07] 211 { 0€ 81811818 


1010 ध +त ०8 शा0 17 १8 (वऽ (883-902 
एवा78.5 पणा 85 कदा 3५ ] ००0. ५291 
४३13 \1177 11870051 6. (01082 83 ©011]081€0 ^ ४8111. 
९ण्टा#०0) 25 047 80 115 76187 एल०त सश ८714 226 11611 
४३05 ला7ला। | ६६६ 4110 00161116. प्र 185 8150 171611110160 11181 
0 षः 70678 31 8605 [116 पतव 1८द118, 61९85४77, 
1604418 811 (२३17278 *»€76€ [81101176 0४ {1711 : 


उ्ताकणः शिवस्वामी कविरानन्दवर्धनः । 


1] ^ "1 साम्राज्येऽवन्तिवर्मेणः ।।' 
£ 1171165 10 ष्णा ©]] 

ह | 1 । र 87 १ न क 
एवापा"5 गलं, 800) क ९९0 {07 11€ 015६ 0778 6871८479- 


7 11 1 
4 [वथा वात्‌ ९2811 10 0 10 16 जा, € {प्ा60 
४ 16 [0 
?102९71165, 16८ ६8५४ 1 ९0716. [€ 762 €त {ला 
१९८ 166711६ 06171 
८1051105 शला 11६ 


11164 116 ए1*216 (जहि 


| । एलाली1, 4 ऽपान ग 
५ 1700दा†311€0 ॥लो) 811 


116 छलाह 101६} 
11617 0168त्‌, प्र १६॥; 
गणा) 118 00111. 


5. 


ध दयागभौर्तया तस्मिन्‌ ग्णिसङ्गपराडमे 
आसेवन्तावरा वत्तौ: कवयो भ ४ 
न्क & 8 # ४ 
निवेतनास्सुकवयो भारिको लट 
भ्तादात्तस्य दीनं 


"समपालकृले जन्म तत्त 


राजत्तरद्जखिणी, 5 , 204-6 


((-0 9118511 91618 1 05111811 (0661100. 01411260 0 6810011 





| & 





ोपार0णणल्ा0ि 29 


1871# 100 ° ^ ४६7111४ क्ा1118, 80 १06 16 82४ 106 7116 ग ला0ा, 
1175 71711771त एएा§( 0४ 1700 9 401) 07 {16 प्रा 81त 1116 
041६1658. € 52#5- 

पातः पूष्णो भवति महते नोपतापाय यस्मात्‌ 

कालेनास्तं क इह न ययु यान्ति यास्यन्ति चान्ये । 

एतावत्त्‌ व्यथयतितरां लोकबा्येस्तमोभि- 

स्तस्मिन्नेव प्रकृतिमहति व्योम्नि लब्धोऽवकाडः ।। 


ल€ 116 0 68615 {४/0 11118265, 0716 15 11191 0 {16 5111119 
3101} 870 11€ गलः 11181 ग फाल वक्चा्ा€ऽ5 9 176 पवा 11911. 
^*21111ए01715 18 € टा) १४8 8 51117108 एल।०प पणा 188 0९11 
01100 ४8४ 8 ५81८ 1211. 21811818 ¡3 {0211160 10 5€€ 118 50116 
72।{लाला 188 शाशा {16 18116 5८१४-1 72107 10 8 5111811 51111112 
1113८{, 2 787)€ श71८}) 015 011४ [06 5 2716 (्0पात्‌ 701 €श्ला 06 
210{11€त 10 11€ 700. {16 रल ८८९ 15 {0 11€ एणा छ10 010 701 
0९8617४6 {€ 7718186 16 ४85 एला हण्टा. 
सूर्यादन्यत्र यच्चन्द्ेऽप्यर्थासिंस्पशि तत्कृतम्‌ । 
खद्योत इति कीटस्य नास तुष्टेन केनचित्‌ ।॥ मश्शय०, 14 
[1६ ऽ पिल 0188051९ 10 070 1181 (16168 &० 10 {1086€ 110 
00 70{ 0६5४८ 177) 87 १९७९ा॥ 111 ५156. 0६ 011४ 1115 7710८71; 
111€ 11८1165 ५0 701 €श्ला {0 2€ 87. {78786 2 {€ 2००५ 6०016. 
श्रीविश्ृह्भलखलाभिसारिका वत्ममिधेनतमोमली मसः । 
शब्दमावमपि सोटमक्षमा भूषणस्य गुणिनः समूत्थितम्‌ ॥ भण्ला०, 7 
21211218 1६615 8077 81 {1115 31816 0 88175 11181 €४ा1 {116 156 
17 116 [617०१ ग तण ऽवा कण्ा 5 00 7101 579681८ 32211157 1118 
81106111€5. 106४ 816 €९८९५॥ 10 पालात 116 पावला 1111 {171ला 
1; 168, 11211218 7€शि8 19 {1115 36 0४ 3516111 116 1005 25 10 19 


{{ {825 ८0 ५&60 175 1018६ 11116 1116803 (गुणाः = 7ाला115) 810 [ला 
3298 11181 1{ 71051 06 ० 0 {16 87 1181 {16 &०५०६8§ ° ८8111 


‰/010 101 86१ 17 01167136. 
कि दीर्धदीघंषु गुणेषु पदुम सितेष्ववच्छादनकारणं ते । 
ग्रस्तयेव तान्पश्यति चेदनार्या त्रस्तेव लक्ष्मीनं पदं विधत्ते ॥ भण्डा०, 25 
^17) €ा1[010४ा 16 0065 1101 1681126 116€ 56८1168 2 1118 
5 
1. भल्लर शतक, 11. 


((-0 9118511। 5116118 1 0511.18॥1। 01661100. 01411260 0 66810011 















30 भच्लटशतकम्‌ 


€1110१668§ १९5७५६§ @070€0721107 816 81811818 60655685 ऽएा- 
71156 81 41 €111710४६६§ 0081180४ 10 67717 10 ऽप 8 171851€ा' ५170 
18 16075157 1 118 36601, १0 115 {0 210४5 0705, 
110 15 8977081 87 185 105{ 31 086 प्ा78071 एलं णएटला 118 0ष्शा 
2९016 97त्‌ 115 लाला1९, पऽ 19705 276 21१88 ला 07 118 
61010668. {116 1068 18 67768560 {0 9 वा1007 200प{ {76€ 
616718६ 81 17€ ए६€ 10 ल्रलसला (णाह एक्ाठा०ा)85116 


5108181711४€5 970 एवा0ा0ा)48110 20}6611४९8, {16 17112 
51४6 7045167 81 8 ०६९४०९6 58९78111, 


सोऽपूर्वो रसनाविपयंयविधिस्तत्क्णयोऽ्चापलं 

दृष्टिः सा मदविस्मृतस्वपरदिक्‌ कि भूयसोक्तेन वा । 
निषचितवानसि भ्रमर हे यद्रारणोऽदयाप्यसा- 
वन्त-शन्यकरो निषेव्यत इति भ्रातः कं एष ग्रह्‌ 
80811318 {7815868 ४ ०५३] 
50611. 11 108 06 5810 1181 
11 18 एाणृल्ला 0118111 15 0 
7 3071160 ४४ नगल 0 
°6४॥८8 1125 20०06 17687771 


265 9 8. 1€0प।- 


भूव 


: |} भण्डा०, 19 
70९0716 1170प्ा1 अ) 1111886 07 9 (071५1- 
116 00101-816]] ¡ऽ 3 7र6ाठ 00716 07 11181 
684 07 {1181 1 3०6३5 11] {16 0्टर्ग 

ण [€ 18 10 00ण। {81 1316८ 11 

६ 970 15 ४01] 1196117, 

रा द्रोऽस्थिशेषः स्फुटितो मृतो वा 

प्ोच्छंवास्यतेऽन्यष्वसितेन सत्यम्‌ । 
किन्तुच्चरत्येव न सोऽस्य शब्दः 
नबव्योनयोयो न सद | 

14188 ५168 30011 
11) ५६18६ 79, }£ 

८4/45 11/14714507150 ए856त 


818 
14८05. 


भऽ्शा०, 28 


॥ 2०111) 216 1111160 21 17 +*21710113 2111८- 
06501068 {16 


011९5 9 8 [ती 11170101 
01 51९ . ॥ 
स्त्वादपि प्रविचलेद्यदि यद्यधोऽपि 
पाद्यदि प्रणयनेन म 


५ हानपि स्यात्‌ | 
द्धरेत्तदपि विर्वमितीटीयं 
केनापि दिक्‌ प्र 


केटिता रुषोत्तमे 
1 16 0पात 1056 7811100 ५ ध 


०९९०6 [0४ }/ ऽपां) ' 1 € ७1]त्‌ ६० 0०४१, ; 
प्रणष्टः ग । ^107, €ण्ल 
11*€756. ग1ा75§ 8 ताद्टाा ॥ 11€ा |] 


भभ्ड०, 76 
{ 16 0110 


1 ^ +0प्रात 58५४६ 1]€ 
1106361881 एिणाप5०। वत (0 1110 }5 16/68160 [६८ 09 8017116 
१ पा६०।89 116) वाऽ (१ 1010 7851)0 908187५९ 


18 88 ६] 28 
9 (18 ५76 


10712511 लु 


€लि {0 11 271 {16 {0870 


18 136९0 7 8 01006 


((-0 9118511 9116418 1 05111811 0661100. 01011260 0 60810011 





 †= 3 
| १ 


१ ।, 2, = न ह ^ ; 9" (४ = ६: किल ह # 4 भुत न ९१ र क न = द }2 







ह0लातिति 


57121101 एण। 18 80४1860 70{ 10 10०86 16871 आत 115 58.४6 1118 
८0४ €शला 91 {116 ९08 2 115 0 ए€ा307181 176 6518. 
तर101108 21 {€ तश] एण6 ग {06 (0४ वप 10 1६ 0116] 
ए०ग166§ ° {€ काकौ णाल, इवत व४वा 8, 81311218 ए65ला)15 80 
27110८07 200६ 2 0681 810 8 ॥पल : । 
मृत्यो रास्यमिवाततं धनुरिदं चाशीविषाभाः शराः 
शिक्षा सापि जितार्जुनप्रभृतिका सवत्र निम्नाकृतिः । 
ग्रन्तः क्रौ्यमहो रर्स्य मधुरं हा हारि गेयं मुखे 
ग्याधस्यास्य यथा भविष्यति तथा मन्ये वनं निमृ गम्‌ ।। भन्या०, 94 
(113 ०0 15 1१६ 11€ 17€ 217 जा ० [36811 11६ 
8770/§ 276 11166 16 70150105 73168, 1113 अ] @व्ला§ पा ग 
47111118 871 01168. 2४6४४166 1€ 51007958. ‰185 † 1115 [0 णृला, 
8 10206, 185 ना पल्‌{ए़ 21 0€8ा{ 876 8. ऽ फ८ला €ा1611311118 3018 011 [113 
118. 1 {पा 181 116 च्ञ +५11] ९८ एला ज 9॥ 21171815. 


न्क 


ऋ 


11 1010९ 1©5€ 71725 01 1116 16106160 1011615. 
0० [0८६०11४ 185 € 6016160 16 [काला18016 5181९ 2723173 
ए076४ब]ल्ा{ 10 018 (11165 ? 

णाल 16 0010115 ०६ 1181 8 [41182 1189 0€ 68868860 0 21] {1 
08111165, ०४६ 11 1€ 1185 {7781 1710010165 श्ण = 1115 51916 810 
21201६5 {ता {16 लाला1€§ {070 ०४15106, 211 115 ५०111168 8111511 
289 : 

मरन्तश्््राणि भूयांसि कण्टका बहवो बहिः । 
कथं कमलनालस्य मा भूवन्‌ मङ्गरा गणाः ॥ भण्डा०, 24 

[7 17 0109178 1० ग 111०1166, ए113112{8 7108 "11068611 
76011€ 08160 07 1181 7008111018 810 6 ५९५ ४९11 {0 1115 {6611728 
0 0151)1685076 0» 56010182 111€ "170 1४5 ; 

कोऽयं श्रान्तिप्रकारस्तव पवन पदं लोकपादाहतीनां 

तजस्वि्रातसेव्ये नभसि नयसि यत्पासुप्‌ रं प्रतिष्ठाम्‌ । 

प्रस्मिन्नुत्थाप्यमाने ज ननयनपथोपद्र वस्तावदास्ताम्‌' 

केनोपायेन साध्यो वपुषि कलुषता दोष एष त्वयेव ।। म °श ०, 95 
\/ [181 8 5018 0672४107 1 11013, 0 »1०५ { [16 ५५5४ ++ [11८11 068€17*€5 
{0 06 ८0506 ए४ {€ ल्लवण {1€ 7601€ 15 0610 {वल 8# #0॥ 10 


1116 1180 9८४, 8 1266 07 शाठषाः 2 11ण111181165. ० 178 1101 
2176 {0 00517010 10 106 51811 ० प्रा€ ए60€ एष 1181 0001 


((-0 9118511 91618 1 05111<1811। 0661100. 01411260 0 60810011 


कश 


32 भल्लटशतकम्‌ 


{06 ता ४० 02९८ एण जा रजा उक 0०0 ? पत०० 15 (12 {0 0९ 
761700५6 ? 


27211248 &1*€5 2 शला 7627{-9106108 (्गावलाााकषप्ठा गा प्रो" § 
10&7दप् णत {0कातऽ 2 70016 20 00 त€४०४८्व्‌ (० पाल इला ४१८६ णा 
0065. 


कि जातोऽसि चतुष्पये घनतरदायोऽसि कि छायया, 

संयुक्तः फलितोऽसि कि फल भरः पूर्णोऽसि कि सन्नतः । 

हे सदृक्ष सहस्व सम्प्रति सखे शाखाशिखाकर्षण- 
कषोभामोटनभञ्जनानि जनतः स्वैरेव दुष्चेष्टितः ।॥। भ०्श०, 37 


0 10016 {1६61 ५% प४ला€ $०प एता 21 8 [पाल[7५ा) ० एणा 10898 ? 
४७४ 010 $ 8४८ 06156 5१४०€ ? 2000 लत्‌ णा 50206 ४७४ 
01 #०४ ए€मा णऽ ? शला ! 7 गप 12 2 शच्ाा जा िणा5, फोर 
०1 ४० एला 50 10५ ? (0 पऽ 85 2 7€5पाौ ज #०प्रा 06) 015, ४० 
१8५€ {0 ऽपि +€ {€ 7€0{01€ 876 एणा ०01, 3121618, 
0571082 27 एश ४०४ 07806165. 

80176 *%€56ऽ 0? 20211212 18५८ 2 {0प्रली अ 70181166 8130. {116 
(८्०ााफ्शी)॥ 9 & 1309 10 56218101 185 एत्ला 76815166 व व सला $ 
{फला अश९. 116 190४ 3562501 125 8५,०1६6९€ {€ 72085 
860872110 0 11608 ° {726787६ 0166268, णाता 6९ पत, 
0206178 {686०५१८३ 304 {71201610 11871618. 916 188 10 (600- 
क्ष0॥ 2621051 € एा८व्द6, € ९३८६०८५ अतं 176 ००४०० ०९८००३८ भा] 
2 (17617) 276 20-11€2716त 10 2165 2010 00 7101 1621126 1116 4801४ 9 
3 ०६1०५६0 5627216 {0111 € 10८ एप 906 085 1621 00111211 
28221781 11€ 11211618 110 125 एला 0101178 € 1810. एला 8 
1249, 306 500पातं 09५८ 1621726 [दा 06218676 200 20006€त 8 
5४100811 210८८ : 

वाता वान्तु कदम्बरेणुश्बला नृत्यन्तु सपंद्धिषः 

सोत्साहा नवतोयभारगुरवो मुञ्चन्तु नादं घनाः। 

मग्नां कान्तवियोगदुःखदहने मां वीक्ष्य दीनाननां 

विद्युत्‌ कि स्फुरसि त्वमप्थकसरुशे स्त्रीत्वेऽपि तुल्ये सति ।। भश्श०,97 

76 0 # ग एना 125 3 6 9 15 000. = */८ 866 10 1 
0 01४ (0€ भ त 0651४108 ०016048 ग 719 पाह एप 250 2 6802 
त11# {0 1110216 115 0) 0650 गा$ क ला. 106 पर्ल, 
{€ {110 प्118175, {€ 0105 9710 {€ 10218 21] 5131८ 1115 € €्1€1८८§ 
2.00 €07688 {1602 317 


((-0 9118511। 51164118 1 05111.1811। 01661100. 01411260 0 66810011 


= ~ -= = ~न च्--न् ज्क - ~-+-+ ~ --- ~~ ---> ~~~ ~~ -----~- = ~ = => 





९०८70 33 


6. (1६741. ८राालाऽ 0 287 .47.7.47.4 54747६4 - 

127. ४. २818४81 10 113 वा ले€ लाप त्ट्त्‌ हादाव(व 50 (व्य हं ४८७ 
प्§ ए३र्पर] [णि 88०[ ०6 7171160 001६, {11166 71185 ला115 
०7 {16 16 शात 06 §क्ाऽता( (ल्जाालाा ४ 01 5/व[धव 5014६4.1 
€ ०156108€5 11118 {86६ क ठण्ड ८ 14५6 8 16 1६ ग 
2/141/414 9014८ एषां ऽ1€त 7 1६ वष्छभावात्र॒ ऽऽ (6४८०121. 1४, 
111 1899} 81 30711089, € 976€ 7101 10017160 ~ 111€ 71181 प्ऽला 013 
011 श्लु 9 तवाप्ठा ५8 0३560. 001{€ 8 187ए€ 770्ाएलाः ज 
811211818*ऽ *€ा5€ऽ वा€ प्रात्‌ 1 116 अ1(1नठष्का<ऽ 276 50116117165 
{116 8111110108165 2867106 *€ाऽ€ऽ पात्‌ 17 {16 &/व {तव 5८1८८ 10 
014 0061ऽ ३150. 11686 35ऽला[0015 10 गला [061 8110 116 
4718111 76801113 0710 11 {16 61811015 0? 50111 ० 11€56€ *€5€5 
717 (€ बा{110्‌९दह्ाइ ज्ला6 जा7ालव छण 7 116 {00170168 17) 11६ 
४१77 [त ९101. 1८ णडा ॥्€ 1३४४] 691 1185 0716 07760 
270 €ाह11 ५675868, 8] ग ला) [10 श्ल, 81110 ए 25८1860 
10 3113118 {8. 1 11९56 ४675865 अमी ये श्यन्ते (65) €1८ , 1 01016 ४ 
&118108४3170113118 288 {118 0 छलाऽ€ 2 1115 12/110711:410 ध, {16 
?€-5€ प्राणा येन समर्पितास्तव वलाद्‌ (१8) €16., ०८5 71 1{7€ [06818 
९०ा€ा187# 2 /1व711/10/व. ^ 0111118 *8्018 पु ०1९5 1{ 85 2 


४6786 9 1115 0४४1 168८7, ए818{{लात पाद] 10 11, गीला 
81811818. 


21 111€ गलाः *लाऽ68, 78419 276 2567860 19 00615 जदा {191 
12811818 1) {16 211110100165. {11 ९011747715/व €01107 101६5 1116 
€\106766 9 011]# {९५० 11010६5, (1९ 90/1६ ८4/147८064441017 2116 


98/51/1407 10 णाल] व्वा 7६ ३५५६५ ९५10६1८८ ° 18118185 
971/८117111//८161417 81359. 


116 35६्८०ाप ४6756 युष्माकमम्बरमणेः प्रथमे मयूखाः 15 95071060 10 
21284 ४818. + 71118818 ३९८०17६ 10 {16 51/6/121141417 (५6756 123); 
{116 *€156€ 9 कोऽयं भ्रान्तिप्रकारः तव पवन €[८., 1८] ऽ ©;1€0 81101 
71101851 771 {16 (५५/7९ ८4/4/47ववदव/व (7 (794) 18 2511060 10 3132८318 
71130218. 111 1116 „5५00 257/द!व्य7 (1032) 210 1116 ,501:170711८161417 
(7. 63). 106 10110 काट 30 भल ऽ८5 876 हाण्ला 95 0 81811818 17 11 
811110102168 : 


1. ४. ९8218४8, 41111415 ० ऽतं [८201441९51114/-व4 01211141 10151114116., [1 प811, 
\/01. 1, 1940, ?81 [, 77. 40.48 8116 52-55. 


2. घवन्यालोक, 3. 4], वृत्ति भाग; 6८ 15 ३150 ८०८ 11८ ण्ट.ऽ€ परार्थे यः पीडाम्‌ 
( भश्ण्० | ४१100 हणा 116 78176 2 0८ 21811818. 


((-0 9118511। 51164118 1 05114811 01661100. 01411260 0 6810011 


ग; 


34 भरंलटणतकभ्‌ 1 
| ए; 
भलटशतक सुमा ितावली शाङ्गघरपदत्ति सृक्तिमुक्तावली (॥ 
3. वद्धा 162 
4. काचो 214 
9. पतत्तु वारिणि 554 । 
10. सदुवृकत्तय 556 | 
11, पातःूष्णो 563 745 ९. 63 | 
13. गते तस्मिन 746 . 64 € 
14. सूर्यादन्यत् | 777 0. 83 
15. घनसन्तत 778 899 | 
18. अत्युत्रति 677 | 
19. सोऽ 751 ९. 82 | 
20. तदद्य 762 ?. 80 | 
21. पथिनि 881 7. 77 
23. करम 669 0. 91 
24. अन्तरि 921 1142 | 
25. किं दौर्थ 922 
28. शष्ठोऽस्थि 913 
29. यथा पल्लव 184 | 
30. साध्वेव 786 | 
31. ग्रथित 799 
32. चन्दने .. 798 1043 0. 15 
33. यत्किञ्च | 800 | 
34. लब्धं 805 | 
35. चिन्नस्तप् 815 
39. त्वन्मूे 816 | 
40. पश्यामः 847 † 
44. आक्ली 868 
45. स्वमाहा 877 
46. सर्वासाम्‌ 879 
48. भिद्यते 893 0. 98 
49. चिन्ताभणे 903 
52. दरे कस्यचि 907 
53. परार्थ 947 1052 १. 207 
54. आग्रा: कि 1019 
56. आजन्मनः 986 | 
57. ये जात्या ` 792 0. 68 
58. रेदन्दशुक 974 


(-0 ॐ1851। 91161९18 [ 0511९180 (0661100. 1011260 0 ©810011 





16:80 6/9 8, 35 


63. आवद्ध 995 
64. किमिदमु 999 
10. शतपदी 1215 0. 129 
22 तनचुतृणा 93 
74. संरक्षितुं _ 984 
75. कल्या जिमेष 985 
76 पूस्त्वादपि 987 
14. स्वल्पा 988 
83. नामाप्य 1017 
84. वाताहार 1016 
85. ऊढा येन 1018 
91. एतत्तस्य 1014 
92. आस्ते 1015 
103, फलित 795 


1) {06 02518 ° ३४०५6 600087801*€ 51४१४ ॥ 15 नल (181 01119 
8 € ४८868 ण गलः ए06§ अ€ [णाल फाण्ट 7 ६६ 01101091 
प्ल भ शवााणव 941वदव 800 8 18785 णणणएल- ० श्लाऽ€ 276 11€ 
66801 9 06 06 2191198. ^8 {7656 21110108165 €ा€ 7101 
0०पात ४० १०८६००९८ भ € श्लाऽ6§ न 2001704 4104, 108६ 18 
५/९, 011४ 561661९0 रलाऽ€ऽ णात प्रलौः 1866 1 चालय. 


7. 108८ ऽ 0 285.47.7 474 54244 ; 


11 028 81680 एल एनणा€त 0 09४ ४6 ए दश्ण्चादच न्ता 
ण 2010 50140 185 006 पणणता6त &7त लं रलाः७€इ. [> ११1५१ 
{0 पऽ त्वा्ठा, 126 ज, $, 1२220881 क@षछ1260 1016८ 
1800861701§ न 10८ वाव ,<014८ 210 28 73708८0६ 9 8 
6017760187$ 01) € कणा 0४ 72166 %818.2 

106 100 पाद््रठा इार्ला 0४ [10 18 88 6गा0ड ३ 

1. 70€ ग5{ 145, 15 8 726*द0दहभ्त एवल 17408611 ठि) 2 
[पश्वा 148. (018 148. (7 12109) एनलणग्ण्ड (0 € 
(00श्लाणााला( क07ा€18 38. [09 १, 1120785. 2856 ०0 8 
148. 2006६164 ००९ श्वापण ग हव्य द्व णि) 2180725 10 
1898 ४ 3. ४९७०९४४6) 21४2 ५1८॥ 015 0 828051६ 276 2181180 
6०165 ३00 हण्ाऽ) (809०. वऽ 108. 00515 2 110 
४€865 200 0065 001 98५6 7४९ भलाऽ68§ 9 {€ ८8*%21318 {ल : यन्तः 


1. #. रिठहाहिकट0, 44 2. ©. च, 7, ए. 37 80 0010016. 
2. 11 85 70१ एला 0591016 णि ४५ १० एण्लणाहे 8 6भु$ ग ४5 न्वा, 


((-0 9118511। 51164118 1 0511.181। 01661100. 01411260 0 66810011 


तल 
ऋ 





=-= 
४, 


# ५ 


ऋष्क 








46 


भल्लटशतकम्‌ 


ककशता (35), एष श्रीमान्‌ (36), दानाधिनः (105), विख्यातं (106), 87५ 


ग्रावाणो (50). 17£ वरवताौनाध ग्ल ऽ8§ 17 1176 11207185 86 ला 1 
876 ऽ€ण्€ा). 


न 2. {€ ऽध््गात्‌ 18 3 02101627 1/5, 
11 15 8150 19171 711 {€ ©उ0णदा1&। (0116 
(7. 12110). [{† नग1$ 61111 ४€ाऽ€§ 
07111160 ४6868 216 85 070 । 


1 1116 0747118 3601171 8110 
118] 2088. [एवा 1120785 
ण [<8४१4111818 {@{, {11656 


4 (3 3), एष भीमान्‌ (36); ग्रावाणो मणयः (50), ग्रावग्रस्त (98); 
| रान।! वनः (105), विख्यातं (106), विशालं ( 101) 810 अयं वाराम्‌ (108). 
{ 8005 0४८ णा $68 0717) 218 116 {0191 7एाएला {0 105. 


11 त 18 1 एश 87 1711 18185871 3101 
१ € ॥ 10 0/9 110४, ५0९० (40 (.8, (21810806 [11, 
४ 1 पवश ठ ^त$8ाः 128 ता 00760 21 लंह111 

। 18 35, 36, 50, 105 8110 106 01111160 3150 0‰ [076४105 


}188. {115 
2150 81108 । 
61811268 17 #€7ऽ6 01 त; 
; ग]; € 01067 ' [शि 

7680188. {115 1/5. 8008 0४6 76४, ४€ा56§ 8110 01 €ा)1 


18 +€ा565 11 1116६ [६३४९०711 १ 76 96568. {06 010५. 
€0 0 {118 001111611879 : 


), अन्तः, (35), ए 
| < › एष श्रौ 
रनाविनः (105) शाते विख्यातं (106) [4६ 


न पद्गादु (25), फलि 
शराब (98), प्ङ्व्मयुख ( 104), त्न (30 


४617565. 
2110 7680 1128. 


2९९81077) 
£ {16 व] 8 
तमाल {3\ ^ ९ 01 11686 1111६ 11810861} 
° 016 €8170{ ६ €ा11110518451 11 
य 


016 {16 {५/0 ‰ {101 ; 
8€5ऽ |] 71) 8] 
817211८ ८ 11९]1 "१६ {10 81 2 ण [16] + £ 

4 {लाता }825, ¢ 181045वात्‌]187828 त 


8. ^ पाऽ 15 


ए (ऽह) 
२९७7 इजा क 


“ष 0? 
| 10 6011 116 {€‰। ३1 

(1111081 त्वात त 

066 0111260 = 


५ 1६ २8१५1२५7 
व 4/.1.474 647 


०48} € 
2/॥410/4 5 , , पपप्लाा+ त † 
“4 ५५/०८, {6 गार (१ 1 
58. 113५६ 


10 0 गतत 
4.7; 4 १३ 


((-0 9118511। 5116118 1 05111811 01661100. 01411260 0 6810011 


रस =---- 


= 





+ 
(1 ~ 





ोपगर07एल्ा0षि 37 


1. ह 145. : 7115 5. (601१818 07121181 ४€7565 2116 5810511 
८०ा7ाला1व479, 1६ 185 € 2001160 25 176 088€ णा {1115 11168] 
८171100, 7ल< 916 06 एात760 2710 7४९ ४७568 11 1018 }/15. 11 13 
765५४९५ 171 116 29118 ार्ला$ 0४ र ४.४.९२.., 5800प् 
51178170, 08111870 (४106 1.4] (78710 (01161101) 15. ०. 38009). 
1} 9 गा्टि०३] शामा फाडाप्ञलाएौ कत्‌ 18 पाला 1 11218- 
४8971 5610६. 4 ८0171फ76ा6ा51*९ (ताला [89 21012 11 #*€86€5 15 
शशल ए10 ४€ा§€ 710, 99 शात्‌ णि) *€ा§6 10 100 10 105 (ल्ग 
71161879 13 हांषला 0ा]# ५117 2141765 0 {16 &101८05 0110 132 310 
{८1105 66 10 80 976 87119 08718260. 116 8126 01 1118 115. 18 त्र" > 
२” 8710 {1616 86 4 11068 0 8 8९६ 2110 36 11165 € 1116. 115 
2606781 (0ाती्ठा 15 7101 80 2०० एषा 1† 15 16्ंएा€ 876 8पा०5। 
0661, 12601126 276 17416416 91 ऽ6ण्€ा3] [12668 2110 1 5ध्€ा)5 शला 
०14 ९४ 115 3]0687311066. {1 £ 56106 18 1101 60110060. 101 
१२३९8५81 610 101 ९+वा117£ 1018 7ाताणडला 2 शा. ५/€ अ6 
{1197ारव0] {0 अं 9. 21856 विशा, लठ ५. ४. २. 1. 
प्रच्य एपाः 0 7लातला08६ एल 10 19 7684178. 


11 0९18 +"11 कूटलुर नै्तेटत्ते भल्लटशतकन्याख्यानम्‌ (1116 20101410 
9014८ 6०111671147# 06101125 10 41/11/1111 प्ात]तधप प्रठ८०5€) हरिः 


श्रीगणप तये नमः, श्रीगुरुभ्यो नमः| अविघ्नमस्तु | श्रीसरस्बत्यं नमः| श्री दुग पये नमः । 
21101 €105 1] अगा धगते निक्षिपति चेत्यथः। तत्र दुः बस्तु व्यज्यते । इति श्रीमन्म- 
हेश्वरेण ल-णाराध्य । 

2. म" 165, : 1† 15 ए1€5€ ४6५ ब 1116 पापाष्लओ> एन) 0 {£ 
श्ल ग णाप, कशा (४106 ९497 5661107. ^ €6. 710. 
159718, 215318/77). 2118 ] 10 ४7565, {1115 6077110161€ पाप्ता 101 
¡5 (काला 0) 20 1011 812€ 2268. 11 15 8 ९07), 01०५४०88 80 
{7275001 ठा 2 गाकाकाण) 118. 12., 12109 1#/108 17 {16 (०४५१ 
111 01716019] 180 पऽलाएा 110श४; 1180785. 1 00क्षण 1111 
|} श्री: ॥ भल्लटशतकम्‌ । तां मवानीं 3५ ©108 ४1111 इति भल्लटशतकं समाप्तम्‌ ।। 
समाप्तञ्नचेदम्‌ । 

3, मः 145. < (1115 118. 15 8150 16567४६0 1 111९ एणाण्लशि {णश 
0{ [प्प [10ाण्लाऽ{ ए, 18 पाप (106 ३57 ऽद्लाणा ९८ ०. 
1597179, 2153/8/77). 11 15 178115011060 707) ३ पापतां 076- 
57४९ 17 {16 ©0णलाालण (0161191 1197056 01 1107819 }180788 
170 (२. 1१०. 29017. 1113 {12756101 185 01118 (णाल) व 
270 1§ 01111811 07 1/1818087. 1116 10181 7पााण्ल ४) 0061९ 
५१९7865 1 105. [1† 13 फा 00 94 2265 9 1] 5126 11116 एश. 


((-0 9118511| 51164118 1 05111.811। 01661100. 01411260 0 66810011 


भ क = म शनक च+ - शद्ध ` नकृ भ च" = ॥ ह 
। व क बा | ४ ् ४। 2 | १४ क ५14 नदर ॥* 1 1 १४ नः ५ ५, त |, ह कक । क ~+ 9 118 ) 
[20 ^ 1 स 


१ 


|, ज, 
क 
2 
1 
| ५ 
॥ | 
---------- 











38 


1 0९75 ज] 
(५ श्रीरस्तु तु ।। मभल्लेर ख्य ( $ रीगु- 
रम्यो नमः। 210 € पद ॥ मह्लटशतकन्याख्या हरिः 1 श्रौगणपतये नमः । श्रीगु 


05 ५ अ प ५। 
इति ्रीमन्मरे्रेण | $ फ] सनाघं गतत नक्षिपति चेत्यथ : त्र दु ° | बस्तु ठथन्यते | 


यासं इस्तक इष्टं ताहरां लिखितं मया । 

वडवा सुवदधं वा ममदोषो न विद्यते ।। 
भरो तत्‌ सत्‌ । 

118 पाक्नाप्हला1ए{ †§ 


70 6 71 [26४211582877 071 72870 270 
60 0 {1६ पाण्य ~ 087 


# [ए वा, [वाण (ाार्लाश 


0607९78 (0 ^ तता [1 (0) 8 एव7ाा९९( वक्वा) 1/3 
11 (णाऽ 108 0 "9 40 (400.8, (21810806 71. ए.80). 
ट \ < ॥ १ ६ ५ ४ | 1 ५ 
0 600 ५0 इति भल्लरशततकं क ५111 श्रीः । भटटशतकम्‌ । तां भवान 
पः च्छ 015 ॐ ] + | | 
` ` (118 8 7 
९५ 11 1] 8 "0 0०००१८० 6/4110{८ ,9८4 ८८८८ 0751 00011. 
0658, 80002 ९ ^ पतती 94 1\/ 1) ] 899 21 पपा 9४8 948४ 
पान ॥ 15 ३5६ प 1 ण्ट 200 {76 करभाण्डलःए1 ०7 
6 एणा 08८ [ ° त्ताणा 1३5 एवा ०७९0 85 9 115. (९ 
11118 },15. ¡8 ` ` «08178 ] | ॥ 
ध च प्र (08 ॥ 1 0 ५, 
11 €ा1048 11] ४ मल्लटकृतम्‌ म्य टशत्तकं वा 6 क्व 
र।ते रत्नत्रये भल्लरशतवं २। युष्माकमम्बरमशेः प्रथमे मयूखाः 
| तमाप्तम्‌ । 


((-0 ७11851। 91168 1 05111811 (0661100. 01411260 0 60810011 


श्रीः 
महाकवि भट्लटकृतम्‌- 
भल्लटशतकम्‌ 


तां भवानीं अवानीतक्लेरनाशविशारदाम्‌ । 
9 | 
शारदां शारदाम्भोदसितसिहासना समः । १।। 


न्रस्बय :-- भवानीतकलेानाशविशारदां शारदाम्भोदसितसिहा- 
सनां तां भवानीं शारदां दुर्गां पक्षान्तरे सरस्वतीं नुमः। 


श्रीरस्तु 
मल्लटशतकव्याख्या :- टरिः । श्रीगणपतये नमः । श्रीगुरुभ्यो नमः 
गरविध्नमस्तु । श्रीसरस्वत्यं नमः । श्रीदुगयिं नमः । 
यामं महस्तत्कुचभा रनर 
कामप्रदं कामरिपोरचिन्त्यम्‌ । 
करोम्यहं भल्लटसूवितटीकां 
बालप्रबोधायसु "`` ` ` 115 


श्री; । प्रारिप्ितग्रन्थ इह खनु सदाचारानुष्डानमनृकुवतास्य व्यपेतान्त- 
रायाभीष्टसिद्धिहेतोरिष्टदेवतानमस्कारस्यावद्यविवेयत्वादाचाय ण तावत्‌ इष्ट- 
देवता नमस्क्रियते । भवानीतक्लेश्ञनाशविशार्दां ` ` ` रानोपनीतानामविदयादी नां 
केलेशानां नाक रणेन विशारदा समर्था शारदाम्भोदसित सिहासनां शरन्मेवघवल- 


ज,मः ह; कमे नहीं 
क,भ्र, म); हमे नही 
क, म, ट्‌; भरल्लटणशतकं भत्लट : अ 3. 

मा मः्जौर हमें यह्‌ श्लोक उपलन्ध है किन्तु क मे नहीं मिलता। म मे 
ह सड्व्या के विना दिया गया है । अतः डा दी० राघवन्‌ ने इसको ए 
म सन्दे न्तु म तथाह में इसको टीका उपलच्छ री हि तथा 
मे सन्देहं कियाहै। किन्तु म~ तथाह मेड १ 
कृ स १ प्रतियों मे इसका समावेण है । इस कारण इसे भल्लटङकृत 
मानने में किसी प्रकार की आपत्ति नहीं होनी चादिषए | ४ 

परलोक अप्रण 

5. ह; बालप्रबोधाय मः टीकागत यहं श्लोक दोनो प्रतियो स भण 


= + 


((-0 9118511। 91618 1 05111811 0661100. 01411260 0 6810011 





। 
| 
॥ 













ग्‌ 
भत्लट शतकम्‌ 


सिहासनां देशान्तरे शारदे 
पत्नीं नुमः स्तुमः। 


हिन्द ध्नुवाद- । 
सन्तापो को नष्ट कव) संसार से प्रात होने वाले (ग्रनेक रोगशोकादि) 
आन पर्‌ विराजमान ० शरत्कालीन मेव के समान श्वेत सिंह कै 
| त।कप् रि सद न पत 
शारदा (दगा या परती) देव सिद्ध तया श्मलौक्िक तेजस्विनी) शिवपत्नी 


वी क्‌ 
(्लतीपक) व म नमस्कार करते है । 


४. । ततर शरोर शरा 
अ भष राजासन) पर ज्र 


टिप्पणौ 

॥ = ल ग 

दुर्गा तथा ५९६, ४ के 
गा पावती) देवी हो जाये 
पृथक पद माने 1 

गि 0 (२ गाय तो द्गदिर्वं ओौ 

हा । ग्रन्थ के रम्भे १ र सरस्वती देवी यह्‌ प्रथक्‌ एथक्‌ ग्रथ 


इष्टदवताया समुभितषटदेवत) भ क्पिगयेकायंकी निष तमाप्ति के लिए 

कवि भत्लट तथा इस श्न 1 स्मरण करने की प्राचीन परिपाटी है। महा- 

क अनुसरण कर ए टीकाकार महेश्वर इन दोनों ते दस परस्परा 

खि (न १ | रस्व ९; ष ; ध 

: ? समय कवियों दारा तीप मे सरस्वती समुचितेष्टदेवता (कान्य 
। 


स्मरणीय काव्यविद्या कौ उपयुक्त श्रयिष्ठात्र 


ति सरस्वती कथ्यते । एवम्भूतां तां भवानीं भवस्य 


प्राप्त होने वाक्ते (श्रविन्याजन्य) कष्टों का विनाश 
न मेध के समान श्वेत सिंहासन (स्वणेमय या 
धिष्ठित सरस्वती देवी को हम नमस्कार करते दै । 


रस प्रथम श्लोक में प्रयुक्त भवानी पद का ग्रथ 
जायेगा ५ वती हे । भवानीं शा रदां का श्रथं शि वपत्नी 
यदि भवानीं च शारदां च इस रूप में पृथक्‌ 


स्वतन्त्र ९६ क १.19. 9 3 || काण्प्र9 २ प्‌ | 

वानीं मवानीत तथ 7 वाले आचार्यो के मतानुसार यहा प 

सारदाम्भोदसिा ॐ निरर्थक पद विसारं शारदां इन दोनों स्थलों १ 
द्‌ सिहासनाम > की म्ाघरत्ति होने से यमकालद्कार ह । 


0 10 §1‰2' 1 


© ५ 
०१65७ 0 16811778- 70 थ 


1 14 
107-1}11 071171211118 70 116 ता 


| 0 | ॥ % ५ ५ 1 {[* 
0-0 51851 51161118 1 0511/९/181 00661011. एटि सए्ल्कजघ्ेठात 771 17116 


नर 





| 


| 








भल्लदट शतकम्‌ ब 


-___ = 
१] दडः - 
क = ° 


युष्माकमम्बरमणोः प्रथमे' मयूखा- 
स्ते मङ्धलं विदधतुदयरागभाजः। 
कुर्वन्ति ये दिवसजन्ममहोत्सवेषु 
सिन्दूरपाटलमुखीरिव दिक्पुरन््रीः ।।२।1 


| 


अरम्बरमणेः उदय रागभाजः ते प्रथमे मगरूखा युष्माक मङ्गलं विदधतु 
ये दिवसजन्ममहोत्सवेषु दिक्पुरन्ध्रीः सिन्दूरपाटलमूखीरिव कुवन्ति । 


अनन्तरमभिलपितवस्तुन्यासं करोति । युष्माकमम्बरमणेः प्रथमे ममूखा 
इति । श्रम्बरमणेः उदयरागभाजः उदयसमयसभ्नातलौ? त्यसंभ्रयिणः प्रथमे 
तत्पूर्वोदितास्ते तथाविधा मयूखाः किरणाः युष्माक मङ्गलं कल्याणं विदधतु । 
दिवसजन्ममहोत्सवेषु दिक्पुरल्धीः सिन्दूरपाटलमूखीरिव कुवन्ति । म्रत्रायमभि- 
प्राथः--यत्र यथा पृत्रजन्ममहोत्सवेषु प्रष्टा जना यो षितः सिन्द ररेणना वपुः 
कुवन्ति तथेति । 
त्राकाशमणि-चथै की उदयकालीन लालिमा ते युक्त वे पहली किरणं वम्हारा 
कल्याणा करं जो (किरणे) दिवस के ज न्मोत्सवों मे दिशाखूपी स्त्रियों के मुखां 
को मानों सिन्दूर से लाल कर रही हं । 
यहां दिक्पुरन्धीः में रूपक तथा सिन्दररपाटलमुखीरिवे में उतप्रक्षा दै । सूय- 
देवताविषयक रति होने से भावध्वनि है । 
1149 1116 ला 0781 18/85; 1129718 1€0 ९०10 0 7151718 ऽपरा, 
11€ 16५6] ° {11€ ऽ1८४, 01118 61976 10 जणा. 1686 188 876 


16666111 ४1111 ९111110, 95 1 एला6, प्र {9८65 0 1260165 71 1116 
{01 0 त176011015, 010६ (लल0ाधनाऽ 0 {16 णी ज (© तव, 


बद्धा यदप॑णरसेन विमद॑पू्वं- 
मर्थान्कथं* फटिति तान्प्रकृताच्‌ न दुः । 
चौरा इवातिमृदवो महतां कवीना- 
मर्थान्तराण्यपि हठाद्‌ वितरन्ति शब्दाः ॥३। 
"0 9. 
1, क, म, हु; प्रथमाम्‌ 
2. अ, क, ह; मर्त्यान्‌ मः 
3, मः; हठा हं 


((-0 9118511। 5116118 1 0511/.1811। 01661100. 01411260 0 6810011 





॥ 1 
यु 


= = न्‌ । + 
3 |] ॥ 

















[~ ~~~ ~ = 


यिनी ५. ० 


भत्लदट एरतक म्‌ 


यत्‌ श्रपणरसेन $ 
कवीनामतिमदवः 1 तरतितरकाः । ्रतिमृदवः चौरा इव महतां 
1 प ` भ्रथन्तराण्यपि हठात्‌ वित्तरन्ति । 
?वकाव्यप्रशंसापदेशेन = 
विच 1 4 । च पर < पित 1 र ४ 
न विद्यत इत्याह । (९ उपत्ताथप्रत्याहरणे विमदः विनान्यन्यायान्तरं 


ल विमद वमि ध 
प्रयोगोचिता अतिमृदवोऽ्यन्त ९१भति । यदयं णरसेन विवक्षितो योऽथंस्तस्य 


तानु प्रस्तुतान्‌ त हतां कवीनां शब्दास्तान्‌ म्र्थान्‌ विवक्षितान्‌ 
बुद्धया विमृद्य ध लोचनपुरस्सरं कथः भटिति सपदि मनीषिया 
9 मदनेन १ तेपा सवदा सपदि दद्युरेव । किच हटऽत्‌ 
न्ति < 
धाचोराः क च (वितरन्ति) परश्चादन्यानप्यथान्‌ 
^ 9 मदर वयानयनदेतोवंा स्वभावधयंविहीनत्वा 
भ्यमानभधेनार्थन्तिर ५ ₹ वध्यमाना; परमुपिता्थंजातं दत्वा पनः 
तराण्यपि हठत्कारेण बितरम्ति ५ ॑ 


भया (सव्य मे 

। भम न, 
माते ह ( र्था ` 4 दरा) ये शब्द रसाषणसद्ित निनद कियि 
वचारपूवेक ( ।*द्‌ रसात्मकं च ८3 < | 
( वा चिन्तन कि ये कर नकिर्‌ रख ते है सलिए ये 
व्याधं श्रौर्‌ ३ ठ शकर सामाजिकं ग्रोर श्रालं जाते ह इसलिए ये, 


= 4“ यु ल गं य त 

दूसरे (रु ) रूप उभयि लोचक को) उन उन प्रस्ठ 
र ५ वकष व्रथाको तत्काल क्यों न देव! 
(१ । वेह) न [ 
र धि चल स्वभाव वाले बहत ही कच्चे 
बलपः ॐ धक कोमल श > क्र 
लपूषेक दे देते है | मल शब्द (्नुरंणनात्मक ध्वन 


रपव थ 

ब्दाथं- व ५ पधान्तिराण्यपि ५ उनापुवेक ग्रथं होने से) पदरलेष 
इव इस रंश? १ तक्षयाथं श्रौर 2 "१ पदों म भी पददलेष है । श्रं का 
त  ङ्पार्थ प त्रिविध श्रं तथा धन है। चौरा 

गहाकवियों $ इन १ श्लेषानूप्राणित चतो ङर९। 
» भ्रपराघमं जवे कान्‌ न काज्ञान तो आसानी सरे हो जाता 
चु रोई वर्‌ तु को ण्साचोरको २ १ बुद्धिसे ठी सम्भव होता है। चोरी 
| ॥ सा ¶ १इ लिया जाताटै तो वर्ह उस 
त देले पुर] दई वर ५५1 दे त्ता है किन्तु यदि उसे मारय 
६। भोर जैसे दर ५ चोरी स्वीकार करके न्द भी 
ष्म विचार्‌ 6 पिः गुप्त घनों को वापिस कर 
भ्य बन जाने पर नानाविध र्था 


2/1 (01661100. 10111260 0 6810011 












मंत्लट शतकम्‌ ५ 


को उद्घाटित कर देते हं। 


[1 5110पात 101 11€ (०ात8 0 27681 00618 ९1४८ पातवा गल४ 
[11086 € 07 पणता पीलक काह 1ालवाा ? 10111» 59) णण08 9) 
27641 0615 96 01८66 10 &1५९ 0111€7 (9६8९11५6) 111681111105 8150, 
1151 25 116 {1116४65 04118111 11 (गा7दलानाी ५11 83 प्रीर्ा 18*6 
{0 11271 0श्€ाः [1601816] 116 ऽगला 21110165 81710 3716 प्रिय 
८०ाएवाल्ध 10 अपात जष्ल 1111125 2150 +#1116]) {€ 7771211 
12४€ 5101 ए1€10 01४. 


काचो मरिर्मणिः काचो येषां तेऽन्ये हि देहिनः । 
सस्तिते सुधियो येषां काचः काचो मिमं सिः ।।४॥। 


येवां काचः मणिः मणिः काचः ते हि देहिनः श्रन्ये। (वस्तुतः, 
ते सुधियः सन्ति येषां काचः काचः (एव) मणिः मणिः (एव भवति) । 


ये सदसद्िवेके जडा" अ्रसन्त एवतेयेतु जानन्ति त एव सन्त इत्याह- 
काचो मणिमंशिः काच इति | येषां काचः मणिरिव रत्न इव प्रतिभाति 
मणिरपि काच इव दश्यते ते भ्रन्ये देर्हितोः (हस्तचरः) णाद्यवयवस्य शरीरभारस्य 
बोढार एव । न तु किचित्‌ प्रयोजनं तः साध्य येषां काचः काच एव मणिमंणि- 
रेव प्रतिभाति ते तथाविधाः सुधियो भवन्ति| न सवत्र एतदुक्तं भवति येषां 
दोषा दोषा एव गुणा गुणा एव ते तथाविधा बुद्धिमन्तो विमला भवन्तीति । 


जिन व्यक्तियों क लिए शीशा मणि दै ग्रौर मणि शीशा हं वे निश्चय ही 
दुसरे प्राणी दँ (ग्र्थात्‌ मूखं दै) । (वास्तव मे) वेदी बुद्धिमान्‌ द जिनके लिए 
शशा शीशा (दी) है ग्रौर मणि मणि (ही) है (श्र्थात्‌ जिनकी दष्ट मं दोष 
दोष ही है श्रौर गुण गुण दी दै) । 


यहां काचः श्रौर मणि; इन दोनों व्यञ्जनसमुदायों की मनेक वार 
श्राव॒त्ति होने से वृत्त्यनुप्रास है।य्‌ तथात वर्णो की श्रनेक वार श्रावृत्ति होनेसे 
भी वृत्त्यनुप्रास है । “श्रनेकस्यंकधा साग्यमसछद्‌ वाप्यनेकधा । एकस्य सकृदप्येष 
वृत्यनुप्रास उच्यते ॥।" (साण्द० १०, ४) । यहां अप्रस्तुत मणिकाचवृत्तान्त से 

५ ~= 4 ~~~ 

1. ह; मध्में नहीं 

2. ह; अन्यदेहिनः मः 

2. संशोधित पाठ ` * ` णाद्यवयवस्य म, ६ 

~(-0 3118511 ॐ161९/18/ [ 08114801 0166101. [1011260 0 ©810011 





६ भत्लटशतकम्‌ 


प्रस्तुत सगुण निर्मुण व्यक्ति के वृत्तान्त की प्रतीति होने से भ्रप्रस्तुतप्रशंसा 
ग्रलङ्कार है 1 “श्रप्रस्तुतत्मस्तुतं चेद्‌ गम्यते" ` * अप्रस्तुतप्रशंसा स्थातु" (साण्द० 
१०, ५८-६०) । यहां काच शब्द गृणहीन वस्तु श्रौ र मणि शब्द गुणोपेत वस्तु 
के ्रथं मे सङ्क्रन्त हो ग्ये है, इस कारण यहां भ्र्थान्तरसङ्क्रमितवाच्य 
लक्षणामुलघ्वनि है । 


16 156 तारलि€ा1191€ एलशल्ला 2 € अत 2 21255. {10056 
0106ा§ 416 16ा€ 0058655015 9 60101691 शलाा5 (1860६ दल्ल्णा शण 
0156111110900) 00 11512166 2 &1255 0 2 1€*€] 2710 2 € शि 
2. 21455. 


नन्वाश्चरयस्थितिरियं तव कालकूट- 
केनोत्तरोत्तरवििष्टपदोपदिश्टा । 

प्रागणेवस्य हृदये वृषलक्ष्मणोऽथः 
कण्ठेऽधुना वक्षसि वाचि पुनः खलानाम्‌ ।५॥ 


(हे) कालकरट ! उत्तरोत्तरविशिष्टपदा इयम्‌ भ्राश्रयस्थितिः तव 
ननु केन उपदिष्टा ? प्राक्‌ भ्रणंवस्य हूदये ग्रथ वृषलक्ष्मणः कण्ठे अ्रघुना 
पूनः खलानां वाचि वससि । 


दजन: किचितु पदं लभते. चेत्‌ पुन रुपयपर्यारोदुमीहत एवे । नन्वाश्रयस्थयिति 
दियमिति । है कालकट कालकूटाख्य महाविष केन तवेयमृत्त रोत्तरविशिष्ट- 
पदोपदिष्टा उपर्युपर्यम्यधिककालावकाश्षा भ्राश्रयस्थितिरवलम्बनहानेनान्यत् 
गतिः । कथमिति चेतु प्रागणंवस्य हूदयेऽम्यन्तरेऽभ्युषितोऽसि श्रथ वृषलक्ष्मणः 
शिवस्य कण्डे ह्युषितं पुनरधुना खलानां वाचि वस्तसीति एतदुक्तं भवतिः“ 
सोढुं शक्यं न दु्ज॑नवचनमिति | | | 


ग्रे हलाहल विष | एक के पश्चात्‌ दूसरे उत्कृष्ट पद (को प्राप्त कराने 
वाली (इस ॐचि स्यान मे) रहने वाली विधि का तुभे किसने उपदेश रिया है? 
पले तुम समुद्र के हदय मेँ (रहते थे); फिर शिव के कणठ मेँ रहने लगे शओ्रौर 
श्रवतो तुम दुष्टंकी वाशी में बघते हो। 


यहां कालकूट विष नामक एक वस्तु क स्थिति समुद्रादि श्रनेक श्राधारो 


1. क,म' हु; नृषलक्ष्मणो म 


((-0 9118511। 51164118 1 05111.181। 01661100. 01411260 0 66810011 


१9 [त ` प अथ ` ` ध अ पमि । 


प्णीषयक् थ यि) च ` ध कय थ > "त 


~ * ~-...-,*--- -------.-. ~ ~ ~ .-~-+~-"~- ~ 


== ~ 


कय 
-----=---------्् ~ -- 


र कृष्‌ 


मुय आ श , 1 ~ 1 कि , ^ > ~ यित, बक 


[= य्न = 


भस्लटशतकम्‌ ७ 


मे बताई गई है अतः यहा पर्यायालङ्कार है। प्राचधयं मम्मटने भी इसे 
पर्यायालद्कार के उदाहरण मे रखा है (का० प्र° १०, ५१४) । इस भ्रलद्भार 
का लक्षण इस प्रकार है-एकं क्रमेणनेकस्मिन्‌ पर्यायः (काण्प्र° १०, ११७) 


0 0180, 06 085 ताऽ 1057प६€त $० ७ 1४९10 हल 200 
06 12665 ‰ <^ 75४ ४०४ 1४६ 10 1706 [€ 9 {06 ०८्ल्ड, 
{लाल्याः 171 € प्02{ 9 1४2 874 10 रा [४६ आ € 107४७ 
(8९6५1) 0 €५11 एल50०5. 


द्रविरमापदि भूषरमुत्सवे 

दारणमात्मभये निशि दीपकः 
बहुविघाभ्युपकारभरक्षमो 

भवति कोऽपि भवानिव सन्मणिः ।॥६।। 


(हे सत्पुरुष !) बहविधाम्युपकारभरक्षमः भवान्‌ इव (सः) कोऽपि 
सन्मशिः भवति (यः) आपदि द्रविणम्‌, उत्सवे भूषणम्‌, ्रत्मभये 
शरणम्‌ निचि दीपकः (जायते) । 


एवं दुजंनं गहंयित्वा सज्जनं इलाघते । द्रविणमापदीति । सन्मणिः महारल्म्‌ 
भ्रापदि द्रविणं भूषणमूत्सवे भवति । म्रात्मनो भये सपंपिशाचादिके समुपस्थिते ` 
शरणं मवति । रातिषु ग्रहपिशाचाहिमयं निशातमोनि रसनेन प्रभवति । 
एवं बहुविघस्याम्युपकारभरस्याभितोभूतस्थय सवतौजातस्य उपकारस्य क्षमो 
यथा भेवति तथा भवानिव कोऽपि यः कर्िचत्‌ पुरुषः पुरुषाण।म।शरयःः 
भवति व्यसनं स्वांशेनः प्रतिक रोति,. उत्सवे सन्निधानेन प्रकाडयति भ्रभयदो 
निशि तिश्ाकरे निष््रभयति एषं बहूविधाभ्युपकारकररो इति । 


(दे सर्जन पुरुष) ्रनेकं प्रकार के उपकार करने मे समथं श्रापकी तरह 
वह को दी भ्रष्ठ मणि होती दै जो आपत्ति में धनः ` उत्सव मे भूषणः 
श्रास्ममय (के च्रवसर) में शरण तथा रात में दीपकं (बन जाती) है । 


यहां बहुविधाभ्युपकारभरक्षमः इस विशेषण के राजपक्ष भरौर मणिपक्ष में 
1. म, ह्‌; दीपिकाभ, क 


“ , 2, मरः आधितः ह्‌ ` 
23; मध्स्वार्थेनह 


((-0 9118511। 51164118 1 0511.1811। 01661100. 01411260 0 66810011 








भत्लट शतकम्‌ 


समान होने से श्रथ 
ह तपर है। भवानिव सन्मणिः इस ग्रशमें प्रसिद्ध उपमान 


सन्मणि को उ 
भ्रथं भ्रापकी 9 परतीपालङ्कार है। कोऽपि भवानिव सन्मणिः का 
री सन्मणि होती है, प्रत्यक न हीं । आप सन्मणि के 


सच्श हं श्रौर सन्मणि श्राप 

उपभोषमालङ्धारवनि 8) य हे इस भाति तृतीयसद्शब्यवच्छेद होने से 
श बत | त ताच्यालङ्ा । से सर तर जन = नि 

र भौ भ्रभिव्यक्ति हो रही 01 रा से सज्जनप्रशंसारूपवस्तुध्व 


वस्तुप्रों के साथ वन्ध कहू ही वस्तु सन्मणि का द्रविण भ्रादि बहतसी 
[च सम्बन्ध कटा ट इसलिए उत्लेलालङ्ार भी है। य 


८ वत्मभिधेनतमोमलीमसं १ 
व्दमात्रमपि सोढमक्षमा 


भूषणस्य गिनः समुत्थितम्‌ ।1७।। 


घनतमो 
वत्मधि. /. 
(1 ) एन ^ 1 ५ विश्यङ्खलखला श्रीः श्रभि- 
| | , तथत्‌ राब्दमात्रमपि सोट 
टम्‌ ग्रक्षमा 
भथ लक्ष्मीं विडर 


नतर तयति । श्री 

निभिय । घनतमोमलीमसेः 

४ व्दमात्रेमपि 1 तथा + व 
ए पणितः शब्दमात्रेण ल | ५ (11 

= ए पकत-मभूत पापो 2 | 4 | गवरतीति 

1 भ) वो केस ॥ ६ ५९ से जामे वाली, उच्छृङ्खल होकर 

सी उक्तिको = यणी सत्पुरुष से = १ ल्मोरूपी वेश्या (समाज के) 


श्नु । १ षन हु ५५ क्‌ लय 
पचन गदी कर पाती है | ° (कल्याणां कही गई) छोट 
त 
जने वाली: -श्षकारसेश्र 
ने वाली तथा = 4 प प्रथवाव 
ङ्‌ 


= 


त्रं ने 


मार्गा से 
दलों के तर 
रला के अन्धकार से काले दृण 


के सा श्र 
4 चरित्रहीन व्यक्तियों के सा 
((-0 9118511। 5116118 1 05111811 01661100. 01411260 0 66810011 








ध ५ ए 


भतलटश्षतकंम्‌ € 


रमण करने वाली वेश्या सूत्र बाले श्रथात्‌ धागे मँ पिरोये गये किंसी श्राभूषणं 
से उटी हई छोटी सी श्रावाज्ञ को सदन करने मँ च्रपने को श्रसमथे पाती है । 


यहाँ श्री श्रौर श्रभिसारिका क विशेषणो में इलेष है । सावयव उपमेय श्रौ 
के उपर सावयव उपमान लक्ष्मी का ्रारोप हृभ्रा है इसलिए यहां इलेषा- 
नुप्राणित साङ्खरूपक है । यहाँ श्री शब्द धनवान्‌ व्यक्तियों का उपलक्षण है अतः 
यहाँ रूढिमूला उपादानलक्षणा ह 


1051 95 9 [70811106 100861४ आकतद लाः 00 १४३9 16 7607016 
7 71018] ©9746ला {[0पषटाी श्ल तथत्‌ एवा75, 0065 1101 1{01€7816 
८५८) 11 5007 {76206 गाथाय {+ 31711187 {16€ 2०५०८55 
9681111, 1.80, 20178 07 [ला 0 णा 10 ५+16तलधं €00६ 1 पाप 
४8४5, १०९५ 7101 0700८ दला 8 रिफ +*५108 0 8 156 6501). 


ग्माने नेच्छति वारयत्युपशमे क्ष्मामालिखन्त्यां यां 
स्वाततर्त्ये परिवृत्य तिष्ठति करौ व्याध्रय धेयं गते । 
तृष्णे त्वामनुबध्नता फलमियत््ाप्तं जनेनासुना 
य° स्पृष्टो न पदा स एव चरणौ स्प्रष्टु न सम्मन्यते ।८॥। 


माने न इच्छति, उपशमे वारयति, द्यां क्ष्माम्‌ भ्रालिखन्त्याम्‌, 
स्वातन्त्ये परिवृत्य तिष्ठति, करौ व्याधय धेयं गते (हे) तुष्टे त्वाम्‌ 
प्रनुबध्नता प्रसूना जनेन इयत्‌ फलं प्राप्तं (यत्‌ पूव ) यः पदा न स्पृष्टः 
स एव चरणौ स्प्रष्टुं न सम्मन्यते । 


किचत तृष्णातिशयेनानुचि तकरणे प्रवत्तोप्यलब्धर्णोज्रवीतु । माते नेच्छति 
वारयत्युपरमे इति । तृष्णो त्वामहमनुवध्नामीति मया यदा कृतमासीत्‌ तदा 
मानस मत्सरः । माने नेच्छति नियतं मा गच्छेति निवारयति तिरुन्धति स्वा- 
तन्त्पमिति मां त्यक्त्वा गन्तु प्रवृत्ते सति उपमे चिरकालाभ्यस्तशरुतस्नाते 
मा गच्छ मा गच्छेति निवारयति निरुन्धति सति, हिया लज्जायां र्पाणामलं- 
कारभूतायां कथमयमेवंभरतां विपत्तिमनुभवतीति क्ष्मां भुवमधोमुखीभरुय लिखन्त्यां 
सत्यां, स्वातन्व्ये च परोपजीविताय विपरीते परिघृत्य प राद्मूखीम्‌य तिष्ठति 


ह (7 ~~ 
1 भ्न, क, ह में यह श्लोक उपलन्ध; ५ ) मे नहीं 
2. भरकम; यत्‌ ह 


((-0 9118511। 9116418 1 05111811 0661100. 01411260 0 68104011 











सति चैयं गाम्भीर्ये करौ व्याधूय व्यसनातिशयेन हस्तविधुननं कत्वा गते 
सति सवनिततानवन्ञाय त्वामेवानुगच्छताऽनुवघ्नतानुस रताऽमुना जनेन फलमिय- 
देतावन्भात्रमेव प्राप्तं लब्धं पूवं यः पदा न स्पृष्टः य: पदेनापि न स्पृष्टः कुत्सायं 
जायते स एव चरणौ स्प्रष्टुं न सम्मन्यते स स्वचरणयोमया स्प्रष्टुं समीपतयाः 
नानुमति करोति किं चिद्धिगहंयत्येवेति । | 


जब (मेरे) स्वाभिमान ने स्वीकार नदीं किया, शान्त भाव ने मना कियाः 
(मेरी स्थिति पर) जव लञ्जा (लञ्जित दोकर) भूमि कुरेदने लगी, जब (मेरी) 
स्वाधीनता ने सुख मोड़ लिया श्रौर जब हाथ पटक पटक कर (मेरा) धेयं चला 
गया तव हे तृष्णे ! ठम्दारा त्रनुगमन करने पर मुभे यद्दी फल मिला दहै कि 
निस (पुष) को मे परो ते भी नदीं दूता था वह च्रब चरण छने कौ अनुमति 
भी नहीं देता । (श्रथात्‌ जिख को निकृष्ट सभभ करभे वैरो से मी नदीं दूता थाः 
त्रान तृष्णा के वशीभूत ह्योकर उसके पैर छ रहा हँ परन्तु वह फटकार रहा है ।) 


यहाँ इष्ट (धन) की अत्राप्ति तथा अपमान रूप श्रनिष्ट वस्तु की प्राप्ति 
होने से विषमालक्कारहि। 


0 2660 { 87766 [ 1056 {0 गाठ $, शाला 10४ 561{-16510601 
014 101 270070४6 ग 11, कौला 7४ ऽधाला॥# एाहशटणाल्व 706, पला पार 
71106680 (पौ ग 1ल्‌016850658) ३§ ऽला्ला108 106 ल्वा, पणाला पर 
{6600170 0185४846 716 200 +ल र (्णप्रा2९€ प] 71018 1217105 
धी 706, {76 वच्ञणा८ः 25 एव्€ण 21 € 0€ऽ0 = %7©700 1 १५३५ 7101 
ए6क्षाहत {6 लौ त्री क 666 15 207 गाज््ांणह 106 70 €श्ला 
10 {७प्ली 013 ६6. 


पततु वारिणि यातुः दिगन्तरं" 
विशतु" वद्भखिमथ* त्रजतु क्षितिम्‌ । 
रविरसावियतास्य गुणेषु का 
सकललोकचमत्कृतिषष क्षतिः ॥ € ॥ 
ह्‌, अ, क; यात्िम 
इ, अ, क; दिगम्बरम्‌ मा 
ह, क, अ; त्रजतु म व ४ 345 


ह्‌, क, अ; मयो मः 
ह, के, अ; विशतु मा 


10 


((-0 9118511। 51164118 1 0511.1811। 01661100. 01411260 0 66810011 





भल्लटशतकम्‌ ११ 


भ्रसौ रविः वारिणि पततु, दिगन्तरं यातु ्वाह्भि विशतु, रथ क्षिति 
व्रजतु । इयता श्रस्य सकलल।कचमत्कृतिषु गुणेषु का क्षतिः ? 


उत्तमस्यानुचितव्यसनापत्तावपि न कदाचित्‌ स्वभावहानिभेवतीत्याह- 
पततु वारि णीति । वारिण्यपरसागरसलिले पततु । दिगन्तरं वा यातु बह्व 
चिशतु । दिनान्ते स्वतेजो रिव द्धौ निक्षिपतीति लोकवादः 1 भरथो भ्रथवा क्षिति 
व्रजतु । भूमौ निमग्नो भवतु । भूमिश्ब्देन भूम्यघोगतरसातलं प्रतीयते । रवि- 
रसावेवमेव भवतु । तथाप्यन्य (स्य) गोषु का क्षतिः । हानिनं कदाचिदपीति । 
के गुणा इति चेत्‌ सकललोकानां चमलत्छृतयः सम्भावनास्ता एवं गुणास्तेष्वेवेति ॥ 


यह सूयं चाहे समुद्र मजा भिरे, चाहे दृसरी दिशा को चला जाए, चाहे 
श्रागम भिरे श्रौर चाहे भूमि के नीचे जाए, इतने से सारे संसार को चमक्छृत 
करने वाले इसके गुणों कीक्याहानिदै१ 


भाव यह्‌ है कि प्रतापशाली उत्तम मनुष्य कहीं भी जाए, कैसी भी आपत्ति 
मे पडे, दूसरों को भ्रपने गुणों से चमत्कृत कर देता है । यहां अप्रस्तुत रवि- 


वृत्तान्त वाच्य है भ्रौर उससे प्रस्तुत व्यङ्ग्य सज्जनवृत्तान्त की प्रतौति होने से 
श्रभ्रस्तुतप्रगंसा अलङ्कार है 1 


व€ ऽपरो 702 शि 0 € 568, 1029 20 10 € गलः तापन ता, 
7029 शला "6 € 0 70849 20 1710 (€ ल्श, € †ल), 115 
११०11165 ग 1 हलो1०8 1116 016 916 701 16556060. 


सदुव्ृत्तयः सदसदथंविवेकिनो ये 
ते पश्य कौहशममुं समुदाहरन्ति । 
"चौ रासतीभ्रशेतयो ज्ुवते यदस्य 


तदु गह्यते यदि कृतं तदहस्करेणा ।॥। १०॥। 
ये सद्वृत्तयः सदसद्विवेकिनः ते भ्रम्‌ कीदशम्‌ समुदाहरन्ति (इति) 
परय । चौरासतीप्रभ्रृतयः यदस्य ज्रुवते तद्‌ यदि गृह्यते तत्‌ श्रहस्करेण 
कृतम्‌ । 


यं सन्तः स्तुवन्ति निन्दन्त्यसन्तः स एव यस्वीत्याह-सद्वृत्तय इति । 


1. मक; चोराह्‌,अ 


©©-0 51185॥। 5161९187 08॥1/61181¡ 06101. [21411260 0\ 66810011 


११ भैस्लटशंतकम्‌ 


सदुवृत्तयः सदृव्थापाराः । सदक्षदथविवेकिनः सदिदमसदिदमिति ये विवेक्त्‌ 
शक्नुवन्ति ते कौीहशं कीटग्भुतममुमादित्यं समुदाहरन्ति स्तुवन्ति । तत्पश्य 
विमृश । चोरासतीप्रभृतयो यदस्य च्रुवते तन्न ग्राह्यमिति । 


` जो लोग श्रेष्ठ श्राचरण करते ह तथा श्रच्छ बुरे का विवेक रखते है वे 
इस (सूयं) के विषय मेँ स्था कते ह यह देखो ।. चोर तथा दुष्टा स्नियाँ इसके 
बारेमे जो कहती ई वह मानने पर तो सूयं कीं का नदीं रहेगा । 


भाव यह है किं किसी उच्चात्मा के विषय में टीक ठीक जानने के लिए 
विद्वान सज्जनो की राय को महत्व देना चाहिए, स्वार्थी दुष्टो की राय को 
नहीं । चोर ग्रौर दुष्ट स्त्रियां तो प्रपते दुष्कृत्यों मे वाधक होने के कारण सूर्य 
क निन्दा कृरते हं । 

यहां ्रप्रस्तुत वाच्य सूरयवृत्तान्त से प्रस्तुत व्यङ्ग्य सज्जन प्रशंसा की 
प्रतीति होने से श्रप्रस्तुतप्रशंसा अलङ्कार है । 


16 ऽ0णातं {2166 101० (०णऽवलयदप्रजाा (2६ € &००५ 2607916 
0804016 ° त्प ४८४४८ &००५ 27 ८4 58 200४६ (16 
शा. एउल्ालात्‌ ! # $०प दत्ल्छौ जा (16५८5 20५ ०2 गा) 58४ 
400 11 लया 18 {€ ऽछा {0 96 (्०ातलण<्व 0 पदा ? 


पातः' पूष्णो भवतति महते नोपतापाय यस्मात्‌ 

काले प्राप्तेः क इहशन ययुर्यान्ति यास्यन्ति वान्तम्‌, । 
एतावत्त्‌ व्यथयतितरां लोकबाह्य स्तमोभि- 

स्तस्मिन्नेव प्रकृतिमहति व्योम्नि लन्धोऽवकाशः ॥ १ १॥। 


र्णः पातः महुते उपतापाय न भवति यस्मात्‌ इह काले प्राप्ते के 
तस्त न ययुः (न) यान्ति (न च यास्यन्ति। किन्तु) एतावत्‌ तु 
(्रस्मानु)व्यथयतित राम्‌ (यत्‌) लोकबाह्यः तमोभिः तस्मिन्‌ एव प्रकृति- 
महति व्योम्नि भ्रवकाशः लब्धः (यस्मिन्‌ पूवं सूरयः स्थिरः आसीत्‌) । 
- ---~-~-~----~----~-- 
इ, अ, क; अन्तः मा 
द, बः, क; भवतु अ 
ठ्‌, मः, म; काल्ेनास्तम्‌ क 
क; वे ह्‌, मः, ग 
भः, चास्तम्‌ ह्‌, ध; चान्ये क 


^ ~> © (> ~ 


((-0 9118511। 51164118 1 0511.1811। 01661100. 01411260 0 66810011 


=-= = = _ 
श =-= > 








भत्लटशवक्‌म्‌ १३ 


उत्तमगुणविनाशस्तथा न व्यथयति यथा दजनोन्मेष इत्याह- पाततः पूष्णो 
भवतीति । पात इत्यादि । पूष्ण भ्रादित्यस्य पातोऽस्तमयो महते निष्प्रतीकारा- 
योपतापाय मनोदुःखाय न भवति । यस्माद्धेतोः काले प्राप्ते फलोन्मुखे सत्ति क 
इवे के वा भ्रस्तं न ययुः । भ्रस्तं न यान्ति नास्तं यास्यन्ति च। तस्मादिति 
एतावन्मात्रमेव व्यथयतितराम्‌ । लोकबाह्यः सवेलोकवरहिभूतंः तम (भि) स्तस्मि- 
न्नेवं प्रकृतिमहति स्वभावत एव प्रथितमहिम्नि व्योम्नि गगने अवकादो लब्ध 
इति यतु तदेतावन्माचमेव व्यथयतीत्ति ॥ 


सुय का पतन (श्रस्त होना बहुत) बड़े कष्ट के लिए महीं है (चर्थात्‌ 
इससे हम श्रधिक दुःखी नदीं है) ्योकिं इस संसार मे (मृस्यु) समय श्राने पर 
कौन शवसान को प्राप्त नदीं हुए, नदीं हो रदे है च्रथवा नदीं देगि (श्र्थात्‌ 
सभी की यदी दशा होती श्रा रदी है श्रौरशेगी परन्तु) इतनी बात तो (दम) 
श्रत्यधिक पीड़ित करती है किं (इस) संसार से बाहर निकाले दए अन्धकारो के 
दारा उसी स्वभाव से महान्‌ श्माकाश मेँ (श्रपना) स्थान बना लिया गया है 
(जिसमे पदले सूये प्रतिष्ठित था) 


एेसा प्रतीत होतादहै कि यहां महाकवि भल्लट कदमीर के यशस्वी एवं 
लोक्रिय राजा अवन्तिवर्मा की मृत्यु के श्रनन्तर सिहासनारूढ राङ्कुःरवर्माके 
राज्य को दुदेशा से खिन्न होकर ठेसा लिख रहे ह । या श्रप्रस्तुतवाच्य 
रवितमोवृत्तान्त से प्रस्तुत व्यङ्ग्य प्राचीन एवं नवीन राजवृत्तान्त की प्रतीति 
होने से भ्रप्रस्तुतप्रशंसा ्रलङ्कार है । 


1 15 701 शला$ 0160658108 10 {८10५ 1181 {€ फण 18 581. ४१110, 
०४९ 10 (706 010 0 एकया, शल 70० करण ग छशा एन एलं§] ? 
४181 15 लङ एकण्पि 15 "6 864 पी {€ क्ा6 ९३७ 310 (क 
४25 [लशकणर 0न्लपल्त 0४ पाल ऽप त0फ) 025 एत्ला 0ण्ल0शल6त 


0 € ०211655. 
प१डक्तो विशन्तु गणिताः प्रतिलोमवृक्त्या 
पुवं भवेयुरियताप्यथवा त्रपेरन्‌ । 
सन्तोऽप्यसन्त इव चेत्‌ प्रतिभान्ति भानो- 
भासाऽऽवृते नभसि रीतमयूखमुख्याः ॥१२॥ 


1. . मः, अ; विकशषन्तिक, ह 


((-0 9118511। 51164118 1 05111.1811। 01661100. 01011260 0 66810011 


१४ भल्वटशतकम्‌ 


भानोरभासिा नभसि श्रावृते (सति) शीतमयुखमुख्याः (न्ये ग्रहाः नक्ष- 
घरारि च) सन्तः श्रपि श्रसन्त इव प्रतिभान्ति । पङ्क्तौ चेत्‌ (ते) विशन्तु 


(तहि) प्रतिलोमवृत्त्या पूरवे भवेयुः! ्रथवा इयताऽपि ते (कि) पेरन्‌ ? 


ग्रधमानानामत्यन्तसम्भावितानामपि न कदाचिदुत्तमप्रकृतिता भवतीत्याह 
-पड्क्ती विशन्त्विति । भानोमसिवृते परिवीते नभसि शीतमयूखमूख्याइचन््रायया 
भ्रन्ये नक्षत्रताराग्रहाः सन्तोपि भवन्तोपि भ्रसन्त इव प्रतिभान्ति प्रकाशन्ते चेतु 
ते पड्क्तौ सूर्यादिभिरपिष्ठतायां वीथ्यां विदान्तु । भ्रन्तगंता भवन्तु । प्रतिलोम- 
वृत्त्या प्रतीपवृत्त्या केतुराहुमन्दादिस्वरूपया गणिताः संख्याताः पूव पुरःस्था 
भवेयुः । श्रवा तथापि इयततावन्मात्रेणापि कि त्रपेरन्‌ लज्जाभिभरुताः कि 
भवन्ति ? किमिति भ्रष्याहायंम्‌ । सर्वथा न लसिता भवेयुरिति । सन्त इति न 
चित्राणि सूच्यन्ते । श्रयमथः । उत्तमसंनिघाववमा जीवन्मृता एव तथा निस्त्र- 
पतया सद्भिः सहव पड्क्तावरुपविशचन्ति । यो योऽवमस्तं तमारम्य गणिताः पुरस्था 
भवन्ति । एतावन्मात्रमपि सम्भावनां मन्वाना न लज्जिता: कथं भवेयुरिति ॥ 


सूयं के तेज से आकाश के व्याप्त दो जाने पर चन्द्रादि (दुसरे दूसरे न्षघ्र) 
होते हुएभी न होते हुश्रों की तरह प्रकाशित शेते द (अ्रथवा प्रतीत होते ई) । 
परन्तु यदि वे (सूर्यादि बड़े ग्रहो की) श्रेणी मेँ प्रवेश पाले तो उल्टे क्रम से 
(केत, राहु, शनेश्चर, मङ्गल, चन्द्रादि, रूप मँ) गिने हुए वे श्रगले-श्रगल्ले हो 
जाते है फिर मी (क्या) वे इतने मात्र से (ग्र्थात्‌ पिद्धडे होने पर अगे श्रागे 
गिने जाने पर) लज्जित होते है १ (बिल्कुल भी वे शर्भिन्दा नदीं होते) | 


महाकवि भल्लट ने यहां यह वतलाया है किं सूयं की उपस्थिति में अर्थात्‌ 
दिन में तो चन्द्रादि नक्षत्र चमक्ते ही नहीं है, रात में भी यदि चन्दर प्रकारित 
होताहैतोसूयंकेही प्रकाश से चमकता है । किन्तु सूयं के साथी चन्द्र राहु, 
केतु भ्रौर शनंरच रादि नक्षत्रों की चमकने वालों मे गणना होती है श्रीर इनको 
मी महत्त्वपूणं मान लिया जाता है । यदि कहीं उल्टे क्रमसे नक्षत्रों कौ गणना 
होती है श्रयति छोटे राहु" केतु भादि नक्षत्रों का नाम पहले तथा सूयंकानाम 
बाद मे लिया जाताहै तोये नक्षत्र ्रपने को डना समभते है । इसी प्रकार 
उत्तम कोटि के पण्डितो की उपस्थिति मे मुखं पण्डितो का कोई प्रभाव नहीं 
पड़ता है परन्तु उनको भी जब भ्रन्य प्रकाण्ड पण्डितो के साथ सम्मान दिया 
जाता ह तो वे श्रपने भापको सचमुच का पण्डित मानकर प्रभिमानी बन जाते 
रह। सम्मान पाकर वे लज्जित न होकर गौरवान्वित होते है । 

यहां अप्रस्तुत वाच्य सूयचन्दरवृत्तान्त से प्रस्तुत व्यङ्ग्य उत्तमाघमपुरूष- 


((-0 9118511। 51164118 1 05111.1811। 01661100. 01411260 0 66810011 


2: 
श, 


~ क 

(नुम 

~~~ ~: ६ 
गन्म = 


"~: - ~~ --- 


~ = ~~ 


-~--------- 
~~: ~+ 


----.- 
-+-----:---- 


+ 
१, ज ५ 


~~~ ~~ 


----~ न्न ---------:-- ~~“ 0 द 


=== ~= ~ +~ 


भम == ५. 


न्न 





भल्लटशतकम्‌ १५ 


वृत्तान्त की प्रतीति (साद्य के प्राधार पर) हो रही है । भ्रतः यहां भप्रस्तुत- .. 
प्रशंसा अलद्भुार है। 


४४06 {06 [ण७॥€ 2 {176 ऽपर 0८्लणण€ऽ 06 अछ, पाला #1€ ठता 
294 {76 छदी ऽवाऽ, {10प्रद्ा लह, ५० 00६ गुए८2ा 10 ४६ 50. 
$ 067 (हलति 00 {16 00005706 वापव्ला०ा) 0 गवलया, (6 ए6्6०0€ 
पि 10 च 1271८, एए 00 धल ध्व 25702106 2 1? 


गते तस्मिन्‌ भानौ नरिश्ुवनसमून्मेषविरह्‌- 
व्यथां चन्द्रो नेष्यत्यन्रुचितमतो नास्त्यसहशम्‌ः । 
इदं चेतस्तापं जनयतितरामनत्र यदमी 
प्रदीपाः संजातास्तिमिरहतिबद्धोद्धुरशिखाः* ।। १३।। 


तस्मिन्‌ भानौ गते त्रिश्रुवनसमुन्मेष विरहन्यथां चन्द्रो नेष्यति श्रतः 
भ्रनुचितम्‌ भ्रसद्शं नास्ति । इदं चेतस्तापें जनयतितरां यत्‌ भ्र्र भ्रमी 
प्रदीपाः तिमिरहतिबद्धोदुधुरशिखाः सञ्ञाताः ॥ 


उत्तमकल्पेनाप्यपनेतुमशक्यामुत्तमविरहव्यथामत्यन्तमघमोऽपनेत्‌ं कथं शक 
नोतीत्याह--गते तरिमिल्निति। तसिमिन्‌ तथाविधमहाप्रभावे भानौ गते भ्रस्तमिते 
त्रिभुवनस्य समून्मेषः प्रादुभविः। तद्िरहेणामावेन जातां पीडां चन्द्रो नेष्यतीति 
यदतः पर सवंषामनुचितमसाम्परतं नास्ति । तथापीदं वक्ष्यमाणं चेतस्तापं जन- 
यत्तितरामू । किमिति चेत्‌ भ्रत्र त्रिभुवने प्रदीपास्तिमिरहतिबद्धोद्धुरशिखा 
जाताः 1 तमोनि सरसनहेतोजंनितोद्धतज्वालास्सम्भूता इति चेत्‌ इदं चेतस्तापं 
जनयति । 


उस सूयं के श्रस्त हो जाने पर तीनों लोकों की उत्पन्न हुई विरहपीडा को 
चन्द्रमा दुर कर देगा-इस कयन से बढ़कर श्रनुचित श्रौर गलत बात को$ नीं 
परन्तु इस खम्बन्ध में यह बाततो मनकेोश्चीर मी पीड़ित करती दहैकिद्यब 
यदं ये छोटे-छोटे दीपक ही अन्धकार को दूर करने के लिए श्रपनी बह्वी मोरी 
चोटी बंध रहे ह (उद्यत दहो रहे रै) 


यहा भ्रप्रस्तुत वाच्य भानुचनद्रप्रदीप वृत्तान्त से प्रस्तुत व्यङ्ग्य उत्तम- 


1. अ, क; नात्ति सदृशम्‌ मः, ह 
2, अ, फ, हु; बद्धोद्धत,.. ,..मः 


~(-0 3118811 ॐ161९/18/ [ 08110811 (0661010. 1011260 0 ©810011 


पः 1 


न ~ ~ ~~ 


१६ भत्लटश्तकम्‌ 


मघ्यमाघमपुरूष वृतान्त की प्रतीति होने से (सम सेसमकी प्रतीति रूप) 
भ्रप्रस्तुतप्रशंसा ग्रलद्धुार है । 


¶06€ा€ 15 10111 71106 प्रणाएठ 270 [100 {17121 {1€ (लाश 
1781 € 7100 शला एला10*८ {16 285 9 5€0शः8ध0या 68५60 {० 10€ 
17766 045 0४ 116 ऽए ग 16 ऽप. एप 1६ 15 10016 01516581 
10 लाणक 04 10 {0686 1811 €वला 1210705 02५८ ०6060 16 
0९51709 ४1८ तकशा ता€85. 


सूर्थादन्यत्र यच्चन्द्रेऽप्यथसिस्परि तत्कृतम्‌ । 
खद्योत इति कीटस्य नाम तुष्टेन केनचित्‌ ।। १४॥ 


केनचित्‌ तुष्टेन (जनेन खचयोताभिधस्य) कीटस्य खद्योत इति तत्‌ 
नाम्‌ छृतं यत्‌ सूर्यादन्यत्र चन्द्रेऽप्यथसिंस्पशि (विद्यते) । 


गुणदोषविवेचनशक्तिरहितोऽयं पक्षपातेन यं कन््विदवरामनवद्यगुणं मत्वा 
तदुचितेन संस्कारेण संस्करोति । तं प्रत्याह--सूर्यादन्यत्रेति । खमु श्राकाशं 
प्रकाशयतीति खद्योतः सूयं एव । तस्माल्सूर्यादन्यव यच्चन्दरेऽप्य्थसिंस्पशि 
खद्योतताभावादंगातार्थं तत्‌ खद्योत इति नाम । तुष्टेन पक्षपातिना केनापि 


कस्यापि कोटस्य कमेज्योतिरिङ्गणास्यस्य कतं न गुणापेक्षया केवलं पक्षपात- 
मात्रेण कृतमिति । 


किठी पर्चेपाती (चाइकार पुरुष ने खद्योत नाम के) एक कीड़े का खद्योत 
(श्राकाश को चमकाने वाला) इस रूप मेँ वह नाम रख दिया है जो (ऊँचा नाम 
तो) सूये को छोड़कर श्रन्य किसी मे (यहां तक किं) चन्द्रमा मं भी श्रपने श्रथं 
को नहीं छता (है) (ज्र्थात्‌ खद्योत का ब्युत्पत्तिजन्य श्र्थ तो चन्द्र पर भी नदीं 
लागू होता है)। 


खम्‌ जाकाश्ं योतते भ्रकाक्लयति इति खयोतः- यह्‌ व्युत्पत्ति केवलं सूयं पर 
ही धरती है । चन्द्र शन्दकी व्युत्पत्ति 'चन्द्रयत्ि ग्राह्वादयति रति चन्द्रः इस रूप 
मही सम्भव द । इस कारण खयोत का ब्युलत्तिनिमित्तक श्रथ केवल सूयं 


परर ही बट सकता है चन्द्रमा पर नही । चन्द्रमा केवल रात को ही आकाश को 
चमका सकता है दित मे नहीं । 


1, ई, मः, क; चन््रायभ 


((-0 9118511। 51164118 1 05111.1811। 01661100. 01411260 0 66810011 


॥ 
र 7 ५५1 





भल्लटषतकम्‌ ` १७ 


यहां खलचोतत पद का श्रपने प्रसिद्ध जुगनू रथे मे श्रपह्लव करके सू्य॑- 
चन्द्रादि भे इस पद के भ्र्थं की स्थापना होने से यहां पयंस्ताप हुति है। साथी 
भ्रप्रस्तुत वाच्य सूयं चन्द्रवद्योतवत्तान्त से प्रस्तुत उत्तममध्यमाधमयपुरुष वृत्तान्त 
की प्रतीति होने से भ्रप्रस्तुतप्रशंसा अलङ्कार भी दै । दोनों भ्रलङ्कारों का एक 
ही स्थान पर प्रवेश होने से यहां एकाश्रयानुप्रवेश् सद्धुर दै । 


30106 381181६ एभि ए0€ाऽ०ा 025 7811160 ध1€ ऽण्था 15६८ 
(£1०-५00) 35 0440014, 1.6. "ऽक -1प्ा102101.' 013 न0106६ 06 
015 ॥1€ प्रा व0€ 210 0065 101 ऽपा( ध तल 66९0६ 06 7160. 


कीटमणे दिनमधुना तरखिकरान्तरितचारुसितकिर मू । 
धनसन्तमसमलीमसदरशदिशि निशि यद्विराजसि तदन्यत्‌ ॥ १५॥ 


कीटमखे ! तदन्यत्‌ यत्‌ धनसन्तमसमलीमसदरादिरि निलि विरा- 
जसि 1 भ्रघुना तरणिकरान्तरितचारुसितकिरणं दिनम्‌ (श्रस्ति) । 


कापुरुषाणामूत्तमसल्निघौ न प्रादुर्भावः । तदसन्निधावेव समुन्भेष इत्याह- 
कीटमणे इति? । कीटमणे खद्योत । घनसन्तमसमलीमसदशदिशि निरन्तरान्ध- 
कारमलिनितदशदिशां मखे निशि प्रदोषे विराजसि । यत्‌ तदन्यत्‌ तत्‌ ते गुणो- 
पचयकारणं न भवति । विचा्येमारो शषुद्रत्वप्रकाज्ञकमेव । यस्मादन्धकारसन्निधौ 
समुन्मेषो न तेजस्सन्निघौ । तस्मादधुना तररणिकरान्तरितसितकरिरणं सूर्य 
मरीचितिरस्कृतचन्द्रं दिनं जात्तम्‌ । तस्मात्‌ त्वया रात्राविवोन्मिषितुं न 
शक्यमिति । 


प्रे जुगनू | वह बात श्रौर है जो तुम गरे श्नन्धकार से ग्रँषेरी इई दशो 
दिशाश्रों वाली रात मे चमकलेतेष्टो | श्च तो सूये की किरणों से सुन्दर चन्द्रमा 
को पा देने वाला दिन है। श्रब यहाँ तुम्दारी दाल नटीं गलेगी) | 


यहां र्‌, द्‌, क्‌, मूश्रौरश्‌ इन वर्णो को भ्रनेक बार श्रादृत्ति होनेसे 
छृत्त्यनूप्रास श्रलंकार रहै । श्रप्रस्तुत वाच्य सूयकोटमणित्तान्त से प्रस्तुत 
उत्तमाधमपुरुषटृत्तान्त की प्रतीति होने से प्रप्रस्तुतप्रशंसा दै । 


0 210 - फणा ! 1 ५85 ऽता 010६ 86 1081 ‡०ण 06 7 16 


0101 10 पालो गा 6 चरला तादना005 सला 01160 तदपा, पिणक शण 


1. भअ, म, हुः तरणिकरस्यवितसितफिरणम्‌ क 
2. संशोधित; धनसन्तमसेति म, हु 


((-0 9118511। 51164118 1 0511.181। 01661100. 01411260 0 66810011 


१८ भत्लटशतकम्‌ 


०16 701 96 2916 {० ५6 20910108 १01 11 15 ०8४ भाला 005 प्ल § 
€ 116 000 ॥/ १ 1116 1895 2 106 ऽ्रा) (85 5८), $#0प शात 
0ध््म6 103 शा706धा)६ 10). 


सत्तवान्तःस्फुरिताय' वा कतगुणाध्यारोपतुच्छाय वा 
तस्मे कातरमोहनाय महसो लेश्ञाय मा स्वस्ति भूत्‌ । 
यच्छायाच्छुरणा-रुणेन खचताः खद्योतनाम्नासुना 
 कीटेनाहितया हि जङ्कममणिश्रान्त्या' विडम्ब्यामहे ।। १६ 


सत्त्वान्तःस्फरिताय वा, कृतगुखाघ्यारोपतुच्छाय वा, कातरमोह्‌नाय 
महसो लेशाय तस्मं (ज्ञानलवदुविदग्धाय) स्वस्ति मा भूत्‌ । यत्‌ छाया 
छ्रणारुणोन खचता श्रमूना खचोतनाम्ना कीटेन भ्राहितया जद्खममणि- 
श्रान्त्या हि (वयं) विडम्ब्यामहे । 


यस्तु निर्मलेन पल्लवग्राहिणा श्रुतेन स्वल्पेनाविर्भावमात्रेण सञ्जातलेषः वतते 
तमुदिश्याह-संच्वान्तःस्फुरितायेति । सत्वं सद्भावमात्रं तत्प्रमाणस्य स्वत्प- 
शरीरस्यान्त्मनसि स्फुरितया विततसम्भावनया वा समुच्चयाथ कृतगुणाध्या- 
रोपतुच्छाय कृतो गुणानामध्यारोपः स्वतः सिद्धत्वाभावात्‌ प्रसह्य समायोजन तेन 
तुच्छाय लचुभरूताय । वा शब्दः पूरवैवत्‌ । अरत एव कातराणां प्राकृतानां मोहनाय 
मोहनक राय महसो लेशाय तेजसो लवाय वा यत्स्वस्ति तत्‌ सद्धावो माभूत्‌ । 
यस्य तेजसो लवस्य छाया वीप्तिस्तस्याइच्छुरणेनारणेन रक्तेन खचता स्फुरता 
खद्योतनाम्नामूना कीटेनाहितया कृतया जङ्कममणिश्रन्त्या बुद्धिमोहेन वयं 
विडम्बामहे । वयमिति वाक्यशेषः । अयमथः । सत्वेन सद्धावेनान्तः स्फुरित- 
मथवा कृतगणाध्यारोपतुच्छं वा यन्महस्तस्यापि यो लेशः । कातरान्‌ मोहयति । 
तस्य सद्भावो मा भूत्‌ । तथाविधस्य तेजोलेशस्य न।श एव भवतु । यस्य 
तेजोव्यतिकरलोहितः स्फुरन्नयं खयोतनाम। कृमिरस्माकमपि जद्कमररने 
उदूभ्रान्तिं विडम्बनं करोतीति । 


ज्ञान की सत्तामात्र से श्रथात्‌ श्रल्पक्ञान से प्रकाशित अन्तःकरण वाले 


[यै 


1. ह्‌, मः, भ्र, क; सत्यान्तः म। 
2. क; ्टुरिताह्‌,मः,अ 

3, रह्‌, म, क खचिताञ 

4, ह्‌,अ क;पिम। 


((-0 9118511। 51164118 1 05111.1811। 01661100. 01411260 0 66810011 


[प 
ग 
मः 








 ¶ 


भत्लर्प्रतक्रम्‌ १६ 


द्रोर्‌ (वास्तविक गुणों के न होने पर भी) श्रपने ऊपर गुरो का श्रारोष करने 
वाले; दीन (छोटे ओर मूखे) व्यक्तियों को (ही) आकर्षित करने वाले उस 
(ज्ञानलवदुर्विदग्ध टठोगी) थोडे तेज वाले शअरसत्पुरुष का कल्याण न हो । क्योकि 
(थोद्धी सी) दीम्ति के सम्पकं मान्रसे प्रकाशमान इस खद्योत नामके कीडेसे 
उत्पन्न चलती फिरती मणि की श्रान्ति से हम लज्जित एवं श्रपमानित हुए है । 


यहा श्रप्रस्तुतवाच्य मणिकीटवृत्तान्त से प्रस्तुत व्यङ्ग्य विद्रन्मुखंवृत्तान्त 
की प्रतीति होने से श्रप्रस्तुतप्रशंसा श्रलद्भुार है। साथ ही पहले मखं में पण्डित 
होने का सन्देह है श्रौर बाद में उसके मूखं ही होने का निद्चवय हो गया है । 
इस प्रकार इस श्लोक मे श्रप्रस्तुत प्रशंसा श्रौर निदचयान्त सन्देह का एकाश्रयानु- 
प्रवेश सङ्कुरहै। 


(वा की (थ ता 1 (७ 114८ 10160६6 म 2 एना 
71187) पौली 65 एर 1४७, 3 लढा तप्र ६० ध€ ऽप्फृल्ा00ओं्० 
9 पपशाप्€ऽ शात 1६ ०6७८७ 70 00886858, {06 11 णाती तनपतलछ 
1116 00/88. € 12४८ एष्ला वदव्था१्€त ए ॥075 60075} आणा प्रा 
62166 210५-0) ४6 € 7151001८ 0 2 16५५९. 


दन्तान्तकन्तमुखसस्ततपातघात- 
सन्ताडितोन्न'तगिरिगंज एव वेत्ति । 


पश्चास्यपारिपविषञज्ञरपातपीडां 
न क्रोष्टुकःरवशिशयुहु द्ुतिनष्टचेष्टः । १७।। 


दन्तान्तकुन्तमूखसन्ततपातघातसन्ताडितोन्नतगिरिः गज एव 
पशच्चास्यपारिपविपञ्जरपातपीडां वेत्ति, इवशिशुहुङ्कृतिनष्टवेष्टः 
क्रोष्टुकः न (जानाति) । 

धीरं धीर एव वेत्ति न मूखं इत्याह-दन्तान्तकुन्तसुखेति । दन्तान्तो 
दन्ताभ्रं तदेव कुन्तमूखं प्रासाग्रं तस्य सन्ततपातेनाविच्छिन्नसन्तानेन घातेन 


, हननेन सन्ताडितो श्रभिहत उन्नतो गिरिर्यन स एव गजः पञ्चास्यस्य सिंहस्य 


पाशिरेव पविः कलिं तस्य पञ्जरं समूहम्‌ । तत्पातेन जनितां पीडां वेत्ति । 
इवशिशुः सारमेयपोतस्तस्य हङ्कृत्या नष्चेष्ः किकतेग्यविमूढः क्रोष्ठा श्यगालो न 
वेत्तीति । 


1. हु, मः कं; सन्तापितोभः' न 


((-0 9118511। 51164118 1 05111.1811। 01661100. 01411260 0 66810011 


२० भरलटशतकम्‌ 


दतो की मोकरूपी भाले के सिरे से निरन्तर चोट करके ऊचे पवेत पर 
परहार करने वाला हाथी दी सिंह के पजेरूपी वज्रपञ्ञर मे पढ़ने की पीडा को 
जानता है; कुत्ते के पिल्ले के भोकने मात्र से जिसका होश उड़ जाता है वह 
गीदद्ध नदीं जान पाता दै। | 


यहान्‌, त्‌, प्‌ श्रादि वर्णोकी श्रनेक वार श्राटत्ति होने से इत्यनुप्रास 
अ्रलद्कार है । तथा अ्रसादश्यनिवन्धना श्रप्रस्तुतप्रशंसा भ्रलङ्कार हं । 


[+| लककण ५00 623065 (गाप््रऽ]$ 222108६ 2 010 00पा- 
1810 111 015 8611166 न्न 0 [ता०५४5 € एक्ा$ 9 18 1716 
176 1700 हा ग 2 10. 4 1व्लत्भ] श्त सिा$ ०1 ॥€वा8 ४1९ 
एता ग 2 एषए# ५५६ 101 प्द्शा2€ ६. 


म्रतयुत्नतिव्यसनिनः शि रसोऽधुनेषः 

स्वस्येव चातकशिशुः प्रणयं विधत्ताम्‌ । 
श्रस्यैतदिच्छति यदि प्रततायु दिष्य 

ताः स्वच्छशीतमधुराः क्वनु नाम नापः।१८॥। 


एष चातकशिशुः प्रत्युन्नतिग्यसनिनः स्वस्य शिरसः एव श्रधुना 
प्रणयं विधत्ताम्‌ । यदि एतत्‌ इच्छति तहि प्रततासु दिक्ु स्वच्छशीत- 
मधुराः ताः भ्रापः क्वनु नामं श्रस्य न (भवेयुः) 


मनस्वी पुरुषो निजोदरपूरणाय न कस्यापि नति करोतीत्याह्‌--्रत्युन्न- 
तीति 1 एष चातकशिशुः । भ्रत्युग्नतिग्यसनिनः सवदा समुन्नतिमेव कतुं व्यसनं 
यस्यन कदाचिदपि ्रवनति तस्यैव स्वशिरसः प्रणयं याचनं विधत्ताम्‌ । हे 
शिरो भवता प्रणम्यताम्‌ । इति याचितमस्येव चातकिशोरेव शिरोवनति 
कतुं यदीच्छति । प्रततासु विस्तृतासु दिक्षु सुप्रसन्ना मघुराश्चापः क्वनु नामन 
सम्भवन्ति ? सर्वत्र सम्भवन्त्येव । एतदुक्तं भवति मनस्वी मानं विहायावनति 
करोति चेत्‌ सर्वत्र लोके युलभमेव जीवनं तथापि मनस्वी न करोत्यवनति 
मरणमेव कर्तुम्‌ श्रध्यवस्यतीति । 


यह्‌ चातक का लोर वस्चां बहुत श्रधिक ऊँचे रहने (स्वामिमान पूवकं रहने) 
के श्रभ्यास वज्ञे श्रपने सिरसेद्ी श्रव (सव प्रकार की) याचना करे (श्रीर किसी 


1. ह,भ्र,क; नैवम 


((-0 9118511। 51164118 1 05111.1811। 01661100. 01411260 0 66810011 


„|| 
५५ 
॥ 





----+"-----++=--------~--- 
६:--:-4" ~~~ "^ ---~------------+---~---- +~ ~~ ~ 





भल्लं टणंतकम्‌ २१ 


से कुड न मांगे) । यदि यह (सिर भकाकर शपना स्वाभिमान छोडकर लेना) 
चाहे तो फली हई दिशां मे निमल, शीतल श्रौर मीठे वे जल भला इसके 
लिए कर्यो नदीं होगे १ (ज्र्थात्‌ सव जगह मिलेंगे) | 


भ्रभिप्राय यह है कि यदि मनस्वी व्यक्ति श्रपना स्वाभिमान छोड़कर मुक 
जातादहैतो पेट भरने के लिए उसको भ्राजीविका कहीं भी मिल जाती है) 
परन्तु एेसा करने से उसकी भ्रवनति ही होती है । इसलिए एेसा मनस्वी व्यक्ति 
ग्रपना स्वाभिमान नहीं छोडता है भले ही उसे मृत्यु का वरण क्योन करना 
पड़ जाय । सिर से ही याचना करने का प्रभिभ्राय यहटहैकि किसी से याचना 
करते समय श्रपने स्वाभिमान का घ्यान रखना चाहिए । 

य्ह श्रप्रस्तुत चातकशिशुदरत्तान्त से प्रस्तुत मनस्विवत्तान्त की प्रतीति 
होमे से सादटश्यनिबन्धना अप्रस्तुतप्रशंसा है । 


16 $०्र्ह ०४८ 0? 2 6212162 0170 500पात 8८8 € 0) 
109 0 180 62. ए, 1 ४ (नपात १४९८ एष्ल्मय€ 10 276) 
0९51685 {06 0५169, 6001 20 5८6६ "265 0४10 08४6 धा २४२). 
2016 07 1{ 170 211 {€ ५161078 | 


सोऽपूर्वो रसनाविपर्ययविधिस्तत्कणंयोश्चापलं 
वृष्टिः सा मदविस्मृतस्वपरदिक्‌ कि भूयतीक्तेनं वा । 
इत्थं निश्चितवानसि भ्रमर हे यद्रारणोऽद्याप्यसा- . ` 
वन्तः शून्यकरो निषेग्यत इति भ्रातः क एष ग्रहः ।। १६॥ 
सः ग्रपु्वः रसनाविपयंयविधिः, कणंयोः तत्‌ चापलं, मदविस्म्रतस्व- 
परदिक्‌ सा रष्टिः । भूयसा उक्तेन वा किम्‌ ? हे भ्रमर! (एवं विधोऽपि 


जन्तुः सेव्यः) इत्थं (किमर्थ) निदिचत वानसि ? आराततः, यत्‌ अ्रन्त 
दून्यकरः श्रसौ वारणः भ्रद्यापि निषेव्यते इति क एष प्रहु: ? ` 


ग्रनुचितविवादी दोषश्रावी दोषवशादविज्ञातशत्रूमित्रभेदो विरक्तः कदर्येदचं 
प्भुने सेन्य इत्याह-- सोऽप इति । श्रपूर्वो रसनाविपर्ययविधिः स एव श्रात्मन 
एवासाघारणतालुविपरिइत्तिविधिः । तथाविध एव कणेयोरपि चापलं तथाविधं 
मदविस्मृतस्वप रटक्‌ दृष्ठिः सा मदावेशेनानवगतनिजयपरजनविभागा बुद्धिः सा 
तथाविधा । निजा कुब्रलयासादिप्रदा । परे प्रसिद्धाः । भूयसा; बहुनोक्तेन कि 


1. ₹ह,क,अ;एवंममः 


((-0 9118511। 51164118 1 05111.1811। 01661100. 01411260 0 66810011 





९९ भर्लटशतकम्‌ 


फलम्‌ ८ हे भ्रमर षट्पद । कि त्वं निदिचतवानसि त्वं भ्रमरशीलत्वादन्यत्रापि 
11वत्‌ रक्तस्तथापि एवविधः सेव्य इति किमित्थं निरिचतवानसि ? किमर्थमिति 
२ व्यमिति वा पाठः। श्रसौ वारणोऽपि निवारणोऽपि ग्रन्तश्गुन्य- 
करोऽपि 1 मन्तःसुषिरकरोऽपि भ्रथशून्यकरोऽपि वा न किञ्चिदपि दातः यस्य 
शक्ति करोऽपि ग्रसौ वारणो गजो निवेव्यत इति यत्‌ तस्मात्‌ । श्रातरि- 
व्वनुकम्पायाम्‌ एष ग्रहो दुरभिनिवेशः। सर्वथा वयेवंविधतेवा न कत्तेव्या । 
मन्यो गत्वा यया कयाचन विधया वतितव्यमिति "व 


नीम ध उल्टी जीम की रना है (हाथी की जीम नय प्राणियों की 
हे तथा ध ४ उल्ट प्रकार की होती दै), कानों से वह (ग्रद्‌भुत) चच्चलता 
५ स्ण श्रपनी पराई दिशा (रास्ते) को मूलने वाली वह 


भ्रामक क क ॥ 

म (क (6 १ (रो को गनाकर) कहने का क्या लाभ१६ 

न ˆ रका दोषपूशं जन्तु भी तुम्हारे लिए सेवनीय रै) इस प्रकार का 
दुम कया निश्चय कर लिया है १ हे 


प्टुचने से मना करने वाले ६ भाई ! लोललौ सड वाल्ते श्रौर श्रपने पा 
| है „ चति सय की हारे द्वारा जो श्रव भी सेवा की जा रही | 
| ? यह तम्हारी केसी हठ है ! | 





| १ रसनाविपयेयविधिः, कृ्णेयं 
| ताना पदां मे इलेष से करमशः 
बोलने (उर्टे प्रकार की जीभ) 
॥ , चुगला को कानों स सुनकर विद्वा ०.९ 8 
|| | का विवेके न कुरते वाल्ली व स करने वाले, गर्वं कैकारणा अ्रपने पराये 
ह ~ ष र = 

इसी प्रकार रन्तशून्यकार, रौ क ताल स्वामी केभ्र्थका वोध. हो रहा €। 

| से रहित शरोर श्रपने पास न ॥ र क यत त गाति शा 
= रता + टक देने त ध. 

| हो रहा है। “ जला--दनम्रर्थोका भीदइनेषसे ज्ञान 


८ 
ग्रद्यापि ्रसौ निर तेव्यः 
+ त्‌ त्‌ १.१ ~ (^ 
नहा केर्नों चाहिष इस ५ पुम्ह्‌ विलक्रुल भौ डस कंजुस स्वामी की सवा 
त 9 । 
तान कित श्रमस्ु ाच् ५ पाति ह रही है द 
ृत्तान्त की प्रतीति = हस्तिवत्तान्त से 
व्‌] प्रतीति हाने से साद्दयनिवन्ध तान्ते प्रस 
काव्यप्रकारा ( १०.४४८ म १ तना दले 
| मिलता है | 


चापलम्‌ तथा मदविस्मृतस्वपरहक्‌ इन 
प च ~ त 
रस्पर विरोधी या उल्टी, अ्रटपटी वाता का 
नाल, कानों के चञ्चल म्र्थातिं किसी कौ 


नर - ----- ~ - 


तुत व्यङ्ग्य कदर्यस्वाभि- 
पा 9. 

ह्द्लाक श्रप् य्रारित श्रप्रसतुतप्रशंसा टं । 
२ स्तुतप्ररंसा के उदाहरणाके रूप में 





[1181 ६ 
1184126 [2 
1606885 ॥ 10668 0 
0 1€ 68 ॥ 1 8 
१/116]} 


} 0180ा7111815 0 
410 {1९ 01] 


1 0 116 10106, {1६ 0५ 
6 [0 [णद्ाटक्षामा ५०९ पन 


£ ; । 
(> १181 1§ {€ ४5८ ° 5210४ 
((-0 ७118511। 51161118 1 0511९811 0166100. 01411260 0 66810011 


9 
9 0 











भत्लटशतकम्‌ ९३ 


71076 ? 0 181८ € ! शा 72५४€ 5111] कटद्लतल्तं पऽ 10 361१6 78 
लदा पणा ता लाए णा] (शात), 0 णिग, पणा 11115 
(दपा) षा 196 9) 0051186४ † 


तद्रेदग्ध्यं समुचितपयस्तोयतत्तवं विवेक्तुं 
संलापास्ते स च मृदुपदन्यासहययो विलासः । 

आस्तां तावद्‌ बक यदि तथा वेत्थि किचिच्छूलथांस- 
स्तूऽणीमेवासितुमपि सखे त्वं कथं मे'न हसः ।।२०।। 


समुचितपयस्तोयतत्वं विवेक्तुं तदु वेदश्ध्यम्‌, ते संलापाः स च 
मदुपदन्याषहृ्ो विलासः । हे बक । भ्रस्तां तावत्‌ । यदि किचिच्छल- 
थासः तथा तुष्णीम्‌ एव श्रासितुं वेत्थ (तहि) त्वं मे कथंन हसः 
(भवेः) ? 


सुजनस्येव सदसद्विवेचनमधुरालापनंमू त्ादिगुणगणसद्धावेन रन्प्रान्वे- 

पणविहीनतया च दुजनस्तमनुकर्त्‌ समर्थो न मवतीत्याह-- तद्वदर्यमिति | 

समुचितपयस्तोयत त्वं विवेषत्‌' वैदग्ध्यं तत्सम्मिध्रितयोद्गध जलयोस्तत्वमिदं क्षीर- 

मिदं जलमिति सद्भावं पृथक्कर्तुं सामथ्यं तथाविधम्‌ । सलापास्त मधुरालापाः 

स्तथाविधाः । मदुपदन्यासह्यो विलासरच । यो मन्दचरणविक्षेपमधुरो विलासः । 

पक्षिणां गगनोडूयनं च तथाविधम्‌ । इत्थं हंसस्य गुणयोगा भवन्ति । एतत्सव 

तावदास्ताम्‌ । इदं पूर्वोक्तगुणपज्जरमिदानीं तिष्ठतु । हे हंस ! किञ्चित्‌ 

रलथांसं स्वल्परिथिलितांसं यथा तथा हसवद्रन्ध्र वीक्ष्य परपीडामढृत्वा तूष्णी- 

। मेवासितुमासनमपि कतुं परपीडामचिन्तयित्वा केवलासिकामेव विष त्‌ वेत्सि 

यदि सचे त्वंमे कथंन हंसो भवसि। न कदाचित्‌ भवता रधर परव्यसनं 

विधाय हंसवज्जोषमेवा वस्थात्‌, दाक्यते चेद्धसो मवि न । नो चेत्‌ हंसत्वं श्रष्ठत्वं 
च तव न सम्भवत्ति। बक इव कपटशील एव भवत्ता त । 

गकं रीति से श्रलग करने की वह चतुराई, वे (मीठे) 


ली मनोहर चाल; श्ररे बगुले | वह्‌ सव रहने 
चुप वेठना ही सीखलोतो मेरे लिए 


दूध श्रौर पानी की 
वचन श्रौर वह कोमल कवमां वा 
दो | बस य॒दि ठम केवल कंवे दीले करक 
दंस दी क्यों नहींदहो जाश्रोगे १ 
४ 
1, ह, मक; वाम्र। 


((-0 9118511। 51164118 1 05111.1811। 01661100. 01411260 0 66810011 





` ~ क "ऋ ऋ - ~ 
कै 1} 











२४ भरेलट 
लट गत्तकम्‌ 
हा अम्र्तुतवाच्य वकहंसवृत्तान्त से प्रस्तुतव्यङ्गय अधम साधुपुरुष 


शत्तान्त कौ समान गणो के ्रावार पर प्रतीति होने से साद्स्यनिबन्धना 
्रप्रस्तुतप्रशसा है । 


® ५) 60818117 7011६ 01 फ8[ल, {1086 (5१९९1) 1215, 
११९ 8811 0 50 81608, 1९4४6 1211-5 0 {11656 1111725. 1 


४४1] 16287 01 85 ~ 
२ ऽवा) 1 +0ा ता] | 
0071 970 ००६६ # ४ 161 छा 51005 60111 


पथि निपतिता गुन्ये हृष्टा निरावरणाननां 
नवदधिघटीं गरवोननद्धः 


निजसमुचि समुद्ध रकन्धरः२ । 
ुभितासतास्तसने विकारशताकृलो 
यदि काकः 
न कुर्ते काकः काणः कदां नु करिष्यति ।२१॥ 


गुन्ये पथि निपतितां ? | 
7 नरावरणाननां घधटी धिकार 
शताकुलः (म्रतएव) गरवो नना नवदधिघरटीं दृष्ट्वा विकार 


समुचिताः ता ता ५ धयुद्ु रकन्धरः काराः ककः तिजः 
करिष्यति ? ` यद (म्रधुना) न कुरते (त्रि) कदा तु 


यस्त्वप्रयासेन स्वयमेव = व 

त्मचापलेन समुपेक्षते ५ निनियन्त्रणां वृषस्यन्तीमूत्तमाङज्खनामा- 

तिता भ्रष्टामुपनतां निरा ` पथि निपतितामिति। शून्ये निर्मनुष्ये पथि निप- 

घटम्‌ नवशब्देन ५ विवृतमुखी मुलावरणदहीनाम्‌ । नवदधि- 

ममोपनीतेति गर्वेणोग्न ति व्यनक्ति । एवम्भूतां दष्ट्वा सेषा दिष्ट्या 

निजसमुचितव्यापारसम्य शतिः समुद्धतकन्धरः समुत्थापितः पर्‌चाद्‌ भूत्वा 
क ८ भत्वा यदिन कुरुते । क ण एकटक्‌ - नवस र- 

: क्षद्रो वा दा + 
= जा कदा कस्मिन्‌ काले पुनः करिष्यति ‡ 


(4 र ५ ^ 4 ते म 3 = क 
सो तारा (लोभं रथव] व „< वाजी तजे दही की मटकी को देखकर 
-गदन को ऊँचा उटा <) हृश्रा (इसीलिए) च्रमिमा 
उन उन क्रियाश्रों को यदि ~ ११ (अ) न श कोरा श्रपने स्वभाव के श्रनुरूप 
करगा (तो फिर । ¢ 
ररि वत्ताइए) कच करेगा ! 


:अ. ५ 
< 2 क, मः, काणः काक. ५ के 


((-0 9118511। 5116118 1 05114811 01661100. 01411260 0 6810011 


“~ 





भमल्लर णतकम्‌ २५ 


यहां किसी नवयौवना सुन्दरी को देखकर नीच हरकत करने वाले किसी 
कामुक पुरूष की ओ्ओर संकेत किया गया है । यहां प्रस्तुत काकदधिवृत्तान्त से 
म्प्रस्तत कामुकरमणीवृत्तान्त की प्रतीति होने से सादृ्यमरुला ब्रप्रस्तुतप्रशंसा 
ग्रलङ्कार हे। 


1 {1€ 016-69€0 0 0ण्ललाणात छापा एल 0 इल्ला व 
छल {01 0 {657 6प्त जा 8 [नलर 1086 310 11511816 ८४ 11170. 
7605 2 25510115 0068 7101 26{ 26८० त10 {0 113 परध[पा द १,६)§ पठ, 
+€) 56 ५11] 76 ५० 211 1171656 2618 † 


नृत्यन्तः शिखिनो मनोहरममी श्राव्यं पठन्तः शुका 
वीक्ष्यन्ते न त एव खल्विह रुषा वायन्त एवाथवा । 

पान्थस्त्रीगरृहमिष्टलाभकथनाह्लन्धान्वयेनामूना 
सम्भ्रत्येतदनर्गलं बलिभुजा मायाविना भुज्यते ॥२२॥ 


मनोहरं नृत्यन्तः श्रमी शिखिनः श्राष्यं पठन्तः (प्रमी) शुकाः (च्‌) 
न वीक्ष्यन्ते । श्रथवा ते एव खलु इह रुषा वायन्ते एव । सम्प्रति 
इष्टलाभकथनात्‌ लब्धान्वयेन मायाविना श्रमना बलिभरूजा एतत्‌ 
पान्थस्तरीगृहुम्‌ ्रनगेलं भज्यते । 


ग्रविलेषज्ञस्य सेवायां कलाविज्ञानादपि चित्तानुवतनमेव प्रभवतीत्याह-- 
नत्यन्तः शिखिन इति । मनोहरं नयनसुभगं इत्यन्तः । ग्रमी शिखिनः। मधुर 
ज्यं श्रुतिमधुरम्‌ । पठन्तोऽमी शुकाइच न वीक्ष्यन्ते । पुनरपि त एव मधुराः 
णुकाङ्चानवसरज्ञतया वार्थन्त एव समृत्सा्येन्त एव तस्माच्चित्तावसरज्नेन सेवा 
कर्तव्या । मायाविना कपटनिपुणोनामूना बलिभूजा ईष्टलाभक थनादभीप्सित- 
न्वयेन लब्धप्रवेशेन बलिभूुजा काकेन सम्प्रत्येतत्पान्थ- 


सिद्धश्यनु गण रवता लन्व लवनं 
खयदुतु ण्डिताया मयु रताण्डवदणनेन 


सत्रीगरहं गृहत ऽन्नपानादिकमनगे लं स्वरं भुज्यते । खं 


1 मः में इत नृत्यन्तः शिखिनः से पूवं निम्नलिखित एलोक अतिरिक्त दै-- 


रणद्भिः कि भेकः धुतिकरुहरकोल। यित्तरवं - 
दकव कर मूकः परनिधननित्यव्यस चिभिः। 
सरोराजख्याति "` "` ` दिद ८ चिरं 1 
कुर स्नेहं हुसैमंधुरविस्तंश्चा रुच रितः ॥। 
9. “भ, मः) 8.९9 सम्प्रति क 
3. क,मः, ह; मानं विना 


((-0 9118511। 51164118 1 05141811 01661100. 01411260 0 66810011 





२६ भत्लटेणतकम 


शुकालापश्रवरोन च मनो दुःखायते । तस्मान्मयूरश्चुकयोनवालमभ्यं समृत्सारणीय 
त्वमेव । काकस्तु ` तेदभिलषितभ्रियलाभाभिसुचकं वदन्‌ षड्रसं भुङ्क्ते । 


तस्मात्‌ कालाविदामपि श्रनवसरज्ञानां न किञ्चित्‌ फलं विद्यते । मायाविनामपि 


चित्ताराघननिपुणानामकार्धमेव कूवंतां क्षुद्रान्‌ मूखंसमीपात्‌ महत्‌ फलं सम्भ- 
वति । तस्मात्‌ चित्तारायनमेव कृत्वा स्वार्थसम्पादननिपुणंरविशेषनज्ञस्पेन्य इति । 


चित्ताकषेक व्रत्य करते हुए ये मोर श्रौर सुनने योग्य श्र्थात्‌ कर्णानन्दजनक 
पाठ पठते हुए तोते (या तो) दिखाई नही पढ़ते है, श्र थवा (यदि कीं दीख भी 
जाते हतो) वेदी यदो (से) निश्चित रूप से क्रोधपूवेक दग दी दिये जाते ह । 
श्रवतो प्रिय की प्राप्ति (के शुम शकुन) को बतलाने के कारण (घर्मे) प्रवेश 
को प्राप्त करने वाले कपटी इस कोवे के द्वार! प्रवासी पति की स्त्री का यह धर 
स्वच्छन्दा के साथ भोगाजार्हाहै। 


यहा अ्प्रस्तुतवाच्य शिखिशुककाकटत्तान्त से प्रस्तुत व्यङ्ग्य सज्जनदुजन- 
वृत्तान्त की प्रतीति होने से भ्रप्रस्ततप्रशंसा अ्रलद्कुार है। शिलिशुकसटश 
सज्जनो को सम्मान के स्थान पर श्रपमान की श्रनिष्टापत्ति होने से विषमा- 


लङ्कारभीहै। 


1086 ५820618 €९6०८1८§ 216 {0656 0015 (लला दाद्ाा1108 
1655015 27€ 3€€ा॥ 19 1107€. {11४ 21€ ए ५५6५ 97. 701 
1701८211) 06 ए6८पा€ा7€0। 01 ८06 ५465160 ०४16८५1, (0€ वटस्य ६0५५, 
90€ा 21118 €ा1{721106, 15 €1109118 {्द्लि४# 11 {16 [1056 ग {16 124# 
५1056 00508716 123 20716 0 प | 


करभ रभसात्‌ क्रोष्टं वाञ्छस्यहो श्रवणज्वरः. 
ररणमथवानृज्वो ` दीर्घा तवेव शिरोधरा । 
पृथुगलविलावृत्तिश्वान्तौ च्चरिष्यति वाक्‌ चिरा 
दियति, समये को जानीते भविष्यत्ति-कस्य किम्‌ ॥२३॥ 


क, म, हु, शरवणज्वरष्‌ भ्रं 
हु, मा; तर्थते अ, फ 
भ; वहु क, ह; कृत मः 
अ, क, हू; क्रान्तो मः 
, ह; मखाद्‌ क, मः 


श्छ 


अ, क; करिष्यति म), ह्‌ 


+~ ५ !> ~ 


©, ९” 


((-0 9118511। 51164118 1 05111.1811। 01661100. 01411260 0 66810011 


भत्लटणतरम्‌ २७ 


(हे) करभ ! रभसात्‌ क्रोष्टं वाञ्छसि । ग्रहो श्रवणज्वरः । भ्रथवा 
तवेव अनृज्वी दीर्घा शिरोधरा (मम) शरणम्‌ । पुथुगलविलावृत्तिश्रान्ता 
वाक्‌ चिरात्‌ उच्चरिष्यति । इयति समये कस्य कि भविष्यति (इति) .. 
कः जानीते ? 


दुजेनः श्रवणप रुषेःशब्द राक्रोदौ रधदिचकीषति । तेन सह्‌ वाङ्मिश्रणंमपि 
विघातुमपारयन्‌ विदग्धः--स तु कालक्रमेण स्वयमेव स्वप्रतिबन्घोपायः-इति 
विचिन्त्य प्रतिपन्नसाहसः (भवति) इत्याह--करभे इति । करभः क्रमेलकः । 
रभसात्‌ सवंप्राेनापि क्रोष्टं गजित्‌ वाञ्छसि कि करोमि । ब्रह श्रवराज्वरो 
कर्णयोर्व्यसनमूपनतम्‌ 1 अथवा भ्रस्मिन्‌ समये किल्चिच्छरणमस्ति । तववैवान्रुज्वी 
वक्रा दीर्धा शिरोधरा ग्रीवा व्यसनप्ाप्तस्य मे शरणं नान्यत्‌ । बहुगलविलावृत्ति- 
श्रान्ता निरायतकण्ठरन्घ्रनिर्गमच्छिन्नस्वरूपा तव वाङ्‌ मुखाद्‌ वागुच्चरिष्यति । 
तस्मादित्येतावन्मात्रे समये ्रवसरे कस्य कि भविष्यतीत्थावयोः कतरस्य कि 
व्यसनं भविष्यतीति को जानीते न किचदयि वेत्ति । सर्वथापि न चिरं जीवितम्‌ । 
रभसात्‌ क्रोशं कुवेतस्ते जिह्वा रोगेण कदाचिदापद्‌ भविष्यति । तस्मात्‌ त्वया सह 
न बाङूमिश्रणं ममोचितम्‌ । तूष्णीमेव स्थातव्यमिति । 


ररे ऊंट | तुम पूणं शक्ति से चिल्लाना चाहते षो श्रो हो| (वुम्दार 
यद `चिल्लाना तो सान्ञात्‌) करोज्वर (कानों को फोड़ने बाला श्रतएव 
कानों के लिए अत्यन्त कष्टप्रद) होगा । या फिर (श्रब) तुम्हारी दी टेढ़ी श्रौर 
लम्बी गदंन (मेरा) सहारा रै बडे गले केेद मे से नारजार निकलने 
से थकी हुई ठम्हारी वाणी वहूत देर मेँ निकलेगी । इतने समय में किसका क्था 
हो जाय (इस बात को) कौन जानता है 


. यहां करूर शासकं हारा प्रताडित निरपराध व्यक्ति कौ मानसिक स्थिति 
का वर्णन है। भ्रपने लिए दण्डका ग्रादेश पाकर यह निर्दोष व्यक्ति सोचता 
है कि जव तक इस भ्रष्ट राजा की भाज्ञा भ्रष्ट अ्रधिकारियों केद्वारा लागू की 
जायेगी तबं तक परिस्थिति बदल जायेगी भ्रौरः बुरे कारनामों के कारण 
इसका तख्ता ही पलट जायेगा रौर मेरा बचाव हो जायेगा । इसलिए लान्त- 
चित्त होकर समय कौ प्रतीक्षा कर लेनी चाहिए । 

` यहां भ्रप्रस्तुत वाच्य करभवृक्तान्त से प्रस्तुत व्यङ्ग्य दुष्ट शासक 
वृत्तान्त की प्रतीति होने से सादश्यमूलक अप्रस्तुतप्रशंसा अलङ्धार है। करभ 
की चिल्लाहट को कर्णज्वर बताकर तथा लम्बायमान ग्रीवा की सत्ता 


1. संशोधित्त ` ` ` ` 


((-0 9118511। 51164118 1 05111.1811। 01661100. 01411260 0 66810011 





ऋ अत -- ^ 


८ 


भृट्लट शतकम्‌ 


कौ भ्र द्र ति ति 
4 र = ९१ निषेधाभास की प्रतीति हो रही हे, इस कारण यहां 
` नङ्कार ह। इन दोनों ्रलङ्कारो का एकत समाचेश होने के कारण 


यहां एकवचनानुप्रवेश सङ्कर है। 


| 0 0वा716्‌ ! ० रां 10 311161८ 11] 
४१1] 1 ए€१ 14४ 0719 71६5011 | 
ऽ€९८1, {160 ५०६ 10 60111112 {7 
160६, शा] {91६ 10118 {1716 27त 09 
046 {0 शामा) 110 7 0८] 
10 णाः ठा १६०-{70्716.} 


| पि] 91८6. ठ €87-76€1101118 
13 #0पाः 107६ 21228 7८८. एणाः 
0118011 {11६ 00६11118 9 $०प्राः 10118 
11181 716, 10 {105 एश 71184 
५३ ? (१20850४ ० 111 त1€ ५11६ 


भन्तर्िद्राशि भूरयांसि कण्टका बहवो बहिः । 
छ कमलनालस्य मा भूवन्‌ भङ्खुरा गुणाः ॥२४॥ 


भ्रन्तःभूयासि चिद्राशि बरहि: 


सवथाभ्यन्तरच्छिद्रवहतते =` < 
*4टलं च्रृञ्ञसपरिवारे णा न तिष्ठन्तीं 
दणीति । प्रभ्यन्तरे चि णा न तिष्ठन्तीत्याह -- प्रन्तरिद्य- 
पभ्यन्तरे छिद्राणि रन्ध्राणि भूयांसि वहिः क क, र 
९* + -<क्‌[ वाधाकराः 


तहूवः | एवम्भूतस्य कमल 
मलनालस्य गुणास्तन्तवः कथं 
मनसि बहच्स्य ततदसाघु जिन तः कथं मङ्गा दुरा मा भूवन्‌ 


& तः : कृण्टकै- 
इवराः चेति । वहिः कण्टकः परिदतस्य गुणाः विन- 


भोतर वहत से छेद हं रौर 


= < बाहर बहुत कां 
तन्तु (कण भर मे) टरूखने बालत केते ए 


पहे। किसी एेसे शासक को श्रोर्‌ सं 
फुट ठे तथा र 
ं गस पर बाहर से 


हतो फिर कमलदणएड के 


कमलनाल छत्तान्त २ 
खत्तान्त से स्तत व्यङ्ग्य व्रशंसपरिवार की 


-8{8]] 12 | । 
, 10४» 0पात्‌ ; 50 गाथा 10165 15; 0 
०।५ 1§ 1016808 ४९ 101 ० ए 
1187 ? 


"` ` ((-0 51851। ऽ6।<18॥ 1 0511९801 01661100. 01411260 0 €0810011 





+ -- -- द्व ल ~ 
, 


५१ ¢ च ऋ # "क - न कनः, क नः त ` ना न्क गि र ण्ण नावो न ~® | 
4; ॥ ~ ५ । | 
प्र ८ | 7.10 ध । ४ ? ४ # ४. 9). ॥ 9, = 4 + 
(१ ~ ज । ५ # 9, । > कि ¢ +| क | क्ख 1. + म ग 3. र १ ६ (¢ [] 
= ५ 3८ १ ८७७ नं (4 वा १4.41 : 132 , ^ ५. 1 


१९. 





भत्लटशतकम्‌ २९ 


कि दी्ंदीरघेषु गोषु पद्य सितिष्ववच्छादनकारणं ते' । 
म्रस्स्येव तान्‌ पयति चेदनार्या त्रस्तेव लक्ष्मीनं पदं विधत्ते ।॥२५॥ 


(हे) पद्म ! दीर्घंदीेषु सितेषु गुणेषु ते भ्रवच्छादनकारणं किम्‌ 
(कारणम्‌) भ्रस्त्येव चेत्‌ भ्रनार्या लक्ष्मीः तान्‌ परयति (तदा) तस्ता इव 
पदं न विधत्ते । 


महेश्वरेण एष इलोको न व्याख्यातः ग्रस्मदीया संस्कृत टीका निर्गृण- 
जना गुणिनो न कामयन्त इत्याह - कि दीधेदी्घेष्विति दीघदीषेषु गुखेषु 
ग्रतिविस्त्रतेषु तन्तुषु ग्रन्यत्र महत्मु दयादाकषिण्यादिसद्गुणेषु सितेषु उवेतवण- 
` वत्सु श्रन्यत्र बलाच्येषु प्रवच्छादनकारण गोपनप्रयोजनम्‌ । भ्रनार्यां दृष्टा 
दुशीला वा लक्ष्मीः श्रीः पदं न विघत्ते न तत्र ग्रागच्छेत्‌ । 


(हे) कमल ! श्वेत श्रोर लग्वेनलम्बे तन्तुस्रों को तम्हारे द्वारा छिपाकर रखने 
मे क्याकारणदै१(देठतो) हैदी। (क्योकि) यदि दुश्वरित्र ल्मी इन्हे देख 
ले तो शायद डर के मारे यँ कदम न र्खे । 


यहाँ "गणेषु" पद में इतेष है । कमल पक्षम गुण का प्रथ तन्तु हे । कमल 
४ र = मे चछृपाक - - 

दण्डके श्रन्दर लम्बे-लम्वे तन्तु होति ह । इन तन्तुभ्रा को कमलनाल मे लिपाकर 
रखने की उत्प्रेक्षा की गई दहे। इसमें गृण रूपी तन्तुभ्रा का दिपाकर रखने का 
कारण यह वताया है कि लक्ष्मी गुणी जनों के सम्पक का पसन्द नह। च 

लृप 
वह॒ गृणहीनो मे रहना चाहती है । यहु कुसलल्षम प भागन १ सलिषए 
कमल त पते भीतर छिपे हए रुणयुक्त तन्तुं को नही प्रकट [किया । ह। 

। | 4 च ॥ 

गणो को गोपन करते रूप श्रतु मे हेतु कौ उलक्षा हतस हतु है । 
म ~, पद्मलक्ष्मीद्त्तान्त से भ्रप्रस्तुत व्यङ्ग्य गुणिजनों को न पसन्द 


ग ` वाच्य प के 
यहां प्रस्तुत वाच्य व्यक्तियों मे बरनुराग रखने वाली चञ्चल लक्ष्मी के 


करने वाली श्नौर दुराचारी $ | 
टरत्तान्त की प्रतीति होन से श्रप्रस्त॒तप्रशंसा प्रलज्गार भीदै। 


1 । ९121 15 (06 ५४८०८ ० (्नाल्ट्शाालाौ ० $0णा 
1113 , \ \ ध 6 
1 £ (4 % (166 1 5761४ 2 क 1 क क 
1. १ 10015 81 {ला 5116, 116 & 71216160 »०पाव; 

8151711 | 
0816 816] 0071 1616. 


„ कारणेष अ 
1 +; म, ह्‌; कारणषु 


((-0 9118511 91164118 4 (0161100. 14111260 0 6810011 






३० भल्लटशतकम्‌ 


न पङ्कदुदुभतिनं जल'सहवास्षव्यसनिता 

वपुरर्धं" कान्त्या स्थलनलिनरतनद्युतिमुषा । 
व्यघास्यद्‌ दुर्वेधा हुद्यलधिमानं यदिन ते 

त्वमेवं"को लक्ष्म्याः परममभविष्यः पदमिह ॥२६॥ 


(है) स्थलनलिन ! न (ते) पद्कातु उद्भूतिः, न (ते) जलसहवास- 
व्यसनिता, वपुः (च ते) रतनदुतिमुषा कान्त्या दिग्धम्‌ । दुरकेधा यदिते 
हदयलधिमानं न व्यधास्यत्‌ (तहि) एकः त्वमेव इह लक्ष्म्याः परमं 
पदमभविष्यः । 


टीकाकर्वा ` महेश्वरेण एष श्लोको न व्याख्यातः । उपरिलिखितः श्लोकः 
म्रयं च इलोकः संस्कृत-टीकायां नोपलभ्येते परमिमौ मुलपटठे तु उपलभ्यते । 
भ्रस्मदीया संस्कृतटीका--स्वजनद्रेषी सद्धीणहूदयः श्रनुदारपुरुषः सत्कूलो- 
त्पत्तिप्रतिभातेजस्वितादिगुणानपि प्राप्य विजयधियं प्रचुरसम्पदं वाप्राप्त्‌ः न 
शक्नोति इत्याह--न पङ्कादुदभूतिरिति । हे स्थलारविन्द स्थलकमल गुलाब 
इति हिन्दीभाषायाम्‌ । पङ्कात्‌ कर्दमात्‌ भ्रन्यत्र नीचकरुलात्‌ । उदुभूति उत्पत्ति - 
जन्म ॒वा। जलसहवासन्थसनिता जलानां बवारीणां सहवासस्य निवासस्य 
व्यसनिता व्यसनम्‌ अरन्य जडानां मूखणिं सहवासस्य सङ्खते व्यसनं दोषः । 
रत्नद्युतिमूषा कान्त्या श्रतिदीप्रया कान्त्या भास्वरं शरीरम्‌ विधते । द्वेधा 
मूर्खो विधाता चषा प्रजापतिर्वेधा इत्यमरः । हृदयलचिमानं मध्यभागस्य 
लघध्वाकार स्थलपश्मघत्ते ब्रत्य॑त्र हृदयस्य अ्रनुदारत्वमदाक्षिण्यम्‌ । लक्ष्म्याः परमं 
पदम भविष्यः पद्मश्चियः भाजनं स्थलकमलम्‌ लक्ष्या भाजनं च त्वमभविष्यः । 
त्वं यदि श्रीदाय विशालहूदयताञ्च भ्रग्रहिष्यः तहि सुहृदां सहयोगिनां साहाय्यं 
प्राप्यं नाढयो विजयी चाभविष्यः इत्याशयः । 


हे स्थलकमल ! तुम न तो कीचद्ध से जन्मेष्टो, न दी जड़ (पानी तथा 

मूख) के संग का दोष तुममेंहै। बुम्हारा शरीर भी रत्न की कान्ति के समान 

लाल कान्ति से देदीप्यमान है । यदि दुष्ट विधाता तुम्हारा दिल छोटा न बनाता 
तो केवल वुम्दीं लददमी का परम स्यान होते । 


अ,म। द्‌; डक 

अ, मः, ट्‌; दुष्यम्‌ क 

भ, म, ह; स्थलकमल क 
अ, म, ह; मेकं क 


~ ० १ 


((-0 9118511। 51164118 1 05111.1811। 01661100. 01411260 0 66810011 


४ 


भल्लटशतकफम्‌ ३१ 


यहां हृदयलधिमा के अ्रभाव में लक्ष्मीपदध्राप्ति की कल्पना "यदि' शन्द को 
लेकर की गई है इसलिए यहां यद्यथिकं ्रतिरयोक्ति है । भ्रप्रस्तुत वाच्य . 
स्यलकमल के वणेन से प्रस्तुत व्यङ्ग्य कुलीनत्वादिगुणसम्पन्न व्यक्ति की 
प्रतीति होने से श्रप्रस्तुतप्रशंसा प्रलद्कार भीहै। 

पद्धु, जड शब्दो मे शाब्दी व्यञ्जना है । प्क शब्द से नीच श्रौर जड शब्द 
से मखं श्रयं की भी प्रतीति हो रही है । वक्ता श्रोता को बताना चाहता है कि 
तुम्हारा नीच कुल भें जन्म नहीं हुश्रा है श्रौर मूस व्यक्तियों से भी तुम धिरे 
नहीं रहते हौ तथा तुम्हारा व्यक्तित्व भी तेजस्वी है किन्तु विघाता ने गलती 
से तुम्हारा हृदय संकीणे बना दिया है श्रन्यथा तुम भी श्रपने सहयोगियों की 
सहायता पाकर बहुत बड़े धनपति होते । ब्रह्या ने तुम्हारा दिल छोटा बनाकर 
तुम्हारे साथ ्नन्याय किया है। 


0 7056 ! ४०परा ण 15 70६ {0४ [पत्‌ आत्‌ ४० ०० 001 12६ 
४1८८ 60560 ४४ (€ (नाशा ण फरवाला (अप्रति 26001}. ४५णा 
७०५४ 15 अआाणा8& णा] #6€ 7६ अपाह [ण्ट [प्ट 0 गम 8 टम. 
प्त ०६ € लाल्ला ग7ा8व८ $ज०णा [ल्वा श्ल 519, ण अणा 
४0 १५६ 06८्०€ 6 2९००6 9 ००८७5 1.0. 


उच्चंरुच्चरतु चिरं चिरी वर्त्मनि तरं समार्य । 
दिग्व्यापिनि शब्दगुणो शङ्खः सम्भावनाभूमिः ॥२७॥ 


वत्मनि तरं समारुह्य चिरी चिरम्‌ उच्चैः उच्चरतु (परन्तु) दिण्न्या- 
पिनि शब्दगुरो शङ्क (एव) सम्भावनाभूमिः (भवति) । 


मूखंस्य बहु जल्पतो विदग्धस्य मृदुवचनमेव युक्तमित्याह - उच्चैरचरत्विति । 
चिरी सत्लिकाः तरु समारुह्योच्चैरिचरमुचरतु । दिग्व्यापिनि लोकन्यापिनि 
शन्दगुणे शङ्क एव सम्भावनायाः रलाघाया भूमिः पदं भवति । श्रयमर्थः । 
` तुङ्गमासनमारुद्य समुद्धतमतिचिरमुचरतोऽपि नीचस्य वाक्यं शुणहीनतया लोक- 
ग्राह्यं न भवति । विदग्चालापो माधुर्येगुणयोगेन प्रथत इति । 


रास्ते म (स्थित) पेद पर चढ़ कर भशर देर तके ऊँचे-ऊॐँचे (भले दी) 
चिल्ञ।ता रहे परन्तु दिशाश्रों मे व्याप्त होने बलि शब्द के गुण के विषय में शङ्ख 
ही श्रादर पाता है। 


1. अ, चीरी म; चीरिः ह्‌; क्षिल्ली क 
2. म1; ्ित्लिका ह्‌ 


((-0 9118511। 51164118 1 05111.1811। 01661100. 01411260 0 66810011 














३२९ 


भत्लटशतकम्‌ 


यहां प्रस्तुत वाच्य चिरी्धवत 
हीने से सादृश्यमूला मप्रस्तुतप्रशसा अ्रलङ्कार है। 


1.61 116 6ततूलल 
९ 0 18६61 20 0 
व1{€ा 01110178 0 4 {766 0 ५ 
7 ¢ 1 | 1 
५८९1१68 165६५। {01 {16 १०३1४ 


प118 गता 0 2 10 (€ 
{€ 1040510. {06 (ल्गाल" 21076 
0 ऽ0पात्‌ (शाल 7118 {€ व्मालि$. 


व्री स्फुटितो मृतो वा 
“ च्छवास्यततेऽन्यश्सित्तेनः सत्यम्‌ । 
"तूचरत्येव हि" सोऽस्य शब्दः 
त्राव्यो नयोयो न सदथंशंसी ॥२८।। 


राख: श्ररि 
प्ोच्छ्वास्यते 4 स्फुटितः ध्तः वा (भवति) श्रन्यश्वसितेन (च) 
रान्दः (एताटशः क ॥ | किन्तु उच्चरति एव | हि ग्रस्य स 
। पः न ्राग्यः यः (च) सद्थंशंसी (ग्रपि) न । 


कि 


थः करिचदन्ञतया स्व 
क या स्वयं 
्वोऽस्थिशेष इति । श,  एुमजानानः परमुद्ेन विवक्षति तं प्रत्माह-- 
स्फ भ ५ 6 ४ कम्बुः | ग्रस्थि ¢ न ् < | 
तो विभिन्नश्चिद्रितो = स्थ कोकसं तदेव शेषो यस्य स तथोक्तः! 
ध्वनितुमराक्यत्वादिति ण पृतः शकलितो वा भवत्‌ । विपर्ययेऽपि स्वेनैव 
न्मायत इति यावत्‌ । ण्यन्ताच्छ नयस्य परस्योच्छ॒वसनेनैव प्रोच्छुवास्यते 
विशेषोऽस्ति । स शङ्खः उचर वतेः कमणि लट्‌ । सत्य निदिचतम्‌। किन्तु 
ध्वनति शमर । गीं 
रुपसम्बन्वी । >. । स॒शब्दोऽस्य शङ्खस्य सम्बन्ध १ 


: । यस्म 


प्रशस्ताथेवाची : शब्दः व 

र तान ` नाव्य: भ्राकर्णनीय भञंसी 

त्यथः | भवति । निजप्र त यो न सद 
भाविशेषाभावानमूखो न सम्यग्‌ व्रवीति- 


रद्धं श्रस्थिमाच है, च 
= › बीच से रट 
टसरं क श्वास से प खा हुश्रा ह 
९१ जाता शा यामरा ह न्च 
नाता है | निय ही दे (रब्दाथित १ पड़ा हे; श्रौर सच 


ही इसका वह श न्तु फिर मी 
सुनने योग्य । वहं शब्द । किन्तु फिर भी यह बोलता 


रथं 
- को बताने वाला होता हे । 
° गद्धऽस्थिभेदः अ, म, ह्‌ 
ऊ; न्योच्छ्वसितेन = मह्‌ 
ऋनक,मः, ह्‌ 


((-0 9118511 9116418 1 05111811 0661100. 01411260 0 60810011 


होताहैन ही किसी श्रच्छे शतादै)जोनते श्रवणीय रथात्‌ 








भल्लटशतकम्‌ ३३ 


तृतीय पंक्ति मँ 'हि' भ्रभ्यय का ग्रहण करने से यह प्रथं निन्दापरक हो 
जाता है किन्तु "हि" के स्थान पर "न' पाठ स्वीकार करने से अन्वय इस प्रकार 
हो जायेगा-करिन्तु उच्चरति एव । ग्नस्य स शव्दः यः श्राव्यो न (भवति) यः 
(च) सदथेशंसी न (भवति एतादशः) न (विद्यते) । इस प्रकार के श्रथ में 
एेसे व्यवित की श्नोर संकेत है जो दुर्बल होने पर भी दूसरे का सहारा पाकर 
विया बात कहता है यह श्रथ स्तुत्तिपरक हौ जाता दै। 

यहां श्रप्रस्तुत वाच्य शद्भुवृत्तान्त से प्रस्तुत व्यङ्ग्य श्र मरना सुविज्ञ 
व्यक्ति के वृत्तान्त की प्रतीति होने से श्रप्रस्तुतप्रशंसा श्रलङ्कार है । 


(76 (लाला 15 2 लाल ऽ्लुल॑०ा, 18 00४6) 17 1116 11110, 07 15 
५९३५. ^ल॑प्थ][, 1 01005 (ऋ 0पष्टी णाया $ 07681118. 1† 2०९8 गा 
61111118 8०71त \#11160 15 101 017४ ग 1910६ 210 0065 1101 


60171*€# 2000 56156. 


यथापल्वपुष्पास्ते' यथापुष्पफलद्धयः । 
यथाफलद्धिस्वारोहा हा मातः क्वागमन्दुमाः ॥२९॥ 


हा मातः ! यथापह्ववपुष्पाः, यथापृष्पफलद्धयः, यथाफलद्धिस्वारोहा 
ते द्रुमाः क्व श्रगमन्‌ ? 

यथा पल्लवेति । यथा पल्लवपृष्पाः पल्लवा प्रा रोहाः । सुखेन आरोहः 
स्वारोहः सुगमत्वं येषां ते तथोक्ता महान्त. समुच्छिता दरुमास्तरवः इ 
¶व गताः | ग्रयमर्थः--श्ननुरागानुगूणस्मिताः स्मितानुगुखपरप्रयोजनाः प्रया 
जनानुगराघ्राप्याथेगतयो महान्तौ लोकेऽत्यन्तदुलभा इति । 


गये जिनके फूल उनके नये पत्तों के श्रनुरूप 


हे माता! वे ब्र कों चले ५ 
होतेथे; जिनकी फलसमृद्धि उनके एलो के ग्रनरूप होती थी श्रौर जिनकी सुन्दर 


श त्र (= नः 
सुगम्य उटान उनके फलो की समद्धि के च्रनु्प टोती थी ! 
वाक्य विशे परां न * एकाव ली 
यहां पूवे पूर्वं वाक्य उत्तर उत्त ^` का विज्ञेषण हं म्रतः एकावः 
श्रलक्कार है। 
वर्णन से प्रस्तुत व्यङ्ग्य । के सद्व्यवहार) 


हां वाच्य द्रुमं के ५ 
ह ८ न दूत सज्जन की प्रम के श्रनुरूप हट, 


सज्जनों की प्रतीति हो रही हं। 
1, क, मः, ह्‌; पृष्पाढघा अ 
((-0 9118511। 5116118 1 05111.181। 0166100. 01411260 0 60810011 


पी (8;“. 90 





३४ 


भत्लटशतकम्‌ 


मुस्कु राहट के अनुरूप प्रयास तथा प्रयासों ऊँ ग्रनुरूप भ्र्थसिद्धि होती है । यहां 


एकावली तथा भ्रप्रर तप्रणसा काए 
तु का एकवचनानुप्रवेश सङ्कर है । 


0 7गन ! शाद 12४९ 
071 प्रठाऽ ए [लौः 16१65 
16115 17 1ला 1 1159 


&076 {71056 {7665 !{705€ 10 ्लाऽ ४८6 
, गिणां एधा लात कला§ 910 पला 


साध्वेव तद्िधावस्य वेधा विलष्टो न यदथा | 
= सपाननुूपेश चन्दनस्य फलेन किम ॥३०॥ 


नाध एव, यत्‌ श्रस्य ; ॥ 
स्व १ १्य तद्विष वेधा व ह. (यतः 
र्पाननुरपेण फलेन चन्दनस्य ष था न क्लिष्टः (यतः) 
भ्रसत्कायस्य कुर 


णात्तस्याकर वर 
चन्दनत रोस्तद्विधौ ए 


याह्‌- साध्वेवेति । वेधा ब्रह्मा । 
तस्य फलस्य विघौ निम 


भान्तः इति यावत्‌ । तः णविषये वृथा व्यर्थमेव न विलष्ठो न 
सोगन्ध्यादिगुरावता १ 3 समोचीनमेव । श्रयमर्थः _ फलेन तरोरप्यधिक- 
= ल ५ >. | ॐ द्‌ ६ 

तत्स्यत।ति वेधसो साव ५ ताहरत्वसम्पादनेन तच्रिमणि मे श्रममेव 


तदेवोपपादयति चन्दनस्य स्वरूपाननुरूपेण 
नति न च प +“ । कस्यचित्‌ सुजनस्य दुषपुत्रलाभात्‌ 
भवति । भ्रसत्सवीकार- सत्प । मन्यत्र पूत्रादिनैव न युच्यते न मुक्तो 
" ° सत्यागश्च न श्रेयोहे | 
हेतुरिति भावः। 


प्ननुगणेन फलेन क्रम्‌? नकि 
तदभाव एव श्रेयानि , 


) के बनाने मे विधाता ने व्यथ 
[त्‌ रसश फल से चन्दन कौ 


अननुरूपता हेतु है अरत. ध निर्माणाभाव भं 
से प्रस्तुत व्यड १ रान्यलिङ्गः है । 
रे भरभिव्यवित होत से माली, मस्व एव 
षन नही बन सकता 4 -नस्युतपरशंसा है । उस 


`° 1 यह्‌ भ्रति 
वचनानुप्रवेश सङकर ह । तशयोवित है | यहां 


फलों मौर चन्दन के स्वरूप क 
रभ्रस्तुत वाच्य चन्दनवृत्तानत 
निस्तन्तान व्यवित के वृत्तान्त 
महान्‌ पुरुष तक ऊँचा उसका 
इन तीनो ग्रलङ्कारों का एकः 
11 ५48 एल = \\ 11} 


(९81; 
€811118 >411081 {1€€ {€ दाधा ५ 


((-0 9118511। 91168 1 05111811 0661100. 1411260 0 60810011 








भल्लट शतकम्‌ ३५ 


10६ 71816 {11€ ५66७5 {70116 (0{ 1181:18 18 म +न 
„01110 [2 ४€ एट्ला {16 ०5€ जि {11& 5281081 {716 ° 2 111 \1116[1 


238 7101 (८०ाीहाप्रल( 10 11 

ग्रथित एष'मिथः कृतम्परङ्खलविषधररधिरुह्य महाजडः । 

मलयजः सूमनोभिरनाधितो यदत एव फलेन वियुज्यते ॥३१॥ 
महाजडः एष मलयजः मिथः कृतश्ृह्कलेविषधरेः ्रधिरुह्य ग्रथितः। 

यत्‌ सुमनोभिः ग्रनाश्चितः श्रत एव फलेन वियुज्यते । 

कृतशृ्भलैः] विषधरेरधिरट्येति । महाजडोऽतिशीतल 

ग्रत्यज्ञदचान्यत्र । एष मलयजङचन्दनत रुः । मिथोश्यालवन । कृताः श्ृह्धला 

येषां तैः । परस्परसंदिलष्टेरित्यथेः। विषधरः स्वत्पैदष्टजनेश्चाविरुह्याधिष्ठाय 


न क ग्रत प 
ग्रथितो बद्धः । सुमनोभिः पृष्पेरन्यत्र सजनश्च । त यस्मादनाश्चितः ध 
फलेन न युज्यते न युक्तो भवति । ग्रसत्स्वीकारः सत्परित्यागहच न श्रया हु 


भव्वः। 


[ग्रथित एव मिथः छ 


इकटठे होकर जंजीर बने हुए सोपाों 


श्रस्यन्त शीतल यह चन्दन श्रापित्त मे 
1 गया ह इसीलिए फल से वियुक्त 


क दवारा (ऊपर) चढ़कर (जकड़कर) बाध दिया 
हो रहा है (इस पर फल नही लगे है) । 

यहाँ जड शब्द के शीतल प्रौर मूख दो अ्रथंहं। इसी प्रकार 4 
साँप तथा दुष जन अर्थं है शरोर सुमनस्‌ राव्द के पुष्प एवं शुढ ध य 
ग्रथ हे। इस प्रकार जड प्नौर सुमनस्‌ चर पददलेष तथा 
ग्रार्थी व्यञ्जना है। | | द ५ 

यहां मनप्रस्तुत वाच्य मलथजवृत्तान्त से प्रस्तुत व्यद्ग्य स २.५ 
विशेष की श्रभिव्यक्ति होने से भ्रप्रस्तुतत्रस। है। चन्दनम फ 


स्वाभाविक है किन्तु यहां विषधरं के लिपटने को इसमें हेतु माना है | ट्स 5 
ग्रहेतु में हेतु की कल्पना करने से यहां हेता है । सर्पो के ससग स पड 
विषाक्त हो गया है इसलिए उसमें फल नट लग रहे हं। 


5 {6 पा 176 70150160 5118.<68 
1178 #ला 600] 58102} ५ ४ 1171 1६ 2710 15 701 6०४८€५ ४10 
पाश्त्ताह 9 608171 {066 60116 8170 
1. म!, ह्‌; एव जञ, क 
2. अ,क; न यज्यते मह्‌ 
((-0 9118511। 91618 1 05111811 0661100. 01411260 0 6810011 


ए] 
| 


"दधः 





न्येरररे ~ 


व 


1 अ 
( ) 


बै ~ क = पत्तः - ङ्ध खडश् कच्छ ऋन्तात्त्ः कः = = 1 क्त्य = गूम । ^ 





१६ भटलटशतकम्‌ 


00 क्र्ाऽ, 11 15 1066, 06 025 एधा 6601४ ग 06 पा (णाल 
06.00 हल ०्ल ऽद), 


चन्दने विषधरान्‌ सहामहे वस्तु सुन्दरमगश्चिमत्कुतः । 
रक्षितुं वद किमत्मगौरवं' सञ्चिताः खदिर कण्टकास्त्वया।३२॥ 


चन्दने विषधरान्‌ सहामहे सुन्दरं वस्तु कुतः ग्रगु्तिमत्‌ (स्यात्‌ ? 
किन्तु है) खदिर ! ्रात्मगौरवं रक्षितुं त्वया कण्टकाः कि सश्िताः ! 
(इति) वद । । 


घनिनस्सुजनस्य सकलोपकारकत्वेन शरीरसंरक्नाविघानमूचितमेव । तद्िल- 
क्षणस्य ठु तदनुचितमित्याह- चन्दन इति? । चन्दमे चन्दनतरौ सुजनोऽपि 
प्रतीयते । विषधरान्‌ सर्पान्‌ श्रन्यत्र दृष्टांदइच सहामहे सोढा स्मः। तत्र हेतुमाह- 
सुन्दरं रमणीयं वस्तु कुतो हेतोररक्षितं रक्षाविहीनं स्यात्‌ न कस्मादपीत्यथः । हे 
खदिर ! मूढोऽपि प्रतीयते । मात्मनः स्वस्य सौष्ठवं रम्यतां रक्लितू त्वया कण्टका 
दुमाङ्खा दुष्ठारच प्रतीयन्ते [सच्चिताः]° सम्पादिताः। किमित्यत्र किं दन्दः प्रक्ने । 
यः स्वयमदातापि दौवारिकमसूुचकादिपरिवृत्तो भवति तं धिगिति भावः । 


चन्दन बरत्त पर सपो (के रने) को तो इम सह लगे क्योकि सुन्दर वस्तु 
करयो श्रमुरित रदे १ परन्तु दे खेर के चच । ठंमने श्रपने बद़प्पन की र्ताके लिए 
ये कांटे क्यो हकट्ठे कर रखे टै! 


यहां पूवधि में चम्दन भें विषधर निवास सहन रूप कायं के लिए सुन्दर 
वस्तु रक्षणरूप कारण होने से काव्यलिङ्क भ्रलङ्कार दहै । भ्रप्रस्तुत वाच्य चन्दन, 
विषधर, खदिर तथा कण्टक वृत्तान्त से प्रस्तुत व्यङ्ग्य सकलोपकारक सुजन 
घनी, दृष संरक्षक, गुणहीन कृपण व्यित तथा नीच रक्षक अथं की प्रतीति 
होने से श्रप्रस्तुतप्रश्ंसा श्रलद्कार है। इस प्रकार यर्हा कान्यलिङ्ख श्रौरभ्रप्रस्तुत- 
प्रासा मे श्रङ्गाङ््खिभाव सद्र है। 

16 ए€8€ा16€ ° ऽ€्एला{§ 070 5810841 ९6, ५८ 00 10216, 
06८2४56 +$ 5710 70 > एल्वणपि प्ट ०८ 01016660 ? एषा © 
16080772 [66 ! + 136 $ (नल्व 11656 [आनग75 {0 ए0्ल 
४0४ 7110८ ? 

1. कफ; सौष्ठवम्‌ अ, म, हू 

2. मः; धनिनः . . , चन्दन दति यहु भंशदहमें नीं 

3. षंणोधित 


((-0 9118511। 51164118 1 05111.181। 01661100. 01011260 0 66810011 


भलट शतकम्‌ ३७ 


यत्किश्चनानुचितमप्युचितानुवरत्ति' 

कि चन्दनस्य न कृतं कुसुमं फलं वा । 
लज्जामहे वय^मुपक्रम एव यान्तः 

तस्यान्तिकं परिगरहीतवबृहत्कुठाराः ॥३३॥ 


(हे विधे त्वया) यत्‌ चन्दनस्य किचन कुसुमं फलं वा न कतम्‌ 
(इति) प्रनुचितमपि क्रिम्‌ उचितानुवृत्ति ? परिगृहीतवरृहक्कुडारा वयं 
तस्यान्तिकं यान्तः उपक्रमे एव लज्जामहे । 


दुजनस्येव सुजनस्यापि येऽपचिकीषन्ति तेषां मनस्स्विदमेव लज्जितं स्यादि- 
त्याह--यत्किञ्चनेति । हे विधे । अ्रनुचितमपि कुसुमफलकायेस्य चन्दने नेव 
सम्भवादन्यायस्यमपि। स्रम्यस्यतस्तेऽप्युचितं न्याय्यमित्यमरः। किञ्चनाल्पमपि 
कुमूमंफलवा। वा शब्दो विकल्पे चन्दनस्य न कृतं नाकारीति यत्‌ तदुचितानुवृत्ति 
किमुचितानुसरणं कि नोचितमित्यथेः। तदेतदुपपादयति-- उपक्रम एव दशेन- 
प्रारम्भसमय एव परिग्रहीतः स्वीकृतः । ब्हत्कुठारः स्थुलपरणशु्येस्तथोक्ताः । 
वयं तस्य चन्दनस्यान्तिकं समीपं यात्‌ प्राप्त्‌ भृगमत्यथं लज्जामहे । हीणाः 
स्मः। प्रथवा परिग्रहीतवृहत्कुठारा भूत्वा तस्यान्तिकतां प्राप्ता वयमूपक्रमे 
छेदनप्रारम्भसमय एव भृशं लज्जामहे । सोौरम्यलोमादिति मावः। सदुपकार- 
पात्रे सुजनेऽपचिकीर्षा पामरस्यापि पीडामावहतीति भावः । 


(हे विधाता | तमने) जो चन्दन ब्त के ऊपर थोडे भी पुष्प फ़ल नहीं 
बनाये यह श्रनुचित कायं भी क्या उचित व्यापार (माना जायेगा)? बड़े बड़े 
कुल्दाडां को (हायां मे) लेकर हम उसके पास (कायने के लिए) जाते हुए 
` (काटने के) प्रारम्भिक काल मेदी लजातेदहै। 


ल्दन में यदि पुष्प श्रौर फल होते तो लोग उसके सुगन्धित पुष्पों भ्रौर 
फलो को पाकर ही सन्तुश्र हो जाते ग्रौर उन्हें सुगन्धित लकड़ी प्राप्त करने के 
लिए चन्दन वृक्ष को न काटना पड्ता। इसी प्रकार उपकारक व्यक्तिकी 


सम्पत्ति का श्रपहरण करने वाले व्यक्ति भी स्वाथवश एेसा करते हैँ किन्तु 
मन में उन्हं मानसिक कषर होतादहे। 
1. अ, म, हु; मप्यनुचितान्‌बन्धि क 


. जअ, मः, ह्‌; भृशम्‌ क 
3. अ, म, हू{ करमभेव क 


((-0 9118511। 51164118 1 0511/.181। 01661100. 01011260 0 6810011 


३८ भत्लटणतकम्‌ 


यहाँ चन्दन में पएुष्पफलाभाव उसके काटने में हेतु है श्रतः कान्यलिङ्ख है। 
प्रस्तुत वाच्य चन्दनकुटारवृत्तान्त से प्रस्तुत व्यङ्ग्य सुजन (के प्रति श्रपकार- 
पूणे) वृत्तान्त की प्रतीति होने से ्रप्रस्तुतप्रशंसाहै। इन दोनों अ्रलङ्कारों के 
एक ही आश्रय में रहने से एकवचनानुप्रवेश सङ्कर है । 

0 (८५० ! 25 $0पर 2४८ 201 ला€2{6्व €#ला > © 06 लऽ ग 
एिपरा15 01) {76 3210391 ९८ 00 (छपा [ऽ ण]पऽ६ ०८६ ९८ 1ण5॥160 ? 


४८ 21€ 35027160 2 {76 ला अवाद णिः 2000द्ला1708 11 0 ए 
2365 (१ गताः {० (पा 1). 


लब्धं चिरादमृतवत्किममृत्यवे स्याद्‌ 

"दीघं रसायनवदाय्युरपिः प्रदद्यात्‌ । 
एतत्फलं यदयमध्वगशापदग्धः 

स्तब्धः खलः फलति वषंरतेन तालः ॥३४॥ 


ग्रघ्वगशापदग्धः स्तब्धः खलः श्रयं तालः यत्‌ व्षशतेन फलति । 
चिरात्‌ लब्धम्‌ एतत्‌ फलं किम्‌ श्रमृतवत्‌ श्रमृत्यवे स्यात्‌ (श्रथवा) 
रसायनवत्‌ दीघेमायुः भ्रपि प्रदद्यात्‌ ? (न प्रदद्याद्‌ इति भावः) । 


कठिनप्रकृत्तिरिति विलम्बदायित्वान्न सेव्य इत्याह्‌-- लन्धं चिरादिति । 
ग्रध्वगानां दायाथिनां तदभावेन निविण्णानाम्‌ । पथिकानां शापेनाक्रोडेन दग्धो 
विच्छायः स्तन्यो जडः। खलः कसिनोऽयं तालः । वर्षाणां वत्सराणां शतेन 
करणेन यत्फलति तत्फलं चिरात्‌ वहुकालात्लन्वम्‌ प्राप्तम्‌ । श्रमृतवत्‌ सुधेव । 
ममृत्यवे मरणाभावाय स्यात्‌ भवेत्‌ । किमित्यत्र काकुः । रसायनवत्‌ रसो वीरय 
बलातिशयो ईयते प्राप्यते वृद्धादिभि्वेतनादनेनेति रसायनवत्‌ रसप्र धानम्‌ । 
विहृद्धेऽपि जरव्याधिरौषय इति विश्वप्रकाशः दीर्घं निरवधिकम्‌ । भ्रायुर्जीवितं 
प्रदद्यात्‌ उत प्रत्युत दद्यात्‌ । किं नेत्यर्थः । उत विदेषोऽत्रं विकल्पे । श्रयमथः-- 
तालफलोपभोभिना अ्रमृतपायिनेव न मृत्युविजीयते रस्ायनपायिनेव नदीं मायुर- 
वाप्यते । तत्किमे तावन्तं कालमासित्वा परिशुष्यते । तदन्यत्रोपसर्तग्यमिति । 


जो पथिकरांके शाप से जला हुश्रा यह ज़ दुष्ट ताल ब्त सो साल के वाद 


फल देता दै तोक्यादेर से मिला हूश्रा इसका यद फल ्रमृत की तरह गत्यु से 


1, अ, क, ह्‌; भायु रसायनवदह्शतं प्रदद्यात्‌ म" 
2, भ; आयुरुते क, ह्‌ 


((-0 9118511। 51164118 1 0511.181। 01661100. 01411260 0 66810011 








भरलट शतकम्‌ ३६ 


1 


चाने वाला होता दहै? या रसायन की तरह दीधे श्रायुकोदेतादै १ ग्र्थात्‌ 
नही देता |) 


यहां श्रप्रस्तुत वाच्य तालवृत्तान्त से प्रस्तुत व्यङ्ग्य अरतिकरृपणं व्यक्ति की 
प्रतोति होने से म्नप्रस्तुतप्रगसा श्रलङ्कार है। 


[115 001 +६६6€व 29 {766 १111611 785 ए€्ला ला7560 ८9 {73.४६ 
1675, 06875 {1711115 81{€7 [0855118 2 0716 0714766 ४६875. 15 1115 {पा 
00181166 &{ला आला 2 1011 11716, 2716 10 58५६ 701 ५€811 111८ 
21107081. 07 13 1{ 801€ {0 &1*€ 1012 118 11८६ 3 11 7010112 
1161111681 


िच्चस्तुप् सहत स चन्दनतरुयूयंः पलाय्यागता 
भोगाम्पाससुखासिकाः प्रतिदिनं ता विस्मृतास्तत्र वः। 
दष्राकोटिविषोल्कया प्रतिकृतं तस्य प्रहरतु नं चेत्‌ 
कि तेनव सह्‌ स्वयं न लवशो' याताः स्थ भो भोगिनः ॥२५॥ 


भोः भोगिनः | त्रप्तसुहूत्‌ स चन्दनतरुः चिः (श्रथ च) यूयं पलाय्य 
ग्रागताः। तत्र ताः प्रतिदिनं मोगाम्याससुखासिकाः वः विस्मृताः। 
भवद्धिः चेत्‌ दंष्टाकोटिविषोल्कया तस्य प्रहुत: न प्रतिकृतम्‌ (तहि) 
तेनव सह्‌ स्वयं कि लवशः न याताः स्थ ? 


यः करिचत्‌ खलः प्रभूमाध्रित्य सुखेन वहुकालमुषित्वा तस्य व्यसनसमृत्पत्तौ 
तत्प्रतीकारक्षमोऽपि किड्चिदप्यपरिहूत्यान्यतोऽपसरति तं प्रत्याह-च्िन्नेति । 
भो भोगिनः है सर्पाः विषयिररच प्रतीयन्ते । तप्ता दग्ा सुहुदः सुखीभरताः 
समीपस्था वृक्षा यस्य स तथोक्तदचन्दनतरुः। राजा च प्रतीयते । छिन्नः छेदं 
प्रापितः । यूयं भवन्तोऽपि पलास्य पलायनं कृत्वा ्रागता श्रागतवन्तः । तत्र 
चन्दनतरौ राज्ञिच प्रतिदिनं स्वेदा तास्तथाविघाः। वो युष्माक भोगानां 
विषयाणामभ्यास भ्रावृत्तिः । ्रथवा भोगस्य सपेकायस्य घ्रावृत्तिर्वष्ुनम्‌ । ते 
सुखासिका: सुखरूपाः स्रासनानि स्थानानीति यावत्‌ । विस्मृताः न चेत्स्वी- 


म, हेः तप्तस्ुहूत्‌ अ, क, ह्‌ 
अ, मा, हुः यस्पैक 
क, मः ट्‌; प्रदतं अ 
मः; दलशः भ्र, क, ह्‌ 


= 


॥ + 


((-0 9118511। 51164118 1 05114811 01661100. 01411260 0 6810011 





0 


भत्लट शतकम्‌ 
कताः। ग्रासेधतो धात्वथनिर 
कोरि | र ण्वुल्‌ वक्तव्य इति ण्वुल्प्रत्ययः द॑ष्टराणां 
£ ६ ६१ तस्य उत्का ज्वाला तया करणोन । प्रतु; ठेदकस्य तस्य परुषस्य । 

¦ प्रतीक रो न कृतर = टि द ८२.,५-* ८4 + 1; 1 च पु | 
| चत्त।ह तेनव चन्दनेन राजा च प्रतीयते । सतु कि 


कैन हेतना : खण्डशः । न 
एना । दलशः खण्डशः। न याताः स्थन गतवन्तः । स्वामिनि समीपमा- 


पन्ते सति भत्येन र विध 
भाव्यमि 3 ८ रो भयः । नो चेत्‌ तेनव सहोषित्वा ्रापनेनापि 
र मर्‌ राजानं विसृज्यागतान्‌ योधान्‌ प्रत्यस्थावसरः । 


हे सर्पो | दःखी पिन्नो - 
(उसके पास से) 8 ला चहं चन्दन बृक्त काट दिया गया श्रौर ठम 
्रान्द मनाना तुम १ आगे हो। प्रतिदिन बहयँ श्राराम से वैठना श्नौर 
दाढ़ों के जहर की = १ यदि ठम उस पर प्रहार करने वाले से श्रपनं 
* ° »९. | स्तराला से बदला न ल = व 
व्योनहो गये? । नले पाए तो उसके साय वहीं टुकंडे टकडे 


=; प्रर तवं ग 
यहा ग्रप्रस्तुत वाच्य सपनवृत्तान्त से प्रस्तृत 


ध ठं जो चिरकाल परथन्त म्पे प्रभुके 
काल मे छोडकर भाग खडा टुम्रा हे । 
€ ५५ 


ग्यड्ग्य उस दुष सेवक की श्रभि- 
पास सुखपूवंक रटने के वाद उसे 
बतः भ्रप्रस्तुतप्रशंसालङ्कार दै । 


3 1] 18 11६1105 58115060, 145 
1 ४/0 1). (9५८ ४० 
61115 410 (01011401 5111185 
60110 1101 18]6 1661126, 1111 


सन्तोषः किमराक्तता 
लोभो 
श्रास्तां सख 


॥ किमथवा तस्मिच्रसम्भावना 
तानवस्थितिरियं" प्रेष एवाथवा । 


ननुरूपया सपः 
प लया पुष्पश्चि 

शर्‌ । (=| = । हि 
सम्बन्धोऽननुरूपयाऽपि न ध या दुविधे 


(दे) दवय! ? चन्दनस्य त्वया ॥३६॥ 
= नु) क या 
स्वया कि न कृतः ? गनुरूपयाऽपि ( पष्प या 7४ म. 

८“ म,क, मः; रयं ह 4 पन्ताषः (सज्ञातः) ? किम्‌ 


((-0 9118511 51164118 1 05114181 01661100. 01411260 0 66810011 








भत्लटशतकम्‌ 


श्रशक्तता अथवा तसिमिन्‌ अ्रसम्भावना श्रयं लोभो वा उत इयम्‌ श्रनव- 
स्थितिः श्रथवा प्रह्रेष एव । 


यस्य कस्यचिन्िरतिशयगुणसमृद्धस्य दोषव दभावेन निविण्णो विचिप्रत्याह-- 
सन्तोष इति । हे दुविधे । त्वया चल्दनस्यानुल्मया सौगन्ध्या दिनाऽनुगुणया ग्रत 
एव सफलया साफल्यं प्राप्तया पृष्पधिया कुरुमसग्रढचा त बधा न कृत ५ 
दास्तां तिष्ठतु । खलु शब्दः प्रसिद्धौ । गुएवत्सम्बन्ध र दुलंभत्वादिति भावः। 
ग्रननुरूपया सौगन्ध्यादि राहित्ये नाननुगुणयाऽपि पष्पश्चिया सम्बन्धः 1 ध 
न कृतः ? कारणं तु न ह्यत इत्यथः । स्वस्यापि कायस्य कास ना- 
वदथकार णत्वेन भवितव्यम्‌ । इत्येतदेव वहुघोत्प्रक्षयते सन्तोष ४ इत्यादिना । 
सन्तोषः किमेतावदेवास्य पर्याप्तम्‌ अ्रतः परंन विधेयमित्यल बुद्धिः । किमश- 
तता सामध्याभिावः . किमु ? अथवेति पक्षान्तरम्‌ । ग्रस्मिन्‌ चन्दनतरो । 
अ्रसम्भावना श्रवज्ञा वा। वा शब्दो विकल्पे श्रय परिदश्यमानः शना वा। 
सर्वगुरप्रधानेऽस्माकं निरृता भविष्यतीत्येवंरूपा लुन्बता वा । स प्रथा । 
ग्रनवस्थितिदचञ्चलता । किमथवा प्रदेषः । विरक्तत्वमेवेति न ता | 
तत्कथ्यतामिति । सगुणानामपि निर्माग्यत्वान्त पूत्रादिसमृद्धिरस्तीति भावः । 


फल लाने वाली पुष्पलमृद्धि की बात तो दूर 
की सम्पत्ति से भी) चन्दन को युक्त नीं 
या सामथ्यै नहींथा या उसके प्रति 
श्रा गई यी या उसके 


ग्र दुष्ट विधाता | श्रनुह्प छल 
रही, तुमने श्रनलंशूप (सगन्ध रहित एूल। 
किया। क्या द्द सन्तोष हो ग्याथाः वा ~ 
ग्रादरभाव नदींधाथालोमच्रागया या य[ चंचलत 
प्रतिदेषदहोगया या 


यहाँ चन्दन में पृष्पश्री के अ्रभाव <1 काथं के लिए सन्तोष श्रादि ग्रनेक 
४ र दार है । ब्रप्रस्तुत वाच्य चन्दन- 
पदार्थो की कारणता होने से काव्यलिङ्गं ग्रलङ्कार्‌ हं। । ^. 
वृत्तान्त से प्रस्तुत व्यङ्ग्य परम वैभवशाली किन्तु सन्तानहान 


न ~ 1 ल्‌ ङ्का च्‌ : | 
प्रतीति होन से यहाँ ्रप्रस्तुतप्रशसा अ ख 


0 ©106 ! 1681017 । 1€३*८ 5106 111९ स 
धात्‌ 7४118, पा कत 9० १०। 6168 € त 918 07 140 #०प 10 
{70118 {0-9 52708] {1९6 १ १९1९ %0प ९ र ५०४ 0९८०९ ९९) 
पवा ज 08 50 70 [६ ह | ६ लाला भ) 1? 

07 0त]त1€-71114९त 07 ५10 $० 118४८€ 5071 


((-0 9118511। 51164118 1 05114811 01661100. 01411260 0 60810011 


४२ भट्लट शतकम्‌ 


कि जातोऽपि चतुष्पथे घनतरदायोऽसि किं छायया 
संयुक्त फलितोऽसि कि फलभरेः पूर्णोऽसि कि सन्नतः 

है सद्वृक्ष सहस्व सम्प्रति सखे शाखारशिखाकषेण- 
क्षोभामोटनभञ्चनानि* जनतः" स्वेरेव दुश्चेष्टितैः ॥३७॥ 


है सद्वृक्ष ! चतुष्पथे किं जातः श्रसि ? घनतरद्धायः किम्‌ प्रसि ? 
छायया कि संयुक्तः (ग्रसि) ? फलभर: किं फलितः ्रसि ? पूणः (सन्‌) 
सन्नतः किमू असि ? है सले सम्प्रति स्वेरेव दुरचेष्टितंः जनतः शाखा- 
शिखाक्षंणक्षोभामोटनभज्ञनानि सुतरां सहस्व । 


परोपकारशीलस्य तदनुषङ्कापतितन्यसनतासहत्वे यशः प्रभृतिहेतुरित्याह - 
क्रि जात इति । सखे प्राणसम है सद्वृक्ष ! यदाहुः -समप्राणः स्ता मतः इति । 
सुजनोऽपि प्रतीयते । चतुष्पथे चतुर्मागंसमाहारे । कि कि कारणं जातोऽसि । अ्रत्र 
चतुष्पथरान्देन जननी जनकयोमतिापितरौ लक्ष्येते। कि कारणं घनतरा बह्वी 
छायाऽनातपः कान्तिच यस्य स तथोक्तोऽसि। छायासन्नद्धः सहितः सन्‌ कि 
फलितः सञ्जातफलोऽसि । तैः फलभरंः पूर्णोऽसि । श्रन्यत्र घनचयैश्च प्रवृद्धो 
भवसि । श्रथ कि सन्नतोऽसिनग्रोऽसि। अ्न्यत्र विनीतोऽसि। सम्प्रतीदानीं 
स्वैः स्वकीयंरुख्वेष्टितरिति सोल्लुण्ठनं वचनम्‌ । जनतो जनात्‌ सकाशात्‌ । 
शाखानां शिफा जटा ्रथवा शाखाशिखाव्रातानां शालाग्राणाम्‌ । भ्राकषणम्‌ 
क्षोभः प्रकम्पनमामोटनं सेदनं भञ्जनं मदनं चेत्येतानि सहस्व तितिक्षस्व । स्वयं 
कृतापराधापतितन्यसनेषु सहनमेव प्रतीकार इत्यथंः। याचका हि गुिनो 
दातुर्शचेलाञ्चलं ग्रहीत्वा ब्राकर्षादिचेष्टां कुर्वन्तीति भावः । 


श्रे भले इत्त | ठम चोराहे पर कों उत्पन्न हष ? बहुत श्रधिके घनी 

छाया वाले क्यो हुए १ यदि छायायुक्तये तो फिर फले क्यों १ फलयुक्त होने पर 

विनघ्र क्यो हुए १ श्रब श्रपने बुरे कर्मा के फलस्वरूप लोगों द्वारा शाख।रूपी 
चोरी के खींच जाने, दिलाने, तया मरोडे तोद्धे जाने का कष्ट सहो । 


म; युक्त्चेत्‌ क; सन्नद्धः अ, ह्‌ 
भ, म1, ह; आढ्योऽपि क 

ग्र, क; सच्चूत मः, ह्‌ 

भ, क, मा... नादिदह 

ज; सुतरां क; सफलं हू; भवतः मः 


९ ~ ~ {~ ~ 


((-0 9118511। 51164118 1 05111.181। 01661100. 01411260 0 66810011 


भत्लट शतकम्‌ ४३ 


यहाँ पाततः सद्वृक्ष की निन्दा प्रतीत हो रही है जोकि ग्न्त मे स्तुति 


मे परिणत हो जाती है श्रत एव व्याजस्तुति अलङ्कार है। यहां ग्नप्रस्तुत वाच्य 


सद्वृक्षवृत्तान्त से प्रस्तुत व्यङ्ग्य स्वाथेहीन परोपकारशील व्यक्ति को प्रतीति 
होने से भ्रप्रस्तुतप्रशंसा अलङ्कार है 


0, 2611116 {166 1 ए एला€ एता एला 011 2. 9478716 ? ४ 91 
011 0055655 0656 5118065 ? 2716060 \"11]1 5112065 7 010 »0प 
0687 {71115 210 वाला \1$ ५10 #०ण एलात ५0५ ? [15 011 10 
४० 00 विप्ा1§ 70 ४० 12४6 10 आलिः (शाला 006 अ€ एषा18 
40401, 51181111, 06011 31त 07680 ४० {प्र ८€ एा971५165. 


सन्मूलः प्रथितोचतिघनलसत्छायः स्थितः सत्पथे 

सेव्यः सद्धिरितीदमाकलयता तालोऽघ्वगेनाध्ितः। 
पुसः शक्तिरियत्यसौ तु फलेद'्याथवा इवोऽथवा 

काले क्वाप्यथवा कदाचिदथवानत्वेव वेधाः प्रभुः ।३८।। 


सन्मूलः, प्रथितोन्नतिः, घनलसत्छायः, सत्पथे स्थितः, सद्भिः सेव्य 
इति इदम्‌ प्राकलयता म्रघ्वगेन तालः भ्राधरितः। पुसः इयती शक्तः । 
प्रसौ श्र्य फलेत्‌ म्रथवा श्वः फलेत्‌ क्वापि (सचिकृष्टे) काले श्रथवा 
कदाचित्‌ (विप्रकृष्टे काले) फलेत्‌ (इत्यत्र) वेघा तु न प्रभुः एव । 


सत्प्रभुसेवायामपि फलं दंवायत्तमेवेत्याह - सन्मुलः प्रथितोन्नतीति । सता 
प्रशस्तेन मूलेन कुलेन प्रथिता प्रसिद्धा उन्नतिरुच्छायः । अ्रन्यत्न प्रसिद्धञ्च यस्य 
सः तथोक्तः । घनतरा ्रतिभूयसी छायाऽनातपः कान्तिच यस्य॒स तथोक्तः । 
सत्पथे जनसंचारभूयिष्ठे सदात्तारमा्गे च स्थितः । श्रत एव सद्धिविद्यमानेडच 
सेव्य ्राश्रयणीय इतीदमाकलयता विचारयता अ्रघ्वगेन पान्थेन तालस्तालतर- 
राश्रितः सेवितः । इयती एतावती । अ्रसौ शक्तिः पसः पुरुषस्य सम्बन्धिनी । स तु 
दक्षः पुमांरच प्रतीयते । श्रचयव फलेत्‌ फलितो भवेत्‌ । अथवा इवः परेऽहनि फलेत्‌ । 
ग्रथवा क्वापि संनिकृष्टे काले फलेत्‌ । अ्रथवा वा शब्दः पक्नान्तरे । कदाचित्‌ 
विप्रकृष्टे काले वा फलेत्‌। इत्यत्र फलपरिज्ञाने वेधास्तु ब्रह्मापि न प्रभुनं समथः । 
ब्रह्मापि फलकालं न ज्ञातूं शक्नोतीत्यथः। कुलङीलौदायादिगुणव.'तः प्रभवः 
सेव्याः सेविता अ्रपि कदा वा दद्युरिति न ज्ञात्‌, शक्यत इति भावः। 


र = ~ ~ = == ~~~ 





----~-- -- --~- ~ 


1. ह; सतु फलत्य० म). सफलता अ, क 


((-0 9118511। 51164118 1 0511९811 01661100. 01011260 0 6810011 


॥ 0; भत्लटशतंकय्‌ 


यात्री ने यह सोचकर ताल इक का श्राश्रय लिया किं इसकी जदं श्रच्छ्ीरै, 
(ग्रच्छे वंश का व्यक्ति है), ऊँचाई परतिद्ध दै (उन्नति बहुत है), घनी छाया है 
(सुन्दर कान्ति है), ठीक रास्ते पर खड़ा है (सशचारमामैस्थित है), सजनो से 
भोगे जाने योग्य है (खर्जनो से सेवा किंएट जाने योग्य है)। मनुष्य की इतनी 
शक्ति है। श्रागे यई श्राज फलदे या कल या जल्दी यादेर से यह जनने्मे तो 
ब्रह्मा समथं ही नदीं है । 


यहां सन्मल, उन्नति, छाया भ्रौर सत्पथ इन शब्दों के द्वधर्थंक होने से श्लेष 
है । भ्नप्रस्तुत वाच्य तालफलवृत्तान्त से प्रस्तुत व्यङ्ग्य देवाधीन सत्प्रभूत्ेवाफल 
की प्रतीति होने से इ्लेषभुलक भ्रप्रस्तुतप्रशंसा है । 


06 1{1व४नाला 16501160 ४ {06 70 ८८ 11101108 11121 1/5 10015 
276 2००५, 16101 15 ऽप्रपीलला†, 51206 15 ०६०३९, 51205 00 2 &००५ 
0217 शात 15 छग7$ ग एल €ा1०#९त ए४ ६००५ ए६गृ9€ एण शाला 
1६ भा ह्म (णौ 10तम्छ जा 100170५४, दवार 01 ज्ला$ 126, €+ला 
ए781718 15 101 €272016€ {0 {10 1८. 


त्वन्मूले पुरुषायुषं गतमिदं देहैन संशुष्यता 
` क्षोदीयांसमपि क्षणं परमतः शाक्तः कुतः प्राणितुम्‌ । 
तत्स्वस्त्यस्तु विव्ृद्धिमेहि महतीमद्यापि का नस्त्वरा 
कल्याणिन्‌" फलिताऽसि तालविटपिन्‌ पुत्रेषु पौत्रेषु वा॥३९।॥ 
हे ताल विटयपिन्‌ ! त्वन्मूले संशुष्यता देहेन (सह) इदं पुरुषायुषं गतम्‌ । 
ग्रतः परं क्षोदियांसम्‌ भ्रपि क्षरं प्रारितुं शक्तिः कुतः ? तत्‌ (ते) स्वस्ति 
रस्तु, महतीं विवृद्धिम्‌ एहि ? श्रद्यापि नः का त्वरा ? है कल्यारिन्‌, 
पुत्रेषु पौत्रेषु वा फलितासि। 
केरिचत्‌ बहूुकालकृतयाप्यफलया लुन्धसेवया व्यधितान्तःकरण श्राह- 
त्वन्मुल इति । तालविटपिनु ! तालहुम ! त्वन्मुले ब्रध्नप्रदेडे म्रन्यत्र पादमूले 
च । संशुष्यता श्रनकनादिना कायं लभता गात्रेण शरीरेण सहेदं पुरुषायुषं 
महीयान्‌ कालः । त्रचतुरादिसुत्रेण पुरुषायुषशब्दोऽकारान्तः । साधु गतं नीतम्‌ । 
ग्रतः परमस्मादुपरि क्षोदीयांसमत्यल्पमपि क्षणं कालम्‌ । कालाघ्वनोरत्य^त- 
संयोग इति द्वितीया । जीवित्‌ प्राणितुम्‌ । दक्तिः सामथ्यम्‌ । कुतः नास्तीत्यर्थः । 


1. अ, म", कल्याणैः फ, हु 


((-0 9118511। 51164118 1 0511.1811। (01661100. 01011260 0 66810011 


= = * ~ --- -----~--~-- “~ -~~-~- ~ -= ~~~ ._. [प रि ~) प 0 क पा 
य = = _ ~ श~ ~= ~ ककि, ष + १1 & 


ककः प 


भतलंटरतकम्‌ ५1 


ते तुभ्यं स्वस्त्यस्तु मङ्कलं भवतु । नमः स्वस्तीत्यादिना चतुर्थी । महतीं सम्पद- 
मृदधिमेहि प्राप्नुहि इणः कतरि लोटि रूपम्‌ । म्रद्यापि का त्वरा वेगः । का त्वरेति 
सोल्लुण्ठनं वचनम्‌ । पत्रेषु पौत्रेषु वा कल्याणः प्रागभवीयेस्तदृपाजितेः शुभकमेभिः 
करणेः । फलितासि फलितो भविष्यसि। फल्‌ निष्पत्तावित्यस्य धातोर्लूटि 
रूपम्‌ । एकः कमंकर्ता फलभाक्‌ तदन्यो भवति इति धिक्‌ प्रभुसेवामिति भावः। 


दे ताल वृत्त | वुम्हारे मूल में श्रपना शरीर खखाते हुए यह पूरी श्रायु तरिता 
दीदे । इससेश्रागेज्रासीभीजीने की शक्ति कों १ दे कल्याणएकारिन्‌ | तम्दारा 
भला दो; दुम बहुत इद्धिको पाश्रो | श्रमी क्या जल्दी दै? हमारे पुत्र पौत्र 
को फल देना । 


यहाँ श्रप्रस्तुत वाच्य तालवृत्तान्त से प्रस्तुत व्यङ्ग्य किसी कृपण प्रभूकी 
प्रतीति होने से ग्रप्रस्तुतप्रदासादै। साथ दही स्वस्ति, विद्रद्धि ओर कल्यारिन्‌ 
इन स्तुतिपरक पदो से निन्दा की श्रभिव्यक्ति होने से व्याजस्तुति ्रलङ्कारहै। 
इस प्रकार यहां व्याजस्तुति रौर ग्रप्रस्तुतप्रशंसाका अङ्घाङ्जखिभाव सङ्कर है। 

00 78111 {166 ! 71 +110]€ 11 15 अए्ा॥ 61861811 771 ००५६ 
प्रातलः ४०. बलाल 1§ 70 71076 € 211 10 11४6 शि दण्ला 8 51216 
17016 16166 शि11. 248४ {€ा€ ०८ ४०पा ४६ णि€ । 119४ ४0 ९10 


7171076 ! {166 15 710 [प्रा7४. 0 ल्‌[-लाः ! ४० 7189 शावा 7 ए115 10 
07 5075 07 2181108018 (85 $#०प् 18*€ 101 2787160 21 111{ 1077६). 


परयामः किमयं प्रपत्स्यतः इति स्वत्पाश्रसिद्धकिये- 

दर्पाद्‌ दूरमुपेक्षितेन बलवत्कसमंरितंमन्विभिः। 
लब्धात्मप्रसरेण रस्षितुमथाशक्येन मुक्त्वारानिः 

स्फोतस्ताद्गहो घनेन रिपुणा दग्धो गिरिग्रामकः || ४०।। 

(वयं ) पश्यामः श्रय किम्‌ (रथम्‌) प्रपत्स्यत इति स्वत्पाभ्रसिद्ध- 
क्रिये: बलवत्कमं रिते: मन्िभिः दर्पाद्‌ दूरम्‌ उपेक्षितेन लब्धात्मप्रसरेण 
ग्रथ रक्षितुम्‌ श्रशक्येन रिपुणा घनेन श्रहो ताहक्‌ स्फीतः गिरिग्रामकः 
प्ररानि मक्त्वा दग्धः । 

स्वल्पोऽप्युपेक्षितः रातु: समूलं नाश्शयति न प्रतिकतव्यश्च भवतीत्याह- 


1. हः; प्रपद्यते म, क, मा 
2, म, क, हु; मृक्तोऽशनिः मः 


((-0 9118511। 5116118 1 05114811 01661100. 01411260 0 66810011 


भल्तट शतक म्‌ 


रयाम इति नो ५ 

ण 
न्यथा तथा शनभ गगने सिद्धा निष्यन्ा त दपा दूरमत्यन्तमुपक्षितेन स्वल्प 
वायुः सत्वाकार सज्चरति। न क्रिया सञ्चाररूपायेषां तेस्तथोक्तः। 
करणेलंव्य ग्रात्मनः त 4 9 कर्मणा गमनहेतुना । ईरितै्नोदितः 
रथानन्तरम्‌। रक्षितं प्र तिक्तं ` १।रप्राप्तिर्येन तेन तथोक्तेन समागतेनेत्यथः । 
प्रवृद्धः तादृक्‌ तथ!विधः |गि त भरक्यविषयेण महता घनेन कर्त्रा । स्फीतः 
करोशन्ती तिवल्लक्ष णया 9५ गिरिप्रामकः । प्रत्र गिरिग्रामशब्देन मञ्चाः 
तत्प्रयोगेन विनेति च ध्वन्यते ५४ स्वतो जनो लक्ष्यते । श्रशनि मुक्त्वा प्रयुज्य 
पशृद्धोऽ्यलसो भूपतिः परेण (रि ५ ॥ स वा अरहो श्रार्चयम्‌ । 

(हम) देख लेंगे यह्‌ कथं 
गे यह क्यों ग्रयेगा १--इस प्रकार सोचकर योदा -सी श्राकाश- 


सिदिक्रिया करने वाले 
ग्रभिमानके ५) कमे प्रेरित क्वि गये मन्त्र जानने वालो ने 
` १ श्रतयन्त उपेक्ता कौ  ग्रपने पर्हचने का (मोका पाए 


दए) ओरौर श्रव जिससे 
„ "तप नेचाव 
ज । नहीं 
क्ता) ते श मेषने र „कता था (या जिसका मुकाबला नदं किथा 


गिराकर वह्‌ सम व जला दिया । 
यहां अस्तुत वारय ६ समृद्ध पहाद्धी गोव जला दि 


ठ पु घ्न 
कर उपेक्षित कि गरिग्रामडत्तान समभ 
२ उपक्षिते किये गये शात्र न्त से प्रस्तुत न्म पुज 


होने से जा रा त 
<“ स ्रप्रस्तुतप्रशंसा प्रलङ्कार च, बाप्त व्यक्ति के छत्तान्त की प्रतीति 
५ 
१/९ +] ऽ 
366, 
6618, ३ 11[]]€ प 
01 णा ] 


07 णा]; 
1 

००९६ रा 90 ` णा [75 106 पाल कषाय 
2९०1051 प} 0" 80160 16 श 1 वत एप पणाः 5170708 
य व 1 णण ए (2 106 6]0पतव 100, ९०९ 
[९ 1] > ` ताह का दाका एप 


।॥ 
पमा 27086०18 0111 1112९ 
¬» प्छ 15 ्णातला०॥ 


1 २ शुषियाः ध्येयं धरायामिदं 


वृटते कमः 


_ सर्वानोपयिकेषठु =, तत कष्ाणि तवराशचनिः 


= द्रधरि नकतारण्येष्वपां 


+ सुधियाक), मः ह 
क्रो ॥ 
भ, ह; तथैव अ 


वृष्टयः ॥४१॥। 


(-0 3118511। 5116118 1 05111811 01661100. 01411260 0 66810011 











भत्लर पातक भ्‌ ्\4 


हे उत्पातघनौघ ! साधु सुधिया (त्वया) ध्येयम्‌ (यत्‌) धरायाम्‌ 
ईं साधु दुष्करं कर्म अनन्यः कः कर्तुम्‌ प्रलम्‌ ? सर्व॑स्य श्रौपयिकानि 
यानि कतिचित्‌ क्षेत्राणि तत्न (त्वया) भ्ररानिः (पात्यते श्रथ च) 
सर्वानौपयिकेषु दग्धसिकतारण्यषु श्रपां वृष्टयः (दीयन्ते) । 


ग्रपात्रं प्रति दानं न क्तन्यमित्याह--उत्पातघनौघ ! संहारसमयमेषवृन्द । 
सुधिया धीमता कर्वा। धरायां भूमौ । साधु समीचीनं कृत्यं साधु सम्यगेव 
विचिन्तनीयम्‌ । त्वद्थः को वा इदं कर्मं कर्तूमलमिति काकुः । दुष्करं कतुंम- 
दाक्यमीदहशमेवंविधं कम घटते युज्यते । कि तत्कमं इत्यत श्राह-- सवस्य लोक- 
स्यौपयिकानि उपयोगभूतानि उपयुक्तानीति यावत्‌ । विनया दिपाठादुपायशब्दात्‌ 
स्वार्थे ठक्‌ प्रत्ययः । उपायाद्‌ स्वं चेति हस्वः । यानि कतिचित्‌ कियन्ति 
क्षेत्राणि सन्ति । तवर केषु कषेत्रेषु अ्रशनिः १तितः। तनुवृष्चिरित्यथेः । स्वनिप- 
यिकेषु सर्वस्यानुपयुकतेषु । दग्धेषु दावाग्नप्लष्टेषु । सिकतेपु वालुका पररप्येषु 
च । श्रपां जलानाम्‌ । दर्यः दीयन्ते इति शेषः । उत्पातघनत्वात्तवेवेदमु- 
चितमित्यर्थः । प्रायेण दातारः पात्रेषु न ददति । किन्त्वपात्रेष्वेवात्यर्थं ददतीति 
भावः। 


ग्ररे संहारक (ग्रपशकुनसूचक) मेघममूह ¡ तम्दं (बहुत श्रधिक) शावाशी 
(दे रहे है) | (ज्रपने को) बहुत त्रधिकं बुद्धिमान्‌ (मानने वाले) तमहं यह बात 
सममः लेनी चादिए किं (इस) परथिवी पर इस ग्रच्छे कायं को तुम्हारे सिवाय 
दूसरा कौन करने मे समथ है १ सवके उपयोग मं श्राने वाले जो कु (थोडे बहुत) 
खेत ह वहाँ (तो वम्हारे द्वारा) बिजली (गिराई जा रही) दै (श्रीर) सवके लिए 
ञनुपयोगी जले हए श्रौर रेतसे भरे हृ जंगलो मे जलों की ब्रष्टियां (प्रदान कौ 
जा रही) हं | 
गराना रौर अ्रनुपयोगी स्थलों पर द्रि 


यहां उपयोगी क्षेत्रों पर विजली ? ११ 
पात करना इन दो श्नननुख्प घटनाश्रों के कारण विषमालङ्कार ह तथा 
त्र को दान न करके कुपात्र 


प्रस्तुत वाच्य मेषवृत्तानत से ्रस्तुत व्यङ्ग्य सूप | 
को दान देने वाले घनी व्यक्ति की प्रतीति होने से प्रप्रस्तुतश्ररसा मलङ्कार 
दै । साधु" तथा ईशं दुष्कर कर्म" इन पदोंकेद्रारा विपरीत लक्षणा से निन्दा 
की अ्रभिव्यक्ति हो रहीदहै। 

105 ! ४] 60716 ! + 01167 {71871 
४०, ©) {5 ९111, ८०४1 0711011 ऽप८॥ 2 2००५ 914 01061 ०६६५. 


1 . 28 ९ 2705 1161) 81९ 
(011 ०९ का ¡01178९5 0 {116 97801 । 
= 8501 11616/18/ [ 0511|<1180। (0661101. [1411260 0 66810011 


0 श्ण ग 0680 ८10 











' भल्ल टस्षतकम्‌ 


ऽणि 0 9 21 276 एण फला 10 {1016515 शत) 27€ 71160 


710 एपत108 38105 20 पऽल ८85 णि. 811 ए€ाऽ००5. 


लब्धाया" तुषि गोमृगस्य विहृगस्यान्यस्य वा कस्यचिदु 
वृष्ठ्याग स्याद्‌ भवदीययोपकृतिरित्यास्तांः दवीयस्यदः । 
परस्याव्यन्तमभाजनस्य* जलदारण्योषरस्यापि कि 
जाता पश्य पुनः पुरेव परुषा संवास्य दग्धा छविः ॥४२॥ 


(हे) जलद ! गोमृगस्य विहगस्य भ्रन्यस्थ वा कस्यचिद्‌ तुषि 
लब्धायां भवदीयया वृष्ट्या उपकृतिः स्यात्‌ इति श्रदः दवीयसि 
आस्ताम्‌ । म्रत्यन्तम्‌ श्र भाजनस्य अरस्य भ्रा रण्योषरस्यापि ते वृष्ट्या कि 
(जातम्‌ ?) पश्य, प्रस्य सैव छविः पुनः पुरेव परुषा दग्धा (च) जाता। 


यः परेषां नोपकरोति स नोपकर्तत्याह-लब्चायामिति है जलद । गोरक्षादे 
मंगस्य कृष्णासारादैः । विहगस्य पक्षिणः काकददेरन्यस्य वा कंस्यचित्प्रारिनः 
कृमिदंशादेः । तषि तृष्णायां लम्धायाम्‌ । सञ्जातायां सत्याम्‌ । भवदीयया 
त्वत्सम्बन्धिन्या । त्यदादीनि चेति वृद्धत्वं वृद्धाच्छं इति वृष्ट्या उपकृतिरूपकारः 
स्याद्‌ भवेत्‌ । इत्यतेद्‌ दवीयसि दूरे श्रास्ताम्‌ तिष्ठतु । ब्रत्यन्तमतितरा- 
मभाजनस्यापात्रस्यारण्योषरस्यास्य ते वृष्ट्याकिम्‌ ? न किमपीत्यथेः । पुनः किन्तु 
पुरव पूर्वमेव परुषा कठिना सैषा सेयमारण्योषरस्य छविदेग्घा हता जाता । 
इष्ट्याप्तं किल शेंवलावरशेन श्यामीभूता चेत्यथेः । ब्रपात्रे दीयमाने दातुः 
स्वीकर्तुश्च न किमपि प्रयोजनं स्यात्‌ किन्तु स्वीकतु; प्रत्यवायो भवेदिति भावः। 


हे मेव | नीलगाय श्रवा वेल श्रौर हरिणः प्छी या किसी दूसरे प्राणी को 
प्यास लगने पर श्रापकी वर्षा से उपकार हो जायेगा इस प्रकार कौ बात तो बहुत 
दूर की होगी (श्र्थात्‌ दुम किसी की प्यास बभा सको इसकी तमसे श्राशा रखनी 
वयर्थ है) । श्रत्यन्त श्रस्पात्र इस ऊसर जंगल को भी (तुम्हारी वर्षां से) क्या 


अ, क, हः जातायां मः 
ज, हु; दुष्ट्याक, मः 

अ, मः, ट; रप्यास्शां क 
मः, हु; महाजटस्य म, फ 
हः जातं अ, क, मः 

क, ह्‌; परव अ, मः 


>, ~ ॐ> ५० ¢> ~ 


(-(-0 5118511 ऽ11/९118॥ [ 051/</810| 0661100. [1011260 0 68170011 


भत्लटणतकम्‌ ४९६ 


(लाभ) हो पाया दै? देखो तो इसकी वही पुरानी त्राकृति दोवारा पहले की 
तरह सूखी श्रौर जली जली हो गई दहै । 


यहाँ श्रप्रस्तुत वाच्य जलददरत्तान्त से प्रस्तुत व्यङ्ग्य कुपात्र रौर सुपात्र 
का विवेक न करने वाले ्रविवेकी दानशील व्यक्ति के टृत्तान्त की प्रतीति होने 
से श्रप्रस्तुतप्रगसा श्रलङ्कार ह। 


0 0000 1 1९8४८ 85106 {€ 0616018 116} 8 111751४ 27116106 (ग 
8171 0 07 0द्ला) 07 3 010 0 शा$ गा 2711118] एठपाते 08४६ 
1110४६५ ४0४ #0ा 7811. 181 एड (गात {113 11110851 0160686 +18 
ए8€ा1 18710 770 {गा ए०पराः 7811 ? 23610 1 11 68105 {16 52116 010 
07४ 210 एप्राा 2[0068181766. 


सन्त्यज्य पानाचमनोचितानि तोयान्तराण्यस्य सिसेविषोस्त्वाम्‌ । 
निजनं, जिद्धेषि जलेजेनस्य जघन्यकार्योपयिकेः पयोधेः ॥४३॥ 


(ह) पयोधे ! पानाचमनोचितानि तोयान्तराणि सन्त्यज्य त्वां 
सिषेविषोः श्रस्य जनस्य जघन्यकार्योपयिकेः निजः जलैः त्वं (कि) न 
जिह्धेषि ? 


योऽत्यन्तसमृद्धोऽपि न कस्याप्युपकरोति तन्तिराकरणायाह- सञ्चिन्त्येति। 
हे पयोधे समृद्र । पानाचमनयोरुचितानि योग्यानि तोयान्तराि भ्न्यानि जलानि 
सञ्चिन्त्य विचायं त्वां सिषेविषोस्सेवितुमिच्छोरस्य जनस्य जघन्ये निकृष्टे कायं । 
गुदप्रक्षालनादौ । श्रौपयिकेरुपायभूतंरुपकारकरित्ति यावत्‌ । विनयादि- 
पाठादृठक्‌ । उपायादृध्रस्वदचेति वस्वः । निजः स्वकीयेजलेः न जिदह्षि न 
लज्जसे । लज्जायामपेयजलवत्ता हेतुरित्यनुसन्धेयम्‌ । सतां सत्कम निह दुष्स्य 
दुघेनसन्दोहं धिगिति भावः। 


(दे) समुद्र | पीने ग्रौर कुल्ला करने योग्य दुसरे (कूपादि के) जलो को 
छोडकर तुम्हारे (जल के) सेवन की श्रमिलाषा रखने वाले इस मनुष्य के सामने 
निकृष्ट कार्यो को सम्पन्न करने वाले (श्रर्थात्‌ गुदादि को दही घोने वाले ग्रपने 
इन) जलो से ठम (म्यो) लञ्जित नहीं रहेहो? 


1. क; सच््चिन्त्य अ, म, ह्‌ 
2. भ, मः, हु; पयोद क 


((-0 9118511। 51164118 1 05114811 01661100. 01411260 0 60810011 


















भत्तट शत्तकम्‌ 


५ यहां श्रपेय जलवत्ता रूप हेतु के होते हृए भी लज्जा रूपी कार्यं की उत्पत्ति 
प ही सही ह रए यहां विशेषोक्ति ग्रलङ्कार ह । श्रप्रस्तुत वाच्य पयोधि- 


दत्तान्त ¦ नुप होते 
ध से प्रस्तुत , व्यङ्ग्य अ्रनुपकारक समूद्धव्यक्ति की प्रतीति होने से 
भरतरस्तुतप्रशसा श्रलकार भी है । 


0 0८ ! 8 
०३९ {णि # ` 76 0 7० वडीक्षाल्व्‌ जा इतण फरथादाऽ ऋतौ 210 
&^+ ३015 171 गा† 2 1}8 एदा त वलयः 7ला०पाल7४ 


311 गल 1 1 (1 
त ८ ५१ ताता जला 728 80702010 ‡०प 21710 15 
११0 परर पठ ता पा कलऽ 


भस्त्रीरिश्च प्रथित एषः पिपासितेभ्यः 


| स रक्ष्यतेऽम्बुधिरपेयतयैवः दूरात्‌ । 
रशकरालमकरालिकरालिताभिः 
भाययत्यपरम्मुमिपरम्पराभिः ॥४४॥ 
आास्तरीरिशु प्रथितः 


भम्बुधिः दुरात्‌ संलक्ष्यते ( 
परम्पराभिः (एष ) 


(यत्‌) पिपासितेभ्यः श्रपेयतया एव एष 
तथापि) दंष्टराकरालमकरालिकरालिताभिः 
क भपर्‌ कि भाययति ? 
°त्यन्तलु्धे = 
परास्नौरिशु त त परान्‌ निरुणद्धि तद्धिडम्बनाया्ह- ` 
विध्योरित्यभिविष वब्ययीम्‌ ५; ` समुद्रः स्त्रीवालमारम्य । ्ाङ्मर्यादार्भि- 
भ्रपेयजलत्वेन । प्रथितः ध | पिपासितेभ्यस्तृष्णार्तेभ्यः । श्रपेयतया 
दष्टराभिः कराला उत्त ञं द एव दूरात्‌ संल्यते परिदद्यते । तथापि 
नीय मकरास्तेषामालयः पङ्क्तयः ताभिः करालिताभि- 


मषिणीकृताि 

। भः | मरां ङ्ध 4 ; 
धमर ऊमिः तरङ्ञाणां ध = 
किमर्थमुदरेजयसि ? निभी गां परम्पराभिः करणैः । अ्रपरमन्यं जनं कि 


कारणं न इयत ५ स्यस्मादधातोष्यन्ताल्लटो भियो हेतुभये । भीषण 
पन्‌. १ ~ धि गे 
दौवारिकसुचकादिपरिषन नर्गुणोऽधिकारिपुर्षादिःस्वभावादनयिगम्योरभि 


तः 
सन्नतीवानधिगम्थो भवतीति भावः । 


स बच्चो से लेकर (युज = 

व्यक्तियों के जिए त गा तक्‌) बह वात प्रसिद्ध है (करि) यह समुद्र ध्य 
व 1. पाला) होने के कारण दी दूर से देखा जात। 

|| अ, मा, ह्‌ 


2 ; प्र चित्त य पक 


मः, संर 
° सरक््यतेञ, क, मः, 5 


अ, क, मा. ८ 
^ 4, भाययर्‌ ञः 
४ पपर ह 


((-0 9118511। 5116118 1 05111181 01661100. 01411260 0 66810011 





^ 





ष च पणम ~~ द -्- कानन स ् वन्क्रकणकायः = न्-- -- ककत सिता = न 4 ए च 
६. ग \ 1 र क्क नु नि» ४ ¶ # ते 1 | 1 १ 1 # क 9 ॥ न 
1] 9, । 6 ॥ र ` छ. न ॥ 0 ५५ 1 च ४ + ह ^ छ । "प = त व, ह # 1 क | १) ति ` । | 1 7, १ ५ नि | [नी 
(64/५५ 9.14 3.१ 1 च ~ 
= ~ 3, ~ = == + ~ ~ =---------------- ~ - = ~~ रं 


भत्लट शतकम्‌ ५१ 


(इसके खारे जल के कारण ही को इसके पास नही शाता हे । फिर भी) दाद 
क कारण भयङ्कर मकरसमूह के द्वारा भीषण बनाई गई तरङ्श्रणियों से यह 
दूसरे व्यक्तियों को क्यों उराता हे १ 


यहां द्सरों को भगाने के लिए भ्रपेय (खारा ) जल हेतु ही पर्याप्त है। 
इसके साथ करालदषटायक्त मकरो तथा भयंकर तरङ्गं रूप अरन्य भय के 
हेतग्रों के आ जाने से यहां समुच्चय श्रलद्कार दै । भनप्रसतुत वाच्य क्षाराम्बुचि- 
रत्तान्त से प्रस्तुत व्यङ्ग्य दौवारिकादि से परित कपणच्परृत्ान्त की प्रतीति 
होने से श्रप्रस्तुतप्रदंसा ग्रलङ्कार भी है। 


11 15 ५९] [6 10 चश्ल$००त$ [पन्ता ५6 कणप 200 116 
(तावा 1181 {16 {11751 60701 &6€ ६१४ ० 1116 568 1 
18 लाः एलं7६ पगम पतणा प{प1४ 15 1६ पला | {7121116 
०लाइ एष 115 (ि्०णड ४४९७ पि] न कतम 0 06001165 05568 
108 3197) {66111 ? 


स्वमाहात्म्यश्लाघागुरुगहनगर्जामिरभितः 
कर रित्वा विलदनासि' भुतिकुहरमब्धे किमिति नः। 
इहेकरचूडालो ह्यजनि कलशाद्यस्य संकरः _ 
पिपासोरम्भोभिस्चुलुकमपि नो भतुमशकः ॥४५॥। 
हे अ्रन्धे ! स्वमाहात्म्यदला घागुरुगहनगर्जामिः प्रमितः क 
नः श्रृत्तिकूहरं किमिति विलदनासि † इह एकः क 44; न । 
पिपासोः यस्य चुलुकमपि त्वं सकलः ग्रम्भोभिः भर्तु नो अ्रशकः 


य; स्वदलाघानिरतस्सन्‌ परान्‌ ना द्रियते व 
रलाघेति । हि श्रव्ये ! सवमादारम्यस्लावागुरुगहनगरजाभिः अ 
महत्ता तस्य इलाघा स्तुतिः तया गुरवो (& 4 छवनित्वा । श्रन्यव्र 
स्ताभिरन्यत्र भतर्सनादिभिरिव्य्थः। श्रमितः सवत; व ॥ ४१ क्विरनासि 
समाहूय नोऽस्माकम्‌ । श्रुत्योः करयोः कुहरं र 1 : चूडा शिखा 
जाधते 7 णकार व्रवीषीत्यथैः । इहं जगति । एकइचूडालः चूड, 
= 

1. अ; मुष्णाति क,म',हं 


1 = क कं 
९ अ, ए. इ 54७) ७44 7०७14087 0 न०ा०गा, 00२०५ ७, ०©ना0नी। 


= 





। / ^. 





दू 1 र --०्, न "ऋ कालक ष्ज्दक्रः 


ऋ 2 क कनन त कृषा ~ ऋक 


बू च~ = == 











२९ 


भतल्लट एतकम्‌ 


्रस्यास्तीति चूडालः पटुः । सिष्मादिपाात्‌ चूडाशब्दान्मतवर्थे लप्प्रत्ययः । श्रजनि 
सः । दीपजनेत्यादिना कतरि चिण्‌ प्रत्ययः । सकलेरम्भोभिः भवदीयेजंलः 
पिपासोस्तृष्णातेस्य यस्य च्ूडालस्य चुलृकमपि करतलास्यन्तरमपि भतु पूरयितु 
नो श्रशकः समर्थो न । दके: कर्तरि लुङः । पुषादीत्यादिना च्लेरडादेशः। पुरा 
किल भगवानगस्त्यः सागरं पीतवानिति पौराणिकी प्रसिद्धिः । श्रनेनात्मर्लाघा- 
परस्य निषृषटस्याहङ्कारो निराङृत इति भावः । 


२ ध 
से १ ! श्रपने वड़प्पन की प्रशंसा से (गर्वित होकर) बड़े गम्भीर गजन। 
दमार्‌ कानों को फाड़ फाड़कर कथो कष्ट दे रहे ठो १ यहाँ एक जसाधारी वह 


[| थं ए तं भ व प्र 
ती त) तपस्वी कलश से उत्पन्न हू था जिस प्यास की ८ 
उल्लू म (तुम श्रपने) जलो से नहीं मर सके ये | ४ 


यहां ग्र भरस्तुत वाच्या 

प्रस्थ द्रत्तान्तसे प्र ठव त्म घाप रायण 
किर्सं नक्रप्रव्य '१।।१९९ न प्रर तुत व्यङ्ग्य ग्रात्मदला 
दि ॥ निप्र ५ | तो के व्रतत न्त पु - = ए 


कृ ~; न = ~ * ती ट्‌ | 
प्रतीति होने से ग्रप्रस्तुतप्रशसा ग्रलंकार € 


0 0९६91] | 


४ || { ॥ 
{113 ४४ ८. 


{70 911 
/0प्रा 107 73156 


11056 [7७ ५ 


^ राणा छाः 6975 811 ८ । ॥ 

१ &1€81 4110 80110 51001115 ०८८४१९५ ५] 

र 8: ४/३ऽ . 007 701 9 [01, 10 9 15, 
१९६ 011, [5 एव]7ऽ 01 91] एणा १,४.८ 


क िनगलवपाियमसावाणारता तावकीं 
वित्वा आयमथा्बुेऽतुनिलये सेयं महासत्त्वता । 
| €भ ्गभोषरातन्‌ त्वामेव वेलाचल- 
प्रावस्रोतसि पानतापकलहो यत्ववापि निरवप्यते ॥* ५ 


है प्रम्बुधे | | ता 
भथ (च ) भ्म्बुरि ५ (जगति सर्वासाम्‌ श्रपाम्‌ तावकी इयमस। १ # 1 
लोकः) क्न मय प्रोल्लासः, सा इयं महासत्त्वता  _ चलः 
ग्रावस्रो रि | तन त्वा ~ कलहः वेल 
्रव्लोतसि यतक्वापि तिजा [ 

1. न पथो तना | { 
2. ^ °) पवार््बा 
* ६; ¶प्तापदहूनो ५ ॥ › मघो तवाम्बुनिलये मः ; मथो तवाम्बुनिचये ६ 


1 म ९ .पापत्त 
` ग | । ((-0 91185111 5116९181 1 05111481 ८०।९्निको ता॥60 0\/ €(810011 


[ 


` या ञ्नापः सन्ति तासां जलानां तावकी त्वत्स 


[4 ॥ 1 # ॥ छ, # + 
: अ - ।(- ह ~ 2 : ५. ~ 


भरल टणत्तकम्‌ ५३ 


दुषप्रभसकाशाद्‌ द्य रिग्रहजं दुःखं सुजनमन्य लाता साच परिहीयत 
इत्याह सर्वासामिति । ठे अ्रम्बुधे ! समुद्र ! राजा च प्रतीयते । त्रिजगति लोकत्रये 
बन्धिनी इयमाधा रता श्राश्रयत्वम्‌ । 
यदाह अ्राकाञ्ात्पतितं तोयं यथा गच्छति सागरम्‌ इति । न्यत्र सवजनाश्न- 


यत्वं ध्वन्यते । ्रम्ूनां पयसां निचये समूहे प्रय परिहद्यमानः प्रोत्लासो विज्‌- 


प तचयशब्देन धनसमूहो ध्वन्यते । सा 
म्भणम्‌ । भ्नन्यत्र प्रोट्लासो हषः । प्म्बुि न घनसमूही 
मक रादिमहाप्राणिमत्ता । अन्यत्र 


तथाविधा इयं परिहदयमाना महासत्वता व 
महा बलवत्ता दश्यते । किच बहुभ द्धभीषणतन्‌, व 
नादिभिः पराभवश्च भीषणा भयावह त देहो यस्य तंत्वा ५ अ 
सम्प्राप्य । पानतापकलहः पानेन जनितस्तापः पानतः तेन सजञ्जनितो यः 


न, =, रो ध्य यत्न त्र 
कलहः क्लेशः । कलहस्य क्ते गहंतुत्वात्‌ कलंहशब्देन क्ले 9 । ॥ 
क्वापि वेलायां स्थितोऽचलः पवतः तत्र ग्रावाणः पाषाणाः तेषु यत्छोतो जल- 

णि लद्‌ । दुष्रस्य धनन 


प्रवाहः तत्र निर्वाप्यते शमं तीयते वपतेण्यन्तात्‌ कम 
वह्वपि परोपमोगायः । सतस्तु तन्मितमपि न तथेति भावः \, | 
जलों की तुम्हारे ग्राधार बेनने की वह यह 

॥ मूर ४ ~ 1 य 
वात (प्रसिद्ध) है ग्रौर (ठम्हारे भीतर) जलसमूहं म॑ यह उवार ४ 
करता) हे तथा तुम्हारे व्न्दर तड बड (मकरादि) प्राशियो की वह यह्‌ ई 
है । परन्तु मतष्यों के द्वारा, श्रतेक लदरों के कारण मगङ्कर शरीर वाले मा 
(खारे जलो के) ही सेवन को करके (इनके) पीने से स (व (5 
तटवतीं पञ्चत की पयरीली (नदी की) जलधिं मे जहां क द 


किया जाता है। 


दे समुद्र | तीनों लोक मे समस्त 


स्तुत व्यङ्ग कृपण व्यक्ति 
= न्त से प्रस्तुत व्यङ्ग्य स्र तने 
यहाँ अ प्रस्त॒तवाच्य परम्बुविद्तता गता रीति होने से 
को ५ तथा स्वल्पघन सज्जन ध ९७८ र व है । इस 
्रभ्स्तुतप्रंसा अ्रलंकार दै । परोल्लास गओरौर महासत्वता 


| । 
कारण यह्‌ श्रप्रसतुतभ्रंसा इ्लषमूल ट 


{16 ०००१८ ० 91 116 भणादाऽ-- 0015 15 (00 
€ {1 | 


॥ 12 0681168 171 शठा 
। 01105. ४० 11236 1106 270 स 1111 111819४ 
॥ 11€ 6८ फा ^ 108 ००४ 0००१ 0 
| 8 ह 


8101658 9 92678. {1 {ा, ५€ 11256 201 21701 1681 

43 +... “ 
५१२९४९६ 27 त्ता +०१ -.11{ 0.3 5110716 00षप्रा काप. 
08610016 ऽ०ाप्ल्शाला९€ 17 8 7069 1\/1. | 


~ ~ नः 


1. म; परोपभोगार्हम्‌ ह 


() 0०८८811 ! ४० 8 


क 1  , अ मि 
क्क = 


१ रै । गीति 


((-0 9118511। 9116418 1 05111811 0661100. 01411260 0 60810011 


० 4.५ । व ` । ॥ 9 ४५ तः ५ ४५) = | 9 चं) ग 34 पिं क) ~ १: 2 2 =^ 2 1 














स= नत न 


= ऋ नः [रः जका = ह ~ गृचाणरनकनत ~ "ज्छ ष्कु्ः व्रज ~~ = ङ्ग र--ङद्वङ्भऋह्नः र~ - --- 





५ भल्ल शतकम्‌ 


नोद्वेगं यदि यासि यद्यवहितः कर्णं ददासि क्षणं 
त्वां पृच्छामि यदम्बृघे किमपि तन्निश्चित्य देद्युत्तरम्‌ । 
न राश्यातिशयातिमात्रनिशरृतै निःश्वस्य यद दुश्यसे 
तष्यद्धिः पथिकः कियत्तदधिकं स्यादौवंदाहादतः ॥४७॥। 


(हे) अम्बुघे ! यदि उद्वेगं न यासि। यदि श्रवहितः क्षणं कणं 
ददासि (तदहि ग्रहं) त्वां यत्किमपि पृच्छामि तत्‌ निश्चित्य उत्तरं देहि । 
ने राश्यातिरायातिमात्रनिभृतेः तृष्यद्भिः पथिकं नि.रवस्य यत्‌ (त्वं) 
हर्यसे तत्‌ (दशनं ) श्रतः श्रौवंदाहात्‌ कियत्‌ भ्रधिकं स्यात्‌ ? 


यस्तु घनवान्याथिमि रलव्धमनोरथैः सविषादमालोक्ते तद्विडम्बनायाह-- 
नोद्वेगमिति ! हे श्रम्बुषे समुद्र ! प्रभुरपि प्रतीयते। यचुेगं मनस्तापं न 
यासि न गच्छसि वक्यमाणस्याथेस्यातीव परषत्वादिति भावः । श्रवहित एका- 
ग्रमनाः सन्‌ क्षणं क्षणमात्रं यदि कणं ददासि प्रयच्छसि श्रोष्यसीत्यथैः । तयं 
स्वां यत्किमपि वचो वचनं पृच्छामि । पृच्छते द्रहियाचीव्यादिना द्विकर्मकता । 
तश्निरिचत्यावधायं उत्तरं प्रतिवचनं देहि ब्रूहीत्यथैः । तदेव प्रडनस्वरूपं निरूप- 
यति - तृष्यद्भिः पिपासितः पथिकंरष्वगैरनेराश्यातिशयातिमात्रनिभृतैः । सर्वेथा- 
यमपेयजलः तस्य समीपं गत्वा तृटुप्रतीकारो न विधेय इत्येवम्भूतस्य निराशभा- 
वस्यातिशयेन प्रभूततया श्रतिमात्रमत्यर्थं निश्रतं निडचलं यथा निःकवस्य शुत्कृत्य 
दश्यसे प्रेक्ष्यसे इति यत्‌ । तदतोऽस्मात्‌--ग्रौर्वदाहात्‌ श्रौर्वाग्निजनितात्सन्तापात्‌ 
कियत्‌ भ्रधिकं भूयिष्ठं स्यात्‌ वडव।नलसज्जातादप्यलब्वमनो रथपयिकजनवीक्षण- 


स्तापो दुन्सह्‌ इत्यथैः । स्वकीयजनसन्तापात्‌ परकीयस्तापो गरीयानितिभावो 
ध्वन्यते । 


हे समुद्र ! यदि त॒म नाराज्ञनहोश्रोश्रौर केण भर ध्यान देकर सुनतेद्ोतो 
मै तुमसे थोद्धा बहत जो पृ्खता हँ उसका निश्चय करके उत्तर देना । नियशा 
कै श्राधिक्यसे बहुत चुपचाप रहने बाले प्यासे पथिकों के द्वारा श्रा मर भर कर 
जो तुर देखा जाता है वष्ट दष्ट वडवानल से कितनी अधिकं (दुःसद) होती ह ए 


भ्रौवंदाह (समृद्राग्नि) से होने वलि कष्ठ की श्रपेक्षा निरा पथिकों की 
ट्ठि भ्रधिक कष्ठकारी होती है इस प्रकार यहां उपमेयं की श्रपेक्षा उपमान के 
भ्रधिकं (ग्रौर्वदाह्‌ की तुलना में पान्यदट्िदाह के ब्रधिक कश्चकारक ) होनेसे 


1. ह; . . . विमात्रनिभूतं भ, मण, , , मनिषांफ 


((-0 9118511। 51164118 1 05111.181। 01661100. 01411260 0 66810011 


=== नन पय 
। ऋं 


11. 
, 1. 


भत्लट शतकम्‌ ५५ 


व्यत्िरेकालंकार है । भ्रप्रस्तुत वाच्य प्रम्बुधिटत्तान्त से प्रस्तुत व्यङ्ग्य दान मे 
ग्रक्षम धमत्मा न्यकिति कै दरत्तान्त की प्रतीति होने से भ्रप्रस्तुतप्रशसा अलकार 
मोरे) 


0 568 ! 7138 [ 351८ ० 50116 1111118; 1 $०ा ५0 70४ ध्लि] 
211710/€त 87 276 एश7[777 {0 [लात ४णणाः €वा5ऽ 10 7€ णिः 8 +?1111€ 
ए1८856€ &1४€ {76 लु गलाः ५०८ 60151067811071. पठ प्ली 11016 
(08111701) 1781 1{116€ 57181716 776 15 {16 51111 ० 11086 11751 


{72*€]1ला§ "10 2768119 5158[070011160 आधार 5120 8.10 2826 21 
9011? 


भिदयतेऽनुप्रविश्यान्तर्यो यथारुच्युपाधिना । 
विशुद्धिः कीहरी तस्य जडस्य स्फटिकारमनः ॥४८॥ 


तस्य जडस्य स्फटिकारमनः (इयं) कीरशी विशुद्धिः ? यः (स्फटि- 
कारमा) उपाधिना भरन्तः भ्रनुप्रविश्य यथारुचि भिद्यते । 


यः करिचत्सुजनोऽपि कायं वशेन खलमासाद्य स इव व्यवहरति । स सुजनो 
न भवतीत्याह्‌- भिद्यत इति । यत्स्फटिकाइम उपाधिना जपाकूसुमसम्बन्धेन 
यथारुचि स्वकान्तिमिनतिक्रम्य । जपाकुसुमाद्यसन्लिवाने स्वच्छतयाऽनपायादिति 
भावः । अन्तः स्वमध्ये अनुप्रविङ्य । विशतेरन्तभावितण्य्थात्‌ क्त्वो ल्यप्‌ भिद्यते 
भेद नीयते ञ्त्रापि भिदेरन्तर्मावितण्यर्थात्‌ि कमणि लट्‌ । जडस्य रीतलस्य 
ग्रन्यत्राज्ञस्य । स्फटिकादमनः स्फटिकशिलायाः । विशुद्धिः कीटशी कथम्भूता । 
स्फटिको हि सङ्कवशेन विक्रियामेति । तथा सङ्खवशेन विकुवेतः पुरुषस्य सुजनता 
दू रादेवापास्तेत्यथंः । 


उस जड बरिल्लौर पत्यर की (यदह) कैसी स्वच्छता है १ जो (बिल्लौर मणि 
किसी) उपाधि (भूत वस्त॒ जपाकरुसुमादि) के दारा भीतर प्रवेश करके इच्छानुसार 
विदीणे कर दिया जाता है। 


जव बिल्लौर मणिके निकट जपाकुसुम (एक प्रक्रार करालाल पुष्प) रख 
दिया जाता है तो यह्‌ इवेत विल्लौर मणि श्रपनी उवेतिमा छोडकर जपाकुसुम 
की लालिमा को धारण करलेतीहै। यहां विल्लौर मणि द्वारा श्रपना गुण 
छोडकर द्सरी वस्तुके गुण को ग्रहण करनैके कारण तद्गुण प्रलङ्कार है। 
17 स्फटिकात्मनः न्म, मः 


((-0 9118511। 5116118 1 05114811 01661100. 01411260 0 60810011 


५ < @ = -:-. - 
), 











48 भटत्लर गततकम्‌ 


, श्स्तत वाच्य स्फटिकमणिदत्तान्त से प्रस्तुत व्यङ्ग्य किसी सज्जन की 
१ प दोपप्राक् का वृत्तान्त सुधित होने से भ्परस्तुतपरशंसा प्रलंकार 
मी > । 


1 "187 301 15176 एणा ० 1121 [ला ए€0णि© 8006 ए) 100 


15 ॥ त 
पिर 09 21 21110 प्र 0010117 61618 111 1 1{5 0\/1 


चिन्तामणे भूवि न केनचिदीश्वरेा 


_ मूध्नाृतोऽहमिति मास्म सखे विषीद \ 
नास्त्येव हि त्वदधिरोपणपुण्यवबीज- 


सौभाग्ययोग्यमिह्‌ कस्यचिदुत्तमाद्धमु ॥४९॥ 


त मत | विनि र भं न धल 
- | च ~ ए ~ 
कस्यचित्‌ उत्तमाङ्खम्‌ ए ९ ६५ # द[धर्‌ापण पुण्यबीजसौमा ग्ययोग्य 


मान्य यो 
चिन्तामरो व < ४, मानहीन इत्याहं - चिन्तामण इति । 
करवा । मूर्ध्ना मस्तकेन ५. वन्यत । त्वं भुवि कैनचिदीश्वरण मुए 
मणीन्‌ लिरसा दधति व य न धतवान्‌ । सर्वेऽपि राजानः ध 
¶ भ्ापुहि । स्मोत्तरपदे लड द ऽपीति चेतसि चित्ते विषादं मास्म 
त्वदधिरोपणं तवाधिरोहणं = भ्‌ चकाराद्‌ गमेः कतरि लुड्‌ । तत्र हेत माह 
तेन सौभाग्यं शु तत्‌ प्‌ प्राचीनं शुभकर्म । तदेव वीजं कारणम्‌ । 
नास्त्येव । एवकारोऽवघ र ५ समुचितमुत्तमाङ्ध शिरः। कस्यचिद्‌ 
भ्रति सम्मानभाग्यंन स्वेलाम यसित चेत्‌ कोऽपि वा विभरयादित्यथः | सज्जन 

स्तीति भावः । 


(ष शि 4 ््‌ > कि 

क ध [र्ण नहीं किया तर्द धारण करने के पुण्य के कार 
कसा इक्वर के चि 
षा कारणा किसी ऊ ध तामणि को सिर पर्‌ वारणा न करे खूप कय 
क~ 9 | तकृ का साभाग्याभाव हो जनि = हां काव्यलिर्ज 


114 का 


1. 
'१;मास्मगमो विषा 


# दं | 
((-0 9118511। 51161118 1 0511/.180। (0166100. 01011260 0४ छत्रां 





|, # "द / क व, 6 न्नै 
क । ॥ | र ४ |} क ज # १ = ~ । 
4 = ५१4 ~+ ८.9. ॐ ~ 4 1404 ` ऋ 0. त | 


भरल्लट भातत ती म्‌ 4 ५. 


ग्रलंकार है तथा भ्रप्रस्तुतवाच्य चिन्तामणिदधत्तान्त से प्रस्तृत व्यड्ग्य सुयोग्य 
व्यकित की श्रवन्नारूपटत्तान्त की प्रतीति होने से ्रप्रस्तुतप्रशसा हे । 


0 {लात लापाद्वाा वा), ५० 10 216५6 0116 10 1116 261 {1191 १९ 
[ता18 गा {115 €वा1]1 188 {19066 +#५प 07 1115 0680. ^ ५1०1५ 11676 15 
710000४8 {1680 01118 1081 {0 ष्ठाः $०प 11) 0761003 
71011005 १६९05 ल] (णण 06 {11€ 08186 ° 7186118 ण्ण 


(0111). 


संवित्तिरस्त्यथ गुरा: प्रतिभान्ति लोके 
तद्धि प्ररस्तमिहः कस्य किमुच्यतां वा । 


नन्वेवमेव सुमणे लुट यावदा 
त्वं मे जगत्प्रसहनेऽत्रः कथाशरीरम्‌ ॥५०॥ 


हे सुमणो (तव) संवित्तिः ग्रस्ति श्रथ लोके गणाः प्रतिभान्ति । इह 
प्रशस्तं तत्‌ (गुणजातम्‌) कस्य वा किमुच्यतासु ? ननु एवमेव त्वं 
यावदायुः मे लुट, श्रत जगत्परसहने कथाशरीरम्‌ । 


यितः सद्गुणोऽप्यसत्कृतो मवति तदादवासनायाह- 
सुजनोऽपि घ्वन्यते । तव संवित्तिः सम्यग्‌ 


ल्ञानमस्ति चिन्तिता्थप्रदानसामथ्यंस्य सद्भावादिति भावः। व | 
गुणा दातृत्वादयो लोके प्रतीता मवन्ति धक ग । ध ५ त क 
तद्गुणजातं कस्य वा कि कारणम्‌ । उच्यतामि अ । तं १ (4 
वक्तुमनुचितत्वादिति भावः । नयु चिन्तामणे त्वं मे मद युराय 


दस्ति तावदित्यर्थः । यावदवधास्ण दत्यव्ययीभावः । एवमेव सर्वोपि कतत्वेन लुट 


उन्मिष प्रकाशयति यावत्‌ । गवतो वस्तुनः + कारितुमुचितः वादिति श 
च न्क त ना धि ८ गुण च 
६6 प्रनस्यावदयविनाचिल्वादायुषोऽन्त स्वह , र 1 तदाधित 1 १ 
जातं विनङ्क्ष्यति । तत्किमनेन अरल्पन परकाशेनेति शंकायां भ ५ 
£ ई घ उत्याह- जगत्प्रसहनं 

नादोऽपि की्ति्रीरस्यापि न्वरत्वेन न द 1 ४ बाहल्यस्या- 
जगतः सर्वस्यापि लोकस्य प्रसहनं पर कधण सहनम्‌ । याचक्य ८ ; ् 

| ल्या वार्ता सैव ते शरीरं भविष्यतीति 

तीव (तितिक्षति यावत्‌ । एकं सदेव का शुषा वात! ५५ 
1. अ, म, हः; प्रशस्यमिह क 
2. क, मः; जगत्मसहनैक क, न, ₹ 
((-0 9118511। 51164118 1 0511/.1811। 01661100. 01411260 0 66810011 


यः करिचत्सुजनः प्र 
संवित्तिरिति । सुमे भोरिचन्तामणे 


(~ ह क इष्कु नकु + सनुुगजकम न्‌ च कणु न ह. तऊ ज = वहः त = 

















५८ भल्लट शतकम्‌ 


भावः । नदवरात्‌ भौतिक्रीरादपि अ्रविनद्वरस्य कीतिशरीरस्यैवोपादानं 
वरम्‌ । अतस्तेन नं रन्तयंण प्रकादानं युज्यत एवेति भावः । 


यहां अ्रप्रस्तुत वाच्य सुमणिद्त्तान्त से प्रस्तृत व्यङ्ग्य किसी प्रसिद्ध 
गणराली किन्तु भ्रसत्कृेत सज्जनं के टत्तान्त की प्रतीति होने से ्रप्रस्तुतप्रशंसा 
भ्रलद्धुार है । 


(दे) सुन्दर मणि | (व्हारे पास) ज्ञान है। संसार में वम्दारे गुण चमकते 
है । किसके गुण पेते प्रसिद्धै? श्रौर किसके श्रागे क्या कहा जाय १? अनर 
तक तुम्हारी श्रायु रै तत्र तक्र मेरे लिएरेसे ्टी लुटो (चमको) । यहो जगत्‌ के 
लिए (कष्ट) सदन करने की कथा ही वुम्हारा शरीर बनेगी श्र्थात्‌ व॒म्हारी 
कीर्तिं वुम्दारे समाप्त दोने के बाद भी वनी रहेगी । 


0 8€1४€ तणद्0201 ! $0प 02४6 एा7क्ा८€. ४०पा 016८116 6 
80105 717 176 ®#0110. "710 6156 125 प्ल) व्ल॒ल्छा1८४ ? भमा 
1076 681 € 5४1 ? 21&456 5101116 07 716 25 1012 25 ९० 276 [1४फष्. 
€ 510 गं शण (गल्ः०९€ णः € जत जण € जपा ००८४ 
(2162703). 


चिन्तामणेस्तुखमणेरच कतं विधात्रा 
केनोभयोरपि मणित्वमदः समानम्‌ 1 
नकोऽथितानि ददन्नथिजनाय खिन्नो 
गृह्भञ्जरत्तृणलवं तु न लज्जतेऽन्यः ॥५१॥ 


केन विधात्रा चिन्तामणे: त्रणमशेद्व उभयोरपि भ्रदः समानं 
मरित्वं कृतम्‌ ? एकः श्रथजनाय भ्रथितानि ददन चिन्नः न (भवति) 
मन्यः तु जरत्‌ तृणलवम्‌ (श्रपि गृह्णन्‌ न लज्जते) । 


 बवदान्यकदययोः स्वरूपनिरूपणंपुरःसरेण सादश्याभावोपपादनेनेव कदर्यः 
स्वयमेव जिह्ष्यतीत्याह-चिन्तामशेरिति । विधात्रा ब्रह्मणा कर्त्रा चिन्ता- 
मशेस्तृणमणेदच । चिन्तामणिर्नाम चिन्तिता्थप्रदायी मणिविशेषः 1 तुणमणि- 
नामि तृणग्राही कंदिचत्‌ पाषाणविेषः । तयोरुभयोरपीदं मखित्वं केन वा 
हेतुना इदं समानं तुल्यं कृतम्‌ श्रकारि कारणादशेनादुमयोः सारष्याभिधानमनु- 
चितमित्यर्थः । तदेवोपपादयति--तयोरेकरिचन्तामणिरथने जनाय अ्र्थितान्य- 
भिलषितानि ददन्नपि प्रतिपादयन्नपि नाम्यस्ताच्छतुरिति नुमभावः । न खिन्न 
क्लेशितो न भवति । ब्रन्यस्तृणमणिः । जरन्तं जीणम्‌ । जीयंतेःशतृन्‌ प्रत्ययः । 


((-0 9118511। 51164118 1 0511/.181। 01661100. 01411260 0 66810011 


मत्लटशतकम्‌ ५६ 


तृणस्य लवमभेकदेशं गृह्णन्‌ स्वीकू्ेत्तपि न लज्जते न द्वीणो भवति । प्रभूत- 
प्रदानेनापि न वदान्यः क्लेदायति । कदर्यस्तु प्रसह्यास्य" हरशोऽपि न लज्जते 
इत्युभयो मंद इति भावः। 


किंस (मूख) ब्रह्मा ने चिन्तामणि ओर वृणमणि दोनों को खमानलखूप से 
मणि होने कागवं दे दिया है? एक (चिन्तामणि) तो याचको को उनके 
श्रभीष्ट पदाथ देते हुए कभी खिन्न नदीं होता श्रौर दूसरा णेखा है कि उसे ट्टे 
तिनके के टुकडेकोलतेते हुए भी लञउना नदींश्राती। 


यहा श्रप्रस्तुत वाच्य चिन्तामणि ्रौर तृणमणि इत्तान्त से प्रस्तुत ग्यङ्ग्य 
उदार श्रौर कपण व्यक्ति के इत्तान्त की प्रतीति होने से प्रस्तुतप्रशंसा 
भ्रलङ्धुार है। चिन्तामरि रौर तृणमणि मेँ विरुदडधघर्मता बताई है । चिन्तामशिं 
तो श्रपना सब कूदे देता है श्रौर तृणमरि दसरों की तिनके जसी तुच्छं 
नस्तुकोभीलेलेताहै। इस कारण यहाँ विष्मालङ्कार भी है। चिन्तामणि लोगों 
कै अभिलषित पदार्था को प्रदान करने वाली मणि मानी जाती है भ्नौर 
तृणमणि तिनके को पकड़ लेन वाला विशेष प्रकार का पत्थर होता है। 


ए 9116] यलटवाल 176 व्वृपश् (€ ग [लश्च 25 एष्य ९७८०५५८५ 
प्रा) 801 भाणिका 87त (प्रशा १ (0116 106 016 15 701 ६४६6५ 
0 &141028 ५€७1776€व ०४1€५॥§ ६0 € 660 07065, 176 00 15 701 
85811160 9 26660118 €शदाा 2 57211 1६८6 > §& ५५. 


दुरे कस्यचिदेषः कोऽप्यङृतधीर्नेवास्य वेत्त्यन्तरं 
मानी कोऽपि न याचते मृगयते कोप्यल्पमल्पाशयः । 
इत्थं प्राथितदानदुन्यंसनिनो नौदायेरेखोज्ज्वला 
'जातानेपुदुस्तरेषु निकषस्थानेषु चिन्तामणे: ॥५२॥ 
एष चिन्तामरिः कस्यचिद्‌ दूरे (विद्यते) कोऽपि श्रकृतधी 
(समीपस्थः सन्‌) भ्रस्य अ्रन्तरं न वेत्ति । कः ्रपि मानी न याचते, कः 


भ्रपि अल्पाशयः श्रल्पं मृगयते । इत्थं प्राथितदानदृव्यंसनिनः चिन्तामरो 
अनुणदुस्तरेषु निकषस्थानेषु ग्रौदायंरेखा उज्ज्वला न जाता । 


म; भरस्य त्वस्य ह 

अ, मः, ह्‌; कस्यचिदेव क 
अ, मः इ; त्यल्पमृत्याणशयः क 
ह्‌, मः; जाता नैपृणा अ, क 


+ 


((-0 9118511। 51164118 1 05111.181। 01661100. 01411260 0 66810011 


६० भल्लटश्षतकम्‌ 


भ्रसन्निहितस्याविशेषज्ञस्यायाचकस्याल्पाशयस्य प्रभूतप्रदाय्येव प्रदाता न 
वितरति इत्याह-द्रे कस्यचिदिति । एष चिन्तामणिः कस्यचिदकृतपुण्यस्य 
दूरे तिष्ठति । श्रकृतघीरवुद्धिमान्‌ करदिचत्समीपस्थोऽप्यस्य चिन्तामणेरन्तरं 
विश्चेषगुणं न वेत्ति । श्रयं चिन्तितानि दातु शक्नोतीत्येव न जानाति । मानी 
प्रभिमानी कोऽपि पुरुषो न याचते । याच्जाभङ्कभयेनेति भावः| भ्रत्पाशयो 
ग्रल्पवुद्धि कोऽपि करदिचदल्पं तुच्छं मृगयते । वदान्यं विहाय चुब्धं याचितुम- 
न्विष्यत इति भावः । इत्थमुक्तप्रकारेण प्रार्थिते याच्जायां सत्यामपि यदृदानं 
वितरणं तदेव दुन्येसनमभिनिवेश्चः । कदयंस्तु * * 

सी तथोक्तः । तस्य चिन्तामणेषिचन्ता रतनस्यास्यानं पुरादुस्तरेषु श्रनैपुणेना- 
प्रावीण्येनापि दुस्तरेषु दुर्ञेयेषु निकषस्थानैषु तारतम्यविमशेस्थलेषु" । उज्ज्वला 
रमणीया श्रौदायंरेखा दातृत्वचिह्धम्‌ । न जाता नाजायत । दाता रोऽपि बहवो 
दु रस्थादिभ्यो न ददति तद्विपरीतेभ्यस्तु ददल्येवेति भावः । 


(सबकी कामनश्रों को पूरा करने बाली) यह चिन्तामणि किंसीसे दूर 
(होती) है (तो) कोई दुसरा बुद्धि्टीन व्यक्ति (समीप रहकर) इसके (दानशील) 
विशेष गुण को नदीं जानता दै | च्न्य कोई दुरभिमानी (दसम) याचना नदीं 
करता दै तो दूसरा कोई दच्छ्धरय पुरुष इससे थोडा सा माँगता है| इस 
प्रकार याचनां शने पर दी देने के बुरे स्वभाव वाली चिन्तामणि की उदारता 
की रेखा (लोगों की) मृखेता (रूपी मलिनता) के कारण दुय परीच्तारूषी 
कवौरी पत्थर पर स्पष्ट नीं हो पाई है श्र्थात्‌ चिन्तामणि का वास्तविक दात्र 
स्वरूप विभिन्नमति पुश्षों को श्रपनी श्नपनी सीमा के कारण स्पष्टतया समभ 


मर नदीं आता दै। 


यहां प्रस्तुत चिन्तामणिडृत्तान्त से भ्रप्रस्तुत दानी पुरुषटेत्तान्त की प्रतीति 
होने से भ्रप्रस्तुतप्रशंसा श्रलङ्कार है । जंसे चिन्तामणि कौ उदारता का शुणदूर 
रहने पर भी ज्ञात नहींहो पाता श्रौर पास रहने पर भी उसकी कीमत नहीं 
पता चलती वैसे ही दानी राजा दूर रहने वालोको भी दान नहींदे पाताश्रौर 
पास रहने वालों को उसके दानी रूप का क्न नहींहोता है। यहाँ दूरताभ्रीर 


समीपता रादि को चिन्तामणि की उदारताकोन जाननेका कारण बताया 


गया है इसलिए यहां काग्यलिङ्घ श्रलद्भार भी दहै । 


(06 0७७76 #6द10ह 5006 नाद्या 15 0प( म 81111 {07 5076, 


1. मः; स्थनिषुह्‌ः 


((-0 9118511। 51164118 1 05111.181। 01661100. 01411260 0 66810011 





भल्लटशतकम्‌ ६१ 


5०76 (10 27€ ०687 एए) 701 {56 00 110 16600126 1४5 ऽत्लगे 
€; ०प्लाऽ 10 276 71000, ५0 ०0१ 85 0 अणी 200 एध 
10106 7607016 351८ णिः 06४ (17088 ण" गऽ 51006 15 10 ५6 ८80 
, 02 ज रशंलताण भा ल्ल ०णा$ गल एल 78$€त 1, {106 
01801 5॥्ल्शः 0 105 ए6ा6€०८६ 185 ००६ 27006€ग€्तं 9 ०186685 9 
{18 णाल ९०५10 ४७ 10611066 ४४ हप०ढण। 7260016 णप्ा हष्टम 
0106. 


परार्थे यः पीडामनुभवति भद्धेऽपि' मधुरो ` 
यदीयः सर्वेषामिह खलु विकारोऽप्यभिमतः । 

न सम्प्राप्तो बृद्धि स यदि भलमश््षेत्रपतितः 
किभिक्षोर्दोषोऽयं न पुनरगुणाया मरुभुवः ॥५३।। 


यः {इक्षुः परार्थे पीडाम्‌ भ्रनुभवति, भ ङ्केऽपि मधुरः (भवति) इह 
यदीयः विकारः खलु सर्वेषाम्‌ श्रपि अभिमतः (भवति) यदि नखम्‌ 
भरक्षेत्रपतितः स वुद्धि न सम्प्राप्तः (तहि) किम्‌ श्रयम्‌ इक्षोः दोषः पुनः 
प्रगुणाया मरुगुवः (दोषः) न ? 


सुजनः खलमाध्नित्य न प्रवधत इत्याह-पर।थं इति । य इश्ुजनोऽपि भ्रती- 
यते । परार्थं परप्रथोजनाय पीडां यन्त्रादिकृतं मर्दनम्‌ । अन्यत्र बाघां चानुभवति । 
छेदे सत्यपि खाद्यमानोऽपीव्यर्थः । मधुरो माघुयंवान्‌ । भ्रन्यत्र विनयादिगुण- 
वांड्च । इह लोके । यदीय इक्षुसम्बन्धी विकारः गुडरकं प्रभृतिः । सवंषाम- 
भिमतः मिष्टो भवति श्रन्यत्र विकारो मनोविङेतिः क्रोघादिः 1 स इक्षुरक्षे्रपतितः 
भ्रकषेत्रपत्िततमूषरादिस्थानम्‌ पतितः प्राप्तः। निजसदशां स्वोचितां इद्धिमौन्नत्यं 
` न सम्प्राप्तो न गत इति यावत्‌ । भ्रसाविक्षोदषिः कि नेत्यर्थः। पनः किन्तु स 
दोषोऽगुणाया मरुमूवः सम्बन्धी भवति । आश्रयदोषा भआश्रितेषु प्रसज्जन्तीति 
भावः । | 


जो दूसरों केलिए पीड़ा सहन करता दै, तोदधे जाने पर भी मीठा रहता दै, 
जिसका गुड, शक्कर श्रादि विक्रार (जनी हई ची) भी लोगों को पसन्द त्राता 


1. अ ष, मः, भङ्गेष्‌ [स , 
2. ब, क, म; वुद्धि यदि भृशमसत्क्ेत्रह 
3. ककः; दोषोसोमणह्‌ 


(-0 9118511 9116|.118॥ [ 0511/.11801 (0166101. 1011260 0४ 6810011 


६२  भल्लटशतकम्‌ 


है बह गन्ना यदि श्रस्यधिक्ुरे खेतर्मे. पदकर बढ़ता नददींहैतो क्या गन्नेका 
दोष है, श्रौर निगुण ऊसरभूमि का दोष नदीं है १ 


यह इलोक श्रानन्दवर्घन की प्रसिद्ध रचना ध्वन्यालोक (1,14 इत्तिभाग ) 
मे भी मिलता है। यहां इक्षु कौ जो विशेषतायं बतलाई ह, वही विशेषतां 
रलेष के दारा सज्जन भे भी प्रतीत होती ह । सज्जन भी द्सरों के लिए कष्र 
सहता है (पीडामनुभवति) भङ्खेऽपि मघुरः--ग्रपमान होने पर भी मधुरभाषी 
वना रहता है । उसका क्रोधादि विकार भी सवको अच्छा लगता है । श्रक्षेत्र- 
पतित-श्रपने पद के भ्रनुरूप स्थान न मिलने पर उसको पदद्टद्धि नहीं होती । 
भ्रगणायाः मरुभुवः का अथं निगृण स्वामी है। इस प्रकार इस श्लोक मे इक्षु- 
परक रौर सज्जनपरक दो भ्रं होने के कारण इलेषालङ्कार दै। भङ्कंऽपि 
मघुरः तथा विकारोऽप्यमितः में विरो कौ प्रतीति होनेसे विरोधाभास श्रलद्भुार 
है । यहां प्रस्तुत इकुत्तान्त से श्रभरस्तुत सज्जनट्त्तान्त कौ प्रतीति समान गुणों 
के कारणं हो रही है, इस कारण यहां समात्समा ग्रप्रस्तुतप्रदंसा अलङ्कार है। 


116 50६8176876€ 7160 06दाऽ 0051118 5ए001€8570 0 ४06 
8१८6 01165, + 06 (€ श15 5४/८९८1८58 €*€ा) गीला 06108 लप, 
९08€ तदणि210 101 {€ 01 ग 72४ 518€ा 15 1611516 ०५४ 21, 
1 ऽ0८ौ > प्हला616€ 6001 ०0६ &70# € 10 1८5 06108 307 07 2 
एभ्य 18700, ५/2ऽ 102६ ६1८ विणा† > ऽप्र४६ ८४०6६ 27 101 {१४६ म (०८ 
01111685 068€{ ? 


प्राज्राः कि फलभारनञ्रशिरसो रम्या किमूष्मच्छिदः 
सच्छायाः कदलीद्रुमाः सुरभयः कि पुष्पिताइचम्पकाः। 
एतास्ता निरवग्रहोग्रकरभोल्लीढार्धरूढाः' पुनः 
शम्यो भ्राम्यसि मूढ निम॑रुति कि भिथ्येव मतुं मरौ ॥५४॥ 


इह कि फलभारनस्रशिरसः रम्या आभ्राः (सन्ति) ? किम्‌ 
उष्मच्छिदः सच्छायाः कदलीद्रमाः (सन्ति) ? कि पुष्पिताः सुरभयः 
चम्पकाः (सन्ति) पनः एताः ताः निरवग्रहोग्रकरभोल्लीढाघेरूढाः 
शम्यः (सन्ति हे) मूढ ! निर्मरुति मरौ मतु मिथ्यैव कि भ्राम्यसि ? 


दातारं परित्यज्य सुब्ं यस्तेवते तं प्रत्याह-श्रा्नाः किमिति! हे मूढ इह 


1. क, द; भोत्लीडाः प्ररूढा पुनः भ; भोल्लीढावरूदधाः पुनः मः 


((-0 9118511। 51164118 1 0511.181। 01661100. 01411260 0 66810011 


„| „ब कि - 


भत्वटकश्षतकम्‌ ६१ 


तरवः फलभारनश्रशिरसः फलानां भारेण गौरवेण नभ्ररिरसः श्रवनताग्राः । 
भरन्त एव रम्या मनोहरा चूतहुमाः किम्‌ नेवेत्यर्थः । सच्छायाः छायायुक्ताः 
उष्णच्छिदः सन्तापहारिणः । कदलीद्रुमाः कि रम्भातरवः किमित्यर्थः । 
क दलीवारणबुसा रम्भामोचांशुमत्फला इत्यमरः । श्रथवा पुष्पिताः सञ्जातपृष्पाः। 
भ्रतएव सुरभयः सौरम्यवन्तः । चम्पका हैमपुष्परक्षाः । किमित्यत्र काकुः । पुनः 
किन्तु निरवग्रहोग्रक रभोत्लीढग्ररूढाः । निरवग्रहाः निष्प्रतिवन्धाः भ्रतएव 
उग्रास्तीक्ष्णदृत्तयः ये करभा उषाः तंर्लीढा भक्षिताः ततोऽर्धर्डा भ्रङ्कूरिताः। 
भ्र्धपल्लवास्ताः एताः परिहश्यमानाः शम्यः शमीतरवः । तस्मानिनिर्मरुति वायु- 
सञ्चाररहिते मरौ निजंलस्थले मिथ्यैव वृथा मत्तं देहमोक्षायैव कि किमर्थ 
भ्राम्यसि सञ्चरसि ? मरुसञ्चारस्य मरणमेव फलं स्यादित्यथ । भ्रलाभे देशे 
वत्तंमानः पुरुषो मूढ इति भावः। 


क्या यददो फलों के भार से मुके श्रग्रभाग वाले सुन्दर श्राम के पेद! 
व्या यहां गर्मी को दूर करने बाले घनी छया बले केले के पेद़ है १ क्या यहाँ 
सुगन्धित खिले हुए चम्पक ह १ (इनमें से य को$ मी चीक्ञ नदींदै) येतो 
वट स्वच्छन्द उदण्ड ऊंटो दारा चबाए श्राव उठे हुए शमी के पेद है । श्ररे 
मूखे | क्यों इस वायुरहित मरस्थल मे मरने को धुम रदे हो १ 


यहां प्रस्तुत श्राग्रकदली चम्पके शमी इक्षत्तान्त से श्रप्रस्तुत दानशील 
भ्यक्ति एवं कृपणडत्तान्त की प्रतीति होने से श्रप्रस्तुतप्रशंसा श्रलङ्कार है । 


0 001, ५५०४ अ€ ४०४ ्िपीतल्ञ$ #87वलयाणह ॥0 ०16 10 {05 
0०९56 ५€४०८ ग 17 ? 76 ¶ला€ 79780 ४८€ऽ एला+ 0 [नष्तं 
{णाऽ ? 416 {7€ा€ 1611 02721728 {7665 18४18 66056 5308065 छथ. 
0118 07 176 11681 ? 476 0ला€ {द्धा एन्ड०)5ऽ ग 62717818 
17665 ? (41 {0656 ®€ 70६ 1० ४८ गणपत लद). वल € 276 एथ 
2707) 58101 {1९65 011४ ००६५८ $ पालित €व46[,. 


श्राजन्मनः कुशलमण्वपि रे कुजन्मन्‌ 
पांसो त्वया यदि कृतं वद ततु त्वमेव । 
उत्थापितोऽस्यन'लसारथिना यदर्थं 
दुष्टेन तत्कर कल्य विदवमेतत्‌ ।५५॥ 


अ, कफ, म, भप्यणृ ह 
अ, क, ह्‌; ह्यनल मः 
हु; तुष्टेन अ,क, मः 


~ 


((-0 9118511। 51164118 1 05111.181। 01661100. 01011260 0 66810011 


६ भल्लटशतकम्‌ 


रे कुजन्मन्‌ पांसो ! भ्राजन्मनः अणु श्रपि कुशलं यदि त्वया कृतं 
तत्‌ त्वमेव वद । (त्वम्‌) दृष्टेन ग्रनलसारथिना यदथंम्‌ उत्थापितः भ्रसि 
तत्‌ कुर, एतत्‌ विश्वं कलङ्कय । 


दुर्जनान्तरगरेरितो दुर्जनः सकलमपि क्लेरयतीत्याह-- श्राजन्मन इति ! को- 
भूमिः सकाशात्‌ जन्म यस्य स कुजन्मा । कुः व्यधिकरणे वहूत्रीहिः तस्य सम्बुद्धिः 
रे कुजन्मन्‌ भ्रन्यत्र भो दुष्कुलीन । रे इति हीनसम्बोधने रे पांसो रजस्त्वया । 
भ्राजन्मनो जन्मनः प्रभृति । भ्राजन्मन इति भिन्नं पदम्‌ श्रन्यथा भ्राजन्मेति 
स्यात्‌ । श्रणु भ्रल्पमपि । कुशलं क्षेमम्‌ उपकारमिति यावत्‌ । कृतं यदि इतं 
चेत्‌ तर्हि तत्त्वं सत्यमेव वद कथय । दुष्टेनानुपकारिणाऽनलसारथिना । यदर्थं- 
यस्म प्रयोजनाय । उत्थापितम्‌ ऊर्ध्वं प्रापितम्‌ । श्रन्यत्र प्रेरितम्‌ । श्रसि तत्कार्यं 
कुरु । तदेवाह-एतद्विश्वं जगत्‌ । कलङ्कय मलिनीकु र । कल ्भुराब्दात्तत्करो- 
तीति ण्यन्ताल्लोट्‌ अन्यत्र कलङ्कय दोषमुत्पादय । 


श्री कुजन्मा धूल ! जन्म लेकर तूने यदि लेशमात्र मी कोई श्रच्छा काम 
क्रियाहो तो बताश्रो | जिस प्रयोजन से दुष्ट वायुने व्ह उठाया दहै उसे पूरा 
करो। इस सारे संसार को मेला कर दो। 


यहाँ प्रस्तुत ` वाच्य पासुदरत्तान्त से भ्रप्रस्तुत श्रनुपकारी द्जेनरत्तान्त की 
प्रतीति होने से श्रप्रस्तुतप्रदांसा है । सारे विश्व को कलद्धत करनेके कायं का 
हेतु वायु दवारा उत्थापन को वताने के कारण यहां काव्यलिद्धभीरह। 


0 10५ 0070 6४७५६ 1 ल्‌] € 1 #०प्र 0४५९, €श्लाः 51066 छपा 
01710, ६५607101150€व 9$ 26६ ० 2००५०९85. ६010 प्ा€ 701४८ 110 


11100 176 कालत्वं ग7125 12186त ४० 0180 2710 एगाप+€ 16 7016 
0710. | 


निस्साराः सुतरां लघुप्रकृततयो योग्या न कायं क्वचि- 
च्छुष्यन्तोऽच्'जरत्तृणाद्यवयवाः प्राप्ताः स्वतन्त्रेण ये। 
भ्रन्तःसारपराङ्मूुखेन धिगहो ते मारूतेनामुना 
परयात्यन्तचलेन सदयः महतामाकाशमा रोपिता ।। ५६, 
ग्रहोधिक्‌ पश्य, अथ निस्सारः सुतरां लघु प्रकृतयः क्वचितु कार्यं 


1, क, भा; सोज्जनभ्र, ह 
2, श्र,क) दु; षत्मंमः 


((-0 9118511। 51164118 1 05111.181। 01661100. 01411260 0 66810011 


भत्लटसछकम्‌ ६१ 


न योग्याः शुष्यन्तः, जरत्तणायवयवाः ये (रेणवः) प्राप्ताः, ते स्वतन्त्रेण 
भ्रत्यन्तचलेन भ्रन्तःसारपराङ्मुखेन श्रमुना मारुतेन महतां सद्य 
आकाचम्‌ भ्रारोपिताः। | 


निरगणानेव निविवेकाः समृत्फषयन्तीत्याह-निस्सारास्सुतरामिति । ये 
रेणवो नीचादच प्रतीयन्ते । सुतरा मत्थ्थं निस्सारा दुवेलाः ! प्रतएव लघुप्रकृतय. 
तुच्छस्वभावाः । श्रतएव क्वचिदपि कर्यं तरिवगेसाघनादौ न योग्या अनर्हाः 
शुष्यन्त ॒भ्रद्रवा विनयादिसाररहिताइच प्रतीयन्ते । जरत्तृणायवयवाः जी्णे- 
तृण।दिसहचरिताः । श्रन्यत्न तुच्छजनसम्बन्धास्ते रेणवः । भ्रन्तस्सारेषु पवता- 
दिषु प्रबलेषु च । पराङ्मुखेन निटत्तेन स्वतन्त्रेणानन्याधीनेन । भ्यन्तं नितरां 
चलेन चञ्चलस्वभावेनासमूना मारुतेन वायुना । महतां सूर्यादीनां सदम मार्गमा- 
कारामिति यावत्‌ । भ्रारोपिताः प्रापिता इति यत्‌ तत्‌ धिक्‌ । भर्टो श्राइचयेम्‌ । 
पश्य श्रवलोकय । पर्येति लोकः सम्बुध्यते 1 श्रतीव निगुणप्रकृतिकस्य वादस्थानं 
सवस्याप्युद्रेगकरं भवतीति भावः । 


प्रदहो धिक्कार दै देखो; श्राज सारहीन, श्रत्यन्त नीच स्वभाव वाले, कीं 
भी काम न श्राने वलि, सुखे, जीणे शीण तिनको ्रादि से युक्त जो धूलिकण 
मिलते उनको (ही) निरङ्कुशः श्रत्यन्त चञ्चल श्रौर भीतरी गुणों से विमुख रदने 
वाले (श्र्थात्‌ गुणों को न प्टचानने वाले) इस वायु ने महान्‌ ज्योतियों के 
निवासस्थान श्राकाश तक पर्हुचा दिया है । 
यहां भ्रप्रस्तुत वायुपासुदृत्तान्त से प्रस्तुत नीचजनसमुत्कषेकस्वामि- 
हृत्तान्त की प्रतीति होने से समात्समा भ्रप्रस्तुतप्रशंसालद्ार है । 
1.00, 11 1§ > 702 9 (€ ८०५४४ (081 "06 रका 16६88, 620 
प्ल €5ऽऽ, 41166 ५८५४ ए8पध्८€§ स 5125 616, 0०8४९ 0९ 18 लयो 


४7000 {16 81८४, (€ 2800८ ग ९7681 [प्ण968, 0४ (075 €ण्ला 7009108 
२2०१068६ 917 06०61६0 110 100 ला5, 


ये जात्या लघवः सदव गणनां याता न ये कुत्रचित्‌ 
पद्धूयामेव विमदिताः प्रतिदिनं भूमौ निलीनाद्चविरम्‌ः । 

उल्क्षप्नाश्चपलादायेन मरुता पदयान्तरिक्षेऽधुना 
तुङ्खानामुपरिस्थितिः क्षितिभृतां" कु्वन्त्यमी पांसवः ॥ ५७॥ 


1. अ, क, हु; निलीनाश्व ये मः 
2. क, मः, (0 स्थितं ध 
3, क, मः; वितिभुजां घ, द्‌ 


((-0 9118511। 51164118 1 05111.181। 01661100. 01411260 0 66810011 


६९ भल्लटशषतकम्‌ 


:ःयेःजात्या लघवः; ये सदंवे कुत्रचित्‌ अपि गणनां न याताये पदुभ्यां 
विमिताः; ये प्रतिदिनं भूमौ चिरं विलीनाः, पश्य, चपलाशयेन मरुता 
` श्रन्तरिक्षे उल्क्षप्ताः (ते) भ्रमी पांसवः तुङद्धानां क्षितिश्रृताम्‌ उपरि 
स्थिति कुवन्ति । . . 


 कैनचिन्मन्देनोत्कषंमापन्ना नीचा महतोऽपि अ्रभिभवन्तीत्याह -ये जात्या 
लंघव इति । ये पांसवो जात्या स्वभावेन जन्मना लघवः परमाणुरूपाः इत्यथः । 
जातिः सामान्यजन्मनोरित्यमरः भ्रन्यत्र जत्या लघवः ग्रकरूलीनाः सदैव स्वेदा । 
क्वचिदपि काये गणनाम्‌ । इदमनेन सेत्स्यति तदनेन भाव्यमिति संङ्ख्याविषयत्वं 
त याताः न प्राप्ताः । प्रतिदिनं नित्यम्‌ । पद्यां चरणाभ्यां विमदिता ्रधिष्ठिताः। 
भ्रन्यते नीचतया पादेन निरस्ता इत्यर्थः । चिरं भूमौ निलीना श्नन्यत्र नामाव- 
शिष्टाः । ततदच चपलाशयेन चपलस्वभावेन मरुता वायुना ्रनेनेदानीमन्तरिक्ष 
गगनतले । उरिक्षप्ताः प्रसारिताः सन्तः । श्रमी पांसवो रेणवः क्षुद्राश्च ध्वन्यन्ते | 
तुङ्खानामुन्नताना क्षितिभृतां पर्वेतानम्‌ । राज्ञासुपरध्वं स्थितिमवस्थानं कुर्वन्ति । 
परयावलोकय । पश्येति लोकः सम्बोध्यते । न किमप्यस्ति दुरात्मनामलङ्घ्यमिति 


भ्रावः | 


इस चञ्चलद्टदय वायु ने जाति से नीचः कमी किसी गिनती मे न आने 
वाले, पैरो से. कुचे गये, प्रतिदिन भूमि मेँ छिपे रहने बालि धूलिकणों को ऊपर 
दैक दिया श्रौर देखो त्रच उन्होनि श्रकाश मे ऊँचे पहाड़ों पर श्रपना स्थान 
नना लिया है। 


यहा श्र्रस्तुत धूलिपवंतटृत्तान्त से प्रस्तुत भाग्यवश राजा की कृपा पर 
श्राध्रित रहमै वाले क्षद्र व्यक्तियों के इृत्तान्त कौ प्रतीति होने से भ्रप्रस्तुतप्रशंसा 
प्रलङ्कार दै । धूलिकणों भे जाति से लघु होना, परों से विमदित होना तथा 
घाय्‌ से फँके जाने जैसे साभिप्राय विदोषणों के होने से परिकर श्रलद्कार है। 


 ¶16 9811८ ४४111 185 11060 ए {€ ००5१ 21110165, 10०५ 171 हट), 


17011८62 016, {0०-04व भातं ३1५५295 ततल णाल 610, 16 
11 7181 ऽ 200 ग, (<€ ॥2४€ 0न्लप्व > 05101 मा {6 
{003 ग 17€ 100प्रा{शाऽ, 


((-0 9118511। 51164118 1 05111.1811। 01661100. 01411260 0 66810011 


[नन 


भत्लटशषतकम्‌ ६७ 


रेः दन्दशूक यद योग्यमपीशवरस्त्वां 
 वात्सत्यतौः नयति तरुपुरधाम सत्यम्‌ । 
प्रावजिता“लिकुलभंकृतिमूच्छितानि 

कि शिद्खितानिः भवतः° क्षममेव कर्तुम्‌" ॥५८॥ 


रे दन्दशूक ! सत्यम्‌, यत्‌ ईइवरः भ्रयोग्यम्‌ भ्रपि त्वाम्‌ वात्सल्यतः 
नपुरधाम नयति । (किन्तु) इयता भरावजितालिकुलभङ्कृतिमूच्छितानि 
शिल्जितानि कत्‌ कि भवतः क्षममेव ? 


महता प्रभुणा विद्रत्समसवेन सम्मानितोऽप्यज्ञः विद्वानिव वक्तुं न रक्नोती- 
त्याह-रे दन्दशूक इति । रे दन्दशूक भोः सपं दुष्टोऽपि ध्वन्यते । ईइवरस्त्रिलो- 
चनः। यत्‌ यस्मात्‌ कारणात्‌ 1 श्रावजितं तिरस्कृतम्‌ । अलिकलस्य भृङ्खसमूहस्य । 
भड्कृतिर्मृच्छितम्‌ कद्ारोत्कर्षो यस्तानि तथोक्तानि शिन्जितानि भूषण- 
ध्वनीन्‌ 1 भूषणानां तु दिच्जितमित्यमरः । किन्तु भवतस्तव क्षममेव कि समी- 
चीनमेव किम्‌ ? किशब्दोऽत्रप्रह्मे । प्रभुपरिग्रहेण समृद्धो भवति न विद्धान्‌ वक्ता 
वेति भावः । 


श्रे विषधर सांप ! यह बात तो सच है कि महदेव जी श्रयोग्य होते हुए 
भो उ्दे प्रेम के कारण (ही) नूपुरों के स्थान श्रर्थात्‌ श्रपने चरण॒ मेँ पहनते 
है । (षरन्द) इतने से मौरों के समूहो की सुन्दर भकार की तिरस्कारिणी (मधुर) 
ध्वनि्थो को उत्पन्न करने की कमता क्या श्रापके भीतर है ए 


यहां श्रप्रस्तुत वाच्य सपंमहादेवषटत्तान्त से प्रस्तुत व्यङ्ग्य राजा दारा 
सम्मानित मूखं क इत्तान्त की प्रतीति होने से श्रप्रस्तुतप्रशंसा भलङ्कार है। 
इस शलोक का श्रभिप्राय यह है किं केभी कभी राजा लोग मखं को भी विद्वानों के 
बराबर सम्भानतोदेदेते हैँ किन्तु अवसर भ्राने १२ वह भ्रत्पज्ञ व्यक्ति विद्रानों 


की भाति प्रभावशाली भाषणं नहीं दे पाता) 


1. अ,म ह्‌; देक 

2. ह्‌; तदयोग्यम्‌ अ, क, म 

3. क, हु, वाल्लभ्यतो भ्र, म 

4. म, क, हू; आवतित्तालि भ 

5. फ, मः, हू; भिकित्तानि अ 

6. मः; भवषाम, क, दह्‌ 

7, मः, ह; क्षममेव वक्तुम्‌ अ, क्षमतेऽ्र कर्तम्‌ क 


((-0 9118511। 51164118 1 0511.181। 01661100. 01411260 0 66810011 


६८ भल्लट शतकम्‌ 


0 अनलौ ! णण क्य पणौ 7६ 0 प€ ल्ल ग .०गात 1५2. एणा 
61४2 0८ 10 201 छठा€ शठप 85 2 ल्ल काभ. एप (छण 
० 70816८6 ६16 पषा ऽ0णपते ० अणातिल( छ्लौ ऽप्0855 (16 (17६ 
8०00008 0 ०6६ †? 


मौलौ सन्मणयो ग्रहं गिरिगुहा त्यागित्वमात्मत्वचोः 
निय॑त्नोपनतेडचः वृत्तिरनिलेरेकत्र च्यंदुशी । 
ग्रन्यत्रानूजु वत्मं वाण्डिरसना दशौ विषं दृश्यते 
या दिक्‌" तामनु दीपको ज्वलति भो भोगिचु सखे किन्विदम्‌ 
।। ५६॥ 


भोः सखे भोगिन्‌ । इदं नु किम्‌ ? मौलौ सन्मरयः, गिरिगुहा गृहम्‌, 
ग्राटमत्वचः त्यागित्वम्‌, नियेत्नोपनतंः अनिलः च वृत्तिः- एकत्र ईद्शी 
चर्या । अन्यत्र भ्रनरजु वतमं, द्िरसना वाक्‌, ख्टौ च विषम्‌ हर्यते । या 
दिक्‌ दयते ताम्‌ भ्रनु दीपकः ज्वलति । 


यत्र गुणदोषादच यौगपद्येन दृदयन्ते तं प्रत्याह- मौलौ सन्मणय इति । सखे 
प्राणसम भो भोगिन्‌ है सपं । विषयी च प्रतीयते। मौलौ शिरसि सन्मणयः 
प्रशस्तरत्नानि इयन्त इति शेषः । श्रनैनान्यत्र विवेकित्वं ध्वन्यते । गिरिगुहा 
पवैतगह्वरमेव गृहं मन्दिरम्‌ । भ्ननेन रागित्वमुच्यते । त्यागित्वमौदायं च । 
भ्रात्मत्वचा स्वनिमकिन शरीरचर्मणा । भ्रन्यत्र श्रनेनौदायेप्रकषं उक्तः । 
निर्यलेनानायासेन । उपनतं रागतै रनिलंवायुभिः । टत्तिर्जीवनम्‌ इत्तिवेतन- 
जीवने इत्यमरः क्रियते । श्रन्यत्र न तपोनिष्ठत्वमुच्यते । एकत्र एकस्मिन्‌ पक्षे । 
ईशौ एवंविधा चर्या अ्राचरणं दृश्यते इति वाक्यशेषः । भ्रन्यत्रान्यस्मिन्‌ पन्ने । 
अनृजु कुटिलं वतमं भागः गतिरिति यावत्‌ । श्रनेन वक्रशीलतोक्ता । वाग्बाण्यपि 
द्विरसनाद्‌ द्विजिह्वा भवति भ्रनैनासत्यवादित्वमुच्यते । किंञ्च ष्टौ चक्षुषि विषं 
गरलं दृश्यते । श्रनेनासूयाविष्कृतोच्यते तदेवोपपादयति-या दिक्‌ भवताऽ 
हश्यते तां दिशमनुलक्षीकृत्य दीपको भ्रग्निज्वेलति प्रकाशते । भ्रनेन हिस्तत्व- 
मुच्यते । इदं परस्परविरुद्धं चेष्टितम्‌ । किन्तु कीटशमनुत्तितमित्य्थंः । दुष्ट- 
चेष्टितं केनापीदम्‌ । यो न ज्ञातु राक्यत इति भावः । 


, अ, मः, हू; त्यागः किलात्मस्वचो क 
, मह्‌; . . . नतैः स्ववृत्तिर० अ, फ 
, मः,ह्‌;ःयादृक ब,क 
, मः; भगवताद्‌ 


> ६9 (49 ।् 


((-0 9118511। 51164118 1 0511.1811। 01661100. 01411260 0 66810011 


५० 


भल्लटंशतंकर्म्‌ ६६ 


मरे मित्र सोप! निश्चय दी यह क्या वात है १ (तम्दारे) मस्तक पर भेष्ठ 
मणियोँ ई, पवेत की गुफा तुम्हारा धर है, श्रपनी त्वचा (कँचुली) का (ठुम) 
परित्याग करते दो श्रौर बिना किसी प्रयत्न से प्राप्त हवाश्रों से ठम अपना 
जीवन चलति दो-एक शरोर तो वुम्हारा एसा (प्रशंसनीय) श्राचरण दै 
परन्तु दुसरी श्रोर तुम्हारी कुटिल चाल दै, दो जीभ ई श्रोर वुम्दारी श्रंख में 
जहर है । जिस दिशा की ओ्रोर वम देखते हदो उषोमें दीया जल जाता है श्र्थात्‌ 
शग लग जाती है। 


यहाँ श्रप्रस्तुत वाच्य सपंटृत्तान्त से प्रस्तुत व्यङ्ग्य गुण भ्रौर दोष दोनो से 
ही समान रूप भें समन्वित, किसी विषयासक्त उच्च व्यक्ति की प्रतीति होनेसे 
भ्रप्रस्तुतप्रशंसा घ्रलङ्कार है । भोगी, द्विरसना ओर श्रात्मत्वचः मे शब्दशक्तिमुलक 
ध्वनि ह । परस्पर विरोधी गुणो का एक ही स्थान में सल्निवे्ञ होने के कारण 
विषमालद्कार भीदहै। 


^ {धत 512८6 { ५72६ 15 {715 10०५666 ? ©0 ०06 0806 $०प 
02५6 ऽप्लौ 2 &००५ तकल, $०प 02५८ 169४न§ 00 $०४८0006, 
0४ 11४८ 10 1111# 68५८, %०् 6851 ० तणाः 57, भण 11४८ ० 81 
+016॥ 15 ०0906 106 प्८ ००$ द एण 9 € ०7 02०५ 
४0 126 €7001:८0 &81६, 3९९० शश्र त०णणि (0ाष्ण<, 70150 11 
४07 6४६8 204 2 एणा [हा 7 € वा्ल्ला०ण 10 +ल इण 566. 


कल्लोलवेद्धितहषत्परुषप्रहारं- 
रत्नान्यमूनि मकरालयः मावमंस्थाः । 

कि कौस्तुभेन विहितो भवतो ननाम ` 
याच्जाप्रस्रारितकरः पुरुषोत्तमोऽपि ॥६०।। 


हे मकरालय ! कल्लोलवेट्लितदुषत्परषप्रहारः भमूनि रत्नानि मा 
ग्रवमंस्थाः । कि नाम कौस्तुभेन पुरुषोत्तमः श्रपि भवतः याच्जा- 
प्रसारितकरः न विहितः । 


यत्‌ प्रभूर्दूष्सङ्खवरेन दुम त्यानिव मान्यानप्यवमानयति तदुविडम्बनायाह- 
कल्लोलेति । हे मकरालय समद्र ! भ्रनेन दुष्परिवेष्ठितो दृष्प्रभरपि प्रतीयते । 
कल्लोलेरूमिभिस्तर ङ्कः वेल्लितारचलिता दृषदः पाषाणाः ताभियये परुषा 


1. अ, क, भः; मकराकरदह्‌ 


((-0 9118511। 51164118 1 05111.1811। 01661100. 01011260 0 66810011 





५1 भत्लट णतकम्‌ 


निष्टुराः प्रहाराः भ्रभिषातानि तैः करणैः । श्रमूनि रत्नानि मरकतादीनि माव 
मंस्थाः मा तिरस्कुर मन्यते कतरि लुड्‌ । तद्धेतुमाह- पुरुषोत्तमोऽपि विष्णुरपि 
सुजनोऽपि प्रतीयते । पुरुषेपत्तमः पुरुषोत्तमः । सक्चमीसमासः । श्रन्यथा सन्मह- 
दित्यादिना समासेऽपि उत्तमपुरुष इति स्यात्‌ । कौस्तुभेन मणिविरेषेण हेठुना 
भवतः तव । याच््ाप्रसारितकरः याच्जया प्रसारितः प्रसृतः करो हस्तौ येन 
स तथोक्तः । न विहितो नाम किम्‌ ? किमिति काकुः नामेति प्रसिद्धौ । विरहितः 
कृत एवेत्यथः । महद्भिरपि माननीयान्‌ योऽवमन्यते तत्‌ धिगिति भावः।" 


अरे समुद्र | इन रलो को लदरो से पटके गये पत्थरों के कटोर प्रहाय से 
ग्रपमानित मत करो | निश्चय ही क्या कौस्तुम मशि ने पुरषोत्तम विष्णु 
भगवान्‌ को ग्रापके ग्रागे मांगने के लिए हाथ पसारे खड नहीं कर दिया दै ! 
ट शस्त वाच्य पत्थरों के प्रहार से पीडित रत्नद्ृतान्त से प्रस्तुत 
व्यङ्ग्य दषो से प्रपीडित मान्य व्यक्तियों के इत्तान्त की प्रतीति होने से ब्रप्रस्तुत 
रसा ब्रलङ्खार ह। तिरस्कारनिषेध रूप कार्यं के लिए पुरुषोत्तम हारा की 


गं याचनाको हेतु बताने से कान्यलिङ्घ अ्रलङ्कारमभीहै। 


0 868 ! [} 1 
64 . 16856 00 101 1050] 1656 [९१५ल]§ ५01 (6 116९8५४ ०1०५५ 


01 3{01165 025६0 0# 11६ १/२४९8. [210 101 {€ [६ कशाऽ018 > 


71216 [070 
06९९9) ? (चप्प शक्ात्‌ एरदठा€ एण पो ऽ[ल॑ता€त्‌ 18708 (४९ + 


पवस्य मुखानि नाम विदितैवास्ते महाप्राणता 

दर्वाः सस्रसवोऽयमतरः कुपिते चिन्तयं यथेदं जगत्‌ । 
दधतम वशं ठु चरितं शेषस्य येनापिशसा 

भानमृज्येवः निवत्तिता निषधरज्ञातेयदुव तिता" ॥६१। 


नरस्य मुखानि 
%द्‌र्वाः श्रयं सतप्रसव 


त्रलो 


भूयांसि नाम, महाप्राणता विदिता एव शरास्ते । 
„ भ्व कुपिते इदं जगत्‌ चिन्त्यं यथा (स्थाद्‌ 

" ह; मः में भावः परिव्यक्त 
° मः 3 सतप्रसवोऽपि यत्न म्म 
" भ, क, ह; यथैकं मः ` 
` 9, हु; येनास्य क, म 

= कृ। मा, ह; ्ो्मृष्ैव ज्ञ 
` म; दुवंणिका ह 


क, ह 


+ ६.१ -@0 (2) (2 । 


((-0 ॐ118511। 5116118 1 05114811 01661100. 01411260 0 6810011 








भ्लटशतकम्‌ ७१ 


(इत्थम्‌) शेषस्य ईदृशं चरितं तु व्रैलोक्यादुधतं (जातम्‌ ) । येन सा 
विषधरज्ञातेया दूवत्तिता प्रपि प्रोन्ृज्य इव निवतिता । 


कस्यचिद्‌ गुणाल्यस्य सुजनस्य ललमध्योत्पत्तिनं दोषायेत्याह--भूयास्यस्येति। 
मरस्य शोषस्य नागराजस्य मुखानि वक्त्राणि भूयांसि नाम बहूनि खलु । खनु 
रन्दः प्रसिद्धौ । महा प्राणता महाबलता विदितैव । प्र्यातेवास्ते तिष्ठति सकल- 
महीमहीघरादिवारणादिति भावः । कद्र्वाः कास्यपमुनिपल्याः सका यं 
भूधरणे शिथिलयत्नः स्यात्‌ 1 सत्प्रसवः सदृतयततिः । भ्रव शेषे कुपिते रोषाविष्टे 
सत्ति । इदं जगत्‌ यथा येनापि प्रकारेण चिन्त्यं विमृद्य भवति । `यदाभ्य' भू- 
धारणे शिथिलयत्तः स्यात्तदावष्ठम्भान्त राभावाट्लोकोऽय विनश्येदिति . विचार- 
णीयम्‌ स्यादित्यथेः। येन काररोनास्य रोषस्य । त्रैलोक्याद्भूतं त्रयो लोकास्त 
लोक्यम्‌ । चातुण्यादित्वात्स्वा्थे ष्यञ्‌ । तर त्ैलोक्यस्यादुभृतमाश्चयम्‌ । 
हशमेवंविधं चरितमाचरणं दश्यत इति शेषः । ततु, तस्व कारणात्‌ । 


विषधरज्ञातेयदु्व एिका विषधराणां सपाण ्ञातेया -ज्ञातिगता । क पिज्ञात्यो- 
त्तिः । प्ोतमृज्य संशोध्य निपातिता 


ढेगिति ढक्‌ प्रत्ययः । संव दुवैणिका दुष्क ल 
निःशेषेण अ्रपसारितेत्यथः । = -त्ववलवस्वकुलीनत्वप रोपकारत्वादिबहृगुणाथ- 


त्वाच्छेषस्य सर्कृलोदुभूतंत्वं न दोषायेति भावः । 


निश्चयी इस रोष नाग के बहुत सारे मुख हः इसकी महाबलशालिता 
विख्यात होकर प्रतिष्ठित दी है । यह (सपा की माता) कद्र की श्रेष्ठ सन्तान है । 
इसके करद होने पर (ग्रपनी द्याधारभूता गथिवी के डांवाडोल होने से, य 
ससार शोचनीय सा हो जाता है। (इस प्रकार, शेष नाग का एेखा जीवन तीनों 
लोकों मे विलक्ञण दै । जिस (सरव्ञतावलवत्दि के कारण सप॑जातिगत दुष्ट 
स्वभाव मानों पोंछधकर (धोकर शेष नाग से) बाहर निकल गन दे। 
वन्न किन्तु सवेज्ञता, महासत्वतादि गुणों 
से प्रस्तुत व्यङ्ग्य ग्रकुलीन किन्तु वड 
प्रतीति होने से अस्त प्रशसा 
विद्यमान दुवंत्तितानिवतंन ल्प कायं कै 
मृखानि रादि वावया्हेतु प्रयुक्त हए ई 


+ सर्पजाति मे उः 
स युक्त भ्रभरस्तुत वाच्य ज्ञेषना गवृत्तान्त 
वड़ गुणों से समलंकरत महापुरुष के वृत्तान्त कौ 
प्रलद्कार है। यहाँ अन्तिम पाद मे 
लिए प्रथम तीन पादां में भूर्यासि 
भ्रतः काव्यलिङ्गं श्रलङ्कार भी हं। 


{1€ा€ 276. 8 {11005810 {8668, 115 


शला] (1 ऽप षट 10९ तवा 
101 1८10४ 


गणहा [६207. 116 ५ - 
-0 51185111 5116९181 1 05114811 (0661010. 01411260 0 66810011 
0111 








७९ भल्लटणतकंम्‌ 


16 0710 111 ९618 बाहा; ३]] {ऽ &76811685 0 5658 15 11876110 
17 17766 फग]प8 0 8८८९077 ठ 716] 116 086 71811176 ग 115 878 
7618160 10 ऽ6ाए्ा{5 15 0०101६6] $# &80108160. 


वष समस्त एवेकः इलाध्यः कोऽप्येष वासरः । 
ज =. ~ । ८ € => 
7१ महत्तया नीतोयो न पूर्वे नं चापरः ॥६२॥। 


.समस्त एव वषं कः श्रपि स्वः वास्तरः इलाघ्यः यःन पूवः त च 
भ्रपरः जनः महत्तया नीतः । 


< $लसहचरिताच्चिरकालजीवनादप्यनवचसुलसहचरितमल्पकालजीवितमेव 
भय इत्याह- वषं इति । समस्ते निखिले वे संवत्सरप्रभवादिषष्टिसंवत्सर 
५ ् ष्ठो लोकधात्रयंरो वत्सरे वषमस्त्रियाम्‌ इत्यमरः । एवं कोऽप्यन्यो 
प्राचीनैः ् १८१९ छा र समो दिवस्वासरावित्यमर : । यो वासरः पूव 
माविभिरन्येमहात्मभि -वाबवृन्दरित्यथेः । महत्तया दीर्घतरेण न नीतः । श्रपर- 

अ महत्तया त नयिष्यते । श्रत्पत्वेन न नीतः नविष्यत 


ठुंसन्धानजतितनिरतिशययखा ्धान्महानपि कालोऽल्पः 
प्रतीयत इत्यर्थः । रातज्ञयसुखानुपङ्घान्महानपि का 


सारे ही सालमें श्रनि 
प्रशंसनीय है जितिन तो प्राच 
(तथा) स्वाभिमान क साथ 
४ किसी श्रत्याचारी शास 
का यह्‌ वचन है | दास्ता 
दिवस पर एेसी ही 
दिवस पर जो श्रान 
॥ होगा | श्रथवा प्रसन्न 


वचेनीय श्रनन्द पे परिृशं यह एक ही ठेसा दिन 
् न पूजो ने श्रौरन ही ्र्वाचीन पुरुषों ने गोरव 
ताया हे । 

क के शासन के ग्रन्त होने की शम वेला के समय 
ग्रा क क श्रनन्तर पन्द्रह अ्रगस्त जेसे स्वाधीनता 
न्द नानुभूति होती है । एसा प्रतीत होता है करि रे 
९.9 नरा दे वद हमारे पूवेजों को भी ना पिला 

पाडा सा जीवन दुःख भरे लम्बे जीवन से श्रन्छा 

निरतिशय ग्रान 





ोतपक का वर्णन होन च" है । उदात 
का वणेन होने से यहां उदात्तालङ्कार ह । १ 


` “त्‌ू लाकोत्तर 
े प्रभा ५२ > वहां 
उदात्तालङ्कार होता है । अ या समृद्धि का जहां वर्णन होता है 4€ 


0) 1018 818]६ 08]0]09 0३१ 


1. अ, मः, ह; लोके क 
2 संशोधित, दिनो भ,क, ह्‌; दिनः मः 


1 4 | € 
3 20078] ९१४९1 1 }{ एल्टप्राऽ 0) 0 


` जग् 5118511 5116118 1 05114811 (01661100. 01411260 0 6810011 






^ 








भत्लटशतकम्‌ ६ 


89 85 101 7111160 ०१४३४ 0४ € 


| ५ 1115 ५ 14: 
| 111 116 +*1701€ व्छा अ (00015 ४4 शा9८०11४. 


206 ल† 8710 7100 60016 80 ए 


ग्राबदकृत्रिमसटाजटिलांस भित्ति न 
रारोपितो मृगपतेः पदवीं यदि इवा । 


मत्तेभकुम्भतटपाटनलम्पटस्य 
नादं करिष्यति कथं हरिणा।धपस्य ॥ ६३। 


-स : पदवीम्‌ 
आवद्धकृतिमसटाजटिलांसमित्तिः शवा य धवि 
म्रारोपितः (स्यात्‌ ताहि सः) मतत मकुम्भतदपाटनलम्पटस € 
नादं कथं करिष्यति ‡ 
१ देति । श्राबदढ- 
उ्कृष्रपदारूढोऽपि नीचः स्वभाव न परित्यजतीत्याहं क 
छविमसटाजटिलांसनमितिः आवा सा जटिला सञ्जातजटा 
रूपाभिः सटाभिः स्कन्धरोमभिः वलिता नच्रा शुनको भषकश्च इवा 


सभित्तिः स्वत म तथोक्तः । इवा मषकः 4 
ग्रंसभित्तिः स्कन्धस्थली यस्य स -मारोपितोऽपि तत्र स्थापितोऽपि 


्यादितयमरः । मृगपतेः सहस्य पव न नादं गर्जनं कथं करिष्यति 
मत्तेभकुम्भतटपाटनलस्पटस्य भ्रासकतस्म 44: पितोऽपि मूढो विद्वानिव न 
न कथञ्चिदित्यर्थः । विद्देषारी विद्वरस्थान > १ 


वक्तु शवनोतीति भावः । 


| के पद्‌ पर 
यदि कों पर नकली सय (बड़े बाल) लगा क, भ म निषुण 
बिठा भी दिया जाये तो वहं मत्त दायी के कुर्भस्वस 
शेर का नाद कैसे कर पाएगा! ^ 
यहाँ शरपरस्तुत वाच्य इवमृगप तिता | ५ ४ 

बुद्धिमान्‌ के इत्तान्त की प्रतीति होने से श्रप्रस्तु | 

11 115 5१०10९15, "^ 
8 1101 \*10 


{60 €1€- 





11121685 9 | 
81 1{ {70 116 
© 07 211 {1110164 


18 १०६, शीला एष्1१६ 4. 
14९6 छा {11€ 05100 0 2 1107, १ 
5 (ववा ज आठ पत 0० 
71911 १ 
क "मगा 

1. अ, क, मः; वृत्तिह्‌ 

2. मः; वलितां स ह 

((-0 51851। ऽ116।<18॥ 1 05114801 0661101. 01411260 0 66800011 





` 11 9 


७४ भल्लटकषचकम्‌ 


किमिदमुचितं शुद्धेः रिलिष्टंः स्वपक्षसमुन्नतेः 
फलपरिणतेर्ुक्तं प्राप्तं गणभ्रणयस्य वा । 
क्षणमूपगतः कर्णोपान्तं परस्य पुरः स्थितान्‌ 
विलिख निपतन्क्ररः दूरान्वृरंस निहंसि यत्‌ ॥६४॥ 


(भोः) नृशंस विशिखं । यत्‌ त्वं परस्य कर्णोपान्तं क्षणमुपगत 
दूरात्‌ निपतन्‌ पुरः स्थितान्‌ कूरं निहंसि, किम्‌ इदं रुद्धः उचितम्‌ ? 
कि स्वपक्षसमुन्नतेः दिलष्टम्‌ ? कि फलपरिणतेः युक्तम्‌ ? (किम्‌) 
वा गुण॒प्रणयस्य प्राप्तम्‌ ? 


यः कश्चिद्‌ राजवल्लभः स्वस्य धघनादयभ्रदानेन गुणिनं दोषिणमेवाभिधाय 
तत्कार्यं विनाशयति तद्विडम्बयन्नाह--किमिदमुचितमिति । चृशंसः क्रूरतरः । 
` नृशंसो घातुकः क्रूर इत्यमरः। भो विशिख बाण उभयवेतनोऽपि प्रतीयते । 
परस्य श्रत्यन्तमृख्यस्य च । पर दुरात्यन्तमुख्येष्विति यादवः । कर्णोपान्तं श्रवण- 
समीपं क्षणं मृहतंमुपगतः प्रष्ठः । दूरात्‌ कूरः तीक्ष्णो निष्टुरद्च यथा तथा 
निपतन्नागच्छनु पुरोऽग्रे स्थितान निहंसि बाधस इति यत्‌ इदं शुद्धेः लोहशुदधः 
उचितं कि नेत्य्थः । स्वपक्षसमूत्नतेः स्वपक्षस्य पक्षाणां समुच्नतिर्गुरुता । श्रन्यत्र 
सहायानां च समूश्रतेराधिक्यस्य स्पष्टं व्यक्तं कि नेत्यर्थः फलपरिरतेदशल्यस्यं 
निरितताया केथनाभिदृद्धेरच युक्तमुचितं कि नेत्यर्थः । गुरोन मौर्या प्रणयः 
सम्बन्धस्तस्य । भ्रन्यत्र गुणेषु विनयादिषु प्रणयस्य रनैहस्य प्राप्तं योग्यं 
किमित्यत्रापि ककः । सद्गुखवता स्वगुणानुगुण्येनाचरितन्यमित्य्थः । 
क्वचिद्‌ दृष्यद्‌रदेशादागताद्‌ याचकात्‌ घनादि स्वीकृत्य तस्म धनादिकं दापयति 
न तु समीपरस्थेभ्यः पात्रेम्योऽपीति भावः । 


च्रे करर बाण | जो तुम श्रत्यन्त प्रमुख पुरुष के कान के पास क्ण भर 
मँ पर्हुच कर दर से गिरते हुए सामने ठरे हृष्ट लोगों को निर्दयता के साय 
मारते हो क्या यह तुम्हारी पवित्रता के श्रनुरूप है १ क्या यह श्रपने पक्की 
उन्नति से सम्बद्ध है १ क्या यदह फलपाक के उपयुक्त है (प्र्थात्‌ क्या इसी सूप मे 
लोगों का श्नन्त होना चाहिए) ? श्रौर क्था यह (उनके) गुणो में (श्रौर श्रपनी 
डोरी मेँ) प्रेम रखने के योग्य है १ 
1. क, भः; स्पष्टं अ, ह्‌ 0 


2. अ,क, द; करूरोमः 
२. म, म, हु; भिनत्ति कु 


((-0 9118511। 51164118 1 05111.1811। 01661100. 01411260 0 66810011 


"~" -- -- ~ ------ 


~ 1 "व नि | -"~---- 


भस्लटशतकम्‌ ७५ 


यहा प्राणहरणरूप काये के लिए शुद्धि, स्वपक्चसमुक्षति भ्रादि अ्रनेक 
कारण खलेकपोतन्याय से उपस्थित हौ गये है, भरतः समुच्चय अलङ्कार है । 
ग्रप्रस्तुत वाच्य विरिखड़त्तान्त से प्रस्तुत व्यङ्ग्य दान देने में परनिपुण दानी 
के टत्तान्त की प्रतीति होने से भ्रप्रस्तुतप्रशंसा अ्रलद्भारमभीहै। 


0 लप्र] अ0 र ! 20070द्ला0 11019 2 000६ ६8 {०6 तभ 
ग {06 70051 1710ग 201 1120 214 वददता६ एपणिल्ञञङ$ श्नि कसि 
11€ ६०6 7१7 कणा ग $, ४०0 ०६७०४ 0. 15 1४ एलीप्तण& 
#०णा एषणा ? 15 11 गलत्‌ शशका 106 756 ग एल्गाल प्रिय $०णा 506 
15 1 706 ए९इपाप त ईजा 8615 0715 1६ दप ६० $णण 10९6 7 #€ 
97108 91 {716 ००५५१ 


श्रमी ये हद्यन्ते नचु सुभगरूपाः सफलता 
भवत्येषां यस्य क्षणमूपगतानां विषयताम्‌ । 
निरालोके लोके कथमिदमहो चक्षुरधुना 
समं जातं सर्वेनं सममथवान्यरवयवः ॥६५॥ 


ग्रमी ये सुभगरूपाः (मूखाद्यवयवाः) ननु दृश्यन्ते, यस्य क्षणं 
विषयताम्‌ उपगतानाम्‌ एषां सफलता (भवति) । ग्रहो ! म्रघूना (तद्‌) 
इदं चक्ष.: कथं निरालोके लोके सवः भ्रन्येः ्रवयवेः समं जातम्‌ : अ्रथवा 
(कथं ) समम्‌ न (सन्ति) ? 


सकलजनपरीक्षकोऽपि विद्धान्‌ भ्रज्ञसमाक्रान्तकुग्रामादिनिवासेनादावज्ञसमो 
भवेत्‌ । ततस्तेम्योऽपि निङृष्ठो भवतीत्याह-्रमी य इति । सुभगरूपा मनो- 
हराकाराः दर्शनीया इति यावत्‌ । भमी परि दक््यमाना ये घटादर्थाः श्यन्ते ननु 
परीक्ष्यन्ते हि 1 ननु शब्दः प्रसिद्धौ । यस्य चक्षुषः । क्षणं क्षणमात्रम्‌ । विषयतां 
गोचरतां पुरोर्वा्ित्वमिति यावत्‌ । उपगतानां प्राप्तानाम्‌ । सफलता भवति । यः 
पदार्थः समीचीनोऽपि यदा चक्षुषा समीक्ष्यते स तदानीमेव समीचीन इत्युच्यते । 
इदं चक्षुः । ्रधुना इदानीम्‌ । लोके जगति 1 निरालोके निष्प्रकाशे तमोव्याप्ते 
सति श्रन्यत्र विचाराक्षमे सति । सर्वैरवयवैः करचरणादिभिः। कथं केन प्रकारेण 
समं जातं तुल्यमभूत्‌ । यथा करचरणादिभिः ( निविडा) ' न्धकारके परदेशे चक्षु 
षापि न दद्यत इति समभावो द्र व्यः श्रथवेति पक्षान्तरे । श्रन्य॑रपि करचर- 
शादिभिः समं तुल्यमपि न जातम्‌ 1 इत रावयवानां स्वस्वविषयेषु इत्ति रन्धकारे 


1. म, ह्‌ मँ ही; संशोधित पाठ 


((-0 9118511। 51164118 1 05111.1811। 01661100. 01411260 0 66810011 


अव 


७६ भत्लट॑शंतकम्‌ 


ऽपि नान्येभ्योऽवयवेभ्योऽपि चक्ुषोऽपङ्कष्रस्वं वक्तव्यमिस्यथः । ब्रहो प्राश्चर्यम्‌ । 
येन यत्र कायं स तत्रव पुज्यते नान्यत्रेति भावः । 


ये जो घुन्दर श्राति बाले घयदि पदाथं (ग्र थवा मनुष्यों के हाथ; पेर, 
मुख श्रादि श्रवयव) दिखलाई देते है इन (श्रज्गो) की सफलता जिस (चक्ु) के 
चृणभात्र को विषय होने पर (श्र्थात्‌ दिखलाई देने कै कारण) होती ईै, 
प्राश्चये है किं वह नेत्र इख समय इस प्रकाशदीन संसार मे दुसरे सारे श्रज्खों 
के समान कैसे हो गया दै १ श्रथवा (बाकी श्नज्गों के) समान (मी क्यो) नदी दै! 


भ्रभिप्राय यह है किम्रन्धकार होने पर हाथ, परभ्रादिभ्रवयवोंसेतो काम 
लियाजा सकता है परन्तु आंख जरा भी भ्रपना काम नहीं करपातीटहै। 
यहां श्रपरस्तुत वाच्य चक्षुवतान्त से किसी श्रत्यन्त कुशल महापुरुष निरालोक्‌ 
लोक भ्र्थात्‌ भ्रन्धकार भरे जगत्‌ से विवेकटहीनं स्वामी तथा हस्तादि भ्रवयवों 
से श्रक्षम पुरुष रूप भ्रप्रस्तुत व्यङ्ग्य की प्रतीति होने से ग्रप्रस्तुतप्रशंसा 
ग्रलद्कार दहै । 

{06 (^िपारधिपिा658ऽ 9 गा 10656 एल्डपप्णि लि15 *0160 216 #151016, 
1९5 1 0108 {16 009 ९४८ 97 2 1001601. ० 11 1106 


0110 15 ०९४०५ 01101, 109 11656 €$ €#€ 09 ४€ 0६60 64211264 
17 गलः 0915 0 (16 ००4 01 ,276 201६ 6५८ 6वण2। 16 पा) ? 


प्राहृतेषु विहङ्कमेषु मशको नायान्‌ पूरो वायते 
मध्येवारिधि, वा वसंस्तुणमणिधेत्ते मणीनां सुचम्‌° । 
खद्योतोऽपि न कम्पते प्रचलितुं मध्येऽपि तेजस्विनां 
धिक्पामान्यमचेतनं प्रभुमिवानामृष्टतत्वान्तरम्‌ ॥६६॥ 
विहङ्खमेषु भ्राहूतेषु (सत्यु) पुरः श्रायान्‌ मशकः न वायते । मघ्ये- 
वारिधि वा वसन तृणमणिः मणीनां रुचं धत्तं । तेजस्विनाम्‌ भ्रपि 


मध्ये खयोतः म्रपि प्रचलितुं न कम्पते श्रनामृष्टतत्त्वान्तरम्‌ भ्रचेतनं 
प्रमुम्‌ इव भ्रचेतनं सामान्यम्‌ धिक्‌ । 


यः कशिचिक्निर्गरप्रकृतिर्गणिष्वनुप्रवेशादेव स्वस्य गुणित्वं सेत्स्यति इति 
1. म, मः, हु; मेध्ये वा धुरि वां क; सच्चिन्तामणिःकौस्तुभादिनिकटे काचो मणि- 


स्तिष्ठति मः अतिरिक्त पाठ 
2. अ, क, मः; रुचिम्‌ ह्‌ 


((-0 9118511। 51164118 1 05111.181। 01661100. 01011260 0 66810011 





भत्लटशतकम्‌ ७७ 


मत्वा सजातीयत्वमात्रबलेने व तन्मध्यपातं करोतीत्याह श्राहूतेष्विति ! विहङ्ग 
मेषु हंसादिपक्षिषु श्राहूतेषु भ्राकारितेषु सत्सु मशकोऽप्यायान्‌ भ्रायातेः शतुप्रत्ययः। 
पुरोऽग्रे न वार्यते न निषिष्यते 1 मशकस्यापि पक्षिस्वादिति भावः 1 तृणमणिस्तृण- 
ग्राही करिचदुपलविशेषः। मध्ये वारिधि समुद्रमध्ये पारे मध्ये षष्ठ्या वेति समासः। 
वसन्‌ सन्तिष्ठमानः । मणीनां मरकतादीनां रचि शोभां घत्ते विभति 1 मणित्व- 
सामान्यस्य सम्भवादिति भावः । खद्योतः कीटविशेषः । तेजस्विनां सूर्यादीनां 
मध्ये प्रचरितं न कम्पते न विभेति । तस्मादचेतनं निविवेकम्‌ । भ्रतएवानामृष्- 
तत्त्वान्तरम्‌ श्रनामृष्मविचारितं तत्त्वस्य वस्तुनः स्वरूपस्य भ्रन्तरं भेदो यस्य स 


तथोक्तः । तं प्रम्‌ राजादिभिः (सामा)न्यं समानभावं धिक्‌ । मतिवि्रमेणा- 
यमनेन सटश इति । 


पक्ियों के बुलने पर श्रागे वकर श्राने वाला मच्छर (पक्तधारी होने 
के कारण) नहीं रोका जाता दै! श्रथवा समुद्र के बौच मँ रहने वाला (वच्छ) 
तृणमणि (बहुमूल्य पद्मरागादि) मियो की कान्ति का धारण करता है श्रौर 
देदीप्यमान (सूये, चन्द्रादि) ग्रहोके भी मध्य में जुगनू भी चलते चलते नदी 
कोँपता है। (किसी की भीतरी) विशेषताश्रों के मर्मको न खुमभने बाले जड 
(मूख) राजा के समान इस जङ्‌ सामान्यधमे (जातिमात्र) को धिक्कार हे | 


यहा भ्रप्र स्तुत वाच्य मराकादि तथा भ्रचेतन सामान्यदृत्तान्त से प्रस्तुत 
व्यङ्ग्य गण भ्रौर विरदोषताश्रो को पहचानने मे श्रसमर्थं मूखं राजा के इत्तान्त 
की प्रतीति होने से श्रप्रस्तुतप्रशंसा है । भ्रनामृष्तत्त्वान्तरं प्रभुमिव० में 
उपमान, उपमेय, वाचक शब्द तथा सामान्यधमं होने से पूर्णोपमा है । 


1 {€ 7005० 6०068 1 {011 0€7 106 0705 276 62116, 1४18 
7101 910९0 °. व1€ 5112-6] ८७08 15106 11€ ऽय व धा05 € 
18412106 2 868 16५८8. वा11€ हठ शला 15 ००६ शकितं ज 00008 
10 {1€ 701065६ ग [[पा17197165., 51€ ०0 {€ (€ना71010 रप्1एण€§ 
५1016 11८ 2 7001151 1018 476 1086051901€ ६0५६705 ॥्ालधा105, 


हेमकारः सुधिये नमोस्तुते 

दुस्तरेषु बहुशः परीक्षितुम्‌ । 

काञ्चनाभरणमरमना समं 
यत्त्वयैवमधिरोप्यते तुलाम्‌ ॥६७॥ 


भ्र) क मग; स्वणेकार म+ द्‌ 


((-0 9118511। 51164118 1 05111.18॥1† 01661100. 01011260 0 66810011 


७८ भल्लटशतकम्‌ 


(है) हेमकार ! सुधिये ते नमः भ्रस्तु यत्‌ एवं दुस्तरेषु बहुशः परी- 
क्षित्‌ त्वया काशनाभरणम्‌ म्ररमना समं तुलाम्‌ म्रधिरोप्यते । 


यो विद्रन्मूखौ समौ पदयति ते प्रत्याह-स्वणांकारेति । हे स्वर्णकार नाडि- 
न्वम ! नाडिन्धमः स्वणेकार इत्यमरः । सुधिये बुद्धिमते तुभ्यं नमोऽस्तु । नमः 
स्वस्तीत्यादिना चतुर्थी । सुधिये नमोऽस्त्विति सोल्लुण्ठनम्‌ । यस्मात्कारणात्‌ 
दुस्तरेषु विवेवतुमशक्येषु विषयेषु वहुशो बहुवारं परीक्षित्‌ विमश्शितुम्‌ बहुशः 
परीक्षित्‌ ` काञ्चनस्याभरणमश्मना तदृगुणहीनेन पाषाणेन समम्‌ 1 स्वया 
कर्त्रा 1 तुलां यन्तरं समत्वच्वाधिरोप्यते। रहेण्येन्तात्‌ कर्मणि लट्‌ । गुरुत्वलयुत्व- 
परीक्षाप्रसङ्गे तेन सहादमानमपि तुलामारोपयसि तस्मादविशेषज्ञाय तुभ्यं 
नमोऽस्त्विति कदिचन्मूढ उपलभ्यते । 


हे सुनार ! बुद्धिमान्‌ द्द (हमारा) नमस्कार (स्वीकार) हो| क्योकि 
कठिन (परीक्ता कै) ्रवसरों पर बहुत बार परीक्ञा लेने के लिए वुम्हारे दयाय 
सोने का श्राभूषण पत्थर के साथ तराजू पर चढ़ाया जाता है। 


यहां नमस्कार रूप कायं का स्वणभूषण भ्रौर पत्थर की परीक्षालेना 
रूप दुस्तर कारण बताया गया है, भ्रतः कान्यलिङ्क श्रलद्भार है। सुनारकी 
यह्‌ स्तुति निन्दा रूप भ परिणत होने से व्याजस्तुति है । हेमकार, काञ्चना- 
भरण तथा अरमा के अ्रप्रस्तुत वाच्यटृत्तान्त से विद्रान्‌ श्रौर मूख को एक 
जसा समभने वाले प्रस्तुत राजा के इत्तान्त की प्रतीति ग्यञ्जनासे होनि के 
कारण यहाँ भ्रप्रस्तुतप्रशंसा श्रलद्धुार मीहे 


0 &0011107 † ०865४०८6 {0 $०४ 156 ्रा9, \110 17 18४ 1270 
16815, ऽ 01 176 0412066 2० गश {5 21018 +1171 {1८ 5100685. 
वृत्त एव स घटोऽन्धक्रुप यस्त्वत्प्रसाद'मपि नेतुमक्षमः। 
मुद्रितं त्वधमचेष्टितं त्वया तन्मुखाम्बुकरिकाः प्रतीच्छता१।६८॥ 

है भन्धक्रुप ! यः त्वत्प्रसादमपि नेतुम्‌ भ्रक्षमः स घटः (रिक्तः) 


वृत्तः एव । (श्रथ च} तन्मुखाम्बुकणिकाः प्रतीच्छता त्वया तु श्रधम- 
चेष्टितं मुद्रितम्‌ । 
1. भ, मः, इः कपक कृ 
2. ब;त्वां प्रसादंक,म), ह्‌ 
3. अ, म, हु; परीप्सता क 


((-0 9118511। 51164118 1 05111.1811। 01661100. 01411260 0 66810011 





भत्लटणतकम्‌ । ७६ 


यः स्वयमसेवाज्ञोऽपि पुनल्‌ज्घादथंमादित्सति स निङ्ृष्रतम इत्याह--इत्त 
एवेति । हे घट हे कलश अज्ञोऽपि प्रतीयते । स्वां कप्रत्ययः । शून्यकूपक एव 
इत्तः सञ्जातः । किञ्च तन्मुखस्य कूपस्य मुखात्‌ सकाशात्‌ । भ्रम्बुकशिकां 
प्रतीच्छता प्रतिजिघृक्षता त्वया 1 श्रधमस्य निकृष्टस्य चेष्टितं पारमूद्रितं 
चिद्धितम्‌ । ममेवैतदसाध।!रणं भवत्विति तत्त्वयाका रीत्यथेः 1 श्रघमः स्वल्प- 
लाभेन परितुष्यति । 


श्ररे (जलरदित) न्धे कूरे | जो वम्दारी (योदी सी जलप्राप्िरूप) पा 
कोभीलेने मं श्रसम्थं रहा वह घटा (तुम्हारे पास से) खाली ही लौट श्राया 
है । उसके मुख पर लगे जलबिन्दुश्रों को भी छीनने की इच्छा करते हुए 
तुमने श्रपनी कुचेष्टा पर मोहर लगा दी दै श्र्थात्‌ तुमने एेखा करके श्रपनी 
नीचता सिद्ध एवं प्रमाणित कर दीदरै। । 


यहां घड़ा पानी प्राप्त करने रूप इष्राप्ति के लिए श्रन्धकूप मे गया है । 

किन्तु वहां उसे अपनी .जलकणिका के छिन जाने खूप अनिघ की प्राप्ति हुई 

दै । श्रतः यहां इष्ाथं के समूद्यम के वाद अनिष्ु की प्राप्ति होने से विषमालङ्कार 

है । यहां भ्रप्रस्तुत वाच्य धटकृपवृत्तान्त से प्रस्तुत व्यङ्ग्य मूखं याचक तथा 
कृपर राजा के वृत्तान्त की प्रतीति होने से श्रप्रस्तुतप्रशंसा है । 

0 011०० था ! एन६ ००९६९1६ 10 &€॥ $०णा ४०पा', 06 ४6७8€1 185 

061 71601160 लवण र ए %1116 17108 10 50816) ३8४ {76 धल 


ए0र1त€5 प्णलौा ला € लता 10 115 पठण, #०ण 18४6 ए & 56ब] 
01 $ €#1 ०९६6०५5. 


तुणमरोमंनुजस्य च तत्त्वतः: किमूभयोविपुलाश्चयतोच्यते। 
तनुतृराग्रलवावयवर्ययोरवसिते ग्रहण प्रतिपादने ॥६६॥ 

तृणमणेः मनुजस्य च उभयोः विपुलाशयता तत्त्वतः किम्‌ उच्यते, 
ययोः ग्रहखभ्रतिपादने तनुतरृणाग्रलवावयवेः भ्रवसिते । 


यो वाल्पमेव दत््वात्मानं इलाघते तावुभौ न प्रशंसनीय वित्याह-- तृणमशणे- 
मनुजस्य चेति । तरणमशोः प्रागुक्तलक्षणस्य मनुजस्यात्पप्रदातुश्चेत्युभयोस्तर्वतो 
याथार्थ्येन 1 विपुलाशयता महामनस्विता 1 कि किमर्थमुच्यते । नेत्यर्थः । तदेवो- 
पपादयत्ति । ययोस्तरणमणिस्वल्पारययोस्तनूतृणाग्रलवावयवैः तनुतृणानां सूक्ष्म- 
तृणानां यान्यग्राणि तेषां ये लवाः शकलास्तेषामेवेकदेशेः करणः ग्रहणे प्रतिपादने 


1. भ, दु; तद्वतः कमः 


((-0 9118511। 51164118 1 05111.1811। 01661100. 01011260 0 66810011 


८० भल्लटशतकम्‌ 


ग्रवसिते समर्पिते भवतः । षो भ्रन्तकमरीत्यस्माद्‌ दतिस्यतिमास्थामिति 
किति इतीत्वम्‌ । तुणमणिरपि तुखलेरमपि गृह्णाति । नीचस्तु मानें वदान्यं 
मन्यते । तस्मात्तयोधषिपुलाशयता श्रनुचितेत्यथः 1 


तृणमणि श्रौर उसके समान मनुष्य--इन दोनो कै उदारता को यथाथ रूप 
म क्या कदा जाए जिन दोनोंकेत्ेन देन छोटे से तिनके के खण्डं के हिस्सों 
के समान सीमित होते रै 


यहाँ तृणमणि भौर मनुष्य के पृथक्‌ पृथक्‌ घमं में प्रिघानगम्य साम्य 
(विम्बभ्रतिविम्बभाव) से निदशेना प्रलङ्कार है 


08६ €870 86 5816 9 (0८ एल भात ग पु 02101 20 2 118 
11६८ 1४ 1056 &10108& 21 2666०४08 9 4012110108 15 1171116 10 {€ 
2 ० 9 591) 179५ ? 


शतपदी संति पादशते क्षमा यदि" न गोष्पदमप्यतिवतितुम्‌ । 
किमियता द्विपदस्य हन्रमतो जलनिधि क्रमणोविवदामहे ।॥७०॥ 


यदि शतपदी पादशते सति गोष्पदम्‌ भ्रपि म्रतिवतित्‌ं न क्षमा (तहि) 
किम्‌ इयता द्विपदस्य हनूमतः जलनिधिक्रमखे विवदामहे । 


महतां कायं स्वसत््वेनेव सम्पद्यते न साधनान्तररित्याह-शतपदीति । 
रातपदी नाम पादरतेनोपेतः कश्चित्‌ कीटविशेषः । पादानां चरणानाम्‌ शते सति 
विद्यमानेऽपि । गोष्पदमपि श्रत्यल्पदेशमप्यतिव तित्‌ लद्धित्‌ न क्षमा न समर्था 
खलु । खलु शब्दः प्रसिद्धौ । इयता एतन्मात्रेण द्िपदस्य पदद्वययुक्तस्य हनूमतो 
म रत्सुतस्य जलनिधिक्रमणे समूद्रल द्घुने विवदामहे विवादं कुमंहे नेत्यर्थः । भ्रत्रायं 
भावः- हनूमता द्विपदेनापि निरतिशयसतत्वसंवलितत्वात्‌ समृद्रीऽपि लद्धितः 1 
रतपदी पाददाशतेऽपि सत्त्वहीनत्वेनाल्पगोष्पदमपि न लद्धतुं शक्नोति इति न 
विवादास्पदमस्तीति । विवदामह्‌ इत्यत्र भासनोपसम्भाषेप्यादिना तङ्‌ । 


यदि कानखजूर सौ पेरो के होने पर गौ के पेर जितने पानी को भी पार नी 
कर सकतातो क्या श्तनेसेष्टी हमदो पेरों बाले नुमान्‌ के समुद्र पार करने 
के सम्बन्ध मे भगदा करं १ 


1. अ, मः, ह्‌; भविक 
2. क, मः, ह्‌; जलेधिविक्षमणे ष 


((-0 9118511। 51164118 1 05111.1811। 01661100. 01411260 0 66810011 


भल्लटशतकम्‌ ८प्‌ 


यहां किमियता विवदामहे" इस काक्‌ से "न विवदामहे' इस श्रथं को प्राप्ति 
होने से काकूवक्रोक्ति प्रलङ्कार है। 


^ €611106त6 118४172 1107107€तव ६6 15 1718016 10 €055 11 
\81€75 ©01181160 11 3 586८ ८0५९7६0 0 8 605 001. 8 0पात €, 
011 {{18{ ३८८०प्रा11, 17081६6 {1115 017६ ०6081201 85 {10 एणा€ाौील€ा प्िाप- 
71871 1412 {५/0 ६६€{† €0परात 0 €०फरात 701 67058 1716 5९8 १? 


न॒गुरुवंशपरिग्रहशोण्डता न च महागुणसङ्खृहणादरः। 
फलविधानकथापि' न मागणे किमिह लुन्धकबालगृहेऽघुना ॥७१॥। 


गुरुवंशपरिग्रहशौण्डता न, महागुणसङ्ग्रहणादरः च न । मागणे 
फल विधानकथापि न (अतः) प्रघूना इह्‌ लुन्धकवालगृहे किम्‌ ? 


लोभ (युक्तो विगत): विवेकश्च न कदाचिदपि सेव्य इत्याह--न गुरू 
वंशेति । लुञ्बकबालगरृहे लुब्धकस्य लोभिनो व्रालस्याज्ञस्य च गहे गरुवंशपरि- 
ग्रहरौण्डता गुरुवंशानां महाकुलप्रसूतानां गणादचानां संग्रहणे सम्पादने 
ग्रादरोऽपि च नास्ति । मार्गणे अ्रथि (जनानां कृते) फलस्यामिलषितार्थस्य 
विधाने सम्पादने कथा वार्तापि नास्ति । तस्मादधूनेदानीमिह लुब्धकसननि- 
धाने किमपि लब्धुं न गक्यते । श्रतोऽपसृत्यातो गन्तव्यमित्यर्थः । श्रन्योऽर्थोपि 
निरूप्यते--लुब्वकवालस्य व्याघवालस्य गृहे मन्दिरे। गुरूणां महतां वंशानां 
परिग्रहे शोौण्डता समथता न, दीर्घाणां गुणानां धनुमर्वीरां संग्रहणे चादरो 
नास्ति । मार्गणे शरे फलविघानस्य शल्यकरणस्य कथापि नास्ति । बालत्वेना- 
समर्थंत्वादिति भावः । तस्मादधुनेह व्याघधबालणरृहै न क्रिमपि प्रयोजनमस्तीति 
क एिचिच्चापार्थी विषीदति । 


उपाचब्रालकपक्ष-- 


न तो बड़े बड़े बोस का संग्रह करने की चतुराईूदहै श्रोरनदही बी बद्ध 
(उत्तम शरणौ की यालम्बी लम्बी) डोरियों के इकटूठे करनेमे ही (इसकी) निष्ठा 
या सचि है; बाण (के श्रग्रभाण) मं (लौह) फलक लगाने कीतो बातमी 
नदीं है (इसलिए) श्रव शिकारी वच्चे के इस घरमे (खहरने का) क्या लाभ 


1. भ्र, क, हु; कथास्तिमः 


2. श्र, ह; किमपिक, मः 
3. संणगोधित 


((-0 9118511। 51164118 1 05114811 01661100. 01011260 0 6681001 


८२ भअत्लटशतकम्‌ 
६९ श्र्थात्‌ कोई फायदा नदीं दै । 


मुर्खदातुपक्ष- 

नतो बडे वंश में उत्पन्न कुलीन परिडतों के ग्रहण करने श्र्थात्‌ श्रपनाने 
का सामथ्यै श्रौरन दी महान्‌ गुणो वले विद्वानों को इकट्ठे करने मेँ श्रद्धा 
है । मांगने पर (धनरूपी) फलप्राम्ति की भी वात तक नदीं है (इसलिए) 
लोमी श्रौर श्रश्ानी रा्नाकै इस धर में (ठहरनेसे) क्यालाभदहै १ श्र्थात्‌ को 
लाम नदीं ६ै। 


यहा किसी चापार्थी श्रौर धनार्थी का विषाद दिलष्ट शब्दों से बताया गया 
है । वंश, गुण, मागं, फल, लुब्धक श्रौर बाल इन अनेकार्थक शब्दों का 
प्रयोग हृश्रा है । इन भ्रनेकार्यक शब्दों का अ्रभिधा द्वारा व्याघवालकपरक भ्र्थं 
नियन्त्रित हो जाने पर व्यञ्जना द्वारा मूर्खदाता से सम्बद्ध दसरा भ्रर्थश्रातादहै, 
भ्रतः यहां शाब्दी व्यञ्जना है । यदि ग्याधवालकटत्तान्त को भ्रप्रस्तुत तथा 
मूर्संदातृरृत्तान्त को प्रस्तुत माने तो र्हा भ्रप्रस्तुतप्रशंसा भी मानी जा सकतीहै । 


व धा€ 1310 ए5€ ग एह 015 06 ग (16 00191 पाला 25 
{7€ा€ 15 10 8770 71206 9 1872€ 0471000, 79 ४56 ग 9 1008 ९०५५ 
81718 8०0 710 1911 ग एप गा [एणा 00101. आणा, 11766 
15 70 ४56 2 8511118 7 ऽ ा& 2६ 11€ 10056 ° {115 00115 
21 &€९0$ €5010. प€ 095 10 811 {6 1६८00126 8 लाऽ० 
2 11811 01110; € 185 ०० 16270 णि 181) 711 भातं {1€76 15 79 
0006 9 2€1{108 27$ {शि ती) पि. 


तनुतृणा ग्रधरतेन हृतश्चिरं कं इव तेन न मौक्तिकशङद्धुया । 
स जलबिन्दुरहो विपरीतद्ग्जगदिदं वयमत्र सचेतनाः ॥७२॥ 


तनुतरृणाग्रधतेन तेन (जलबिन्दुना) कः इव मौव्तिकशद्कुया चिरं न 
हृतः । अहो स जलबिन्दु (्रासीत्‌) श्रहो, इदं जगत्‌ (तु) विपरीतदृक्‌ 
(विद्यते) श्रत्र वयम्‌ (एव) सचेतनाः (स्मः) । 


प्रायेण सर्वोऽपि पदार्थानां स्वरूपं न याथार्थ्येन (जाना)ति यदि कदिचदवेत्ति 
स॒ एव विवेकीत्याह-- तनुतृणाग्रेति । तनुतृणाग्रष्तेन तनुना स्वत्पेन तृणाग्रेण 
धृतः । तेन जलबिन्दुना मौक्तिकशद्कुया मूक्ताभ्रमेण क इव जनश्चिरमत्य्थं हूतः 
समाछ्ृष्टौ न भवति । वृणामग्रस्थित (जलविन्दुना) सर्वस्यापि मौक्तिकभ्रमो 


((-0 9118511। 51164118 1 05111.1811। 01661100. 01411260 0 66810011 





| 


(न 





भत्लटल्तकम्‌ चष 


जायत इत्यथः । इदं जगत्‌ श्रयं लोकः । विपरीतदक्‌ अन्यथाबुद्धि (भेव) ति । 
ग्रहो भाश्चर्थम्‌ । म्र जगति । स तथाविधः तृणाग्रधृतो जलविन्दुनं तनुमौव्तिक- 
मिति ये मन्यन्ते ते वयं सचेतनाः च॑तन्यवन्तः । धीमन्त इति यावत्‌ । भ्रविवे- 
किनः सुलभाः विवेकिनस्तु दुर्लभा इति भावः । 


छोटे से तिनके के श्रग्रभाग पर रिके हुए उस (जलबिन्दु) से मानों कोन 
व्यक्ति मोती के भ्रमसे देर तक नीं श्राकृष्ट श्रा (श्रथवा छल। नदीं गया) । 
वह तो पानी की वंद (थी) । श्राश्चयं है ! यह संखार (तो) उल्टी दृष्टि वाला 
(रै) यदा म (ही) बुद्धिमान्‌ (है) । 


यहां जलबिन्दु भें मौक्तिकबुद्धि (भर्थात्‌ श्रतस्मिनच तदबुद्धि) रूप भ्रान्ति 

होने से भ्रान्तिमान्‌ ब्रलद्ार है । "क इव' मँ उत्प्रेक्षा होने से इन दोनों भ्रलङ्कारों 
का एकाश्रयानूप्रवेश सङ्कर है। 

५110 6186 13 101 फ€८्लार्ट्व 07 & 1008 {1706 ९४ 1018 ऋ 6707 


81161108 {० € {५7 9 2 57211 द 70151 शत0 1 0 ०6 > हला 
५1016 1४ 15 2 070 9 *8॥ल 001४. 115 9010 1005 9 1 006१196 


€ 21016 &6 60056105 (2 115 7691 प्शण्ष्ट) 


बुध्यामहे न बहुधापि विकल्पयन्तः 
कँर्नामिभिव्यंपदिशेम महामतीस्ताच्‌ । 


येषामशेषभरुवनाभरणस्य हेम्न- 
स्तत्त्वं विवेक्तुमुपलाः परमं प्रमाणम्‌ ॥७३॥ 


बहुधा विकल्पयन्तः रपि (वयं) न बुध्यामहे । तानू महामतीन्‌ कः 
नामभिः व्यपदिशेम, येषां (कृते) ब्रशेषथुवनाभरणस्य हेम्नः तत्त्वं 
विषेक्तुम्‌ उपलाः परमं रमाणं विते । 


ये वस्तुस्वरूपं परिज्ञातुम्‌ श्रसमर्थास्तानि परमुखेन विष्वसन्ति तदुपालम्भ- 
नायाह्‌-बुध्यामह इति । बहुधा नानाप्रकारेण । विकल्पयन्तो विचारयन्तः । 
श्रपि (न बुध्यामहे) तत्स्वरूपं तत्त्वतो न विद इत्यथः बुध्यतेदेवादिकातु कतरि 
लट्‌ । महामतीन्‌ कुशाग्रबुद्धीन्‌ महा०इति सौल्लुण्ठनवचनम्‌ । तान्‌ पुरुषान्‌ 
कंनमिभिर्नामिधेयेर्ग्यपदिशेम व्यवच्छिन्नान्‌ कुर्याम । तेषां गुणान्‌ कथयाम्‌ इति 
काकः । व्यपदेश्यो नाम भेदनिबन्धनो व्यवहार इति न्यासकारः । भथ व्यवहूरेमेति 
पाठ; । तत्र निगदेन व्याख्यानम्‌ । श्रशेषभवनाभरणस्य कृत्स्नं यद्भुवनं जगत 


((-0 9118511। 51164118 1 0511.1811। 01661100. 01411260 0 66810011 





ठ | भत्ल टणतकम्‌ 


तस्याभरणमलंकारभूतम्‌ तस्य । हेम्नः स्वर्णस्य तत्त्वं स्वरूपं विवेक्त्‌, येषां 
महामतीनाम्‌ । उपला निकषादमानः। परमम्‌ उक्कृष्टं प्रमाणं हेतुर्मवति । प्र माणं 
हेतुमर्यादाशास्त्रयतनप्रमातृषु इत्यमरः । ये गुणिनं निर्गणोन सह ॒तुलयितु- 
मुदुञ्जते तेऽतीव मन्दा इति भावः । 


बहुत वार सोच विचार करते हए भी (हम यह घात) नदीं सम पाये हं 
कि उन परम बुद्धिमानों को किन नामो से पुकारे जिनके (लिए) सम्पूणं संसार 
क श्रामूषण सोने के श्रपने (यथा) रूप को पहचान करने के लिए पत्थर (ही) 
भ्रष्ठ प्रमाण ह ? 


यहां 'महामतीन्‌' ब्द कै प्रयोग से प्रशंसा के बहाने निन्दा किये जान के 
कारण व्य जस्तुति प्रलङ्कार ह्‌ । भ्रप्रस्तुत वाच्य हेमोपलद्त्तास्त से प्रस्तुत 
व्यङ्ग्य विद्नमूर्लडत्तान्त की प्रतीति होने से श्रपरस्ततप्रशंसा श्रलद्कार दै । 


ष्य कीला एमादाफ्रभणहि 9 न ऊठ त्वात प्ातलऽकात ० 
1, 7181768 3101110 १८ ८9]] 1108६ 112111४ 17111 {60716 +/10 
‰#€ 4९८९160 507९5 95 {16 71075 16811982 {116 4००111४ णा ४०० 


{16 गाला 0 17८ ‰170]6 00110. 
सरक्षितुं कृषिमकारि कृषीवलेन 
र्यात्मनः प्रतिकृतिस्तरपूरुषोऽयम्‌ । 
स्तब्धस्य निष्क्रियतयास्तभियोऽस्य न्‌न- 
मनन्ति गोमृगगणाः पुरः एव सस्यम्‌ ॥७४॥ 


पर्य ! कृषौवलेन 
अकारि । (परम्‌) 
गुनम्‌ भ्रस्य पुरः ए 


ऊपिसं यं ष. 
4८ पि संरक्षितुम्‌ श्रात्मनः प्रतिकृतिः श्र तृण ना । 
भरस्य स्तन्धस्य निष्कियतया श्रस्तमियः गो मृग ` 
त सस्यम्‌ ग्रइनन्ति | 

त नं समृद्रराष्टा्यपहतं स्यादित्याह संर. 
त कपकेण . . . पेदोवलच्‌ । वल इति दीर्धः । छृषिमात। 
५ २ रवादिभ्यस्वातुमात्मनः स्वस्य प्रतिकृतिः प्रतिनिधीभूतः । रन 
= ` दृण; छृत्रिमपुरषः । श्रक 
पतनस्यास्य तृरपुर्‌ 


धरस्य 
रि कृतः । करोतेः कर्मणि लुड्‌ । क 
पस्य निष्क्रियतया उच्चैः कोगादिव्याप श्यतवेनास 


1 =, = 
। म, ह; पुनरेव म, कं 


[1 _ | ((-0 9118511 91618 1 05111811 0661100. 01011260 0 6810011 
| क 








भयरहिताः। गवां पशूनामृक्षादीनां मृगाणां ङृष्णस(रादीनां गणा यूथानि पुर 
एव तृणपुरुषस्याग्रत एव सस्यं शात्यादिकम्‌ । सम्यगडनन्ति भक्षयन्ति । पदया- 
वलोकय । पश्येति जनः संबुद्धयते । न केवलमाकार एव कायसिद्धिहेतुरिति भावः। 
प्रत्र सस्प्रसंरक्षणार्थं त्रणकृतपुरुषकरणात्‌ स्वस्य भक्षणरूपस्य विरुद्धकाय- 
स्योत्पत्तेविषमालंकारः । तदुक्तम्‌--विरुदधकार्यस्योत्पत्ति रपर विषमं मतमिति । 


देखो ! किसान ने श्रपनी खेती की रखलवाली के लिए अपना नमूना यह 
तिनको का श्रादमी बनाया । (परन्तु) इस जड़ के क्रियाविहीन होने के कारण 
समाप्त दए डर वाले गवो श्रौर हरिणं के भर्ड निश्चय हौ इसके सामने दी 
श्न्नकोखारहेदहं। 

किसान ने तृणपुरुष को खेती कौ रक्षा करने रूप इष्टप्राप्ति कै लिए बनाया 
धा किन्तु इष्ट कौ प्राप्ति के स्थान पर खेती के मक्षण ल्प ग्रनिष्टाप्ति हो गई 
ग्रतः यहां विरुद्ध कायं की उत्पत्ति होने से विषमालङ्कार हं। ू 

म्रप्रस्तुतवाच्य कषीवलत्रणपुरुषत्तान्त से प्रस्तुत व्यङ्ग्य राजा के दारा 
दुर्बल श्रमात्यादि की नियुक्ति रूप एत्तान्त की प्रतीति होने स ्रपरसतुत्र शसा 
प्रलङ्कारमीहै। 

एत्‌ा101त {18 त्रा 0 ऽव, (16 1111886 2{ 7011 8३ 71806 0 


116 शि {0 0701661 116 {01ा1, एए 0९ 10 1116 १ ६ 
{181 11186, 1116 {६97 2 {116 1€05 2 8111771815 1146 005 8716 ५९ 


18 [61110५60 87त्‌ 11 976 6411708 607 


कस्यानिमेषनयनेः विदिते" दिवौको- ॥ 
लोकादते जगति ते श्रपिव गहीत्वा । 


पिण्डप्रसारितमूखेन तिमे किमतद्‌ , 
हृष्टं न बालिश विशद्बडिशं त्वयान्तः ॥७५॥ 


त जगति कस्य श्रनिमेषनयने 
प्रनतः विशद 


{011 (2 106 17286). 


बालिशा तिमे ! दिवौकोलोकाद्‌ ऋत =.“ 
विद । ते वं गृहीत्वा श्रपि पिण्डप्रसारितमूखंन त्व 
ब्र 


. ज, म, ह; कस्यानिमेषवितते क 
- म, हु; नयने क; वितते ज 
“ अ, क, ह; विशदे मः 


* अ, क, हु; बालिशतया म 
((-0 9118511। 5116118 1 0511९811 01661100. 01411260 0 66810011 





८६ भल्लटशतकम्‌ 
एतत्‌ बद किं न दुष्टम्‌ ? 


कृराग्रबुद्धिनापि देवापतिता विपद्‌ दुनिवारेत्याह-कस्यानिमेषेति । 
वालिशः श्रजञः । शिशावज्ञे च बालिश इत्यमरः । तस्य संबोधनं बालिश । है 
मत्स्य जगति लोके दिवौकसां देवानाम्‌ । लोकाहते देवताजनान्‌ विहायेत्यर्थः । 
भ्रन्यारादितरेत्यादिना ऋतशब्दयोगे पञ्चमी । कस्यापि प्रारिनः । भ्रनिमेषे 
निमेषशरन्ये । नयने चक्षुषी । विदिते प्रसिद्धे । देवतानामनिमिषनयनत्वं नान्य- 
स्येत्यर्थः । ये श्रप्यनिभिषे नयने ते द्वया गृहीते स्वीकृते । मस्त्या श्रनिमेषा 
इत्यादिगप्रसिद्धिबलेनं मत्स्यस्याप्यनिमेषनयनत्वमित्यथेः । भ्रन्यत्र प्रवृत्तिनिदत्ति- 
रूपधर्म॑प्रतिपादके शास्त्र एव नयनत्वेन स्वीकृत इत्यथः । ते इति तृतीयार्थेऽव्ययं 
... च वामनः । ते मे शब्दौ निपातेषु त्वया मया इत्यर्थं इति । तथा पिण्ड- 
प्रसारितमुखेन पिण्डे वलिशाग्रे... मांसपिण्डेऽपि पिण्डाय वा प्रसारितं विद्टतमून्न- 
मितं वा मुखमस्य येन स तथोक्तः । श्रन्यत्र पिण्डे परान्नादौ प्रसारितमुखो विद्ध 
 ताननः। ते न त्वया श्रन्तः तालुस्थानं कुक्षि वा विशत्‌ प्रविशदेतत्‌ पुरोवति 
बलिश्च मस्स्यवन्धनम्‌ श्रन्यत्र॒ बलिशराब्देन बन्धक पापं ध्वन्यते । कि कारणं 
न ष्टम्‌ । कारणं तु न ज्ञायत इत्यथः । भ्रतो बालिशत्वं तवोपपद्यत इति भावः। 
यदा प्राज्ञोऽप्यज्ञं इव दोषं न पश्यति तदास्यावसरः । ` 


हे भृखं मद्धली ! देवताश्रं के लोक (स्वभ) को छोडकर शरीर संसार मे 
किसके निर्निमेष (पलक न पकाने वाल्ते) नेन्न प्रसिद्ध है ? (शर्थात्‌ श्न्य किसी 
को भी ेसेः नेत्र नष्टं प्राप्त है) । निश्चय ही उन (पारदशीं मेनो) को प्राप्त करके 
भी (मां त्रथवा श्रन्न के) पिर्ड (लरड, इकडे) को (पने के लिए) मेह फलाने 
वाली तुमने (श्रषने) भीतर प्रवेश करते हूए इस काटेको क्यों नदीं देखा ! 


यहा भरनिमेष नयन होते हृए भी मूखंतावश कटि को न देख पाना (हेतु के 
होने पर फलाभाव) इस रूप मे उक्तनिमित्ता विशेषोक्ति है क्योकि "बालिशः 
दाब्दसे कारण का कथन कर दिया गपा है । भ्रप्रस्तुत वाच्य मत्स्यदृत्तान्त से 
स्तुत भूल करने वाले श्राषदप्रस्त चतुर व्यक्ति की व्यञ्जना से प्रतीति होने 
से भ्रप्रस्तुतप्रशंसा दै 1 


96601 176 &608 ‰00 €&¡5€ 185 "1101518 ९6४९ ? ५४121 15 {£ 
7688071 {१2१ €४६0 टाः 26118 50611 51696 6५४६5, जण, 0 नगा 
9870, 616 ०01 86€ {06 0001८ €णालाा0६ $ 100 00६1005 170 प॥ 
४० 0000170 00€0€व 97 8 ए91] 9 €212 0165. 


((-0 9118511। 51164118 1 05111.181। 01661100. 01411260 0 66810011 


भत्लटंसतकम्‌ &७ 


पुंस्त्वादपि प्रविचलेद्‌ यदि यद्यधोऽपि 

यायाद्‌ यदि प्रणयने न महानपि स्यात्‌ । 
प्रम्युद्धरेत्‌ तदपि विश्वमितीदृशीयं 

केनापि दिक्‌ प्रकटिता पुरुषोत्तमेन ॥७६॥ 


यदि पुंस्त्वात्‌ भ्रपि प्रविचलेत्‌, यदि भ्रधोऽपि यायात्‌, यंदि प्रणयने 
महान्‌ श्रपि न स्यात्‌ । तदपि विश्वम्‌ भ्रम्युद्धरेत्‌ इति ईदुशी इयं दिक 
केनापि पुरुषोत्तमेन प्रकटिता । 


महतां स्वभावपरित्यागोऽपि परप्रयोजनायेव सम्पद्यत इत्याह--पुस्त्वाद- 
पीति । पुरुषोत्तमो विष्णुः सुजनोऽपि प्रतीयते । पृस्त्वात्‌ पुम्भावात्‌ । प्रविचलेद्‌ 
यदि भ्रपसरेद्‌ वा । पुरा भगवानमृतप्रदानसरमये पुरूपं परित्यज्य स्त्रीत्वं जगामेति 
पौराणिकी कथा । सर्वल्नितपदस्थोऽपि भधोऽपि पातालं चापि यायादिति यदि 
गच्छेत्‌ । यातेरदादिकालि्लिङ्‌ । पुरा भगवान्‌ भम्युद्धरणाय वराहरूपेण रसातलं 
जगामेति पौराशिकी गाथा । महानपि विश्वातिशायिविग्रहोऽपि प्रणयनेन या- 
चते (वामनः) स्याद्‌ यदि भवेद्‌ वा। पुरा हरिबंलिबन्धनाय वामनत्वमा- 
जगामेत्यत्रापि गायाऽनुसन्धेया । अथवा प्रणयने याच्नायां सत्यां महान्न 
स्यादपि इति लघुभावाद्‌" याच्जाया लाधवहेतुत्वादिति भावः। तदपि तथापि 
उक्तरीत्या विविघामवस्थामापन्नोऽपि विश्वे समस्तं भूतजातमम्युद्धरेत्‌ श्रापद्म्यः 
संरक्ेत्‌। ईदटशी एवंविधा । इयं परिटष्यमाना दिक्‌ सन्मागेः । पुरुषोत्तमेन 
विष्णुना कर्वरा केनापि हेतुना । इत्येवं प्रकटिता स्फुटीकृता । भ्रथवा कैनापि 
प्रनिरवचनीयमहिम्नेति पुरुषोत्तमविशेषणमेतत्‌ । श्रवद्यचरित्रः कोऽपि पुरुषः 
स्वपौरुषपरित्यागेऽपि नीचेदंशायामपि याचनलाघवेऽपि येन केनापि प्रकारेण पर- 
परित्राणनं न जहतीति भावः । 


यदि पुरषत्व क भी परित्याग करना पड़े, यदि पात्ताल (नीच दशा) मेभी 
जाना पड़े श्रौर याचना के श्रवसर पर महान्‌ भी न रदे (ज्लुद्ध भी बनना पडे) तो 
भी संसार का उद्धार करना दी चाष्िए+ इस सूप में ेखा यह मागे किन्दीं श्रपूरं 
पुरुषोत्तम विष्णा भगवान्‌ ने (मोहिनी, बराह श्रौर वामन श्रादि के रूप 
धारण करके) दिखला दिया हे । 


यहां व्णेनीय रूप से सत्पुरुष कै प्रस्तुत होने पर उसके सदश विष्णु -का 
1. मः; लचुभावि ह्‌ 


~-0 91185|। 5161९181 [ 05111<11801 (01661100. 1911260 0\ €80001॥1 


+~ भल्लटणर्तकम्‌ 


कथन होने से श्रौर उसमें पृस्त्वात्‌ एवं पुरुषोत्तमेन पदों के दिलघ्र होने से ए्लेष- 
मूलक भ्रप्रस्तुतप्रशसा ह । 


"11001 0716 7112 8५6 {0 0६60116 ५९६५० 2 18111004 (*81- 
छपरा), {10प्ष्टी 016 7189 &० ५01 10 {17€ 10 छटा 1६0 (10१४६ 
70511102), 1170011 06 719 0९607116 11211 00६ {0 8 14065, €श्ला 
{7 016 81016 7701661 {16 1016 ४०16 (211 {76 ऽ00}६15). 71115 
15 {1€ थप 5310 29 00 + (07 {16 0६81 गा 71161, 1.€.; 1172). 

16 ४€75€ 15 ००६५ 11 ‰&३५१३[7731358 (-4,444) 8110 ऽत 1111४8- 
037[02118 (3९.60) 285 87 11101 ा7ताा 9 48/4511/1व01वईवा715द ०85९५ 
011 8701101118518. €ा€ 106 0€{ ०९5610९5 106 10६ 0618५90 
2 1८12 +»^716}11 15 {16 1181167 171 1870 (7८45114) ४ १६5८1012 116 
0604010 प्राः 9 #7§प्प +*10 15 101 {76 रोगहा 7 1811 (41451114). 
४0150 180 10 8659716 116 शि) 2 83 0411356] 10 ५९5170४ {1€ 
06710115; € {180 10 2० ५01 {0 {716 [0णएला 16810115 {0 18156 प 11€ 
€817111 5101€72€त0 "10 €ा 87 36 16 180 10 1६व ८९७६ 811 ठि ३ 
166 ° 197 {07 {166 5165. 


स्वत्पारशयः स्वकुलरिल्पःविकल्पमेव 
यः कल्पयन्‌ स्खलति काचवशिक्‌' पिज्ाचः। 

ग्रस्तः स कस्तुभमरोन्द्रसपत्नरत्न- 
नियंत्नगम्फनकवेकरिकेष्येयान्तः ॥७७॥। 


स्वल्पारायः, पिशाचः यः काचवणिक्‌ स्वकुलशित्पविकल्पम्‌ एव 
कल्पयन्‌ स्खलति स कास्तुभमणीन्द्रसपत्नरत्ननियंत्नगुम्फन कवैकरिके- 
प्यया म्रन्तः भ्रस्तः विद्यते । 


यः स्वयं किञ्विज्गोऽपि सवैजञेन सह स्पर्धां चिकीषति तद्धिडम्बनायाह-- 
एवरह्त्ण हति । स्वल्पाश्यो मन्दबुद्धिः यः काचवणिक्‌ पिद्ाचः। काचो नाम 
परोपरसारो वलयकरण्डादिः । तस्य वशिब्‌ क्यविक्रयकर्ता । स पिशाच इवेत्यु- 
तकित्तसभ्रास; । पिशाच इव विगतविवेकत्वेन वणिगपि पिशाच इत्युक्तम्‌ । 
स्वकुलस्य निजवंस्य । शिल्पानां वलयादीनां विकल्पो विज्ञेषभेद इति यावत्‌ । 


1, १, ६; धिवर भ 
2, क, ]1, ह; काचमणि 


((-0 3118511। 5116118 1 0511/.1811। 01661100. 01411260 0 66810011 


भल्लटशतकम्‌ 
म्‌ ८ 


तमेव कल्पयन्‌ रचयन्‌ स्खलति प्रमा्यति । मतिमान्यादिति भावः । तथापि स 
काचवणिक्‌ पिशाचः कौस्तुभस्य मशिविकेषस्य रतनोत्तमस्य । सपत्नानां प्रति- 
पक्षाणां तत्सदशानामिति यावत्‌ । रत्नानां मणीनाम्‌ 1 निर्यलेन भरनायासेन । 
गुम्फनको रचना । तत्तर्स्वरूपपरि ज्ञानेन पृथक्‌ करणमिति यावत्‌ । तत्र पट्‌; 
कूशलः यौ वेकटिको मणिकारः । मणिकारो वंकटिक इति क्षीरस्वामी । तस्मिन्‌ 
विषये" संजातयाः ईष्येया भ्रन्ुयया श्रन्तश्चेतसि ग्रस्तः । समाक्रान्तो भवतिऽ । 
परेष्वसुया स्वनाशायेव सम्पद्यत इत्यथः । 


सरहस्य (नासम) शौर दुष्ट यह जो कोच का व्यापारी श्रपने कुल कौ 
शिल्पकला को करने मे भी लङ्खद्गा रहा दै (उसका कारण यह है कि) व्‌ 
र्नो मे उत्तम कीस्वुभमणि कौ होड़ करने वाले रनो को श्रासानी से ग॑थने वाल्ते 
जौहरी के प्रति होने वाली श्यां से भस्त है। . 


यहां ्रपने कुल के शिल्प भें लड्खड़ने रूप काय के लिए जौहरी भे ईर्ष्या 
खूप कारण होनेसे काव्यलिङ्ग ्रल्कार ह । अप्रस्तुत वाच्य काचवणिक तथां 
वेकटिक वृत्तान्त से प्रस्तुत व्यङ्ग्य भ्रल्पनज्ञ कौ बहुज्ञ के प्रति ईर्ष्या के टृतान्त 
की प्रतीति होने से भ्रप्रस्तुप्रशंसा अरलद्भुारभी है! | 


1018 79770 -्णपतवल्त्‌ (अपठ) ०० फलपल्तं इा955 पलक्छणां 
४10 15 0[प्ातलय108& 17 10€ लर ४५16 ०95 2६४०1०6५ ए€{९611070 7 
915 शिप], 35 पप (0 16 विलं 178६ 06 15 तल्बाण्णड ग ९ न्क्घाल 
प्10 = €वञी$४ = अ्र088 106 116 पप्र (्गाफलणह प 
18078, (€ ऽपएलय-1८क्ल, 


तत्परत्यथितया' वृतो न तु कृतः° सम्यक्‌ स्वतन्त्रो भयात्‌ 
स्वस्थस्ताच्‌ न निपातयेदिति यथाकामं न सम्पोषितः°। 
संशुष्यन्पृषदंश एष कुरुतां मूकः 'स्थितोऽप्यत्र कि 


गेहे कि बहुनाऽधुना गृहुपतेश्चौराश्चरन्त्याखवः ॥७८॥। 


1. मः, विषयेन ह्‌ 

2. भः, जात्याद्‌ 

3. मः; नीचो गुणिषु वुथेव असूययठीत्यथंः अथवा ग्रस्तः भतो भवति ह में 
अतिरिक्त पाठ | 

4. कृ; तत्परत्यस््रदया अ, मः, ह्‌ 

5. र, ह; व॒तोनु हतकः कः धुतोनतुक़ृतः मा 


। ~) 


6. अ, म; सन्तोषितः क, ह 


((-0 9118511। 51164118 1 0511/.1811। 01661100. 01411260 0 66810011 








६० भटलटएतकम्‌ 


तसप्रत्याथितया वृतः, भयात्‌ सम्यक्‌ स्वतन्त्रः तु न कृतः । स्वस्थः 
तानू न निपातयेत्‌ इति यथाकामं न सम्पोषितः । (ग्रतएव) संगुष्यत्‌ 
एष पृषदंशः मूकस्थितोऽपि श्रत्र कि कुरुताम्‌ ? कि बहुना ? श्रधुना 
गृहपतेः गेहे चौ राः श्राखवः चरन्ति । 


यः कश्ित्स्ववाधानिवृत्तये यं कंचिद्‌ बलिनं स्वीकृत्य स्वातिक्रमणभयेन तच 
सम्पालयति तदा स्वीकृतस्य दुवलत्वेनारयो निष्प्रतिबन्धाः क्लेशयितुमारमन्त 
इत्याह तत्प्रत्यस्त्रतयेति तेषां मूषिकाणां प्रत्यधितया शत्रत्वेन दरतः स्वीकृतः । 
मयात्‌ दध्यादिषटविघटसम्भूतात्‌ स्वतन्त्ोऽनियन््रणो न कृतः । सदा रज्ज्वादि 
४ वद्ध एव स्थापितः । स्वस्थः सुखेन स्थापितः । यथा कामं प्रद्द्धः सन्‌ तानाखृन्‌ त 
| निपातयेत्‌ । पतेष्यन्ताल्लङ्‌ । इत्यनेन हेतुना यथाकामं यथेच्छं न सम्पोषितः। 
म्रोदनादिप्रद नेन न वचित इत्यथैः। ग्रत एव संशुष्यन्‌ क्षणे क्षो कदर्यं माप्तुवन्‌ 

एष पृषदशो मार्जारः । श्रोतुविडालो मार्जार, पृषदंशक ्ाखुभुक्‌ इत्यमरः । 
तेगृहस्यस्यापि । भ्रत्रगेहे । मूकः ध्वनितुमपारयन्‌ स्थित । कि कुस्ताम्‌ । 
त किमपीत्यथेः बहुना भूयसा ( कथनेन) किम्‌ । न किमपि प्रयोजनमित्यथः । 
्षुगदानीम्‌ । भ्रालवौ मूषिकाः । उनदरूमूपिकोप्याखुटित्यमरः चौरा वस्त्व! 
न्यादिमक्षकाः । चरन्ति निरशङ्काः प्रततन्त इत्यथः ५ परापत्सहायभूतानामात: 


 ॥ ५ पर्पिलयेत्‌ । नो चेत्ते दौवंस्येन पूनश्चापन्नषप्रतीका रो मवेदिसि 








1 । 0 
न (चह का) शतु होने के कारण (इसे) चुना गया दै, (दवि श्रा! की 


| 
| 
हि | 
| हानि के र 
॥| सुखी कोः क # कारण (इसे) ग्च्छी तरह स्वतन्त्र भी नहीं किया ४ 
| चछानसार ( ध हृता यह उन चों को नहीं मारेगा इस श्राशङ 
| रच्छानुसार (मोजनादि प्रदान करके) पोपरित नहं (इसीलिए) सूः 
त ह] [क्या गया ह! ध 
स्ता हृश्रा मी यहाँ क्या करे | बहुत क्या क 


| (. | त्रा वह बिलाव चुप र 
11 ह चः 1 
| स्वामीके घरमे चोर चे विचरण क देह । 


८1 न्वै (ग) म द प्रप 4 
य विडाल भोर रहो क ठततान्त से ्र्तुत व्यङ्गय 


= द ६ त (र्त 
को प्रतीति होनि ;  यतान्‌ व्यक्तिसे काम नलेने वालि स्वामी के ¶ु 
¶स्तुतप्रशसा श्रलद्धार है । 


४ 01 10८0 [ 

हि | ॥1]) | 0 
01411 101 ध ५ ॥८८/0१ 28 &1४€ 10 1{ णिः (£ 4 11110 
५, (1 (4 101 (116 0018). 11 25 101 211 0 11100. 


21 1108111) (1 111८ 
60-0 5118911 9॥61618 149॥ 47} 66 णठी 01 ऽछा + 


{€ 





भ त्लर शतकम्‌ ६१ 


"२7 र्दा -- र 7--7 


---= ==. 
+ गन 


| पि0४ लाा8्लं शत्व अत्‌ 101 18918 116 09708611 ग 76५ 79६ 60पणात 
1 १० एणा6 वदााक्ा7६ 17 {716 056, 116 16४65 7815 816 71078 
171 {116 10056 ° {76 [0पलागतद्य. 


एवञ्चेत्‌ सरस'स्वभावमहिमा जाड्यं किमेताहशं 
यदेषा च' निसगंतः सरसता कि ग्रन्थिमत्तेद्ली । 
मूलजञ्चेच्छुचिपङ्कजध्र तिरियं कस्माद्‌ गुणा यद्यमी 
कि छिद्राणि सखे मृणाल भवतस्तत्तवं न मन्यामहे ॥७६९॥ 


"अ र, = वु कः क पवत्य वाता र ण्ह 


हे सखे मणाल ! एवं चेत्‌ सरसस्वभावमहिमा (तहि) एतादृशं 
जाड्यं करिम्‌ ? यदि च निसर्गतः एषा सरसता तहि ईदृशौ ग्रन्थिमत्ता 
किम्‌ ¢ मूलं चेत्‌ शुचि ( तहि ] इयं पङ्कज भ्रति : के स्मात्‌ ? यदि श्रमी 
गुणाः तहि लिद्रारि किम्‌ ? भवतः तत्तवं न मन्यामह । 


यत्रे परस्परविरदगृणसद्धागो दश्यते तदरपालम्मनायाह-- एवं चेदिति । 
सखे प्रमाणभूत हे मृणाल विस श्रनेन जडोऽपि प्रतीयते । स्वमावमहिमा त्वत्स्व- 
रूपमाहात्म्यम्‌ । एवमनेन प्रकारेण सरसः सद्र: । प्रन्यत्र सगुणः । सरसइचेद्यदि 
त ्येताटशमेवं विधं जाडयं शीतलत्वम्‌ । श्रन्यत्र मान्यं च किम्‌ । न किमपी- 
त्यथः । निसर्गतः स्वभावेन । एषा सरलता ऋजुता । भ्न्यत्रोदारता । यद्यस्ति 
तद्येताटशी एवंविधा ग्रन्थिमत्ता पव॑भयस्त्वम्‌ । भरन्त कुटिलस्व सावता । कि 
व्यथेत्यर्थः । ग्रन्थिः पर्वणि कौटिल्य इति विश्वप्रकाशः । मूल ध्न तरकार" । 
भन्यत्र वंशादिश्च । शुचि शुभ्रम्‌ । भ्रन्यत्र निर्मलम्‌ । चेद्यदि तहि इयं पकज- 
शरुतिः । पकः कदम । पकः कदैमपाकयोरिति विश्वः । तत्र जात पकजं 
तस्य श्रुतिः । प्रसिद्धिः पंकजमिति प्रथा । कस्माद्‌ ैतोर्मवति । यदीयगुणास्तन्तव 
विनयादयश्च तहि चिद्राणि श्नन्यत्र दूषणानि कि ृधेत्यथ : । दद्र रन्ध्र ५ 
ऽपोति रत्नमाला । तस्मात्‌ मवतस्तव । तत्त्वं पारमार्थ्यंम्‌ । न मन्यामहे साधु 


पष स्थापयामः उत सलपक्ष इति न विद्म इत्वथः। 





„ ठेसी महि गो एेसी जडता 
दे कमलनाल । यदि तुम्हारे सरस स्वभाव क। २ श हमा क मूल दै 
१ यदितुममें स्वभाव सेही सरलता वी ब 


1. म, म", हः; सरसि क 


९. स, क, ह; गरिमा म 


% म, म्‌), हः यस्मादेव्‌ क | "न | 
((-0 9118511। 51164118 1 05111.1811। 01661100. 01411260 0 60810011 


क्यों 








भत्लटशतकम्‌ं 


तो कीचड़ म उत्पत्ति सम्बन्धी प्रसिद्धि कैसी १ यदियेगुणदहतो छिद्र क्यो! 
हम तुम्हारी वास्तविकता समम नहीं पा रहे है | 


4€। सस्स, जाड्य, सरसता, ग्रन्थिमत्ता श्रौर शुचि ्रादि दिलष्ट शब्दो का 
प्रयाग किया गया है । सरस स्वमाव तथा जाड्य (शीतलता शौर मूर्खता) 


रादि गुणों विरो दिखाया गया है इसलिए यहां दलेषानुप्राणित विराधा- 
मास श्रलङ्कार है । 


0 ऽ{३1} 0 10115 ! 


५१ 876 #0प 50 ताल 1 जाः 781 प्ा6 15 50 
5९६1 


क, 1. (| 
स ॥ वा€ 11656 [11018 171 ४0 7 $८ण 216 16 17 पथणा€ 1 
# 15 1115 50 2 शपा 0717 ि0ा॥ प्रत्‌ 1 ठप 276 ग 101# 


1277 १ प व 
0 : ५ 1 11656 1018 1 ०४ 876 0ि]] 07 1115 ? #0प्ा 71291प्ा८ 
18 प्176077[01616715101€ 10९९6 । 


ये दिष्वैव' कृता विषेण कुसृति्येषां कियद्‌ भण्यते 
लोकं हन्तुमनागसं द्िरसना रन्ध्रेषु ये जाग्रति 
व्यालास्तेऽपि दधत्यमी" सदसतोर्मदा मणीन्‌" मूधभि- 
नाच्याद्‌ गृणशालिनां क्वचिदपि श्रंशोऽस्त्यलं चिन्तया ।।०॥ 


जयः 


1 र दनव इव कृताः, येषां कुसुत्तिः कियत्‌ भण्यते { 

प्रमी ६ ष लोक हन्तु रन्ध्रेषु जाग्रति । सदसतोः मूढा ते 

ववचित्‌ श्रि १/१ मूघमिः मणीन्‌ दधति। जौचित्यात्‌ गणशालिन 
^ ¶ शः नास्ति (इति) चिन्तयां प्रलम्‌ । 


| णवान्‌ निगृणेरपि नँ रन्त्यं 
भुजङ्खाः | व्याने भुजङ्खमे 
गरलेन दिध्वा विलिप्य क 


पूज्यत इत्याह्‌- ये दिग्ध्वेति । ये व्यालः 
करे श्वापदे दुष्टजन्तुनि इति विश्वप्रकाशः । विषेण 
कृतिः कलिता & ता निमिता ट्व भवन्ति। येषां भूजङ्ध मानाम्‌ । 
रक्यते सथ | ५ | ति । कियत्‌ मण्यते कथ्यते ? वक्त 
शाव्यम्‌ । कसति ठता चत्यस्माद्‌ धातोभविं स्त्रियां क्तिन्‌ । श्रन्यत्र कुसति 
1 मिमरः | द्िरसनाः जिह्वादयोपेताः । ग्रस्यत्रा- 
"म, हः; दिष्ठ्वैवम, क 

मः; वण्यते अ; गण्यते कं - 
* मः; ते विदधत्यमी श्र, ॥ ८.९ 

` भप मूढा मिग, ह = क 


~> (+ ॥*¬ ^~ 


` 5118511 5116118 1 0511/.181। (01661100. 01011260 0 6810011 








भत्लट शतकम्‌ ६३ 


सत्यवादिनण्च । ये भुजङ्गाः । श्रनागसं निरपराधं लोकं जनं हिसित्‌ रन्ध्रेषु 
वल्मीकादिषु । अन्यत्र विनिपातेषु । जाग्रति प्रबुद्धा मवन्ति। जागतलेटि 
प्रदभ्यस्तादिति भेरदादेशः। सदसतोः सुजनदुर्जनयोः गुणदोषयोश्च । अन्यत्र 
मढाः सदसद्विवेकरहिताः । तेऽमी व्याला म्रपि मूवभिः शिरोभिः मणिं दधति 
विभ्रति। तस्माद्‌ गुणशालिनां विदादिसदगुणशोभिनामौचित्यात्सम्मानस्य 
समुचितत्वात्‌ । क्वचिदपि कूत्रापि भ्रंशः स्थानाच्च्युतिर्नास्ति । न विद्यते । 
तस्मात्‌ स्वपदभ्र शंका न कत्तव्येत्यथः । 


जो सोप मानों जहर में ब्ुभाकर (डुबोकर) वनाये गये ह, जिनकी टेढ़ी चाल 
(दुष्टता) का कितना बखान किया जाय १ दो जीमां वाले बनकर जो निरपराध 
व्यक्ति को मारने के लिए छेदो म बैठकर) जागते रहते हैँ । (इस प्रकार के) 
बुरे भले श्रादमो के विषय मे मूख (विवेकरहित) वेयेरखपमी (श्रपने) सिरां 
पर (इन चृद्{)मणियों को धारण करते हे । (सम्मान-प्रात्नि की, उपयुक्ता 
होने के कारण गुणी पुरुषों का कीं भी (च्रपने उचित पदया स्थान से) पतन 
नहीं होता है (इसलिए किसी प्रकार कौ) चिन्ता नहीं करनी चाहिए । 


मणिद्त्तान्त से प्रस्तुत व्यङ्ग्य दुरगुणी 


यहाँ श्रप्रस्तृत वाच्य भूजद्धचूडा 
ठ ह है- इस अथं का प्रतोति 


न्यवितयों द्वारा मी गृणवानों का सम्मान किया जाता 
होने से अप्रस्तुतप्रशंसा हे । कुसति, द्विरसनाः तथा रन्ध्रादि रिलिष्टप के 
पयोग के कारणा यह श्रपरस्तुतप्रशंसा ए्लेषानुप्राणित टि । प्रथम तीन पृवितियो 
के भीतर सर्पो द्वारा चूडामणि का सम्मान करिया जाता है इस विशेष (भ का 
चतुथं पित के गुणशालियों की पदच्युति नही होती है--इस सामान्य वचन 
से समर्थन होने के कारण भ्रर्थान्तरन्यास श्रलङ्कार दे । 


{011 { 1ऽ 7707६, ५0 
{20 101 (01४. त [16 1६110110 06750159 85 ५ 


+ [] ऽलाल€ा18 (१1५1८९0 
70 ५ एश 17 6४11 $€ त 
(००९. १ []) 0015071; {11056 €४1{ 26110718 


ए८०एरटो पात वाह एग शआालवादत +1 55 0001916 10126 
०२५ 110 ४€ा1€1118) 816 {77111711612016, (1.11 (476 {€€ {0 
10 1.11] 17710 7९01016, »7० 1 15) [सत] (४ 70016 
010 शिप्रा शणं गल$) ष्ट 0८ (1 


0€750 . 1: 121 7090101. 
" 0 [18650 


2 1 08141181} 0661010. 01011260 0 ©68/10011 











५ भल्लट शतकम्‌ 


अहो ¦ स्वरीणां क्रौर्यं हत'रजनि धिक्त्वामतिशे 
वृथा प्क्रन्तेयं तिमिरकबरीविङलथधरतिः । 
प्रवक्तव्ये पाते `जननयननाथस्य' शशिनः 
कृतं॒स्नेहस्यान्तोचितमुदधिमुख्येनंनु जडः" ।८१॥ 


ग्रहो | स्त्रीरां क्रयं य्‌ । ग्रतिशठे । हतरजनि | त्वां धिक्‌ | इयं 
तिमिरकवरीमोक्षविधृतिः वृथा प्रकान्ता । जननयननाथस्य शशिनः 
भक््तन्य पाते (सति) उदधिमुख्यैः जडे तनु स्नेहस्य भ्रन्तोचितं कृतम्‌ । 
सक्लजना ह्वादकारिणो मत्‌व्य॑सने सत्यपि दष्टस्त्रीहूदयं न व्यथते किन्तु 
0 थत इत्याह्‌-- श्रहो कौयेभिति । ग्रतिशठे श्रतिवक्रस्वमावे । 
पि श र ह रत्यमरः । हतरजनि मो दग्धरात्रि त्वां मवतीं धिक्‌ । धिक्‌ 
क भत्सनं वतते । चिङ्‌ निभैत्संननिन्दयोरित्यमरः। य वथः 
क्षीरे 4 सी | १४५ स्तु 0 प्रतिदृदधे सति वर्धनादिकं प्राप्नुबन्ति। 
ध्वनिः। न क ५ ध स्वीहृदयस्य परनुचितकर्मकरणात्‌ कूरत्वमिति भाव- 
पीत्यथेः । त्वया भवत्या त नार समासन्न प्रतिसमीपस्थे सति कृष्णपक्षावसान- 
मन्धकार एव कवरीके क परिदस्यमानातिमिरकवरीमोक्कृशृतिः तिमिर 
कुसृति तिृतिर्शाय्यम + तस्य मोक्षः परित्यागः तस्मिन्‌ कूसृतिः शठ्त। 
इत्यथः । तदेव 1 । प्रकरान्ता समारन्धा तिमिरकवरीमोक्षो नाम कृत 
योग्यमेव कृतम्‌ श्रकारि । । परमापायोचितं प्रेमापायस्यानुरागराहित्यस्योवित 
प्राङ्चयम्‌ । पुरुषाशा। १ कयं क्रूरचित्तं स्त्रीणां नारीणामेव । ग्रहौ 
परुषाणां तु न तथेत्याह-- तु शब्दो व्यतिरेके । किन्त विकञेषोऽस्ती- 


त्यथः जडंजेडप्रभृतिभिरुदरि 
भरुदधिमृख्येः समद्र र कौरव 
चन्द्रकान्तादयो लक्ष्यन्ते | २ समुद्रापिमिः । मृख्यरब्देन चकोर 


ग्रार्चयं है | नारियों के भीतर (कितनी) 


“ क, म, ह्‌; अयि म 
" भ, ह्‌; मृषा के, म 
" के; मोक्ष निपषृतिः म1 
" अ, क, मै 


त्र च ॥ षः ॥ य एवं 
रता हती ह १ श्रति नद 


` कमग्हःनतुक ¦ 
„ ज क. जतः म, हु 


षू) (7 न (^ {~ न 


((-0 9118511। 9116418 1 05111811 0661100. 01411260 0 6810011 








भरह्तनदट शत्तकम्‌ ६१५ 


दत्यारिन रात ! तुमं धिक्कार है । श्नन्धकार रूपी जडे (वंघे बालो) को खोल- 
कर॒ (फलाकर) धारण करने (का) यह कार्यं (तमने) व्यथं ही श्रारम्भ किया 
हुश्माहै। (ठम तो प्रसन्न हो इसके विपरीत (समस्त) लोगों के नेत्रं के स्वामी 
चन्द्रमा के च्रकथनीय (च्रशुभ) परतन के हो जाने पर स्तन्ध एवं मौन हए 
समुद्र श्रादि (बन्धु)जनाों ने निश्चय दी प्रेम ओ्रौर सहानुभूति की चरम सौमाके 
छ्रनुरूप काये किया है | 

प्रमिप्राय यह है कि चन्द्रमा के ऊपर श्रापत्ति श्राने (उसके श्रस्त होने) पर 
समुद्रादि बन्धुजन तो शान्त होकर बैठ गये है किन्तु राति रूपी नायिका श्रपने 
केश खोलकर प्रसन्नता प्रकट कर रही है | 


यहां तिमिर मे कवरी तथा रजनी मेँ स्त्रीकाश्रारोप होने से रूपक है। 
यहां प्रस्तुत वाच्य रजनी; शशी ग्रौर समृद्र में करमशः नायिका, नायक ओरौर 
बन्धु के व्यवहार का समारोपहोनि से समासोक्ति है । रजनी के कवरीवन्ध के 
मोक्ष रूप कायं के लिए स्त्रियों की क्रूरता रूपकारण की प्रतीति होने से 
काव्यलिङ्ध श्रलङ्कार ह तथा भ्रप्रस्तुत वाच्य रजनी, चन्द्र ग्रौर उदधि इत्तान्त 
से प्रस्तुत व्यङ्ग्य चन्द्रमा की विपत्ति, रात्रिक क्रूरता तथा समुद्रादिकी 
सहानुभूति के दृत्तान्त की प्रतीति होने से भ्रप्रस्तुतप्रशंसा है । 


01, 10 लाल] {€ एला 876६ ? 16 पुणा ० 0 1795081 376 
1710351 ४१161८६6 7112111. प्र 0५ ०५८1581४ एणा एवाः 116 1061८ ० [87 17 
{76 णगि 9 08761655 ? एश्टा 116 [हा 06९ 271 01€ा§ 09५6 
४६11०५९ 70] 16881018 116 0718] एवा ग [ल 10४८ (109५5 
7110071) 81 {1€ ल{ला1त]$ ए87700ि] वलुशा{पा€ 9 176 700 010 1 
0९51160 0 {16 €$९६8§ ° 116 601६. 


ग्रहो गेहेनर्दी दिवस्षविजिगीषाज्वररुना 

प्रदीपोऽयं' स्थाने ग्लपयति मृषा ऽमूनवयवान्‌। 
उदात्तस्वच्छन्दाक्रमणहूतविशहवस्य तमसः 

परिस्पन्दः दरष्टुं मुखमपि च कि सोढममुना ॥८२॥ 


ग्रहो ! गेहेनदीं श्रयं प्रदीपः स्थाने (तिष्ठन्‌) दिवसविजिगीषाज्वर- 





1. भ, क, हु; प्रदीपःस्वमेः 
2. क, म।, ह; वृथा अ 
३, अ, क; परिस्पष्टं म, मः, ह 


((-0 9118511। 9116418 1 05111811 0661100. 1011260 0 60810011 





। 1 


९६ भल्लटशषतकम्‌ 


रुजा भ्रमन्‌ भ्रवयवान्‌ मृषा ग्लपयति । (परम्‌ ) म्रमूना उदात्तस्वच्छ- 
न्दाक्रमणहूतविरवस्य तमसः परिस्पन्दं मुखमपि द्रष्टं कि सोढम्‌ ? 


य: कश्चिच्छतनरुसन्निधौ किञ्चिदपि कत्‌मशक्नुवन्‌ भ्रात्मगरहाभ्यन्तर एव 
शौर्यं प्रदर्शयति तं प्रत्याह-गेहेनदं तीति गेहेनर्दी गेहेशूरः 1 गेह एव शौर्या- 
डम्बर प्रकारायन्‌ गेहेनर्दीत्युच्यते गणरत्नमहोदघौ । पात्रे समितादित्वान्‌ 
सिनिप्रत्ययान्तस्य तत्पुरुषसमासनिपातः । निपातसामथ्यदिव सप्तम्या भ्रलुक्‌ । 

गेहेनर्तीति पाठः 1 गेहे मन्दिरे चृत्यति परिस्फुटतीति । तथोक्तः प्र दीपः 
कर्ता । स्वस्थाने स्वस्यात्मनः स्थाने श्रधिकरणे मल्लिकादौ स्थितः सन्‌ दिवस- 
विजिगीषाज्वररुजां दिवसस्य श्रह्लो विजिगीषा विजेतुमिच्छा' म्नन्यत्र तेजसि 
विजिगीषा ध्वन्यते । तया ज्वरः सन्तापः सं एव रग्व्याधिः तया उपलक्षितः 
सन्नमूनवयवान्‌ घटपटादेशान्‌ । म्न्य सम्बन्विनः पुत्रादीन्‌ । वृथा व्यथमेव 
ग्लपयति 1 स्वसम्पकण मलिनयति । गेहेऽपीति या वा म्लायते । हितुमण्य- 
न्तत्वाट्लदट्‌ 1 एतावदेव प्रदीपसामध्येमित्यथः 1 अथवाऽप्यथत्वस्य म्लापयती- 
त्यनेन सम्बन्धः । तथापि उदारस्वच्छन्दाक्रमणहूतविदवस्य उदारं महत्‌ यत्‌ 
स्वच्छन्दाक्रमणं स्वेच्छल द्धनम्‌ । तेन हूतं परिभूतं विदवं जगद्‌ येन तथोक्तं तस्य 
तमसोऽन्वकारस्य मुखमपि प्रारम्ममपि वक्तरमपीत्य्थः । मुखं निस्सुरणे वक्त्र 
प्रारम्भोपाययोरपीति विश्चः। परिस्पष्टं यथा मवति तथा द्रष्टुमवलोकयितुम्‌ । 
भ्रमुना प्रदीपेन सोढं कि शक्यमित्यथंः । सहे मविक्तः प्रत्ययः । करिचच्छरूर- 
मन्यो ह्यशक्तानेव बाधते न कदाचिदपि शक्तानिति भावः । 


घरमे ही शोर करने वाला यह दीपक (श्रपनी) जगह (दी) रदता हुश्रा 
दिवस को जीतने की इच्छाके उवरकेरोगके कारण व्यथं दी इन श्र्गोंको 
केष्ट पर्चा रहा दै, (पर) क्या इसके द्वारा विश्व के उदात्त एवं स्वच्छन्द गम- 
नागमन को श्रपदह्त करने वाले अन्धकार के स्पन्दन रौर मुख के देखने को 
सद्दा जा सकता है १ 


यहं श्रप्रस्तुत वाच्य श्रन्धकार को जीतने का सामथ्यं न रखने वाले प्रदीप 
वृत्तान्त से प्रस्तुत व्यङ्ग्य नि्वैलों को सताने वाले शूर के टत्तान्त की प्रतीति 
होने से श्रप्रस्तुतप्रशंसा प्रलङ्कारदहै। 
01 1 1115 द्म{ल 1 भप %116), 0712५४८ 15106 {€ 1056 011४ 
870 ५०५५ ५1 {16 टश ° 8 0676 (0 (लगाव {06 ०2४; 
प्र11€6८5581711$ ए7185 810 10 1 2718. (0णत 1 {जलाथ #6€ लार 


एच्छा००8६ 2०0 णलः ठर्लाला{8 ज 6871८0655 108 20तपल§ १९ 
766 2०५ [01 70४15 9 ४ रणत 


((-0 9118511। 51164118 1 05111.1811। 01661100. 01011260 0 66810011 





भल्लटणतकम्‌ &७ 


नामाप्यन्यतरो निमीलितमभूत्तत्तावदुनमीलितं 

प्रस्थाने स्खलतः. स्ववत्मंनि विधेरप्युद्गरहीतः" करः । 
लोकरचायमनिष्टदर्छनकरृताद्‌ दुग्वशसान्मोचितो । 

युक्तं काष्ठिक लूनवान्‌ यदसि तामास्रालिमाकालिकीम्‌ ।॥८३॥ 


(रे) काष्ठिक । यत्‌ त्वम्‌ म्राकालिकीं ताम्‌ म्रा्रालि लूनवान्‌ तत्‌ 
युक्तम्‌ (म्रनेन) भ्रन्यतरोः नाम भ्रपि निमीलितम्‌ अभूत्‌, तत्‌ तावद्‌ 
उन्मीलितम्‌ स्ववत्मेनि प्रस्थाने स्खलतः विधेः श्रपि करः उद्गृहीतः। 
ग्रयं च लोकः ्रनिष्टदशनकृताद्‌ दुग्वशसात्‌ मोचित्तः। 


सतत सदुटृत्तस्य क्वचित्प्रमाद।दमागं प्रदत्तस्य वधो न प्रशस्यत इत्याह-- 
नामाप्यन्यतरोरिति । काष्ठानीन्धनानि प्रयोजनमस्य काष्ठिकः तस्य सम्बोधनं 
काष्ठिकं । प्रयोजनमिति ठक्‌ । भ्राकालिकौम्‌ श्रकाले वसन्तव्यतिरिक्तकालै 
कुसुमिता ज्राकालिकी ! श्रध्यात्मादिपाठात्‌ ठन्‌ मावाथं । पुष्पितो हि क्षः 
पुनरुत्पन्न इवाभिनवः तामाकालिकों श्रास्रालि चूततरुपक्तिम्‌ । यद्‌ यस्मात्‌ 
लूनवान्‌ छिन्नवान्‌ । नसिध्मादिम्य इति निष्ठानत्वम्‌ । तस्मादन्यत रोश्चूत- 
व्यतिरिक्ततरो नमपि नामधेयमपि निमीलितं तिरोहितमभूत्‌ । तत्तावद्‌ 
तावदेव चतनामंव उन्मीलितं प्रकाशितमित्ि । सोल्लुण्ठनं वचनम्‌ । तावच्छब्दो- 
ऽवधारणे । स्ववत्मन्यात्मीयमाग वसन्तव्यतिरिक्तकाले चूतेषु पुष्पोत्पादनं विधि 
मिः तत्र प्रस्थानं गमनं सञ्चवरणमिति यावत्‌ । तत्र स्खलतः प्रमायतः। 
ग्रकाले पुष्पमुत्पादयत इत्यथः । विघेत्रह्यणः करः पाणि गृहीतः । त्वयेवं 
कदाचिदपि न कर्तव्यमिति प्रतिबद्धः। श्रन्यत्‌ प्रयोजनान्तरमपि भ्रस्तीत्यथंः । 
ग्रयं लोको जनडच । ब्रहष्टदशनभुवः श्रहघ्रस्याभूतपूवस्वोत्पत्तिकस्य कूसुमप्रादु- 
भविस्य दनेनावलोकनेन भवत्युत्प्यत इति तथोक्तः । दण्वे शसात्‌ नयनसङ्धु- 
टान्मो चितः सन्त्याजितः भ्रौत्पातिकदरनात्‌ खलु भयमूत्मयते । मूज्चयते हेतु- 
मण्ण्यन्तात्क्त प्रत्ययः । तस्मात्त रुच्चेदनं युक्तम्‌ । उचितमेवेति सवत्र व्यतिरेको 
द्र्रव्यः । सन्ततपरोपकारिष्वपि स्वजनेषु गुणानेव दोषीक्रत्य तानेव समूलं 
तारयन्ति ग्रनात्मन्ञा इति भावः । 


ग्रे लकड़हारे | जो तुम रसमय (वसन्त से भिन्न) समय में (विकसित) 


1. ह", मः; स्खलितं स्व कः; स्वलितं स्व अ; स्वलितःस्वमः 
2. म।; विधेरन्य॑गु हीतः करः कः; विधेरम्यद्‌ गृहीतः करः अ, मः, ह्‌ 
3, म!; अदृष्टदशेनवशाद्‌ अ, क; अद्ष्टद्णनभूवः म~ ह्‌ 


((-0 9118511। 51164118 1 0511/.1811। 01661100. 01011260 0 66810011 


६८ भल्ल टशतकम्‌ 


होने वाली उस ्रभ्रवृच्पंक्ति को कार चुकेदो वह (तुम्हारा कमै) ठीकदहै। 
(इससे) दुसरे पेड़ का नाम भी समाप्तो गयाहै श्रौर (जराम का) वह नाम 
(प्रसिद्ध होकर) प्रकट हो गया दहै । (श्रौ फिर) श्रपने रास्ते पर चलने में भटकने 
वाले विधाता का हाथ भी (उसे ठीक चलाने के लिए) रोक लिया है (ज्रह्मा 
भी तुम्दे किसी प्रकार की स्प्परेरणा न्टींदे पाया है) | श्रोर यह संसार ्प्रिय 
(आपत्ति) के देखने से उत्पन्न नयन संकट से बचा लिया गया है। 


यहाँ विपरीतलक्षणा से तुमने श्रच्छा काम किया कहकर लकड्हारे के बुरे 
कामको बताकर भ्रपकारातिशय की भ्र्मिन्यजञ्जनाको गईं है । भ्रप्रस्तुत वाच्य 
ट्ष श्रौर लकडहारे के इत्तान्त से प्रस्तुत व्यङ्ग्य परोपकारी लोगों को सताने 
वाले भनात्मज्ञ, मूखं एवं दुष व्यक्ति के इत्तान्त की प्रतीति होने से यहाँ 
ग्रप्रस्तुतप्रशंसा मी है । 


0 ५००८०६१ { 717 (प({102 ०0५७ {11€ 10241129 ९८०५८ +श1116 
10€7€6 0प्१ ° 5६23501, 9० 12५€ {7710 171० अणा {€ रला # 
18476 2 811 न [16८5 1116 $०प 04५८ 72156 16 [70101066 {06 
18776 0 1113 (&0*९). ^2811, ४०५ 12४6 168{7181116त {1€ 12765 (1.6. 
26110105) ° {€ € 0 *„70 20 201€ 25112 17 15 ५५१४५ (0४ 
70818 1176 74020 0108550) ०४४ ०1 5685070). 7410766 4€ा, #0 18४६ 
52५६0 {€ \*010 {070 7€ प051811119# 3€्ला€ 9 #*171658108 21 €“ 
001161६ (76 00४४18६ 2 {665 0 3€2501)). 1०6९6 #०४ 18५९ 
एल11€0 > ५६८०6 ९811 


वाताहारतया जगदूविषधरराइवास्य' निःशेषितं 
ते ग्रस्ताः पुनरभ्रतोयकरिकातीत्रव्रते बंह्भिः । 
तेऽपि क्रूरचमूरुचमंवसने' नीताः क्षयं लुन्धकं 
दम्भस्य स्फुरितं विदन्नपि जनो जाल्मो गुणानीहते ॥८४॥ 
वाताहारतया विषधरं: जगत्‌ श्राइवास्य निःरेषितम्‌। ते पुनः श्रभ्र- 
तोयकणिकातीत्रब्रतेः, बर्हिभिः ग्रस्ताः 1 तेश्रपि कूरचमूरुचमंवसनंः 


लुन्धकः क्षयं नीताः । इत्थं दम्भस्य स्फुरितं विदन रपि जाल्मो जनः 
गुणान्‌ ईहते । 


1. क; राष्वास्यं मा, मः, ह; रास्वा्य अ 
2. भ, म, मः, ह; तेऽप्यक्रूर कृ 


((-0 9118511। 51164118 1 0511.1811। 01661100. 01411260 0 66810011 


222 








भल्लटणतकम्‌ && 


वाह्ययेव शिष्टमूद्रया दुष्टा न विश्वनीयास्तथाप्यज्ञो लोकस्तस्यंवावर्य- 
म्मावमाकाङ्क्षत इत्याह- वाताहारतयेति । विषधरं: । धरन्तीति धराः । 
मूलविभमुजादिदशेनात्‌ कप्रत्ययः । विषस्य धरा विषधराः सर्पाः तेः कतेभिः। 
महीध्रादयो मूलविमुजादिदशेनादिति वामनः । वाताहारतया वायुमक्षणत्वेन । 
स्राश्वास्य विरवस्य विश्वासं जनयित्वा । जगत्समस्तभूतजातं निदशेषं साकल्येन 
नाहितम्‌ । पुनरनन्तरम्‌ । ते विषघराः भ्रभ्रतोयकरणिकातीत्रब्रतेः अभ्रेभ्यो 
मेघेभ्यः सकाडात्‌ यास्तोयकणिका जलविन्दवस्ताभिः। तीत्रं दुडचरं व्रतं नियमो 
येषां ते तथोक्ताः अ्रमौमजलपायिन इत्यथः । तं बंहिमि मेयूरे ग्रस्ताः मक्षिताः। 
ग्रस श्रदन इत्यस्मात्‌ कमणि क्तप्रत्ययः । ते बरहिणोऽपि कूरचमूरुचमेवसनं: 
करूरं कठिनं चमरो मृगस्य चर्मेव वसनं छादनं येषां ते तथोक्ताः । विइवास- 
जननाय मृगचमघारिण इत्यथः । ते लून्वकं मृगयुमिः। मृगयुर्लुब्यकङ्च स 
इत्यमरः । क्षयं नाशं नीताः प्रापिताः नयतेः क्म॑ि क्त: । एवं दम्मस्य कैतवस्य 
कपटस्येति यावत्‌ । दम्मस्तु केतवे कल्क इति विर्व । स्फुरितं विजम्भणम्‌ । 
विदन्नपि जाल्मः श्रविमृश्यकारी । जा्मोऽसमीक्षयकारी स्यादित्यमरः । जनो 
लोकः । गुणान्‌ वाताहारत्वादीन्‌ । ईहते भ्राकाङ्क्षते । बाह्यगुणलेशदशेनेनेव 
निर्गुणमपि गुणिनं मन्यते इत्यथैः । 


वायुका ग्राहार करने के कारण संसार को विश्वास दिलाकर सांपोंने उसे 
समाप्त कर दिया हे । वर्षाजल कौवुरदोके दही (पान का) कठिन व्रत धारण करने 
वाले मयूरो ने उन सापोंकोखा लिया है। चमरू मृग के कठोर चम को 
धारण करने वाल्ते व्याघोंनेउनमोरांका भी नाश कर दिया रै। श्रविवेकी 
(मूख) मनुष्य दग्म के उदयको जानता हृश्रा मी इन गुणों को चाहता दै 
(ग्रथात्‌ घमं का दोग रचने वाले इन धूर्ता के कपट के व्यवहार से हानि उठा 
कर मी वह वाताहदारारि गुणों बाले व्यत्रितयों में श्रद्धा रखता है | 


यहां प्रस्तुत वाच्य, विषघर, मोर तथा व्याध वृत्तान्त से प्रस्तुत व्यङ्ग्य वाह्य 
ग्राडम्बर करने वाले ढोगियों से ठगे जाने वाले व्यक्ति के वृत्तान्त की प्रतीति 
होने से म्रप्रस्तुतप्रशसा म्रलङ्कारदटहे। दम्भं विदन्‌ श्रपि जाल्मो जनः गणान्‌ 
ईहते - श्र्थात्‌ ढोग को समभता हुश्रा मी मखं व्यक्ति इन गुणों को चाहता है 
यहां विरोध हे क्योकि वह श्रज्ञानी है इस रूपमे परिहार दहो जाता है- इस 
प्रकार यहां विरोधामास अलङ्कार है। 

स्राचा्यं मम्मट ने काव्यप्रकाश 7.283 में इसे विध्ययुक्ततादोष के उदाहरण 
के रूपमे रखा है। वाताहार का त्रत सबसे कठिन है, उससे श्रभ्रतोयकणिका- 
पान का त्रत सरलदहैग्रौर मृगचमं के घारणमात्र का व्रत बहुत सरल है । 

~(-0 3118811 ॐ61९/18/ [ 081९0801 0661101. [1011260 0 ©810011 


१०० भलत्लटणतकम्‌ 


रतः सरलता के कम से सवसे पहले मृगचमं धारण करने के त्रत का उसके 
बाद अभ्रतोयकणिका के व्रत का श्रीर सवसे श्नन्त में वाताहार ब्रत का वर्णनं 
करना चाहिए था । यहां उसका क्रम उलटकर वणेन किया गया है 1 


¶1€ 5702165 12४६ 0€5170४८५ {16 शशगात अलः 19६1782 11 1110 
01100666 ए [1778६ © अ17 011४; 11056 (67081668) 9५6 6६९) €) 
ए ए 116 [68606८5 7० ०ए§ल ४८ धा€ दात ४०९ त 11४1082 01 तात 
0 1417-8; {16 68606८5 08४८ एद) ा€त ०४ (€ पाल § 
९८108 16 [ठत अत) ग व्वप्र वल्ल, करणा 9४का€ ० #13 
719111६5121101 9 0%00लांऽ४, 1116 090115॥ 5111 12४८ 1116108 णि ऽप्ला 
०००1168. (0०1९6 ए४ शपा. 17 (वे, व5द 11 [2058012158- 
7212, 7.283.) | 


ऊढा येन महाधुरः° सुविषमे मागे सदंकाकिना 

सोढोग्येन कदाचिदेव न निजे गोष्ठेऽन्यशौण्डध्वनिः। 
भ्रासीद्‌ यस्तु गवां गणस्य तिलक^स्तस्येव सम्प्रत्यहो 

धिक्‌ कष्टं धवलस्य जातजरसो गोः पण्य^मुद्‌घोष्यते ॥८५।। 


एकाकरिना येन सदा सुविषमे मागं महाधूरः ऊढाः । येन निजे गोष्ठे 
कदाचिदेव अन्यशौण्डघ्वनिः न सोढः । यः तु गवां गणस्य तिलकः 
ग्रासीत्‌ । ग्रहो, सम्प्रति जातजरसः धवलस्य तस्य एव गोः पण्यम्‌ 
उदु घोष्यते (इति) धिक्‌ कष्टम्‌ । 


उढो येनेति । सुविषमे निम्नोन्नते मार्गेऽध्वनि । एकाकिना श्रसहायेन 
वृषभेण महान्‌ भारो यस्य स तथोक्वः । रथादिरित्य्थः । धृतः धरते: कमणि 
क्तप्रत्ययः 1 येन वृषभेणैव कदाचित्‌ कस्मिंदिचत्‌ काले निजे स्वकीये गोष्ठे 
त्रजादौ 1 म्रन्यशौण्डध्वनिः भ्रन्यस्यापरस्य यौवनदर्पातिशवमत्तस्य । मत्ते 
शौण्डोत्कक्षीना इत्यमरः । शवनिर्नादोऽपि न सोढः न क्षान्तः । कमणि क्तः। 


„अ, क, मा; ऊढो म, ह्‌ 

„ म, मः, हु; महाधुराः अ, क 
, फ, म, मः, हु; सोढाम 

, अ, म, ह्‌; तिलकं क 

क, पष्य अ; मः, मः, हु 


^+ => +> £> ~~ 


((-0 9118511। 51164118 1 05111.181। 01661100. 01011260 0 66810011 





भल्लट शतकम्‌ १०१ 


यस्तु गवां पञ्ूनां युधस्य गणस्य तिलक आसीत्‌ । सम्प्रति इदानीम्‌ । जात- 
जरसः परिप्राप्तवाघकस्यात एव ववलस्य शओोणितक्षयेण शुभ्रत्वमापन्तस्य 
गोः पो वषमस्येत्यथः । गोरब्देनोज्ञोऽपि ध्वन्यते । पुण्यं सच्चरितमुद्घोष्यते 
संस्तूयते । पुरा मयवं कृतमिति सर्वजनसमक्षं स ङ्कीत्य॑त इत्यथैः । तस्य तथाविधं 
कष्टं निन्दितकृत्यं धिक्‌ । म्रात्मस्तुतिरनाचारत्वेन परिहायेति मावः । 


श्रकेले जिघने हमेशा बहुत ऊंचे नीचे रास्ते पर बड़े बडे भार टोये, जिसने 
त्रपनी गोशालामं कमी भी ग्रन्य मतवाले सांडकी हृकार नदीं सदी श्रौर जो 
वेलं के समूह का तिलक था; श्राश्चरयं है; श्रव वृह हए उसी सफेद वेल की 
(बेचने के लिए) बोली लगाई जा रही है । धिक्कार दै ग्रौर यदहं वड़े दुःख की 
वात है । 

"पण्यमुद्घोष्यते" इस वाक्य से वैल के मावी वध की व्यञ्जना से 
प्रतीति होने के कारण यहां करुणरसध्वनि है । श्रप्रस्तुत वाच्य वैल के दृत्तान्त 
से प्रस्तुत व्यङ्ग्य ग्राजन्म परोपकारी किन्तु वृद्धावस्थामें दु्दगाग्रस्त व्यक्ति की 
प्रतीति होने से श्रप्रस्तुतप्रशंसा ्रलङ्कार है। 
| 0४ एशााणि] 11 15 17291 {1716 एशा111€ 0 (१10 31076 ८०16 681४ 
168४ 10805 01 प्रा1€लया 10465, \?710 ०6५10 701 {021६ 17€ 50070 


2 21 06 0 11 {6 6006) 87 10 ऽ {176 011 ० 31 
02611 15 10४, 011 06601111 ०1५, 06112 20611010. 


प्रस्थानोयोगदुःखं जहिहि नहि नभः पङ्ुसंचा रयोग्यं 

स्वायासायव साधो तव शलभ जवाभ्यासदुर्वासनेयम्‌ । 

ते देवस्याप्यचिन्त्याइचटलितश््ुवना मो गहेलावहेला- 

मूलोत्खातानुमा्गागतगिरिगुरवः^स्ताक्ष्यंपक्षाग्रवाताः ॥८६॥ 
(हे) साधो शलभ ! ्रस्थानोद्योगदुःखं जहिहि, नभः हि पङ्गु- 


सचचारयोग्यं न (विद्यते) । तव इयं जवाभ्यासदुर्वासना स्वायासाय एव। 
चटुलितसमुवनाभोगहेलावहेलाः, मूलात्खातानुमार्गगितगिरिगुरवः ते 


ताक्ष्यं पक्षाग्रवाताः देवस्य भ्रपि श्रचिन्त्याः (सन्ति) । 


|. भ्र, क, मः, हः योगं म" 

2. अ, क, म~, ह; साध्यम्‌ म। 
3. श्र, म, मः. हुः प्रचलित क 
4. क, म, मः, ह; गृरुभिरयस्‌ अ 


((-0 9118511। 51164118 1 05114811 01661100. 01411260 0 6810011 








भल्लटशेतकम्‌ 


| = 4 + चलसाध्यकमारम्भरोनापहासायतनमायासपात्रं च स्यात्‌ । प्रवल 
| स्वसाव्यमपि कर्मानायसेनैव प्रसाध्य सकलश्लाघनीयमहिमा भवतीत्याह-- 
| भ्रस्थानोद्योगेति । साधो श्रन्न मूढेति यावत्‌ । भो शलभ पतद्ध । समौ पतङ्ग 
9. | भ्रस्थानोद्योगदुःखम्‌ प्रस्थाने ग्रहक्यविषये य उद्योगः पुरुषकारः 
10: प रित्यज । म्ाहान्‌ त्याग इत्यस्मात्‌ लोटूप्रत्ययः । तत्र 
संचारयोग्यं संचरणारह ५ । पृङ्गुसंचारयोग्यम्‌ । पङ्खः पादशवितदहीनः । तस्य 
वेगस्थाम्यासः प 1 ॥ ध १८ । तस्मात्‌ तवेयं जवाभ्यासदुर्वासनां ज वस्य 
निवेश ` “स एव दुरवसिना दुर्वृद्धिः श्रथवा जवाभ्यासनाय दुर्वासना 
दुरभिनिवेशः । स्वा यासायेव स्वस्य श्रा $ र अः नवि 
भूतसाम्यवतसतु न तथेत्याह _ => हा ायातसाय कलशाय एव्‌ 
` 1 ट्‌ -- चट्लितस्य प्रचलितस्य भुवनाभोगस्य लाक 


विस्तारस्य यावे 

| | पावला मर्यादा डेलय < त . 
समुत्पाटिताः । माग (दा तस्या श्रवहेलयाऽनादरेणामूलं मूलादारभ्योत्ाताः 
५ ताः । मागमनुगताः अनुमा 


| ते आगतास्समागच्छन्तः संदा । गरुडमागनुसारिण इत्यर्थः | म 
| मारायमाणाः ते तथाविधा; । याता इति यावत्‌। ये गिरयः पवेताः तगृ 
वाता वायवः । देव्य ५ 1 । त्यस्य गरुडस्य ये पक्षाग्र9 
ईइवरोऽपि स्मतं | ` मस्व रस्याप्यचिन्त्याः चिन्तितुमशक्या भवन्ति । 
न शक्नोति किमुतान्य इत्यर्थः । 


श्रे भले परवाने । 
< | | ्रनुचत रथम कने 7 ो | 
क्योकि श्र।काश लंगडे स्थान पर परिश्रम करनेका कष्ट छोड़ा 


४ व्यवितो ॐ चलने योग्य नहीं (दै) । तेजी से चलन 

परिश्रम केलि ही 0 यह्‌ ड-लाहस मरी इच्छा (तुम्हारे) श्रपने (व्यथ) 

| उपेता करने वाले त दूरी शरोर) दिलते ह्‌ सुवनवितार की श्रना 
बने हए, गरुड़ के ^ ८ उलाड़े जाकर मागैतें श्रये हर्‌ पर्वतो से मारी 
~ २।। + ट 1 ८ 

| त्रचिन््य होते है । भाग (से चालित) वे वायु विष्णु देव द्वस *। 


गाव यहद फि दु 
ठतादैतो उत्त व्यथं कृष्य 
टी महन्‌ कार्य कर पाता है । 


द क्त १ - ¢ 
्यक् यद्‌ श्रपने सामथ्यं से बहकर कायभाः 
उटाना पदता है । विशेष सामथ्यं से युक्त व्यि 
मेदहीदैजोपरवैतोको आ अकश मे तीतर गति से चलने की चमत € 
“१ भी उखाड़ करसाय ले चलता है । 
यहां हि २4 

~ ९ -ाहनहिनभःमेल रन्‌ वर्णौ ॥ मोगमेम 
भण की अनेक वार श्रि + ९१।२ वर्णो कीश्ावृत्ति है, मुवनाभा१ 
र्‌ वर्णो की शरा 3८ पहं रौर मूलोत्ातानुमार्गागतमिरिगुरवः मं म्‌, ¶ 
बृत्ति हे रतः ६ ता्‌ © 


1 ग = १ 3 त्रम 
¶ स्वर्‌ व्यञ्जनो की ग्रादर ट इत्यनुप्रास है । देलावदेला में एक ६ हि 
= ॐ । त ट्‌ ते र [ ॥ जरह > 
स्स वाक्याथ के र निमे पमकालद्कार है| ग्रस्थानोद्योग जहि 


तएन हिनभ हप 


। [ज्ञसञ्चारयोग्यम्‌ ट्स वाक्याथ को देत्‌ 


` ~ | ((-0 9118511। 5116118 1 0511९811 01661100. 01411260 0 66810011 





न | - ष. न" ष ॥ र श ए" { क न चं ब. त्म्‌ # + त १ । क = 
| | = "0 1-14-1. ५ ५.9 9 ‰ "~ ५. व कृ २१५ ४. { तः 1.9 र । न, + ~ अः | १) क १, न 2 1 5 8 
(अ न्‌ र 41 धि 0 4 1/8 ¢. ड, ् 9५ (4 = १, 9 ५४ + 4 ~ग (नी ऋ" 19. 1 न 34.23 [क । { „ध =, 





भल्ल णतकम्‌ १०३ 

















मे उपस्थित किया गया है इसलिए यहाँ कान्यलिङ्ख दै। ग्रौर यहां अप्रस्तुत 
| वाच्य शलभ म्नौर तार्यं टत्तान्त से दुर्बल के उपहास भ्रौर सबल को प्रशसा 
के वत्तान्त की प्रतीति व्यल्जित होने से श्रप्रस्तुतप्रशंसा श्रलङ्कार हं। 


(1*€ 0 1116 78119 11216172 दण 11 [एज 16९. ०५४ 15 
101 76811 जि 11€ 700श्लाला॥ ग 8 1876 6300. [€ 16003 
{71{ला1167 ग कव्वृणोप्ाह (6 पवत ज वणत( फ्ठणलाला। पणा 1 
शा 81016 (0 »०४. {16 710श्लपला 8 0 1116 105 27151112 {107 
11€ 05 ०? 68700815 11125 8ध7€ प[ा१1८३016 €शला शि 
१ \0151111- 116 ५105 "111९0 €28119 1६10६ {16 017167151078 01 {116 
{76171716 ७ा1त अपे + 1160 9६ 162५४ 11} 116€ 1001815 70016 
711 तिता 11€ हातात 27 (गा108 171 [ला १५६२/. 


चन्द्रेणैव तरङ्कभद्धिमुखर' संवध्यंमानाम्भसो 
दद्य ्जीवित्मेव कि गिरिसरित्छोतांसि यद्यम्बुधेः । 
तेष्वेव प्रतिसंविधानविकलठं पयतु साक्षिष्विव 
द्ाग्दरपोडधरमागतेष्वपि न स क्षीयेत यद्यन्यथा ॥८७॥ 


यदि चन्द्रेण एव संवर्ध्य मानाम्भसः भ्रम्बुषेः तरङ्ग भङ्जिमुखरं (यत्‌, 
जीवितं (प्राप्यते) किं (तत्‌) जीवितम्‌ एव गिरिसरित्खोतांसि दद्युः ? 
यदि (एतत्‌) श्रन्यथा तेषु एव प्रतिसन्धानविकलं १३यत्पु साक्षिषु इव 
द्राक्‌ दर्पोद्धुरम्‌ म्रागतेषु श्रपिस्न क्षीयेत । 
महतो महानेवोपकतु समर्थो नान्य इत्याट-- चन्द्रेणेवेति । गिरिसरित्लोः 
तांसि गिरिषु हिमवदादिषु याः सरितो नद्यस्तासां प्र वाहाः । चा निशा- 
करेण नान्येनैव्य्थः । तर ङ्ध मद्धखिवहुलं तरङ्काणामूमिणां भङ्गेन सञ्चारेण बहुलं 
# प्रचुरं यथा भवति तथा मङ्ख गैत्यर्थाद्‌ मावे घम्‌ । सवध्यमानं प्रभूतीक्रियमाण- 
मम्भो जलं यस्य स तथोक्तः । समुद्रस्य जीवनमेवोदकमात्रम्‌ अन्यत्र प्राणव रण- 
मात्रम्‌ । यनादिकमित्यथैः । दचयुः किम्‌ | किशष्द ॥ श । नवत्यथः । 
य्न्यथा यद्येवं चेत्‌ जीवनं ददति चेदित्यर्थः । तेष्वेव गिरिसरित्सोतस्सु 
प्रतिसंविधानविकलं प्रतिक्रियाविहीनं यथा तथा पर्त्सु प्रवलोकयत्सु साक्षिषु 
सामाजिकजनैष्विव साक्षाद्‌ द्रष्ठरि सञ्ज्ञायामितीनिम्रत्ययः । द्राक्‌ शीघ्र दपुर 
वेगबहुलं यथा तथा श्रागतेषु म्रभिमुखमापतितेष्वपि केनाम्बुधिनान संक्षीयत 


, अ, म, ह; बहुल कः मः 
अ, मः, ह; जीवनमेव क, म- 

तर अ ° (~| न 1 
कः; संक्षीयेत अ, म~; तत्‌ येत म 


~> {~¬ ~ 


((-0 9118511। 51164118 1 0511/.1811। 01661100. 01411260 0 66810011 


"व 4 | 




















१०४ भत्लटं शतकम्‌ 


न संक्षय प्राप्येत क्ष क्षय इत्यस्माद्‌ मावे लिङ्‌ । सरितस्समागता श्रपि समुद्रस्य 
काश्य कारत्स््येन न परिहत्‌ शक्नुवन्ति । किमु दद्धि प्रापयितुमिति मावः। 
सामाजिका श्रि कस्मिश्चित्‌ केनचित्‌ विलश्यमाने दिदृक्षया समागता श्रपि कलेशं 
कतु परह्‌ वा न दावनुवन्ति । किन्तु माध्यस्थ्येन परदयन्ति । तथा सरित्स्वाग- 
तास्वपि समुद्रस्य दद्धि: क्षयो न वेत्यवसेयम्‌ । 


यदि प्रबद्ध जल वाले समुद्र को लहरों की दिलोरो से शब्दायमान जो 
जीनन चन्द्रमा से ही (मिलता दै) तो वही (मला) क्या पहाड़ी नदियां कं प्रवाह 
इ १ रथात्‌ वे वेसा जीवन नहींदे सरकेगे | यदि यह वात मिथ्या है तो (लोक 
म सुखदुःख के श्रवसर पर) प्रतिकरियारहित (उपकारापकार की चेष्टा स 
विरहित) दोकर ताक्ाद्‌ द्रष्टा बनकर श्राय हुए तटस्थ व्यक्तियों का माति 
(पहा नियो के उन्हीं प्रवाहा) ॐ शीघ्र द्ैयक्त होकर (रस्यन्त वेग से 
मलं के लिए) ग्राने पर भी (कृष्ण पन्न सं) समुद्र को घटना नहीं चाहिए । 


प्रन्त उ = ्‌ र 
( ग्‌ तु नके मिलने पर्‌ ४१ सागरम म जलच्रद्धि नहीं होती रौर उसमें जलाभाव 
भना दी रहता हे) । | 


सोतों को सार लि । 
४ का साक्षी के समान वताने के कारणा यहाँ उपमालङ्कारदै। ग्र 
सामान्य च ९: नरा कै इततान्त से प्रस्तुत व्यङ्ग्य प्रभावशाली व्यक्ति रीर 
¶ व्यक्ति कै तान्त की प्रतीति होने से यहां ग्रप्रस्तुप्रशंसा मीह। 


11 {€ 56 +11]1 113 11512 ५, त 
1101/€711€71{ 0 "2\/5 


प्रस्तुत 


क १1।€ाऽ ९९15 11६ 16507411 11|1 | 
"४ लऽ 0 116 * 1 19 00] वष्ट {0 ट परात्मा, (01५ । ् 
१0४] 70। ९ "वाऽ 81*6 11 10 {१ कव, गाल | 

2€{ 01171310 11 167 11९5166 शल्य {16४ „11.1* 


1प्रा111112 [पा । | 
१ ~ ५१1९0) ०४६ ४६78 "0916 10 1{]६€ 91 (0076 वनन 
461 111.6 €\/९ 1011765865 


किटेकचूलकैन 
चुलुकेन | यो मुनिरपारमव्िं पपौ 

८ 4 पस्मरोऽविकृतमेषः तेषां पिबेत्‌ । 
*भव।त किन्त्विदं बत विकासिघाम्ना विना 


सदप्यस?ि | | 
पि ' 1, & कू र, क, । 


1 ५ १; क्रित ९4 71. प्रि तमेव म? = 


4 1 ¶7“ श ॥ । 
म,मः, हूः परम्भवतिश्च क 
4. मा, प. ह+ कि लििचदे । 


ता 
; 15५ 
ध 1 वरविकासिधाम्न 
>: =; ज्जस्विनिम्‌ चं, म 


वर्तिकां [सिघ्ताषनीां [चिनाकंः निःज्चिदग 
> मथ, ह 


((-0 911851। 9116418 1 05111811 0661100. 1411260 0 68104011 


पधि क 


भत्लट शतकम्‌ १०१५ 


यः (मुनिः) किल एकच्ुलुकेन श्रपारम्‌ ग्रन्थि पपौ (सः) एष 
घस्मरः तेषां सहम्‌ श्रपि पिबेत्‌ । किन्तु इदं विकासिधाम्ना विना 
न सम्भवति ? वत ग्रोजस्विनाम्‌ भ्रन्तः स्थितं सत्‌ श्रपि स्फुरितम्‌ श्रसत्‌ 
इव (प्रतिभाति) । 


महतामन्तरेण बलेनैव कार्यसिद्धिः न वाह्यः साधनकलापरित्याह 
किलक इति । प्रक्षिप्तोऽयं इलोकस्तथापि व्याख्यायते । यो मूनिः भ्रगस्त्यः। 
ग्रपारं निरवयिकम्‌ । अ्रव्धिं समुद्रमेकेन चुलुकेन करतलाभ्यन्तरेण करणेन 
पपौ पीतवान्‌ किल । किलेति वार्तायाम्‌ । घसति भक्षयति सवंमिति घस्मरो 
वाडवाग्निः । संहारश्द्रो वा । सृघस्यदः क्मरच्‌ इति क्मरच्‌ प्रत्ययः । घस्मरो 
भक्षकोऽदूमर इत्यमरः । तेषामन्धीनामपि सह्रमविछ़ृतं भयादिविकृतिरहित- 
मेवेति क्रियावि्ञेषणम्‌ । किलेत्यत्रापि किल शब्द श्राकृष्यते । इदं समृद्रपानम्‌ । 
विकासिधाम्ना प्रसृतकरेण तेजसा विना न सम्भवति । किन्तु न संघटते । 
किमिति काकुः । सूर्यादिवद्‌ वाह्यप्रकाशरदितोपि सम्भवत्येवेत्य्थैः । तदेवोप- 
पादयत्ति- ऊर्जस्विनां तेजोऽतिशययुक्तानाम्‌ । ग्रन्तहं दये स्फ़रतं तेजः स्फुरणं 
तदपि विद्यमानमपि श्रसदिव काष्ठादिगतवह्लयादिवदविद्यमानमिव स्थितं 
भवति । यदाह्‌ कालिदासः - 





दामप्रधानेषु तपोधनेषु 
गूढं हि दाहात्मकमस्ति तेजः । इति ॥ 


निश्चय से वह कदा जाता है कि जिष (्रगरत्य) ने एक चुल्ल में ग्रपार 
समुद्र को पी लिया था (वह) यह (लोकप्रसिद्ध मुनि) भक्षक होने प्र वसे 
हजारो को बिना विक्रृत हुए पी गे । किन्तु यह (समुद्रपान उनके) ग्रत्यधिक 
विकसित (भीतर के) तेज के विना श्रसम्भव होता । श्राश्चय है तेजस्वियो के 
मीतर स्थित तेज उपस्थित होता हृश्रा आ ग्रनुपस्थित सा (दीखता दै) ग्रयात्‌ 
बाह्य रूप से तेजस्वी दिखाई देने बाला सूर्यं समुद्र को नदीं खला पाता पर्त 
त्रन्तर्जिहित तेज से युक्त श्रगस्त्य मुनि के लिए यह सम्भव दह) सकाथा। 


ऋषि के समृद्रपान रूप विशेष प्रथं का ग्रोजस्वियो के भीतर 


यहां ग्रगस्त्य १ 
वचन से समर्थन होने से श्रधान्तरन्यास तथा 


विद्यमान तेज रूप सामान्य 
धा > =त्प लङ्कार है 
सदप्यसदिव मे सम्भावना होने से उत्प्रक्ना अलङ्का ट । 


0 0787८ {16 [1711111688 ०ल्€्ी १9 0116 12110] जा 
11 ‰11111& 10 ५० 50, {16088705 111६ 
) 11170551] "1111061 106 


त्‌ 1€ 58171 \५॥ 
५९३१) ९81 41171 €88119> ४४ 
11121. 15 {115 (8८ ग ता1]112 {116 0६ 


((-0 9118511। 51161118 1 05111९81 01661010. 01411260 0 6810011 





१०६ भत्लटशतर्कम्‌ 


51011108 ऽप ? (16 [४7€ @1811118 (7 {0€ #1070४5 06150115 
00०९5 701 2]0एढा 10 06 दाऽ शण पल ०011४. 


ग्रावाणोऽत्र विभुषणं त्रिजगतो भर्यादया स्थीयते 
नन्वत्रैव विधुः स्थितो हि विबुधाः” सम्भूय पूरणाशिषः । 

शेते चोद्गतनाभिपद्मविलसदुब्रह्मोह॒ देवः स्वयं 
दैवादेति जडःस्वकक्षिभ्रृतये सोप्यम्बुधिनिम्नताम्‌" ॥८६९॥ 


भ्रत्र (्रम्बुघौ) ग्रावाणः (सन्ति प्रय) त्रिजगतः विभूषणम्‌, 
(मरने) मर्यादया स्थीयते । विधुः श्रत्र एव ननु स्थितः । (श्रच्र) विबुधाः 
हि सम्भूय पूणशिषः (म्रभूवनच्‌ श्रपि च) इह स्वयं देवः उदुगत- 
नाभिपद्मविलसदृब्रह्या शेते । देवात्‌ एव स॒ जडः भ्रम्बुधिः म्पि 
स्वकुक्षिभृतये निम्नताम्‌ एति। 


गुणवानपि सुजनो दारिद्रयदोषवशेन कदाचित्‌ नीचकृत्य प्रसज्जतीत्याह- 
ग्राताण इति । भ्रवाम्बुघौ ग्रावाणः पाषाणाः रत्नानीति यावत्‌ । त्रिजगतो 
लोकत्रयस्य । पात्रादित्वात्‌ डीबभावः। विभूषणमलङ्धुारो मवति । येन भ्रम्बु- 
श्वना लोकस्य मर्यादया स्थीयते । लोकस्यावघीभ्रूतस्य-- तिष्ठतीत्यर्थः) तिष्ठते 
भवि लद्‌ । भ्रत्र एव विधुरचन्द्रः। अरतरंवाम्बुधौ स्थितः तिष्ठति । मतिबुद्धि- 
पूजार्थे्यश्चेत्यत्र चकाराद्‌ वतमाने क्तप्रत्ययः । अतराम्बुघो विबुधाः देवाः । 
ग्रन्यत्र विद्रसश्च 1 ज्ञतृवाग्मिसुरा बुधा इत्यमरः । सम्भूय सङद्खीमूय पूर्णाशिषः 
पूर्णाः समृद्धाः आशिषः श्रमृतलाभादिरूपा मनोरथा येषां ते तथोक्ताः । श्रभूवन्‌ । 
किञ्च । इहाम्बुधौ नाभिपग्मविलसदुब्रह्या नाभिपद्मे विलसन्‌ विराजमानो ब्रह्मा 
चतुर्मृखो यस्य स तथोक्तः । देवो विष्णुः । स्वयं शेते श्रनन्यप्रेरितः स्वपिति । 
एवं बहुगुणाढश्योऽपि जडः अ्र्ञप्रकृतिः । डलयोरभेदाञ्जलरूपी च । स तथाविधो 
अम्बुधिः समुद्रोऽपि स्वकृक्षिभृतये स्वोदरपूरणाय दवात्‌ प्रृष्टवशात्‌ निम्नतां 
गरत॑प्रदेशवतितां गम्भीरतां वैति प्राप्नोति । भ्रष्टं केनापि दुनिवारमित्य्थः । 


हस (समुद्र) में बड़े षडे पेत्थर (ह) । (यद) तीनों लोकों का भूषण (दै), 


1. अ, क, मः, इह; त्रिजगत्तम्‌ मः 

2. श्र, क; स्थितोऽत्र विवुधाः; म"; स्वितो भुवि बुधाः द्‌ 
3. म।, मः, ह; दंवादेव गतः अ, क 

4. अ, मः, मः, हु; निम्नगा; क 


((-0 9118511। 51164118 1 05111.181। 01661100. 01411260 0 66810011 


ह, य 


भर लटशतकम्‌ १०५७ 


(यह) मयादा मेँ ठहरा रहता है, निश्चय से यदीं चन्द्रमा हया रहता ह । 
यदीं देवता लोग इकट्ठे होकर पूणंकाम (मनोरथ पूरे करने बाले) होते ह । 
यहीं विष्ु स्वयं सोते है जिनकी नामि से निकले कमलम व्रह्याका वास है। 
भाग्यदोष से वह शीतल समुद्र भी ग्रपना पेट भरने को नीचा को प्राप्त 
होता है । नामि में उत्पनन कमल में शोभायमान ब्रह्मा से संवलित स्वयं विष्णु 
भगवान्‌ सोते ह । दौभाग्य के कारण वह शीतल (महान्‌) समुद्र भी पने पेर 
को भरने के लिए नीचाश्को प्राप होता दै । 


यहां समुद्र का उत्कपं बताने के लिए प्रावाणोऽत्र विभूषणम्‌ एक ही कारण 
पर्याप्त ह परन्तु म्रन्य त्रिजगतः विभूषणम्‌ म्रादि श्रनेक कारण खलेकपोतन्याय 
से उत्कषं कौ सूचना दे रहे हँ इस कारण यहां समुच्चय श्रलङ्कार है । भ्रप्रस्तुत 
वाच्य भ्रम्बुधि वृत्तान्त से प्रस्तुत व्यङ्ग्य गुणवान्‌ प्रौर सुजन होते हए भी 
दुदंशा को प्राप्त व्यवित के दृत्तान्त की प्रतीतिटोनेसे यहां भ्रप्रस्तुतप्रशंसा 
प्रलद्धारमीदहै। 

[1€ा€ 876 1118€ 70]<§ 15106 {11€ 5९8. 1{† 15 171€ जााो8ा7167† त 
1116 1117166 "07103. [{ [31711815 111€ 70 [1€{+ ¢ 60700८६. (11 
1110011 1651065 11 11. {16 ९0०५5 28116760 [<€ 81८ 1011 58115060. 
{1८ &०५ #1§प्प {© ५1036 118४6] 8113685 {16 10115- 1116 16510118 
01466 ° 81381715 --3]§ 01 1{. एष्टा 11121 ०८८87), 016 10 2816, 
185 {0 20 0011 10 71] 115 एला. 


प्रनीर्घ्यां श्रोतारो मम वचसि चेद्‌ वच्मि तदहं 
स्वपक्षाद्‌ भेतव्यं नतु बहु विपक्षात्‌ प्रभवतः । 
तमस्याक्रान्तशे कियदपि हि तैजोऽवयविनः 
स्वशक्त्या भान्त्येते दिवसकृति सत्येव न पुनः ॥९०॥ 
हे श्रोतारः! मम वचसि (भवतां) ्रनीर््या चेत्‌ तत्‌ प्रहु वच्मि। 
स्वपक्नात्‌ (एव) भेतव्यम्‌ न तु प्रभवतः विपक्षात्‌ बहु (भेतव्यम्‌) । 


तमसि हि श्राक्रान्ताञ्ञे (सति) एते तेजोऽवयविनः (नक्नषज्नादयः) स्वदाक्त्या 
कियदपि भान्ति न पुनः दिवसकृति सति (भान्ति)। 

1. अ, ह, मः: अनीर््याः क, मः 

2. मः ह्‌; कियदिव अ, क, मः 

3. अ, मः, मः, हु; भासन्ते क 

4 क, म, मः, ह्‌; भाभ्व्येव अ 


((-0 9118511। 51164118 1 05114811 01661100. 01011260 0 6810011 


~ -~ -*-~- += ~~~ -* ~> “~ 


१०८ भल्तट एतकेम 


बाह्यजातीयकृतादपि भयादाभ्यन्तरं स्वजातीयकृतं भयं वलवदित्याह- 
ग्रनीर्घ्या श्रोतार इति । हे श्रोतारः श्राकणेयितारः जनाः । मम वचसि मद्ाक्ये 
ग्रनीर्ष्या अ्रनसूया चेत्‌ त्यहं व्त्मि वक्ष्यामि । वतंमानसामीप्ये वतंमानवद्रेति 
भविष्यदथं लट्‌ । कि तदित्यत ब्राह-सपक्षात्‌ सजातीयजनसकाश्यात्‌ भेतव्यम्‌ 
उद्विजितव्यम्‌ । निभी भय इत्यस्मात्तव्यप्रत्ययः । प्रवलायमानाद्विपक्षाद्‌ 
विजातीयाच्छन्जनाद्‌ बहु मूयिष्ठं न भेतन्यम्‌ । तदेवोपपादयति । एते गगनतल 
विनः, तेजोऽवयविनः नक्षत्रादयः । तमस्यन्धकारे श्राक्रान्ताशेऽ व्याप्तसकलदिशे 
सति स्वशक्त्या स्वतेजसोऽनुगरुणत्वेन कियदपि स्वल्पमपि मान्ति प्रकाशन्ते । पुनर- 
नन्तरं दिवसकृति सूरये सति भ्रम्युदिते न भान्ति न प्रकाशन्ते । तस्मात्‌ परकी- 
याद्‌ मयादपि स्वकीयमयं वल्लवदिति भमावः। तत्र तमःसूर्ययोः सल्लिधाने 
नक्षत्राणां प्रकाशाच्येन सामान्येनार्थन शत्रुजनादप्यात्मीयजनस्य दुःसहतेजोहा- 
निहेतुत्वकथनाख्यस्य विशेषस्य समर्थनात्‌ सामान्येन विशेषसमर्थनरूपोऽर्था- 
न्तरन्थासोऽलङ्कारः । तदुक्तम्‌--सामान्यविशेषमावेन कायंकारणभाव एव 
निरदिष्टप्रकृतसमथैनमर्थान्तरन्यास इति । 


दे भोतागग॒ | यदि मेरे वचन के विषय में (च्राप लोगों का) विद्रेषभाव 
नदीं है अ्रथात्‌ मेरी बातसे यदिश्रापलोगबुगश न मनायतो र (श्रपनी) 
नात कता हू । पने प्रत्त (के लोगों) से (ही) डरना चादहिएन कि प्रभाव- 
शाली द्रे पक् (के लोगो) से बहुत (डरना चादिष्ट) क्योकि अन्धकार के 
दिशाश्रो मे भर जाने पर ये तेज के पुञ्ज नक्छत्रारि श्रपने सामथ्यं के श्रनुसार 
थोद्धे-बहुत भी चमक लेते है नकि फिर सूये के श्राने पर (उतना भी) चमक 
पाते । 


र्हा श्रपने पक्से उरनां चाहिए न कि विपक्ष से-इस सामान्य वचन 
का--नक्षत्रादि श्रन्धकारमें तो चमक लेते है परन्तु सजातीय सूयं के होते हए 
नहो चमकते-इस विशेष वचन से समथन किया गया है श्रतः य्ह श्र्थान्तर- 
न्यास ्रलद्भार है। भ्रप्रस्तुत वाच्य सूयं नक्षत्र इत्तान्त से प्रस्तुत व्यङ्ग्य 
सजातीय मयदायके बन्धुग्रों के इृत्तान्त की प्रतीति होने से याँ भ्रप्रस्तुतप्रशंसा 
ग्रलद्कारमीदहै। 


0 1151615 { 1 #०प् ५0 10{ 7106 100४ »/0103, 1 11289 ऽ2४ {091 01६ 
510०४1५ ४८ 2021 9 0065 01) {60016 279 1€66 701 ०८ 2814 


9 010€5. {10८ 5875 शालाः 25 71प्लौी 25 11६४ (620, +€) {116 


5, ह; बाक्रान्तदिशे मः 


((-0 9118511। 51164118 1 0511.1811। 01661100. 01411260 0 66810011 








भल्लट णतकम्‌ १०६ 


011811675 816 ०५€ा [00०५९7९ 0# तचा 11९58 01 (8111101 51116 पणुाहा 
{116 ऽए 51165. 


एतत्तस्य मुखात्‌ कियत्कमलिनीपत्रे कणं वारि'णो 
य नमक्तामणिरित्यमंस्त स जडः श्युण्वन्यदस्मादपिः। 
ग्र ्गुल्यग्रलघुक्रियाप्रविलयिन्यादीयमाने रान 
कू त्रोड्धोय गतो ममेत्यनुदिनं निद्राति नान्तःद्युचा ॥६१।। 


स जडः कमलिनीपत्रे वारिणः कणं यत्‌ मूक्तामणिः इति अमंस्त 
एतत्‌ तस्य मुखात्‌ कियत्‌ । श्रस्मात्‌ ्रन्यत्‌ श्रपि श्यणु । (वारिकणे) 
रनः ग्रादीयमाने अद्धल्यग्रलघुक्रिया प्रविलयिनि सति मम (मिः) 
कुत्र उटीय गतः इति श्रनुदिनम्‌ भ्रन्तःश॒चा न निद्राति । 


ग्रज्ोक्तं समीचीनमिति यो मन्यते स एवानज्ञ इत्याह ~ एतत्तस्येति । यः 
कमलिनीपत्रे नलिनीदले स्थितं पाथसो जलस्य कणं व्रिन्दुं मुक्तामणिरित्यमंस्त 
मौक्तिक मन्यते स्म । मन ज्ञान इत्यस्मात्कतंरि लुङ्‌ । मृक्ताम रिरित्यत्रेतिङब्देन 
निपातेन मुक्तामणेरभिदहितत्वादनमिहित इति द्वितीया न मवति । यदाह- 
वामनः- निपातेनाम्यभिहिते न कमणि क्मविभमवितः । परिगणनस्य प्राधिक- 
त्वादिति । स समन्ताञ्जडः भ्रज्ञ एव । तरय जडस्य मुखात्‌ सकाशात्‌ कियत्‌ 
स्वल्पं यदेतन्मोक्तिकायतनं श्चृप्वन्नपि पुरुषः । तस्माप्पू वस्माज्जनात्‌ जड एव 
भवति । तदेवोपपादयति । ततोऽनन्तरमादीयमाने स्वक्रियमाणो तत्र जललवं 
ग्रङ्गुल्यग्रलघुक्रियाप्रलयिनि स्रङ्गुल्यग्रेण या लघुक्रिया मन्दस्पद्ञेः तया प्रविलयिनि 
नदवरे सत्ति ममायं मुक्तामणिरुड्‌डीय उत्प्लुत्य गतो विनघ्र इति । म्रन्तइणुचा 
मनोदुःखेन दहेतुना अनुदिनं प्रतिदिनम्‌ । न निद्राति न स्वपिति । एतदुक्तम्‌- 
जललवे मुक्तामणिभ्रान्तिमतो वचने प्रामाण्यवुद्धच। तज्जिहीर्पृस्तदपायेन संताप- 
माप्नुवन्‌ जडतम इत्युक्त दति । 


कमलिनी के पत्त परर स्थित पानी कीवँद कोउस मूखं ने मोती समभ 


„ अ; पाथप्तोक, हु; वारिणां म' 

, अ, म, ह्‌;योक 

अ, मः, ह्‌; ग्युण्वन्नकस्मादपि क 
अ, ततस्‌ क, म“, ह; पुनस्‌ मः 

अ, क, म, ह; कुतोडडीय संशोधित 
„ भ्र, म), दहः त्यनुनिण कं 


(+>, +नः 


<, ८ ~> ८ 


((-0 9118511। 51164118 1 05114811 (01661100. 01411260 0 66810011 


११० भल्लटशतकम्‌ 


भ 


लिया । यह तो उसके मख से बहुत चछोटी-सी (मूखता की) बात है । इससे 
भी द्धी मूर्खता की यह वात सुनो कि श्र॑ुली के श्रगज्ञे भागसे धीरेसे द्र 
लेने से उसके लुप्त होने पर (श्र्थात्‌ च्रंगुली मे लगकर केही उसके सूख जाने 
के कारण) मेरा मुक्तामणि उड़कर कहां चला गया इस श्रान्तरिक शोक के 
कारण प्रतिदिन सो नहींपाता हे। 


यहां प्रस्तुत वाच्य जड व्यक्ति कै वृत्तान्त से परप्रत्ययनेयवुद्धि अर्थात्‌ 
द्सरों की वात को विना समभ ठीक मानकर चलने वाले प्रस्तुत मूखं 
व्यक्तियों की व्यञ्जना से प्रतीति हो रहीटै ग्रतः यहाँ ग्रप्रस्तुतप्रशंसा म्रलद्धुार 
है । जललव में मुक्तामणि कौ आ्रान्ति होने से यहाँ भ्रान्तिमान्‌ श्रलद्धुार भी 
हे । 

11 15 3 51811 71131 (2 [00115111655) 11181 11115 001 162870९ 
1116 ०६५# ध70 011 116€ 1015 168 25 8 1010 1९6५८]. (01€8{ला 0011511. 
1688 15 {115 {111 2{ {€ 41580061816€ 2 1116 १९५५ ५700 एणा] 8 
71167€ {0५1 ० (16 णि &श्ा{ 9 115 0716, 16 15 71६्तं (णा) हर 
110 8117101 51८९] €शला# ०8४ {111178,  "€ा€ 1185 17४ 700४ 
\/211511€0 8५५३१ ?" 


प्रास्तेऽत्रेव सरस्यहो बत कियान्‌ सन्तोषपक्षग्रहो 

हंसस्यास्य मनाङ्‌ न धावति मनः. श्रीधाम्नि पद्मे" क्वचित्‌| 
सुप्तोऽद्यापि न बुध्यते तदितरांस्तावत्प्रतीक्षामहे । 
वेलामित्युदरम्प्रिया मधुलिहः सोढु क्षणं न क्षमाः ॥&€२॥ 


(ग्रसौ) ्र्र सरसि एव श्रास्ते। बत । कियान्‌ सन्तोषपक्षग्रहुः | 
अस्य हंसस्य मनः क्वचित्‌ श्रीधाम्नि पद्ये मनाक्‌ न धावति (किन्तु) 
सुप्तः ग्रद्य श्रपि न बुध्यते तत्‌ तावत्‌ इतरान्‌ प्रतीक्षामहे इति (विचायं) 
उदरम्प्रियाः मधुलिहः क्षणं वेलां सोदु न क्षमाः (सन्ति) । 


निस्प्रहः न समीपस्थमपि दातारं सेवते लुन्धस्तु दुरादागत्यापि सेवत 
इत्याह-- ग्रास्तेऽतरैवेति । स प्रसिद्धो हंसो मरालः । भ्रत्रैव सरसि कासारे भ्रास्ते 





1. मः; मतिः अ; म,1 हु, मः 
2. अ, क, हः; पृष्पेमः 
3. संशोधितः; तंदितरस्‌ क, मः, हु; तदितरं अ 
((-0 9118511। 5116118 1 0511/.1811। 01661100. 01011260 0 66810011 


| = अ = व , (त व 


भल्लट शतकम्‌ १११ 


तिष्ठति नान्यत्रेत्येवकारा्थैः । अ्रहो श्रादचयंम्‌ । भ्रस्य हंसस्य मतिर्कृद्धिः धियो 
लक्ष्म्याः वामति निवासभूते पद्मे सरसिजे" । क्वचित्‌ कदाचित्‌ मनागीषदपि न 
धावति न प्रसरति । तस्मात्‌ सन्तीषपक्षः सन्तोषोऽलं बुद्धिः। स एव पक्षो 
वलम्‌ । पक्षः पाश्वगसुत्सध्यसहायवल भित्तिषु इत्यमरः । कियान्‌ प्रभूत इत्यथः । 
वत बत शब्दोऽत्र विस्मये । हसो हि विशुद्धस्थानस्थितत्वात्‌ सन्तुष्टत्वाच्च मान्य- 
मुपयातीत्यथः । उदरभ्प्रियाः कुक्षिम्मरयः। मधुलिहो अमराः । दुष्टा अ्रपि 
प्रतीयन्ते । म्यं पद्यः सुप्तो मुकुलितः श्नन्यत्र निद्रित इत्यथः । म्रद्यापीदानीमपि 
न बुध्यते न विकसति । ्रन्यत्र न निद्रां जहातीत्यथः । बुध्यतेरदेवादिक्रत्वात्‌ 
कतंरि लद्‌ । तस्मात्‌ कारणात्‌ । इत रानन्यत रांल्लो मात्‌ । प्रबोधकालं तावत्सा- 

कल्येन प्रतीक्षामहे द्रक्ष्यामह इति क्षणं व्यापारामावेनावस्थानं तितिक्षित्‌ 
क्षमाः शक्ता न भवन्ति। नि्व्यापारस्थितौ कालविशेषोत्सवयोः क्षणः इत्यमरः । 
पद्मप्रवोवपयन्तं पुष्पान्तरेष्वासज्जतीत्यथः एतदुक्तं भवति । नंस्पृह्यबलेनान्येन 
सेवन्ते इतरे तु लोभातिङयेन खलानपि नैरन्तर्यण सेवन्त इति । 


(वह) वहीं सरोवरमें ही रहता है । च्रे चराश्च है| कितना (्रधिक 
इस हंस ने) सन्तोषव्रल श्रपनाया हृश्रा दै। इस हंस कामन कहीं लद्मी के 
निवासस्थान कमल (तक) की शरोर नहीं मागता है। (जिन्त) सोया हृ्रा यह 
कमल शरभ नहीं जाग रहा है श्र्थात्‌ नहीं खिल्लादै तो तब तक दसरों की 
ग्रोर देख लेते है-एेसा (सोचकर) ये पेट के प्यारे (पे) भैँढरे क्षण भरकी 
देरी को भी सहन करने मे असमथ है । 


यहां श्रीवाम्नि, सुप्तः एवं मधुलिहः पदों में इलेष है । ग्रप्रस्तुत वाच्य हंस- 
मचुप दत्ताःत स प्ररतुत व्यङ्ग्य निःस्पृह तथा लोभी व्यक्ति के इत्तान्त की 
न्यज्जना से प्रतीति हई दै ग्रतः यहाँ श्लेषानुप्राणित श्रप्रस्तुतप्रणंसा अलङ्कार 


है । 


प्र 11५65 [दा€ 17 [11 ला 1866. पठ &7601 15 15 6011611. 
7 ला{ † [16 70176 ला [115 5४/81 15 101 शपा९व्‌ दशल ४ 11€ 10105 -- 
1116 20006 ° [ज[प्ा1€. एष॑ 117€ शण({ला०पऽ 0८65, 5६61702 1121 11६ 
1015 15 88166] 814 101 ३५/३]६€1€त्‌ १€॥, 971€ 7101 16809 10 ए€87 {1€ 
१६1३४ ° ॐ णाहो 87 ०€८ंप८€ 10 फ। पठा ताला, 


1. ह; सरोजे मः 


((-0 9118511। 51164118 1 05114811 01661100. 01411260 0 60810011 


११२ भत्लटशतकम्‌ 


भरकेन क्वणता सरोषपरुषं यत्कृष्णसर्पानने, 
दातं गण्डचपेट"मूज्भितभिया हस्तः समुल्लासितः । 
यच्चाधोमुखमक्षिणी पिदधताःनागेन तन्न स्थितं 
तत्सर्वं विषमन्त्रिणो भगवतः कस्यापि लीलायितम्‌ ।।६३।। 


उञ्भितभिया सरोषपरुषं क्वणता भेकेन कष्णसर्पानने यत्‌ गण्ड- 
चपेटं दात्‌ हस्तः समुल्लासितः, यच्च श्रक्षिणी पिदधता नागेन तत्र 
ग्रधोमूखं स्थितम्‌, तत्‌ सवं कस्य श्रपि भगवतः विषमन्तिणः 
लीलायितम्‌ । 


यो महदपि कार्यं स्वल्पेनेव साधनेन साधयति स एव वलीयानित्याह-- 
भेकेनेति । उज्ितभिया गारंडिकवलात्‌ त्यक्तभयेन । श्रत एव स रोषपरुषं 
सकोपम्‌ श्रत एव निष्डुरं चयथा तथा क्वणता ध्वनता भेकेन मण्डूकेन प्रयोज्येन 
कृष्णसर्पस्य कृष्णोरगस्य आनने मुखे कणयोदचपेटं ताडनं दातुं $ृष्णसर्पान्‌ 
ताडयितुम्‌ इत्यथः । हस्तः करः समुत्लासितः समुतक्षेपितं इति यावत्‌ । नागिन 
पन्नगेन सर्पेण इति यावत्‌ । नागः पन्नगमातङ्ककूराचारेषुतोयदा इति विश्व- 
प्रकाशः । तत्र गिरि गह्वरादौ । रक्षिणी चद्युषी पिदवता निमीलता सता प्रधो- 
मूखमाकुचितम्‌ भ्राननं यथा तथा स्थितं स्थीयते स्म इति यावत्‌ । स्थितमिति 
तिष्ठतेमवि क्तप्रत्ययः । तदेत्सर्वं भगवतो म्रवायवी्यस्यं कस्यापि विषमन्त्रिणो 
गारुडिकस्य लीलायितं विलसितम्‌ । वलिनो न किमप्यज्ञक्यमस्तीति भावः। 
यदा यो राजात्यल्पेन महतोऽभिभवं कारयति तदास्यावस्षरः । 


निडर होकर करोधपूरवैक ककंशु श्रावाज्ञ करते हए मेदक ने जो काले सोप 
के मुंह पर गणएडचपेट (गालो के ऊपर चाँटा) लगने के लिए श्रपना हाय 
उठा लिया श्रौर जो (वह) नाग वाँ श्रँखं बन्द करते हुए मुंह नीचा करके 
वेढा र वह खव किसी तेजस्वी (शवितशाली) विषमन्त्र के जानकार (विषवे्य) 
काखेलाहुश्रा खेल है। 


यहाँ श्रप्रस्तुत वाच्य भेक श्रौर सपं के इत्तान्त से प्रस्तुत व्यङ्ग्य बड़ 
स्वामी का संरक्षणं पाये हए क्षुद्र सेवक द्वारा श्रभिभवप्राप्त मनस्वी पुरुष के 


|. क; कर्णचपेटम्‌ ज, मः, मः, ह्‌ 
2. म, म~; विदधता, क, ह्‌ 
3. ह; चपेटनं मः 
((-0 9118511। 51164118 1 05111.181। 01661100. 01411260 0 6810011 


भल्लरपणत्कम्‌ ११३ 


दृत्तान्त कौ प्रतीति होने से भ्रप्रस्तुतश्रशंसा है। 


41 {115 15 {€ 18४ 9 3 508€-लौीशाताला {09६ 8 {0 {कणा 
2.71 87 125 {81560 15 0206 08175119 ५17 208 0 81387 0 ०6 
266 9 8 वन 6008 200 (6 60072 00812 15 €४€5 125 81004 
४1110 2 10*/6764 266. 


मृत्यो रास्यमिवाततं धनुरिदं चाशीविषाभाः दाराः 
शिक्षा सापि जितार्जुन भ्रशरृत्तिका स्वेत निम्ना गतिः ¦ 

ग्रन्तः कौयेमहो शठस्य मधुरं हा हारि गेयं मुखे 
व्याधस्यास्य यथा भविष्यति तथा मन्ये वनं निमुंगम्‌ ॥€४॥ 


ग्रहो { यथा अरस्य शठस्य ग्याधस्य मृत्योः भ्राततम्‌ भ्नास्यम्‌ इव 
(श्राततम्‌) इदं धनुः, प्रारीविषाभाः च शराः, जिताजनप्रभृतिका सा 
शिक्षा भ्रपि, सवत्र निम्ना गतिः, म्रन्तः क्रौर्यं, मुखे (च) हारि गेयम्‌ 
(विद्यन्ते) । हा तथा मन्ये इदं वनं निभगं भविष्यति । 


वहिरापत्तितमघुरवचनोऽपि खलोऽन्तःकाटिन्येन स्वजनानपि निहन्तीत्याह 
-- मृत्योरास्यमिवेति । राठस्य वक्रिणः 1 निकृतस्त्वनृजुदशठ इत्यमरः । व्या- 
धस्य मृगयोः स ्राततमारोपितज्यमिदं धनुः कार्मुकं मृत्योर्य॑मस्यास्यं मुखमिव 
भयावहं भवति । इमे इषवो बाणा न मवन्ति श्राशीविषाः सर्पाः । सा 
तथाविघा शिक्षा घनुविद्याभ्यासस्तु विजिताजुन्र भृततिका विजिता भ्र्जूनप्रभृतयो 
धनञ्जयप्रमुखा यस्याः सा तथोक्ता ।. बहुत्रीहेः शेषाद्िभाषेति कप्रत्ययः । प्रभरति- 
शब्देनात्र कर्णादयो गृह्यन्ते । स्थितिर्मालीदादिरूपो धन्विनामवस्थानविशेषः । 
सवत्र तत्तस्स्वखूपेषु निम्ना गभीरा निश्चलेत्यर्थः। श्रथवा गतिरिति पाठः । तन्न 
गतिः संचारः 1 निम्ना भ्रन्तर्हिता व्याधाः खल्वटग्यादिषु संचरन्तीति किचान्त- 
मनसि क्रौर्यं हिस्रत्वं वतते । मुखे मधुरं श्राव्यं हारि हदयम्‌ । गेयं गीतम्‌ । यथां 
येन प्रकारेण वतते तथा तेनैव प्रकारेण वनमरण्यं निमृ गं मृगशुन्यं भविष्यतीति 
मन्ये तकयामि । हा शब्दो विषदे । श्रहो भ्राएचर्यम्‌ । अत्राधिज्यघनूर्धार- 
णादिना विशिष्टेन कारणेन मृगहननाख्यं कार्यमनुमीयत इत्यनुमानालंकारः । 


1. क; नाणीविषा नेषवः अ, हु; चाशी वि षाश्चेषवः म! 
2. भ, फक, हु; सा विजितार्जुन मः 
3. म, मः, हु; निम्नाङृति; क 


((-0 9118511। 51164118 1 05111.1811। 01661100. 01411260 0 66810011 


ग्रोहो ! बडे शराश्च की वात है। क्योकिंइस कुटिल शिकारी का मौत के 
कलते हए मख के समान चढ़ी हई डोरी वाला यह धनुष है श्रौर जहरीले सापो 
के समान (विषाक्त) बाण है तथा ग्रजुन श्रादि को मात करने वाली 
(घनुर्वि्या की) वह शिक्त भी हैः सव जगहे नीचे (ककर चलने वाली) चाले 
टै, भीतर क्रूरता (भरी) है (ग्रौर) मुख में मनोहर गीत (है) । हाय | इस (सव) 
से मभ रेखा लग रहा है कि (यह्‌) जगल पशुश्रां से रहित हो जायेगा | 


यहां बन को पशुग्रों से रहित करने के लिए व्याघ के घनुष बाण पर्याप्त कारण 
हैं किन्तु उनकी सहायता के लिए श्रन्य प्रनेक कारणों के उपस्थित दहो जानेसे 
यहां समुच्चय ग्रलङ्कुार हं । यहां निमृंग वन रूपी साध्य कै लिए धनुष भ्रौर 
वाणादि सावन उपस्थित हए हैँ ग्रतः भ्रनुमानालद्कार टै । मन्ये वनं निमृगम्‌ 
मे मन्ये शब्द तथा धनुरादि हेतुभ्रोंके प्रयोगसे हेतू्प्रक्षा है) श्रप्रस्तुत वाच्य 
व्याध ओर वन कै दत्तान्त से प्रस्तुत व्यङ्ग्य वाहरसे मधुर किन्तु भीतरसे 
कठोर दुष्टों से सताये जाने वाले सज्जन के छत्तान्त की प्रतीति होने से यहां 
गरप्रस्तुतप्रशंसा मी दै । श्राशीविषामाः मे वाचकलुप्ता उपमा है । 


1115 80 1§ 1५46 11{€ 106 #2,*7178 7110] ० [2681], {1६ 
27105 276 1116 1{17€ 01501005 51५1८९5, 15 §1६111 €>८ल]§ {178६ 0 
11119 816 01[€ाऽ, 6४९7४८6९ 16 51005. 4188 ! {1113 एणा, 8 
70९06, {183 लप्र] {» 81 16 2110 3 ऽद €161 31177 50112 01) 118 
1175. 1 17116 116 07681 +] ४८ एलार्ली ग 81] 71818. 


कोऽयं भ्रान्तिप्रकारस्तव पवन पदं लोक्रपादाहतीनां 
तेजस्विव्रातसेव्ये नभसि नयसि यत्पांसुपूर प्रतिष्ठाम्‌ | 

यस्मिच्चुत्थाप्यमाने जननयनपथोपद्रवस्तावदास्तां 
केनोपायेन साध्यो वपृषि कलुषतादौोष एष त्वयेव ॥& ५॥ 


(रे) पवन । तव श्रयं कः भ्रान्तिप्रकारः ? यत्‌ (त्वम्‌) लोकपादा- 
हतीनां पदं पासुपूरं तेजस्विब्रातसेव्ये नभसि प्रतिष्ठां नयसि । यस्मिन्‌ 
उत्थाप्यमाने जननयनपथोपद्रवः तावत्‌ ्रास्ताम्‌ (किन्तु) वपुषि एष 


कलुपतष्ीवः; वया एव कैत उपाये पाध्यः (स्यात्‌) 


ययया 
~त व---- 


|, म, मः, हः पादाहतानां ज, क 
2. म, मः, हः यस्मिन्‌ अ, क 


((-0 ॐ118511। 5116118 1 0511/.181। 01661100. 01411260 0 60810011 





भल्लटशतकम्‌ | १११ 


दुष्टस्य वघनेनात्मनः परेषां च महत्यापत्तिरापतेदित्याह्‌ -कोऽयमिति । हे 
पवन वायो । तेजस्वित्रातसेव्ये तेजस्विनां निकरेण सूर्यादिना सेव्ये सदाश्रवणीये 
नभसि गगनमागं ्रनेन पदद्वयेन महाप्रभुसमुचितमुन्नतं राज्यादिपदं प्रतीयते । 
लोकपादाहतीनां कृत्स्नस्य प्राणिवगंस्य पादाहतीनां चरणाभिघातानां पदं स्थानं 
पात्रमिति यावत्‌ पासुभूरं रजोनिकरं प्रतिष्ठामास्पदं स्थानं नयसि प्रापयसि 
नयतेगत्यथत्वाद्विकमंकत्वम्‌ 1 पासुपूर इत्यनेनतुच्छजनः प्रतीयते । तवायं 
परिदृश्यमानः आन्तिप्रकारो श्रान्ते विपर्येयज्ञानस्य प्रकारो विशेषः कः 
कीटशः सर्वातिञ्ञायीत्यथेः । सामान्यस्य भेदको विशेषः प्रकार इति इत्तिकारः । 
त ह्यनेन कि जातमित्यत श्राह -- यस्मिन्‌ पांसुपूरे । त्वयेव भवतंव नान्येनेत्य्थः । 
उत्थाप्यमाने उन्नति नीयमने सति । जननयनपथोपद्रवः जनस्य प्रारिवगस्य 
नयनपथदचक्षुमर्गिः । तस्योपद्रवः क्लेशः । तावदास्तां साकल्येन तिष्ठतु । असेः 
केतंरि लोट्‌ । वपुषि सकलघ्राणिशरीरे । एष परिषटश्यमानः कलुषतादोषः कलु- 
षता मालिन्यं संव दोषः । केनोपायेन शक्यः सोढुं शाक्यो भवेत्‌ । न केनापीत्यथः। 
एष त्वयेत्यत्र एतत्तदोः सुलोपोऽकोरनञ्समासे हलि इति सुलोपः । दृष्रस्तावत्केन- 
चिदुन्नति तीयमान एवाद(वभिचारेण जनस्य चक्षुषि प्रतिबध्य ततः सर्वाङ्गिषु 
व्याधिमृत्पादयतीति भावः । 


(श्री) वायु ! तेरी यह केषी श्रज्ञान भरी रीत रहै नो (तुम) लोगो के 
पेरो के श्राधातों (से कु चले जाने ) के पात्र धूलिसमूह को देदीप्यमान (सूर्यादि) 
ग्रहों के समूह के द्वारा सेवन करने (श्र्थात्‌ श्राश्रय लेने) योग्य श्राक्रश मेले 
जा रही हो । जिसके उढठये जाने पर (समस्त) प्राशि वगे के चन्ुमागे (श्रयति 
श्रोंखो मे धूल भर जाने के) क्लेश का उत्पात तो (मलते दी) रदे (इसकी दमे 
परवाह नदीं है किन्तु तुम्हारे) शरीर पर विद्यमान यद कालिख (पतने) का दोष 
किस उपाय से साध्य (हटाये जाने योग्य श्र थवा सष्टने योग्य) हो पायेगा १ (अर्थात्‌ 
नतोहटाया जा सकेगा श्रौरन दी सदा जायेगा ।) 

यहां अप्रस्तुत वाच्य नेत्रो के लिए कष्ठकारकं पवन इत्तान्त से प्रस्तुत 
व्यङ्ग्य दूसरों को पीडा पहुंचाने वाले किन्तु स्वयं भी बदनाम भ्रौर भ्रान्त 
रहने बाले व्यक्ति कै इत्तान्त की प्रतीति होने से भ्रप्रस्तुत्रशंसा अलद्कार है। 


0 ५1१, "118{ 2 {८2०९6 06026 णा 18 प ? 706 १०७ स्ला 
065€*९§ {० ०९ ०5०९५ ९४ (€ ६९६४ ° ४्€ ए€०0€ 1ऽ एल {भला 
४ ४० 10 {1€ श <$, > 718८८ 07 ध्6 1ए701021165 ! 0 1089 

001 0०76 07 {€ 00ऽ्पलौठा 0 € 51ह0 ग € ए८्गृा€ एप र 


{^ मः} इत्येतेन ह्‌ 


((-0 9118511। 51164118 1 05111.181। 01661100. 01011260 0 66810011 


११६ भल्लट शतकम्‌ 


200६ {0€ ता छप 02४6 एषणा ©) $०णा ००५४ ? 6०५ 15 {141 10 0९ 
7<00*60 9 ? 


एते ते विजिगीषवो नृपगरहदढारापितावेक्षणाः' 


क्षिप्यन्ते वसु याचनाहितधियः कोपोद्धतेवंत्रिभिः। 
ग्रर्थेभ्यो विषयोपभोगविरसंभ्नकिारि यैरादर- 
स्ते तिष्टन्ति मनस्विनः सुरसरित्तीरे मनोहारिणि ॥६६॥ 


एते (ये) वसुयाचनाहितधियः विजिगीषवः नृपगृहद्वारापितावे- 
क्षणाः (सन्ति) ते कोपोद्धतेः वेत्रिभिः क्षिप्यन्ते (किन्तु) विषयोपभोग- 
विरसः यैः भ्र्थेभ्यः ्रादरः न श्रकारि ते मनस्विनः मनोहारिणि सुर 
सरित्तीरे तिष्ठन्ति । 


ये सस्पृहास्ते लोकद्वये दुःखमेवानुभवन्ति । निस्प्ृहा उभयत्रापि सुखमेवेत्याह 
--एते त इति । वसुयाचनाहितवियः वसुनो घनस्य याचनमभ्यथेनं तयाहिता 
विन्यस्ता घीर्द्धिर्येषां ते तथोक्ताः । प्रवेशे प्रहुपूवेतया द्वारदेशे निष्पन्दमाना 
इत्यर्थः । एते परिटश्यमानास्ते तथोक्ताः । विजेतुमिच्छवो विजिगीषवः । रागिण 
इत्यर्थः । कोपोत्थि्तैः कोपेन प्रसह्य सम्भूतेन रोषेण ठेतुना उत्थितैः । ताडनानि 
चिकीर्षूभिरित्यथेः । वेत्रिमि वेत्रघारिमिः। दौवारिकंरिति यावत्‌ । क्षिप्यन्ते 
ग्रपसा्यन्ते । क्षिपतेः कर्मणि लदट्‌ । विरक्तास्तु नैवमित्याह-- विषयोपमोग- 
विरसः चिषयारां शब्दादीनाम्‌ उपमोगे श्रनुभोगे विरसः ग्रनिच्छुभिर्येमहात्मभिः 
कतंभिः । अर्थेभ्यो धनेभ्यः । श्रादानममिलाषो नाकारि न कृतः । करोतेः 
कर्मणि लुड्‌ । च्लेदिचणादेशः। मनस्विनो मानिनस्ते पुरषाः । मनोहारिशि 
हयतमे । सुरसरित्तीरे सुरसरितो भागीरथ्यास्तीरे तटे काश्यादौ तिष्ठन्ति 
मुक्तये निवसन्ति । भूसारत्वं काश्यामिति भावः । 
श्रसारभूते संसारं सारमेतच्चतुष्रयम्‌ । 
कारीवासः सतां सङ्गो गङ्धाभ्यः शम्भपूजनम्‌ ॥ इति. । 


ये (जो) धनको भोगने मेही श्रपनौ बुद्धि लगाने वाले, (धतिष्पर्घा के 


1. अ, मग, ह्‌; दारापमावेक्षणाः क 

2. अ, म।, हु; वरयाचना क 

3. क; कोपोत्वितंर्‌ भ, ह; कोषोदुरंर्‌ मा 
4. अ, क, म, भविभ्योह्‌ 

5. क, ह; भोगविरतर्‌ अ, म" 


((-0 9118511। 51164118 1 05111.1811। 01661100. 01411260 0 66810011 





प 


भत्लटशतकंम्‌ ११७ 


कारण; विजयामिलाषी श्रौर राजा के महल के द्रवाज्ञे पर दण्ट गद्धाने वाले 
(सांसारिक लोभी) मनुष्य (है) वे क्रोध (के च्रावेश क कारण) उदर्ड बेंतधारी 
दारपालो से परे घकेले जा रदे ह (परन्तु) मगो के भोगने में समास सुचि वाले . 
जिन (वीतराग) पुरुषों ने धनों के प्रति सम्मान (आसक्ति) नहीं किया वे प्रशस्त 
मनां वाले (मक्त्मा) लोग देवनेदी गङ्गा सुरम्य तीर पर बैठे हे । 


यहा सरोसारिक विषयों मे फंसे भोगी मनुष्यों तथा वीतराग मुनियों के 
जीवन की वाच्य वस्तु ते निःस्पृह व्यक्तियों का जीवन ही स्तुत्य है इस व्यङ्ग्य 
वस्तु की प्रतीति हो रही है। इस प्रकार यहाँ पर्य॑वसान में शान्त रस का भनू- 


भव होताहि। 


10656 अाणिप्र८ण§ एलाऽ०§ १०0 पणं 2 संल {0 ०0910 */€2100, 
816 1001९118 2६ {71€ ५००८5 © {16 2021866 2 2 {108 € एनण& ठत्र्चय 
० 0 †1€ 4187 &४1ल6]८ल्द४€7§, पणा11६ 10€$ +70, ०८5151०8 ल्ग) 
५९३{॥ 20५ €1]0शणला६ ग ४०01101 ०९16८65, 92४९ 101 870 वा 


16९2470 0 ५९110, 91 ऽ॥धप्रष् 01 {06 ३।1८§ ० {6 (७०88, १८ 
711$ा ° ००5, 


वातां वान्तु कदम्बरेखुशबलाः नृत्यन्तु सर्पद्धिषः 

सोत्साहा नवतोयभारगुरवोः मुश्वन्तु नादं घनाः । 
मग्नां कान्तवियोगदुःखदहनेः मां वीक्ष्य दीनाननां | 
विद्युत्‌ ! कि स्पुरसि*त्वमप्यकरुरोःस्त्रीत्वेऽपि तुल्ये सति ॥६७॥ 


कदम्बरेरुश्बलाः वाताः वान्तु, सपंद्धिषः नृत्यन्तु, नवतोयभार- 
गरवः सौत्साहाः घनाः नादं मुञ्चन्तु । (परन्तु है) श्रकरुणे विद्युत्‌ ! 
कान्तवियोगदुःखदहने मग्नां दीनाननां मां वीक्ष्य स्त्रीत्वे तुल्ये सति भरपि 
त्वम्‌ श्रपिकिस्फूरसि ? 


विजातीयङृतः क्लेशो भूयानपि क्षम्यते न सजातीयङृतः क्लेशः स्वल्पोऽपी- 


क ए व 


1. भ, म, हु; रेणुबहला क 

2. म~, ह; नववारिवाहमुरवो मः; नवतोभारभरतो म; नवतोयपानगृरवो क 
3. क; गहने ह्‌; जलधौ भ्र, मः 

4. मः, मः; प्रस्फुरति म, क, ह 

3. अ, क, ह्‌, मः, मप्थकरूणा भ 


((-0 9118511। 51164118 1 0511.1811। 01661100. 01011260 0 66810011 


=. 


११८ भल्लट गतकम्‌ 


त्याह--वाता वान्त्विति । कदम्बरेणुशवलाः कदम्बरेणुना नीपपुष्पपरागेण 
शवला धस राः 1 वाता वायवो वान्तु सञ्चरन्तु । वातेरदादित्वात्लोट्‌ । वर्षासु 
खलु कदम्बः पुष्पितो भवति । सपद्धिषो मयूराः सोत्साहाः मेघोदयदशनेन 
हिता नृत्यन्तु नर्तनं कुर्वन्तु 1 नवतोयमारगुरवः नवेन वाधिकत्वानतुतनेन तोय- 
भारेण जलनिवहेन गुरवो निङ्चला घनाः जलदाई्च नादं मुञ्चन्तु गजन्त्वित्यथः । 
वातादीनां तुल्यपुरषत्वेन प्रातिकूल्याचरणमुचितमित्यथेः । विदुच्चञ्चले कान्त- 
वियोगदुःखगहने कान्तेन वल्लभेन सह वियोगो विदलेषस्तेन यदृदुःखं तदेव गहनं 
सङ्कटम्‌, अ्ररण्यं वा तत्र मग्नां प्रविष्टाम्‌ श्रतएव दीनाननां म्लानमुखी तां 
वीक्ष्य । उभयोः स्त्रीत्वे स्त्रीभावे तुल्ये साधारणे सत्यपि त्वमप्यकरुणा कृपा- 
विहीना सती कि किमर्थं प्रस्फुरसि प्रकर्षेण विलससि 1 स्त्रत्वाद्‌ विद्युतः स्फुर- 
एमनुचितमित्यथेः । सजातीयया हितंषिण्या भवितव्यत्वादिति भावः । यदाह 
भारविः- बद्धकोपविकृतीरपि रामाश्चारुताभिरमतामुपनिन्ये । पदयतां मधुमतां 
दयितानामात्मवर्गहितमिच्छति स्वः । 


कदभ्ब्र के पराग से मिले हुए पवन (मले ही) चलं; साणों क शत्रु मोर 
नाचे न्रौर नये जल के मार से भारी भरकम उत्साही बादल (भी) गजेन करं 
(परन्तु दे) निर्दय विजलं | (श्रपने) प्रियतम के वियोग की दुःखाग्नि मे जलती 
हुई म्लानमुखी मुके देखकर समान नारीरूप होने पर तुम भी क्यों चमक 
रही हो १ (तुम्हार यद चमककर सुभे चिदाना अनुचित है ।) 


यहां स्फुरण के श्रनौचित्य मे विदत्‌ का स्त्रीटव कारण है। ग्रतः यहां 
काव्यलिङ्क है । विरहिणी नायिका के हारा त्रचेतन विद्युत्‌ पर चेतन नायिका 
तथा वातादि पर नायक के व्यवहारका भ्रारोप होने के कारण समासोक्ति 
ग्रलद्भार है 1 श्र्रस्तुत वाच्य नायिका तथा विद्युत्‌ के इत्तान्त से प्रस्तुत व्यङ्ग्य 
सजातीय कष्टदाता व्यक्ति के टत्तान्त की प्रतीति होने से यहाँ ग्रप्रस्तुतप्रशंसा 
भीदै। 


1. {1€ 1745, 112९6 (णा {06 [नु ° [६६087008 १0०९5, 
त; 1ल {16 ९६८०८८§ ५4१८९; 16॥ {€ लठणवंऽ पिति 16५, 
५21€75 210 011 ग ४1६०१, [पातल्; एण( 0 प्ालाल1€55 11817108 ! 
70%# ०0 #०0५ 3111716 © 8€९108 17€ ° €<] 6८ एणा 11 17 
{9€ 107€ 9 27 ८०४०५९० ०४ 1176 ऽकशषक्यणा ग ४ [प$0876, ४० 
५110 ८011 {0 1116 58116 लि2॥€ 510८. 


((-0 9118511। 51164118 1 05111.1811। 01661100. 01011260 0 66810011 





# 


भत्लंटशतकम्‌ ११६ 


प्राणा येन समपितास्तव बलाद्‌ येनैवमूत्थापितः 

स्कन्धे येन' चिरं घृतोऽसि विदधे यस्ते सपर्यामपिः । 
तस्यान्तः स्मितमात्रकेण जनयज्ञीवापहारं क्षणाद्‌ 

भ्रातः प्रत्युपकारिणां धुरि परं वेताललीलायसे ।॥६८॥। 


(हे) भ्रातः । येन तव प्राणाः समर्पिताः, येन एवं बलात्‌ (त्वम्‌) 
उत्थापितः, येन (त्वम्‌) चिरं स्कन्पे धृतः श्रसि, यः ते सपर्याम्‌ श्रपि 
विदधे । श्रन्तः स्मितमात्रकेण उपलक्षितः त्वं तस्य क्षणात्‌ जीवापंहारं 
जनयन्‌ प्रत्युपकारिणां धुरि परं वेताललीलायसे । 


नीचाः खलूपकर्त्‌रेवापकुवेन्तीत्याह - प्राणा येनेति । हे भ्रातः सोदर ! 
श्रातरिति सोल्लुण्ठनं वचनम्‌ । येन सुजनेन प्राणास्तव समर्पिताः । तुभ्यं प्रदत्ता 
इत्यथः । तवेति सम्बोधनमात्रे षष्ठी । येन स्वं बलात्‌ प्रावल्याद्‌ चेतोः । उत्था- 
पितः श्रापदुम्य उद्धृतोऽसि । येनेवं त्वं चिरं बहु कालं धृतोऽसि भ्रन्नदानप्र दानेन 
पोषितोऽसि। गतयी बृद्धिशून्यस्त्वं सुष्टु भावम्याथतः। उन्मार्ग त्वया न 
वतितव्यमिति समीचीनभावं प्राथितोऽसि । एवं वहुपकारिणस्तस्य स्मितमात्र- 
केण स्मितेनव उपलक्षितः सन्‌ क्षणादल्पेन कालेनंव श्रन्तमनसि जीवापहारं 
प्राणापहारं जनयन्नुत्पादयन्‌ प्राणापहरणोपायमेव चिन्तयन्नित्यथेः । प्रत्युप- 
कारिणां प्रत्युपकारवतां महात्मनां धुयंग्रे परमत्यर्थं वेताललीनायसे पिश्ाच- 
लीलामाचरसि । पिशाचा प्रप्यन्नपानादिदायिनमेव निघ्नन्ति तद्वत्त्वमपि 
रक्षितारमपि तिहंसीत्यथंः । तत्करोति तदाचश्र॒ इति ण्यन्ताल्लट्‌ । णिचश्चेत्या- 
र्मनेपदम्‌ । श्रथवा वेतालेति भिन्नं पदम्‌ । अ्रथवा वेततालपिश्ञाचसहशः पि्ाच 
इव विगतविवेकत्वेन पुरुषोऽपि पिज्ञाच इति उच्यते । लीलां विनोदं करोषि 
लीलायस्े । पर प्राणापह्रणमेवासाधरूनां विनाभोगोऽचिकारः । सत्यां कर्म- 
विभक्तौ च सप्तमी तत्र सम्मतेति । भोज राजवचनाद्‌ द्वितीयार्थे सप्तमी । 


जिस (उपकारी) ने ठम्हारे भीतर प्राण डाले है; जिसने इस भांति बलपूवेक 
वम्र (ऊपर) उठाया है श्रौर देर तक कन्धे पर (भी) वेडाया है तथा जो वम्हारा 
श्रादर सत्कार भी करता श्राया है (इस प्रकार) उस (उपकर्ता) के श्रपने (मन के) 
भीतर सुस्कराट से भरे होकर चण भर मेँ प्राणापषर्ण को पेदा करते हुए 
1, क; त्वं येनैव अ, ह; स्कन्धेनैव म 
2. क; हतकः सम्यक्त्वमभ्ययितः गतधीयन त्वमभ्ययतः म"; गत्तघीः सम्यक्‌ त्वमभ्य- 
यितः अ, ह 


((-0 9118511। 51164118 1 05111.181। 01661100. 01411260 0 66810011 


रस्युपकरताश्नो मे श्रागे होकर तुम पिशाचलीला (चूरतापूएो क्रौडा) की तरह 
काखेल खेल रदे हो। 


यहां किसी अपकारी कौ भर्त्सना की जा रही दहै । वेताललीलायते मे 
क्यङ्लुप्ता वाचकलुप्तोपमा है । वेताललीलायसे से श्रभिप्राय है कि जैसे 
वेताल श्रपने प्रत्युपकारियोंकाही नश करताहैवसेही तुम भी श्रपने उप 
कारीकाही भ्रनिघ्न कर रहेहो। 

तान्त्रिक लोग श्रपने मन्त्रवलके प्रभाव से शव में जान डाल देते ह शव 
जीवित होकर जब बोलने लगता है तो वह श्रपने जिलाने वाले तान्त्रिक की 
ही जान लेने के लिए उतारू हो जाताहै । वेताल की इस विशेषता को हृ 
मे रखकर यहां यह्‌ बताया जा रहाहैकि नीच लोग उपकर्ताका ही अ्रपकार 
करने के लिए उद्यत हो जति ह । 


1116 12118 2४2५४ {716 11६ ग 2 67501 ५४८ 10 115 ताला 
510116- "€ 0650 #1० 724 €श्ला 112 {0 +#७प, \70 पणौ 115 
5761810 120 ९020160 10 51810 प, ५10 120 (ढा11€त्‌ ठप जा 1 
510प्ा0लऽ 210 #110 126 6016 ऽ ५1९९ {6 ४०८- ४० 216 602४1708 
11८6 2 $€]. छना ! #०४ 9€ 21 {16 10 ग हा वदपि। 5075 ! 


रज्ज्वा दिशः प्रवितता: सलिलं विषेण 
खाता मही हुतश्रुजा ज्वलिता वनान्ताः । 
व्याधाः पदान्यनुसरन्ति ग्रहीतचापाः 
कं देशमाश्चरयतु यूथपतिमंगाणाम्‌ ॥६६॥ 
दिशः रज्ज्वा प्रवितताः, सलिलं विषेण (मिश्रितम्‌) मही खाता, 


वनान्ताः हृतभ्रुजा ज्वलिताः, पदानि (च) गृहीतचापाः व्याधाः ्ननुसरन्ति 
(म्रघूना) मृगां यूथपतिः कं देशम्‌ प्राश्रयतु ? 


म्रप्रतिविधेयास्वापत्सु युगपत्‌ समन्ततः समागतास्वपि घीरो ह्यन्यत्र 
जिगामिषुः स्वस्थान एव तिष्ठतीत्याह- रज्ज्वा दिश इति दिशो रज्ज्वा दाम्ना 
प्रवितताः विस्तारितः शृह्कलिता इति यावत्‌ । रज्ज्वेति एकव चनमुपलक्षण- 
परम्‌! सलिलं जलमपि विषेणाक्तम्‌ । सम्मिधित्म्‌ । मही भूमिरपि खाता 
गर्तादिरूपण विदारिता । वनान्ताः भ्रन्तशब्दोऽत्र-- स्वरूपवचनः| हृतभुजा 


1. अ, मः, हू; पार्‌ क, म। 


((-0 9118511। 51164118 1 0511.1811। 01661100. 01411260 0 66810011 





भल्ल्टंगतंकम्‌ १२१ 
श्रग्निना ज्वलिताः दीपिताः दग्धा इति यावत्‌ । व्याघाः किराताः स्वाहितचापाः 
प्रधिज्यवनुर्दवानाः सन्तः पदानि मृगपदचिह्ञानि श्रनुसरन्ति अ्नन्विष्यानुधावन्ति । 
एवं स्थिते मृगाणां युथपति मृगयुयपतिः । सापेक्षत्वेऽपि गमकत्वात्समासः । 
कृष्णासारादिः कं देशं विषयं निर्जविमाश्रयति प्राप्स्यति । वाधायाः सार्वत्रि- 
कत्वान्न किंमपीत्थथः । महान्तो विपत्स्वपि न धैर्यं परित्यजन्तीति भावः । 


दिशाय रस्सी से व्यातत हं (इधर उधर जाल लगे हुए है), पानी विष से 
मिधित है, प्रष्वी खोद दी ई है (गड्ढे बने हुए); बनप्रदेश्‌ श्रागसे 
प्रदी है (ग्रौर) पैरों का श्रनुसरण धनुषों को धारण करने वाल्ते शिकारी कर 
रदे ह (शिकारी पीछाकररदे ह । च्रन) हरिणो के भुएड का स्वामी (रिण) 
किस स्थान का श्राधरयले 


यूथपति के प्राणापहरण के लिए एक ही कारण पर्याप्त था । किन्तु अनेक 
` कारणों का समवाय होने से यहां समुच्चय प्रलङ्कार है । यहां ग्रप्रस्तुत वाच्य 
यूथपति हरिण के उत्तान्त से प्रस्तुत व्यङ्ग्य श्रपने स्थान को दछोडने म श्रसमथे 
भ्रापत्तिग्रस्त किसी नृपति के उत्तान्त की प्रतीति होने से श्रप्रस्तुतप्रशंसा | 
ग्रलद्भारदै। 


€ 10065 9€ 56676 } 97 11६ 01661105, 106 ५8६ 1 
71266 *“1111 {€ 0§०, 1116 <अ) 85 एदा ००९, {€ {7016515 27€ ०9 
07€ 206 {€ 0 प्ल § +णा11 प्ल ए०५५§ 26 1011०108 176 {00151९05 
(ग तल्लाऽ 7109/), फ"6्ा5, शठणातं 016 [लवत्‌ ज {€ ह्ण ग तल्छा$ 
2० °? 


ग्रयं वारामेको निलथ इति रत्नाकर इति 
श्रितोऽस्माभिस्तुष्णातरलितमनोभि जंलनिधिः | 

क एवं जानीते निजकरपुटोकोटरगतं 
क्षणादेनं ताम्यत्तिमिनिकर'मापास्यति मुनिः ॥१००॥ 


भ्रयं जलनिधिः वाराम्‌ एकः निलय इति, रत्नाकर इति तृष्णातर- 
लितमनोभिः भ्रस्माभिः धितः । क एवं जानीते यत्‌ मुनिः निजक रपुटी- 


1. म, मः; मकर, फक, दह्‌ 


((-0 9118511। 51164118 1 05111.181। 01661100. 01411260 0 66810011 








१२२ भल्लटणतकम्‌ 


कोटरगतं ताम्यत्तिमिरनिकरम्‌ एनं क्षणात्‌ श्रापास्यति | 


ग्रसावतीव लुब्धो गुणाद्यर्चेत्यालोच्य प्रभूसेवनमथिव्यापारः किन्तु 
समासन्ननिधनोऽयमिति न केनापि ज्ञायत इत्याह्‌- श्रयं वारामेको निलय इति । 
तृष्णयाऽऽकाडक्षया तरलितं चञ्चलीकृतं मनो येषां ते तथोक्ताः तैरस्माभिरय 
समुद्र एक एव वारां जलानां निलयः श्राश्रयः । यदुक्तम्‌--म्राकाशात्‌ पतितं व 
यथा गच्छति सागरमिति । भ्रनेन सकलजनाश्वय इति ध्वन्यते । इत्यस्मादूचत! 
रत्नाकर इति रत्नानां कौस्तुभादीनामाकरः उत्पत्तिस्थानमिति । श्रत 
सुजनाश्रय इति ध्वन्यते । ्राकरो निवहोत्पत्तिस्थानश्चष्टेपु कथ्यते इति 
विद्वः । जलनिधिः सागरः श्रितः सेवितः । तदनु निजकरपुटीकोटरगतं तिजा 
स्वकीया करपुटी करतलं सैव कोटरं रन्ध्रं तद्गतं प्राप्तं स तथोक्तः । श्रत एव 
ताम्यत्तिमिरनिक्ररं ताम्यत्‌ संतापमाप्नुवत्‌ तिमिराणां मत्स्यादीनां प्राणिना 
निकरः समूहो यस्य स तथोक्तः । श्रनेन विलद्यदाधितजन इति ध्वन्यते । तमन 
जलवि मृनिरगस्त्यः क्षणादेवमनेन प्रकारेण श्राषास्यति निष्योषीकरिष्यतीति क! 
वा जानीते वेत्ति । न कोऽपीत्य्थैः । 


= 2 _~= ८ ट गोन्वकर 

यह समुद्र जलों का एकं ग्रागार है ग्रौर रत्नों का खज्ञानादै, पेता स। ४, 
वृष्णा से व्याकुलमन होकर हमने इसका श्राश्रय लिया था परन्तु यहं ॐ“ 
जानता था कि श्रपने दाय कौ ग्रञ्जलि की खोह मे समाये हूए ग्रौर तड़फड़ात। 


६ बड़ी जड़ी मछलियं | र 
हर अड १ड। मदछलियां के समुदाय बाले इस समद्र को मति त्रगस्त्य क्षण + 
म॑दहीपीलेगे ! | = 


यहां श्रगस्त्य मुनि के द्वारा समुद्र का पी जाना श्रापाततः ्रसम्भव १ 
च (2 = ह 
ठता ह । समुद्रपान त्रिया श्रौर श्रगस्त्य दोनों मे विरोध दहै । ग्रतः ५ 
क्रिया के साथद्रव्यके विरोध वाला विरोवाभास ्रलद्कुार है । ईस # 


६ | 
का परिहार यहद कि श्रपार सामथ्यं वाले श्रगस्त्य मुनि के लिए समु ९ 
पान करना सम्भव था। 


| 11 15 1116 80]€ 1९561\/0} 0 \\/21675, {1115 15 {16 51016०५० 
16५१८18, ५/6, १४] ठा 7111108 {ला1010प् ५1{] {11751 20104016 1 
006. 8४। १10 ५1 [तातठक्र {81 1116 8926 ^ 2838198 ५०४० 
1 101 8 71107161 अहा पष 1 8]0ाषह छशा \1016 5 ० 
(06001165, 111 {116 ५२५11 11146 ४ 115 72173. 


((-0 9118511। 5116118 1 05114811 01661100. 01411260 0 66810011 








क्ष 
४ ^ 
| = 
13 
[त 


1! [ मी 


५ र ~ र ) । # ` ५ 1. ५ ह) ऋ. 4 8.6 ॥ 9 ह अ - पर ॥ (1 कर, - "अ 
, ,- ^ ॥ 1/0. ८ ४५ "` # 1111 4 14 ^. 1 = 
भौ चं, 1 नि 8, ` 8.0 4 # । - = ।  ¶ +, { । * ॥ = 1८ ~ 
= ज १ } (3 ` कक = (ठं ~ =-= हः = 


श्व 
= 


भरलट शतकम्‌ १२३ 


विशालं शाल्मल्या नयनसुभगं वीक्ष्य कुसुम 
शुकस्यासीद्‌ बुद्धिः फलमपि भवेदस्य सटशम्‌ | 
चिरासीनं तस्मिश्च फलमपि देवात्‌ परिणतं 
विपाके तूलोऽन्तः सपदि मरुता सोऽप्यपहूतः ॥ १० १॥ 


शाल्मल्याः नयनसुभगं विशालं कुसुमं वीक्ष्य अरस्य फलय रपि 
(कुसुम) सदृशं भवेत्‌ (इति) युकस्य बुद्धिः भ्रासीत्‌ । त } 
चिरासीनम्‌, देवात्‌ च फलम्‌ ग्रपि परिणतम्‌ । (परन्तु) विपाके भ्रन्तः 
तूलः (सञ्जातः) सः रपि मरुता अपहृतः । 


प्रभूतमर्थं दास्यतीति वुद्ध्याथी सिचेवे । सोऽपि बहुकालेनासारं किञ्चिद्‌- 
ददौ । तदपि दुष्रपुरोदितादिभिरर्पाह्यत इत्येत न्मनसि कृत्वाह - विशालमिति । 
नयनसुभगं नयनयो दृशोः सुभगं रमणीयं विालं महच्छालम ० : 
पिच्छिला पूरणी मोचा स्थिरायुः चाल्मलि दयोरित्यमरः । कुसुम १ ५ 
कुसुमस्य सदशमनुगुणं फलमन्यत्र धर्मादिलामइचं भवेदिति ुद्धिःससुतवन्ना 
सञ्जाता । विशिष्टेन कारणेन कार्यानुमानस्योचितत्वादिति मावः । इत्यव 
ध्यात्वा विचायं उपास्तं सेवितं । उपपूर्वादासे भवि क्तः फलमपि दवाददृ्ट- 
वदातः परिणतं सञ्जातम्‌ । ततो विपाके प यमन्तः फलाभ्यन्तरे 
तूलः पिचुरेव सञ्जातः । तूलः पिचौ भवेत्तलं ब्रह्मदार्विहायसोरिति ५ 
दि तत्क्षणमेव मरुता वायुना श्रपहूतः । सत्यामपि 


हा; । सोऽपि तूलः सप 1 | 
= लु न कार्येस्योतत्तिरिति भावः । 


रष्टकारणसामग्रचायामदष्टकारणाभावे ख 


सेमरके व्र के नेत्रा को सुख दने वाले बड़े पल क व 
फल  ( पुष्प) जेसा दही (न्दर) दोगा (इस प्रकार १) गोते ( ; १९८ ः 
भीतर विचार (उत्पन्न) हश्रा | उत (पेड़) पर तोता देर (यह ४ ह 
रखकर) रहता रहा । श्रौर माग्यवशं फल *। 1५ गया । पकने प्र (उस 
भीतर रू निकली श्रौर वह भी वायु ने तुरन्त ही (उडाकर) छीन ल॑। । 
रक्ष की कुयुमानुरूप फलप्राप्ति मे भरासत्ति 
स धनी दातासे धन कौ भ्राजा रखकर भा 
त की प्रतीति होने स ग्रप्रस्तुतत्रससा 


यहाँ श्रप्रस्तुत वाच्य ाल्मलि 
रखने वाले णुक के दरत्तान्त से कज 
धन न पाने वाले व्यक्ति के इत्ताः 
(कह; सुमद तत्फलमित्ि अ, म ४६ 
2. अ, ह; चिर घ्याल्ोपास्तं म); इति ध्यात्वापारत 
(-0 91188[1। 9116|९118॥ ¡ 05116180 0॥66101. 1011260 0४ €819011 






क = ज्जः ` ज्वा स्कार ऊ 


ङ्ग. क कु क्र लु क = = = ड ङङड ज" =-= न छ = = 


"इसा क ऋद- 


१२४ ` भत्लतटणशतकम्‌ 


ग्रलद्कुार दै। 


000४६ 2८ {116 तनशिाणि णह 00 शला ग (06 5111८ ,60110 (६6, 
(16 7201 प्राजप्रहा( पी कठपात एलका लनाएश्ाणल शिण. ##1( 
{1115 106४ € 67५९4 1६. [.ण्लता# ला€ 20068160 176 पा. #/1€ा) 10 
४25 1106, {0€ा€ लपला६९त्‌ 50706 €01101 0 105106९. {1 02{ 100 ५५5 
5100601४ 0101 ४४४ 0४ {76 (114. 


'सर्व॑प्रजाहितक्रते पुरुषोत्तमस्य 

वासे समस्तविबुधप्रथितेश््सिद्धो । 
चन्द्राशुचरन्दवितततद्युतिमत्यमुस्मिन्‌ 

हे कालकरुट तव जन्म कथं पयोधौ ॥ १०२॥ 


हे कालङ्कट ! सवप्रजाहितकृते, पुरुषोत्तमस्य वासे, समस्तविब्ुध- 
प्रथितेष्टसिद्धौ, चन्द्रशुवृन्दविततद॒तिमति श्रमुष्मिच्‌ पयोधौ तव जन्म 
कथम्‌ (भ्रभूत्‌) ! 


महाकुलपरभूतं यं कृल्चित्ललषमुपालन्धुमाह-सवंति । हे कालकूट महाविष ! 
खलोऽपि प्रतीयते । सवंप्रजाहितकरे सकललोकोपकारिणि । मौक्तिकायुत्त- 
मवस्तुसदूभावादिति भावः । पुरुषोत्तमस्य विष्णोः सुजनस्य च वासे समाश्रय- 
भूते समस्तविवुघप्रथधितेष्टसिद्धौ समस्तानां सर्वेषां विबुधानां देवानां विदुषां च 
प्रथिता इष्टस्यामृतादेः श्रभिलषितस्य च सिद्धिः-निवंत्तियंस्य स तथोक्तः 
तस्मात्‌ कि चन्दरशुद्न्दविततचुति चन्द्राशूनां चनद्रकिरणानां छन्देन निकरेणं 
वितत। विस्तृता या चति दप्ति यस्यास्तीति स तथोक्तः । तस्मिन्तमुष्मिन्‌ 
तश्राविषे पयोघौ क्षीरसागरे तवोत्पत्ति : कथमभूत्‌ । न युक्तमित्यथः । 


दे हालाहल विष! सारी प्रजाका हित करने बाले; भगवान विषु के 
तरिवाषस्थान, समी देवताश्च के प्रसिद्ध प्रिय (ग्रत) का निमांण करने बलि 
श्रौर चन्द्रकिरणों के समूह की फेली हु चमक से युक्त इस समुद्र मे तुम्दाय 
जन्म केसे हृश्रा १ यहाँ ठम्दारा उत्पन्न होना जंचता नहीं है । 


यहाँ श्रप्रस्तुत वाच्य समुद्र में उत्पन्न होने बाले कालकूटद्त्तान्त से 
1. म, ह्‌, म2; अन्य प्रतियो में यह्‌ श्लोक अनुपलग्ध | 


2, संशोधितः; म।, हु मे अनुपलग्ध 


((-0 9118511। 51164118 1 05111.1811। 01661100. 01011260 0 66810011 


भल्लटशतकम्‌ १२५ 


प्रस्तुत उच्च कुल मे पेदा होने वाले नोच व्यक्ति के वृत्तान्त की प्रतीति होने से 
ग्रपरस्तुतप्रशंसा भ्रलद्खारहै। 

0 ६ तरागप[2 00150, 00 15 1८ 2008अण€ दाक्ष $जप अल एन) तिनि 
1115 0८८11 +लु 1§ € ३0०५6 9 &०त प, +€ ८1 तन्ला ० 116 


5९1९५।, णाती 13 (€ छि} [1१८८ 9 लला, (शाली 15 6100 कत्वं 
प {06 37760178 [8 ग € हइत्ठणः ० 7995 0 {€ 70 १ 


फलितघनविटपविघटित- 

पटुदिनकरमहसि लसति कल्पतरौ । 
छायार्थी कः पशुरपि 

भवति जरद्वीरुधां - प्रणयी ॥१०३॥ 


फलितघनतिटपविधटितपटुदिनकरमहसि कल्पतरौ लसति सति 
छायार्थी कः पञ्युः श्रपि जरद्वीरुधाम्‌ प्रणयी भवति । 


भरस्य इलोकस्य कापि व्याख्या नोपलभ्यते । स्वीया टीकाऽत्र प्रस्तूयते । 
करिचत्‌ मूर्खोऽपि याचकः परमोदारं दानिनं परित्यज्य कृपणं न याचते 
इत्याह-फलिघतनविटपेति । फलितः फलभारनम्रैःघनैः निविडः विटपैः 
शाखाभिः विघटितं नाशितं षटु तीत्रं दिनकरमहः सू्येतेजः घमं वायेनस 
तस्मिन्‌ कल्पतरौ कलत्पदक्षे लसति शोममने सति छायार्थी दछायाभिलाषी कः 
पशुः श्रपि जरदूवीरुधाम्‌ जरल्लतानां प्ररायी प्रेमी भवति । 


फलों से भरी घनी (अपनी) शालाश्रों से तीव सूये के तापके दूर करने 
वाले कल्पद्रक्त के शोभित होते हपट कौन पशुभी छाया की चाह करता हृश्रा 
जीणं शीशे लताश्रों का प्रेमी बनता है १ श्र्थात्‌ कल्पतर् को छद फर वह्‌ उन 
लताश्रों की श्रोर नदीं दौढ़तादै। 


यहां श्रषरस्तुत वाच्य पशु कल्पतरु श्रौर लता टत्तान्त से प्रस्तुत व्यङ्ग्य 
मूखं याचक, उदारदानी तथा कपर घनी कै टृत्तान्त की प्रतीति होने से 
ग्रप्रस्तुतप्रशंसा श्रलङ्कुारे है । 

० णत 27010781 ऽल्ल्०६ 30206 ठण्‌ व्टइ०{ (० ५6८४१६५ 274 
४111676 ता6€्‌€ाऽ पाला फला 765 > 1८210218 (1९6 ८804916 
ग ककाव17ह ० 106 ऽत्०लाा& 0681 ० ४116 इण (ण 145 तडा ए 2). 
©1€8 {011 ग 00 €$ &1 णाऽ. 

1, क,म, हू; छायाम्थीं म 


((-0 9118511। 51164118 1 05111.1811। 01661100. 01411260 0 66810011 








((-0 9118511। 5116118 1 0511/.1811। 01661100. 01411260 0 66810011 








परिशिष्ट 


भल्लटशातक का प्रस्तुत संस्करण ह प्रतिलिपि (विश्वेश्वरानन्द विश्ववन्धु 


वैदिक लोध-संस्थान, होशियारपुर) को श्राघार वनाकर तयार किया गया हे । 
इस प्रतिलिपि में मूल इ्लोक तथा टीका माग साथ साथ दिया हरा है । इसकी 
ए्लोकसङख्यः && तक इलोक तथा टीका दोनों है । तदनन्तर १०० से १०५ 
तक लोक के प्रतीक देकर केवल टीका मात्र दी हू्द है। इस संस्करण मे कुल 
१०३ इलोक टँ । सभी प्रतियों मे उपलन्ध होने वाले रलोको को ही इसमें 
सम्मिलित किया गया है । [कि दीघं (२५) तथा न पङ्कादद्भूति (२६) इत्यादि 
कुद दलोक ही इसके ्रपवाद हैँ । | इस संस्करण मे जिन इलोकों को सम्मिलित 
नहीं करिया जा सका है उनकी सूची इस प्रकार हं : 


(क) म्र" प्रति (्रडयार लाइत्रेरी, ्रडयार) मे श्रतिरिक्त छ्ोक : 


१. 


छायामात्मन एव तां कथमसावन्यस्य कत्‌ क्षमः 

गरीष्मोऽयं न तु शीतलस्तटभूवि स्पर्शोऽनलादेः कुतः । 
वार्ता वपंगते गते किमफलं भावीति वा नेव वा 

धिक्‌ कष्टं मुषिताः कियच्चिरमहो तालेन वाला वयम्‌ ।४३॥ 


पाषाराजालजटिलोऽपि गिरि विश्चाल- 

स्तोयस्य नित्यगमनादुपयाति भेदम्‌ । 
कर्णेजप रहरहः प्रतिपाद्यमानः 

कोवा नयाति विकृति दढसौहदोऽपि ॥ १०६॥ 


प्रेडखन्मयूख नखशातरिखा विखात- 
विख्यातवारणगजस्य हरे गहायाम्‌ । 
क्रोष्टा निकरृष्टसरमायुतदष्टनष्ट- 
धाष्टर्यः प्रविष्ट इति कणष्टमहोऽद्य ष्टम्‌ ॥।१०३।। 


भावग्रस्तसमस्तचेतनमनो वेदर्ध्यमुग्धो जनः 
कः स्प्घमिधिरोहति त्रिभुवने चित्रं त्वया तन्वता । 
भवानां सदसदविवेककलनाभ्यासेन जीर्णा तनु | 
दरादेव न नाम येन हदयं सोदुं कतं न ग्रहः ॥६६॥ 
2-0 51851} 31161९18 7081५181} 0661011. [21011260 0 €6810011 





१९८ 


९. 


६. 





भल्लट शतकम्‌ 


रे ध्वाङ्क्ष अ्रतिरूक्षता वचसि ते काशाक्षता क्षम्यते 
लौल्यं नाम तवेव कात्र गणना दिगिविभ्रमण्चैव ते । 
सवं सोढमिदं स्वभावसुलमं व ह्रिवोष्णं यथा 
यस्त्वेवं विनयस्य कापि भवतो ग्रीवाननः सह्यते ॥२३। 
हे माणिक्य तदेतदेव हि वरं यद्‌ वा नरेणामुना 
ग्रन्तःसारनिरीक्षराव्यसनिना चूर्णीक्रितो नाइमना । 
प्राघ्रातं परिचुम्बितं प्रति मुह र्लं पुनइच वितं 
निक्षिप्तं भुवि नीरसेन मनसा खेदं ठा मा कृथाः ॥६६॥। 


(ख) "क ' प्रति (काव्यमाला गुच्छक 1) मे ्रतिरिक्त शोक : 


२९ 


प्रनतः केकेशता वहिदच घटना मर्माविषैः कण्टकं- 


श्छाया मण्डलसस्पृशां तनुभृतामूदेजिनी संस्थितिः । 
ततरामास्तु विधेरिदं विलसितं वर्वूरशाखिन्‌ सचे 


शाखा ते फलशाखिनामपि तिः सम्पत्स्यते मूर्हाम्‌ ।३५। 


एष श्रीमान विरलगणग्राम णी नारिकेल- 

च्छाया यस्य प्रभवति चिरं घर्मशान्त्यै जनानाम्‌ । 

तनाम्भोमिः कतिचन जना वासरास्तषयध्वं 
दास्यत्येतच्छतगुणमयं वारि मूरध्नं दधानः ॥३६॥। 


प्रावाणो मणयो हरि जलचरो लक्ष्मीः पयोमा नुषी 

_ मृक्तौवाः सिकताः प्रवाललतिका दोवालमम्भः सुधा । 
तीरे कल्पमहीरुहाः किमपरं नाम्नापि रत्नाकरो 
दुरे कणैरसायनं निकटतस्तृष्णापि नो शाम्यति ॥^" । 


` दानाथिनो मधुकरा यदि कर्ण॑ताल 


. इरोकृताः करिवरेण मदान्धनुद्धया । 
-उस्यव गण्डयुगमण्डनेहानिरेषा 


भृङ्गाः पुनविकचपद्मवने चरन्ति | १०५ 
"द्वन्मयखनखशातरिखानि खात- 
विख्यातवारणगणस्य हरे 
क्रोघ्रा र ४ 
रा 1नक्र ठसरमासुत टष्ठिनप्र- 
०1 प्रविष्र॒ इति कृष्टमिहाद्य ट्ष्टम्‌ ॥ १०४ 


गृहायाम्‌ । 


`" 5118511| 5116118 1 0511/.181। (01661100. 01411260 0 6810011 





(ग) (म प्रति (गव्नमेण्ट श्रो° म० लाइन 


परि शिष्ट १२६ 


: ६. भावग्रस्तसमस्तचेतनमनो वेदश््यमुग्ो जनः 


क; स्पर्घामवि रोहति त्रिभुवने चित्रं त्वया तन्वता । 


भवानां सदसदिवेकक लनाभ्यासेन जीर्णान्तर 


दरादेव न नाम येन हृदयं वोदुं कतो दुग्रहः ॥६५८।। 


७. विख्यातं विजयावहं रणभुवि व्याक्ष शुम लक्षण- 


स्तं चेन्मुञ्चति कानने नरपतिस्तुङ्खं महान्तं गजम्‌ । 
अ्रवत्थाभ्रकपुण्ड्केधुकद रालीस्वाद्य वंराकुरान्‌, 
स्वैरं तस्य मनोरमे विचरतः का नाम € ॥ १०६ 


री, मद्रास) मेँ श्रतिरिक्त 
शयोक : 


श्रामूलाग्रनिवद्ध कण्टकतचु निगन्घ पष्पोदूगम- ८ 
इधाया न श्रमहारिणी न च फल क्षूतक्षामसन्तप 

बर्बरद्रम । साधु सङ्धरहितस्तत्तावदास्तामही 0 
` अन्येषामपि शाखिनां फलवतां गुक्चय इति जायते ॥ 


, कृष्णं वपु वंहतु चुम्बतु सत्फलानि 


शन्येषु सञ्चरतु चूतवनान्तरेषु । 
-स्कोकिलस्य चरितानि करोतु काम 
1 काकः कलध्वनिविधौ ननु काकं एव ॥। १०४॥। 


धीमन्‌ ग्रस्त समस्तचेतनमनो वैदरध्यमुग्धो जनः 


कः स्पर्धामधि रोहति त्रिभुवने चित्रं त्वया तन्वता । 


। व्यास्तेन जीर्णान्तरं 
† सदसदविवेककलना 1 
५; दरादेव न नाम येन हृदय < करतो दुग्रंहः ॥ १००॥ 


, प्रथक्‌ लमास्थेयमियं स्थिति नौ 


नान्योऽन्यधामाक्रमणं विधेयम्‌ । 


हासामिति कोशनालौ 
समाश्रितौ श्रीगुणमण्डलाम्याम्‌ ॥ २६।। 


्रह्न्मगूखनखशतिलानि लात 0 
विख्यातवारणगणस्य हरे गृहाय 
टो 
क्रोष्टा निक्ृष्टसरयासुतदृष्टिन ४.0 


धाष्टयात्‌ प्रविष्ट इति कष्टमिहाद्य दष्ट 


((-0 9118511। 51164118 1 05111.181। 01661100. 01411260 0 66810011 








१३० भत्लटणतकम्‌ 


६. रणद्भिः कि भेकः श्रुतिकुहर कीलायितरवं- 
वकं वा छि मुकेः प्ररनिधननित्य व्यसिनिभिः। 
सरोराजख्याति . . . दिद... चिरं 
कुरु स्नेहं हंसं मंघुरविरुतं इचा रुचरितेः ॥२२॥ 


(घ) 'मः प्रति (गवरनर ग्रो मे० लादब्रेरी, मद्रास) म म्रतिरिक्त 
श्युमक तधा टीका : 
१. श्रादाय-इत्यादि शलोक ।॥ १०८ 


विविघोपायेन घनम्जयित्वा लोमी तेन किच्न्विदपि पुश्षार्थं साधयितुम्‌ 
श्रजाना न एव व्यथयतीत्याह-श्रादायेति । भ्रनेन परिददयमानेन दुरणवेन कर्त्रा । 
श्रणेवस्य दुष्टत्वं वक्ष्यमाणजलक्षारीकरणादिनेति द्रष्टन्यम्‌ । परितः समन्ता- 
दादाय स्वीकृत्य कि नाम प्रशस्तं क्रि सावितित्यत श्राह निःसरणे वक्त्र 
प्रारम्भोप।ययोरिति विइवः । वारि सलिलम्‌ । श्राह तु शब्दो व्यतिरेके । तज्जल- 
क्षारीकृतं स्वसम्बद्धं लवणमर्घीङृतं बद्धम्‌ । पातालस्य रसातलस्य कृक्षिरभ्यन्तर- 


भदेश: । स एव विपदं रन्ध्रं तत्र विनिवेरितं स्थापितं च। श्रनूनापभोगानहं 


करोति राजादिभ्यो ददाति । भ्रगाघे गतं निक्षिपति चेत्य्शः । तत्र दुः । वस्त 
वस्त्‌ न्यज्यते ॥१०८।। 
२. कटु रटति वाचाटः स्थिरः टिद्िभको यत्र । 
तत्रापसरणं युक्तं मौनं वा राजहंसस्य ॥२४।। 
यत्र मूर्खो बहु प्रलपति तत्र विदग्धेन तुष्णीमासितन्यम्‌ । ततो षा गन्त- 
व्यमित्याह-- कटुरटतीति । वाचाटो मुखरः । टिद्िभको यश्चिको भष्टिको निकट- 


ती समीपवर्ती स्थिरो भूत्वा कटु रटति परूपं शन्नायते तत्र राजहंसस्यापसरणम- ` 


पगमनमन्यतो गभनं मौनं वा युक्तमृचितम्‌ । तदुत्तरं न प्रयोजनम ॥।२४।। 
३. कि तेनेति ॥ 

दुष्टप्रभूसेवया सेवकस्याकंञ्चन्यं तदवस्थमेव मवति 1 सतप्रभोः सेवया तु 
निःस्वेऽपि स्नेन समीक्रियतं इत्याह--कर तेनेति । तेन तादटशेन सकलदेवताश्रय- 
भूतेनेत्यशेः । हेमगिरिणामेरुणा रजताद्रिणा केलासेन वा कि न किमपि प्रयोजन- 
मित्यथेः । तत्र हेतुमाह--यौ मेरुकंलासौ कर्मभूतावाश्चिताः परिप्रष्वास्तरवः शोभ- 
नाच तादृशाः शाखिनः त एव तरवो भवन्ति ! स्वगुणपरिद्त्ति न प्राप्नुवन्ती- 
त्यथः । किन्तु मलयमेव मलयाख्यमेव नगाधि राजं पर॑तोत्तमं मन्यामहे जानी- 
महे । मन्यते देवादिकात्‌ कतरि लट्‌ तदेवोपपादयति । यस्माद्‌ यदाधिताः 
शाखोटः निभ्वकटजा भ्रपि शाखोटः खरपत्रतरुः । कर्णास्भाषायां मिटिलीति 
प्रसिद्धिः । त्तिस्नः पिन्नुमन्दः । कूटजः शक्ततरुः । भ्रपि शब्दात्‌ खदिरादयो 


((-0 9118511। 51164118 1 05111.1811। 01661100. 01411260 0 66810011 


५ 
नन ~ ~ ~~~ ~~~ ~~~ --- ~ ::-- - ----- ~~ -- -- ~~ ना---,= = ाा=-ा=- ाा ~जा.अ- ~ -अ--------------~ा जियाकषासीः -अिन्क-ब्-ब-न--------------न-------- ~~~ -------~--- -~---~-~--~~--~--~--- > 


परिशिष्ट १३१ 


गह्यन्ते । चन्दनानि भवन्तीत्यर्थः । शाखोट शशारपत्रहच ककंशः कटिनच्यदः 
इत्यष्टा ज्गनिघण : पिचुमन्देदच निम्बोऽकरूटजञ्शक्त इत्यमरः । 


४. ग्रावाणो मणयो हरि जलचरो लक्ष्मीः पयोमानुषी 
मुक्तौघाः सिकताः प्रवाललतिका शे वालम्भः सुधा । 
तीरे कल्पमहीरुहाः किमपरं नाम्नापि रत्नाकरो 
दूरे कणेरसायनं निकटतस्तरृष्णाऽपिनो शाम्यति ॥१०६॥ 


विविधविभवातिसमृद्धो बन्धु दशान्तरे निवसतीति वार्ताश्रवरमनोक्ञं 
भवति । कि चौत्सुक्येन. . . को नाम पिपासामपि सं किञ्चिन्न परिहरतीत्याह॒- 
ग्रावाण इति । यतच्राम्भोघौ मणयो रत्नान्येव ग्रावाणः पाषाणाः हरिः विष्णु जंल- 
चरः सलिलवर्ती मस्स्यभ्राय इति यावत्‌ । लक्ष्मीः रमा तु पयोमानुषी जलवतिनी 
मनचुष्यस्त्री खलु । मनुष्याकाराः प्राणिनः सञ्चरन्ति । मुक्तौघा मौक्िकसङ्धा 
एव सिकता वालुका भवन्ति । प्रवाललतिका विदूमलता एव शैवाला मबन्ति 
श्रमृतमेव भ्नम्भो जलं मवति । किञ्च तीरे वेलार्या कल्पमहीरुहः सन्ति । श्रपर- 
मन्यत्‌ कि न किमपि प्रयोजनमित्यथः । भ्रयमम्मोर्निःच समुद्रः । नाम्ना श्रम्मो- 
निधिनामघेयेन करखेन दूरे विदेशे । कणंरसायनं कणेयोः श्रवणयोः रसायनम्‌ । 
रसो वीयं बलातिरयः । ईयते प्राप्यते ग्याघ्यादिनिवतंनाद नेनेति रसायनमोषधि 
विद्येषः । रसायनं विहङ्गेऽपि जराव्याधिभिरोषधमिति विइवः । रसायनं कर्णा- 
मृतं भवति । श्वाव्यगुणमणो भवतीति यावत्‌ । निकटतः समीपे स्थितानाम्‌ । 
सावंविमक्तिकस्तसिल्‌ । तृष्णा पिपासायि नो साम्यति शान्ता भवति 1 समुद्र 
जलस्य क्षारतमव्वादित्यथैः। शमे दंवादिकत्वात्‌ कतरि लब्‌ । शमामष्टाना- 
मित्यादिना दीघं: ॥ १०७ 

५. त्यक्तेति ॥। १००॥ 

वदान्यात्‌ सुलमं लाभमुत्सृज्य कूरं लोभिनं वा सेवमानो मूढ इत्याह- 
त्यक्तेति । हे भ्रमर मधुप । दुष्टोऽपि प्रतीयते । मुग्धो मूढस्त्वम्‌ । मुग्घं सौम्ये 
नवे मूढे इति विद्वः । भ्रनादरेणावज्ञया । भ्ररविन्दमकरन्दं पद्मरागं त्यक्त्वा 
परिहूत्य । किञ्जल्क कल्कपरिधुसरितान्तरेषु किञ्जल्कः केसर एव कल्को 
मलम्‌ । कल्कोऽस्त्री मलैनसोरित्यमरः । तेन परिघुसरितं परितो धूखरीकृतम्‌ । 
ग्रन्तरं मध्यं येषां ते तथोक्ताः । तेषु केतकीविकटसङ्कुटेषु । केतक्या विकट प्रभूतं 
सद्गुटं सम्बाघो येषां ते तथोक्ताः । सद्धुटं स्यान्तु सम्बाध इत्यमरः । तेषु कण्ट- 
केषु गण्डलुश्धसौरस्यलोमी सन्‌ मुधा व्यथेमेव धावति स्व्चरसि। हा हा 
शब्दो विषादे नहि मद्यपायिनो विवेकोऽस्तीति भावः ।1१००॥। 





((-0 9118511। 51164118 1 05111.1811। 01661100. 01011260 0 66810011 


((-0 9118511। 5116118 1 05114811 01661100. 01411260 0 66810011 


भल्लटक्ञतकीय इलो कानुक्रमरिका 


श्लोक श्नोकसङखुणा पुष्ठसङ्ख्या शलोक श्लोकसड्‌ख्या पृष्ठसङ्ख्या 


म्रत्यु्ति १८ २० चन्द्रेणे ८७ १०३ 
ञ्रनीर्ण्या ६० १०७ चिन्तामणे भु ४६ ५६ 
श्रन्तरिषुद्रा २४ रे चिन्तामणेसू ५१ धष 
ग्रमीये ६५ ७५ चिन्नस्त ३५ ३६ 
श्रयं वारा १०० १२१ तत्प्रत्यं ७८ ८६ 
भ्रस्थानो ८६ १०१ तद्वै २० २३ 
ग्रहो गेहे ८२ ६५ तनुतु ७२ - ८२ 
प्रहो स्त्री ८१ &४ तां भवा १ १ 
भ्राजन्मं ५५ ६२ तुंणम ६६ ७६ 
श्रावद्ध ६३ ७२ त्वन्म ३९ ४ 
आम्ना ५४ ६२ दन्ता ५ १६ 
ग्रस्ते ६२ ११० दरे ५२ ` ५६ 
श्रास्त्री ४४ ` ५० द्रविण ६ ७ 

९९ ५७६ न गुर ७१ ८१ 
उत २७ २१ नन्वा ५ ६ 
ञ्डा ८५. १०० न पङ्का २६ ३० 
एतत्‌ ६१ १०६ नामा ८३ ९७ 
एते ६६ ११६ निस्सा पद ६४ 
एषं ७९ ६१ नुत्य २२ २५ 
करभ २३ २६ नोर ४७ ५४ 
कटो ६० ६६ पठन्तौ १२ १३ 
कस्या ७५ ८५ पततु £ १० 
काचो 1 ५ पथि २१ र 
किमि ६४ ७४ परार्थ ५३ ६१ 
कि जातो ३७ ४२ परयामः ४० ८५ 
कि दीर्थं २५ २६ पातः ११ १२ 
किलैक भ १०४ पस्त्वा ७६ ८७ 
कोट १५ १७ प्राणा ९८ ११९ 
कोऽयं १५ ११४ फलित १०३ १२५ 
गते १३ १५ बद्धा < ३ 
ग्रथित २३१ ३५ बुध्या ७३ ८३ 
ग्रावाणो ८६ १०६ भिद्यते ५ ५५ 
चन्दने ३२ ३६ भूर्यास्य ६१ ७० 


((-0 9118511। 51164118 1 05111.1811। 01661100. 01411260 0 66810011 











134 


श्लोक शलोकसङःख्या 


भेकेन 
माने 
मृत्यो 
मौलौ 
यत्किञ्च 
यथा 
युष्मा 

ये जात्या 
ये दिग्घ्वे 
रज्ज्वा 

रे दन्द 
लब्धं 
लन्धा 
वर्षं 

वाता वा 
वाताहा 
विशा 
नृत्त 
शह 


६३ 

ठ 
९४ 
५६ 
३२ 
२६ 

म 
५७ 
८० 
६६ 
५८ 


भ भ 
नः 


४९ 
६२ 
९७ 
८४ 
१५१ 
६८ 
२८ 


एलोकान्‌क्रमणिका 


९१२ 
९ 
१६३ 
६८ 
२७ 
३३ 

र 
६५ 


पृष्ठसङ्ख्पा लोक 


शतप 
श्रो 
सत्त्वा 
सद्व 
सन्तो 
सन्त्य 
न्मु 
स्वंप्र 
सर्वासां 
साधू 
साध्व 
सूर्याद 
सोऽपूर्वो 
संरक्षि 
सं वित्ति 
स्वमा 
स्वत्पा 


हेम 


ष्लोकसङ्ख्या पुष्ठसङ्ख्ना 


(90 
\9 
१६ 
९ 0 
२३६. 
४६ 
२३८ 
९०१ 
४९ 
(~: 0 
९ 
१६ 
+ 1 
५ 9। 
४५ 
७9 


५५५ 


((-0 91185111 96/18 1 05111<181। 0661100. 14111260 0 6810011 





८१ 
म्‌ 
८ 
११ 
५, 
४६ 
४२ 
१२४ 
५२ 
४६ 
२४ 
१६ 
२६ 
ठ्ठ 
५५७ 
५: 
(न्नृ 


99 


((-0 9118511। 51164118 1 05111811 01661100. 01411260 0 60810011 


। 
॥ 





#- क त 
„ न 
| ५ = 
, 
| 
५ । 1 
॥.। 
1 
. 
1] । 1 
| - 
| 
॥ क. 
1 
। । 
॥ 8 ॥ 
। # 
¶ 
„१ 
+ 
॥ 
॥ | ॥ 
॥ धित । 
॥ ५ । 
# 
# । के 





1 ॥, ५. 
५५३. (7) ४ 
१५ 
2 
६. + 
॥ षि च ्# 
+ 
॥ क 0 कृ हे 
८.9 
1 ८‰*१ ` ॥ 
॥ ऋ) 
1} | {+ ॥ ॥ | त ॥ 
|. ६ ॥ ४ १. \१ 
"1. # ~. 
(01 2 174 
। = च ^? न १ 
% ४ हि ५ 
॥ ॥ 
१ # ॥# ॥ # 
 । ५ † 
"क, 44. # | ् 
> = ¢ 
„(+ + 1 ह 4 
॥42 =. । 
त ॥ १ #, ऋ ` ॥ [+ 
॥ १ 


+, १ ॥ (-0 51189111 5161९181 1 05114118॥1। (0166100. 01011260 0 66810011 





((-0 9118511 51164118 1 05114811 01661100. 01411260 0 66810011 








((-0 9118511। 5116118 1 0511/.1811। 01661100. 01411260 0 60810011 








((-0 9118511। 9116९18 1 05111811 (0661100. 01411260 0 €810011 








# ऋः ऋ त नेय क्रन्त